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Geriराम मंदिर चढ़ावा चोरी पर बीबीसी की पड़ताल: प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल
राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर बीबीसी की पड़ताल: प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल
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राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर बीबीसी की पड़ताल: प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Hızlı Bakış

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले की एसआईटी जांच जारी है। इस मामले में आठ लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, जिससे मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

Yapay zekâ özeti

Neden Önemli?

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले में एसआईटी जांच चल रही है और आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

Yazı boyutu

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले की आपराधिक जांच जारी है लेकिन इस मामले से जुड़े घटनाक्रम ने देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थलों में से एक की प्रशासनिक व्यवस्था, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हज़ारों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मंदिर में दान और चढ़ावे की व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भी बहस छेड़ दी है।

चढ़ावा चोरी मामले की पड़ताल करते हुए बीबीसी ने दो ऐसे लोगों से बात की है जिन्होंने राम मंदिर में काम करते हुए दान और चढ़ावे की व्यवस्था को बेहद क़रीब से देखा है।

इन दोनों लोगों ने जो कहा, एसआईटी की शुरुआती जांच में जो सामने आया और राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोग जो कह रहे हैं, ये सब मिलाकर देखें तो इस पूरे मामले की तस्वीर काफ़ी उलझी हुई नज़र आती है.

'प्रभु का धन है, प्रभु देख रहे हैं'

इस पड़ताल में जिस पहले शख़्स से हमने बात की वो जो कुछ महीने पहले तक मंदिर के काउंटिंग रूम में काम करते थे। पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर उन्होंने हमसे बात की।

उन्होंने कहा कि श्रद्धालु जो नकद चढ़ावा दानपात्रों में डालते थे उसे काउंटिंग रूम में लाया जाता था और वहां नोटों की छंटाई होती थी। उसके बाद बैंक की काउंटिंग मशीन से उन नोटों की गिनती होती थी और उस पैसे को बैंक भेज दिया जाता था।

हमने इस शख़्स से पूछा कि क्या उन्होंने या उनके साथ काम करने वाले लोगों ने चढ़ावे की चोरी होते हुए देखी?

उन्होंने कहा, "हमने देखा नहीं लेकिन कभी-कभी ऐसा महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ हो रही है। हमारे साथ काम करने वाले लोगों ने चोरी करने वालों को पकड़ा, कई बार शिकायत भी हुई और कहा गया कि सिक्योरिटी बढ़ाई जाए। जो इंचार्ज थे सुभाष श्रीवास्तव जी, उनसे शिकायत की गई थी। उन्होंने कहा कि ये प्रभु का धन है, प्रभु देख ही रहे हैं, इसमें हम और आप क्या कर सकते हैं। कौन सा हमारे आपके घर से जा रहा है?"

इस मामले की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने अपनी शुरुआती जांच में कहा कि सुभाष श्रीवास्तव मंदिर के गणना प्रभारी थे। वो उन आठ लोगों में शामिल थे जिन्हें 26 जून को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया।

हमने गिरफ़्तार किए गए आठों लोगों के वकील कुलशेखर सिंह से बात की।

उन्होंने कहा कि अभियुक्त सुभाष श्रीवास्तव के मुताबिक वह काउंटिंग रूम के इंचार्ज नहीं थे और उस कमरे में मौजूद नहीं रहते थे जहां नोटों और सिक्कों की छंटाई होती थी और जहां से पैसे की चोरी हुई। उनका दावा है कि वो सिर्फ़ उस कमरे में रहते थे जहां बैंक कर्मचारियों की मौजूदगी में पैसों की गिनती की जाती थी।

पहचान छिपाने की शर्त पर हमने काउंटिंग रूम के जिस पूर्व कर्मचारी से बात की उनका कहना है कि उन्हें पहली बार चोरी की जानकारी अपने साथियों से मिली थी।

उनका कहना है कि कुछ सहकर्मियों ने बताया था कि काउंटिंग प्रक्रिया के दौरान पैसे गायब किए जा रहे हैं। वो कहते हैं कि इसके बाद उनके कुछ साथियों ने काउंटिंग रूम में काम कर रहे कुछ लोगों पर नज़र रखनी शुरू की।

इस शख़्स ने कहा कि काउंटिंग रूम के कुछ कर्मचारी नोटों को जूतों, जैकेटों या कपड़ों के भीतर छिपाकर बाहर ले जाते थे। उनके मुताबिक़ काउंटिंग रूम के कुछ ज़िम्मेदार लोग चोरियों को रोकने के प्रति गंभीर नहीं थे, जिससे अभियुक्तों को किस किस्म का कोई डर नहीं था.

साल 2022 में भी उठे थे गड़बड़ी के आरोप

चढ़ावे की चोरी को लेकर हाल ही में उठा विवाद लगातार सुर्ख़ियों में है। लेकिन राम मंदिर परिसर के भीतर चढ़ावे के पैसे की गड़बड़ी की शिकायतें कुछ साल पहले भी उठी थीं।

साल 2021 और 2022 के दौरान महिपाल सिंह राम मंदिर में काम करते थे और वहां का हिसाब-किताब देखते थे। उनका दावा है कि उन्होंने साल 2022 में मंदिर के चढ़ावे में पाँच लाख रुपये की गड़बड़ी का मामला पकड़ा था।

महिपाल सिंह बताते हैं कि उस समय वह गिनती की प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे। उन्हें दिनभर की गिनती के आधार पर अनुमान था कि बड़ी राशि जमा हुई है, लेकिन शाम को जो आधिकारिक आंकड़ा बताया गया वह उन्हें कम लगा।

महिपाल सिंह कहते हैं, "सीसीटीवी लगे हुए थे, नीचे तख़्ते लगे हुए थे जिन पर सारा पैसा फैला दिया जाता था। पहले सॉर्टिंग (छंटाई) होती थी। फिर वो बैंक वालों को देते थे। तो एक बार मैंने सारे नोट्स पर ध्यान देने के बजाय बड़े नोट्स पर ध्यान दिया की ये राशि आज लगभग इतनी है, देखें शाम को क्या बताते हैं।"

अपनी बात जारी रखते हुए वो कहते हैं, "उन्होंने जो राशि बताई वो मेरे समझ में नहीं आई, मैंने कहा ये पैसा इससे ज़्यादा होना चाहिए क्योंकि बड़े नोट ही बहुत सारे थे। मैंने कहा मुझे कुछ समझ में नहीं आया, आप इस बक्से को खोल कर दिखाइए। जब उन्होंने उसको खोल के दिखाया तो वाउचर में और जो राशि ले जा रहे थे उसके बीच में पांच लाख रुपये का अंतर था।"

महिपाल सिंह के मुताबिक़ अगर बक्सा दोबारा नहीं खुलवाया जाता तो अतिरिक्त राशि का कोई रिकॉर्ड नहीं बनता।

महिपाल सिंह के दावे साल 2022 की घटनाओं से जुड़े हैं और बीबीसी इनकी स्वतंत्र पुष्टि बीबीसी नहीं कर सका है।

महिपाल सिंह का कहना है कि उन्होंने उसी दिन तत्कालीन वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस कथित गड़बड़ी की जानकारी दी थी। उनके मुताबिक उन्होंने गोपाल राव, अनिल मिश्रा और चंपत राय को इस मामले के बारे में बताया। उनका आरोप है कि इसके बाद कार्रवाई होने की अपेक्षा थी, लेकिन इसके बजाय कुछ सीसीटीवी फुटेज हटाने की कोशिश हुई और अगले दिन से उन्हें उस जगह से हटा दिया गया।

गोपाल राव राम मंदिर ट्रस्ट के विशेष आमंत्रित सदस्य थे। चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद उन्हें मंदिर ट्रस्ट के कामों में हिस्सा लेने से मना कर दिया गया।

महिपाल सिंह के आरोपों के बारे में बीबीसी ने गोपाल राव से उनका पक्ष जानना चाहा। उन्होंने कहा कि महिपाल सिंह जो आरोप लगा रहे हैं वो ग़लत हैं और सच एसआईटी की जांच के बाद बाहर आ जायेगा।

इन्हीं आरोपों के बारे में बीबीसी ने अनिल मिश्रा से भी उनका पक्ष जानने की कोशिश की। अनिल मिश्रा की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.

मामले की टाइमलाइन

ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने बीबीसी को बताया कि तीन और पांच जून के बीच पहली बार मंदिर से चढ़ावा चोरी होने की बात सामने आई और ट्रस्ट के भीतर इस पर बातचीत होने लगी।

सात जून को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि 'राम मंदिर' के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है।

आठ जून को श्री राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर कहा कि जिस कमरे में चढ़ावा गिनने का काम होता है उसका ऑडिट चल रहा है और कोई भी उल्लेखनीय बात किसी के भी ध्यान में अभी तक नहीं आयी है।

लेकिन 12 जून को राम मंदिर ट्रस्ट ने चढ़ावे की गिनती से जुड़ी आशंकाओं की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से एक विशेष जांच दल या एसआईटी बनाये जाने की मांग की।

एक ही दिन बाद, 13 जून को राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन कर दिया।

एसआईटी बनने के 12 दिन बाद, 25 जून को उत्तर प्रदेश पुलिस ने आख़िरकार एक एफआईआर दर्ज की जिसमें मंदिर में काम करने वाले आठ लोगों को नामज़द किया गया।

अगले ही दिन, 26 जून को एफ़आईआर में नामज़द इन आठों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ग़ौरतलब है कि एसआईटी के बनने तक और उसके बनने के 12 दिन बाद तक भी इस मामले में कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं करवाई गई।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ट्रस्ट को चढ़ावे की चोरी होने का शक हो चुका था तो एफ़आईआर दर्ज कराने में इतनी देरी क्यों हुई?

आशीष अग्निहोत्री फ़िलहाल राम मंदिर में भोजन भोग प्रभारी हैं और पूर्व महासचिव चंपत राय के क़रीबी माने जाते हैं।

उन्होंने ये माना कि चार जून को ही ट्रस्ट के लोगों ने काउंटिंग रूम में काम कर रहे कुछ अभियुक्तों को सीसीटीवी पर संदिग्ध हरकतें करते हुए देख लिया था और पांच जून से ट्रस्ट ने इस मामले की आतंरिक जांच शुरू कर दी थी।

उन्होंने कहा, "काम करते-करते हमारी नज़र वहां तक गई। कैमरे और काउंटिंग की समीक्षा हो रही है। हालाँकि जो हमारा काम नहीं था वो हमने एसबीआई को दे दिया। जब गड़बड़ी लगी, उन पर सर्विलांस लगाया गया। गुप्त कैमरे लगाए गए।"

हमने उनसे पूछा कि शंका कैसे उत्पन्न हुई?

उन्होंने कहा, "वो जैसे कैमरे के सामने खड़े हो रहे थे, एक निश्चित टाइम पर खड़े हो रहे हैं... ऐसा क्यों हो रहा है।"

तो सवाल वही है कि जब काउंटिंग रूम में काम करने वाले कुछ लोग शक के घेरे में आ चुके थे तो उसके बावजूद ट्रस्ट ने उसी वक़्त एफ़आईआर दर्ज क्यों नहीं कराई?

आशीष अग्निहोत्री कहते हैं, "पहले दिन ही अगर एफ़आईआर करनी होती तो चार पर हम तत्काल करते। जब कैमरे में देखे जाने के बाद शंका हुई तभी हम एसआईटी के पास गए। ऐसा नहीं है कि हमें चोरी का अंदाज़ा नहीं हुआ। छिपाने के कोई प्रयास नहीं किए गए, तुरंत जांच में लगे। किसी के दबाव में आकर जांच नहीं की थी।"

लेकिन बात सिर्फ यहीं नहीं ख़त्म होती।

ट्रस्ट से जुड़े कई लोगों ने ये माना कि इस मामले के शुरुआती दिनों में ही ट्रस्ट ने कई अभियुक्तों से बड़ी मात्रा में चोरी किया गया पैसा बरामद करने का काम शुरू कर दिया था।

एसआईटी ने भी अपनी शुरुआती जांच रिपोर्ट में इस बात की तस्दीक की और कहा कि एसआईटी बनने से पहले ही ट्रस्ट के पदाधिकारी कुछ अभियुक्तों से क़रीब 81 लाख रुपये की बरामदगी कर चुके थे।

अभियुक्तों को पहचाना जा चुका था, ट्रस्ट उनसे चोरी का पैसा बरामद कर रहा था, लेकिन इस दौरान उसने कई दिनों तक पुलिस में इस मामले की शिकायत नहीं की। अहम सवाल यही है: आखिर क्यों?

चंपत राय और नए सवाल

महिपाल सिंह का कहना है कि चार साल पहले चढ़ावे में हो रही गड़बड़ी की जानकारी ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व को देने के बाद उन्होंने इस मामले पर दोबारा ध्यान नहीं दिया। लेकिन इस साल 5 जून को जब वो राम मंदिर के दर्शन के लिए अयोध्या पहुँचे उसी वक्त चढ़ावा चोरी का मामला तेज़ी से चर्चा में आ रहा था। उनका दावा है कि वो 5 जून को ही राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय से मिले।

महिपाल सिंह कहते हैं, "मैं चंपत राय जी से मिलने गया। उन्होंने श्याम योग केंद्र का कोई नाम लिया और कहा कि वहां उन्हें जाना है। उन्होंने कहा- 'तुम्हारा विषय सही था और उसी सिलसिले में मुझे अभी जाना है। हम लोग कल मिल सकते हैं'।"

हमने उनसे पूछा कि "विषय सही था" का क्या मतलब है।

महिपाल सिंह ने कहा कि चंपत राय इस बात की तस्दीक़ कर रहे थे कि चार साल पहले उन्होंने जो पांच लाख रुपये की गड़बड़ी की बात उठाई थी वो सही थी।

इस साल जून में चढ़ावा चोरी का मामला सार्वजनिक होने के बाद चंपत राय ने राम मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफ़ा दे दिया।

सात जुलाई को उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद वो सभी सवालों का जवाब देंगे और पूरा सच सामने आ जाएगा।

बीबीसी ने चंपत राय को संदेश भेजे और उनसे फ़ोन पर बात करने की कोशिश की। लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

इसी बीच महिपाल सिंह ने यह भी दावा किया है कि मामले पर सार्वजनिक रूप से बोलने के बाद उन पर दबाव पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि वह 1968 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर बोलने के बाद उन्हें संगठनात्मक गतिविधियों से दूर कर दिया गया है।

आरएसएस ने इन आरोपों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया, जबकि संगठन के क़रीबी लोगों ने इन आरोपों को निराधार बताया।

राजनीतिक गहमागहमी

इस बीच इस मामले पर राजनीतिक गहमागहमी लगातार जारी है।

अयोध्या में कांग्रेस नेता शरद शुक्ला कहते हैं, "देखिये इस देश के अन्दर तमाम मठ-मंदिर हैं, किसी गाँव किसी क़स्बे के अन्दर कोई छोटा सा मंदिर घंटा चोरी हो जाएगा तो उस मंदिर का पुजारी तत्काल जाकर उसकी एफआईआर करता है, शिकायत करता है। लेकिन ट्रस्ट में इतनी बड़ी विसंगति हुई, इतनी बड़ी चोरी हुई, डकैती हुई... तो उस महालूट की शिकायत तत्काल नहीं हुई। 12-13 दिन बीत गए थे। मैं पहले शिकायतकर्ताओं में से हूँ, लिखित शिकायत मैंने थाना रामजन्मभूमि में जाकर दी है, वो ट्रस्ट क्या कर रहा था?"

अपनी बात जारी रखते हुए वो कहते हैं, "ये बात समझ लीजिये कि इतनी लम्बी चोरी चलती रही, यह किसी को बिना जानकारी के असंभव है। मंदिर के अन्दर लोग लूट कर रहे थे तो इतनी हिम्मत बिना संरक्षण के नहीं मिली है।"

फ़ैज़ाबाद से लोकसभा सांसद और समाजवादी पार्टी नेता अवधेश प्रसाद कहते है, "सारी ज़िम्मेदारी तो भारतीय जनता पार्टी की है। नृपेंद्र मिश्रा जो मंदिर के बहुत नज़दीक हैं, सलाहकार, ज़िम्मेदार लोग हैं, उन्होंने भी इसकी संज्ञा दी है कि चोरी नहीं डकैती है। इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? ट्रस्ट में कौन लोग हैं? उसे भारतीय जनता पार्टी ने बनाया है तो ज़िम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी के लोगों की है, सरकार की है।"

हमने भारतीय जनता पार्टी के नेता और अयोध्या के महापौर गिरीश पति त्रिपाठी से इस पूरे विवाद पर बीजेपी की आलोचना के बारे में पूछा।

उन्होंने कहा, "एक ट्रस्ट गठित हुआ, उसमें कुछ विसंगतियां आईं। उन विसंगतियों पर भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रभावी कार्रवाई कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही है। कहीं कोई विसंगति पकड़ में आई है, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है, कार्रवाई होगी, दूध का दूध, पानी का पानी होगा। कहीं कोई उसके संचालन में कई दिक्कतें आ रही हैं तो उसको ठीक किया जायेगा।"

गिरीश पति त्रिपाठी ने कहा, "कुल मिलाकर यह जो घटना हुई वह नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस घटना से सबक़ लेते हुए राम मंदिर की व्यवस्थाओं को कैसे और प्रभावी किया जा सकता है, कैसे और अच्छा किया जा सकता है। ये सारे प्रयास और सारी प्रक्रियाएं चल रही हैं।"

एसआईटी की शुरुआती जांच में क्या सामने आया?

अब तक गिरफ़्तार आठ लोगों में से छह काउंटिंग रूम में काम करते थे।

बाकी दो लोग काउंटिंग रूम प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव और राम शंकर यादव उर्फ़ टिन्नू हैं। टिन्नू एक वक़्त पर चंपत राय के ड्राइवर थे लेकिन पिछले कुछ सालों में उनके क़रीबी सहयोगी बन गए थे।

एसआईटी की शुरुआती जांच में कहा गया है कि काउंटिंग रूम कर्मचारियों की नियमित तलाशी नहीं होने से ही चढ़ावा चोरी मुमकिन हुई और इसके लिए सुभाष श्रीवास्तव ज़िम्मेदार हैं।

राम शंकर यादव उर्फ़ टिन्नू पर आरोप है कि वो बिना औपचारिक अधिकार के हुंडियों की चाबियां रखते थे। एसआईटी का कहना है कि टिन्नू की सिफ़ारिश पर उनके रिश्तेदार मनीष कुमार यादव को काउंटिंग रूम में नौकरी मिली, जिससे उसे गबन करने का मौका मिल गया।

आठों गिरफ़्तार किए लोगों के वकील कुलशेखर सिंह का कहना है अभियुक्तों पर आदतन अपराधी होने की धारा भी लगाई गई है, जबकि उनके खिलाफ पहले ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं रहा। उनके मुताबिक ये धाराएं सिर्फ ज़मानत रोकने के लिए लगाई गई हैं।

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू के मामले में कुलशेखर सिंह का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर एफआईआर दर्ज होने से पहले ही चोरी की संपत्ति ट्रस्ट को वापस मिल गई थी, तो वह चोरी का सामान नहीं रह जाता। ऐसे में पुलिस द्वारा अब दिखाई जा रही बरामदगी, चाहे घरवालों के ज़रिए हो या बैंक खातों से, ग़लत है।

एसआईटी जांच में यह भी कहा गया है कि साल 2024 में बने सुरक्षा नियमों को 2025 में कमज़ोर कर दिया गया और कर्मचारियों की नियमित तलाशी बंद हो गई। इसके लिए पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा को भी ज़िम्मेदार ठहराया गया है।

एसआईटी के मुताबिक़ अनिल मिश्रा ने सुरक्षा से जुड़े नियमों को लागू नहीं करवाया और जब उन्हें बताया गया कि नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो उन्होंने व्यवस्था सुधारने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। मामला सामने आने के बाद अनिल मिश्रा ने ट्रस्ट से इस्तीफ़ा दे दिया।

पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर कंपनी के एक अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ भीड़ को संभालने की थी और काउंटिंग रूम से बाहर आने वाले लोगों की तलाशी लेने का काम उन्हें नहीं दिया गया था। इस अधिकारी के मुताबिक चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद अब ये ज़िम्मेदारी भी उन्हें दे दी गई है।

एसआईटी सिर्फ़ 27 अप्रैल से 5 जून के बीच की सीसीटीवी फुटेज की जांच कर सकी, क्योंकि उससे पहले का फुटेज उपलब्ध नहीं था।

लेकिन इन 39 दिनों में ही सीसीटीवी पर 70 बार चोरी होती दिखाई दी जिसमें कुछ कर्मचारी नोटों की गड्डियां और खुले नोट अपने कपड़ों, जेबों और जूतों में छिपाते दिखाई दिए।

एसआईटी का कहना है कि अभियुक्तों के बयान और उनके बैंक खातों में जमा रकम इस बात की ओर इशारा करते हैं कि चोरी 27 अप्रैल से पहले भी हो रही थी। लेकिन पुरानी सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध न होने की वजह से ये नहीं कहा जा सकता कि 27 अप्रैल से पहले कितने की चोरी हुई।

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि कितनी रकम चोरी हुई। असल सवाल यह है कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मंदिर की निगरानी व्यवस्था में अगर कोई चूक हुई, तो वह कैसे हुई? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या जांच उन सभी ज़िम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी जिन पर लापरवाही और मिली-फगत के आरोप लग रहे हैं?

13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी से मामले की जांच पर रिपोर्ट देने को कहा था। 19 जुलाई को उत्तर प्रदेश एसआईटी ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफ़ाफ़े में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी।

20 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि मामले में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

Bundan Sonra Ne Olabilir?

Yapay zekâ öngörüsü — kesinlik taşımaz

  • एसआईटी अंतिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी

    Çok muhtemel · Haftalar içinde

Açık Sorular

  • चोरी की एफआईआर दर्ज कराने में इतनी देरी क्यों हुई?
  • क्या एसआईटी की जांच सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी?

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