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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में विभाजन: चुनाव चिह्न और संपत्ति पर किसका होगा अधिकार?
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BBC हिंदी11.06.2026Siyaset7 dk okumaIndia

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में विभाजन: चुनाव चिह्न और संपत्ति पर किसका होगा अधिकार?

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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) तीन हिस्सों में बंट गई है, जिससे पार्टी के चुनाव चिह्न और संपत्ति पर अधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विधायक और सांसद अलग खेमों में बंट गए हैं, और चुनाव आयोग को इस विवाद को सुलझाना होगा।

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Author, प्रत्युष रॉय

पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, दिल्ली

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के हाथों से पार्टी की कमान निकलती दिख रही है.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी का चुनाव चिह्न उनके हाथ में रहेगा? जैसे महाराष्ट्र में शिव सेना की कमान उद्धव ठाकरे के पास में नहीं रही.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद नई सरकार के गठन के एक महीने से भी कम समय में तृणमूल कांग्रेस तीन हिस्सों में बँट गई है.

एक ओर 80 विधायकों में से 60 विधायक पहले ही ममता बनर्जी का साथ छोड़कर बाग़ी हो चुके हैं, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पिछले दिनों दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठाने की मांग की है.

10 जून को सुष्मिता देव ने टीएमसी से इस्तीफ़ा दे दिया है और राज्यसभा की सदस्यता भी छोड़ दी है.

विधानसभा में बाग़ी खेमे के नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित किए जाने के समर्थन में 60 विधायकों ने हस्ताक्षर किए हैं. वहीं दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के कई बाग़ी सांसदों ने बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाक़ात की है.

उस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे. बाग़ी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, यह बैठक शुभेंदु अधिकारी के आह्वान पर ही आयोजित की गई थी.

काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बाग़ी सांसदों ने पहले ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अपने फ़ैसले की जानकारी दे दी है.

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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में जारी इस टूट को देखकर कई लोग इसकी तुलना 2023 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में उद्धव ठाकरे से शिव सेना के नियंत्रण छिन जाने की घटना से कर रहे हैं.

हालांकि, वास्तविकता यह है कि शिव सेना के विभाजन और तृणमूल कांग्रेस में मौजूदा टूट के बीच कुछ महत्वपूर्ण और बुनियादी अंतर हैं.

इसलिए यह समझने से पहले कि पार्टी का चुनाव चिह्न और संपत्ति किस गुट को मिल सकता है, यह जानना ज़रूरी है कि भारत में राजनीतिक दलों के विभाजन की स्थिति में क्या क़ानूनी प्रावधान मौजूद हैं.

दल के चुनाव चिह्न और संपत्ति पर अधिकार किसका होता है?

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दल का चुनाव चिह्न किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पार्टी की पहचान जुड़ी हुई होती है.

किसी दल के लिए अपने चुनाव चिह्न को खो देना उसके नेतृत्व के लिए एक बड़ा झटका माना जाता है.

भारत के हालिया राजनीतिक इतिहास में इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला, जहाँ शिवसेना दो भागों में बँट गई, एक का नेतृत्व एकनाथ शिंदे के पास और दूसरे का नेतृत्व उद्धव ठाकरे कर रहे थे.

एकनाथ शिंदे का गुट बीजेपी के साथ गया और महाराष्ट्र सरकार का प्रमुख सहयोगी बना जबकि उद्धव ठाकरे बीजेपी विरोधी खेमे में रहे और इंडिया गठबंधन का हिस्सा बने.

ऐसी परिस्थितियों के लिए भारत के चुनावी क़ानूनों में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं.

'सिंबल्स ऑर्डर, 1968 की धारा 15 के तहत भारतीय निर्वाचन आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव चिह्न पर वैध दावा करने वाले गुट तय करे.

किसी राजनीतिक दल में विभाजन होने पर चुनाव आयोग दोनों पक्षों की दलीलें सुनता है और फिर तय करता है कि मूल पार्टी का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है.

इस संबंध में 1971 के सादिक़ अली बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग के फ़ैसले को आधार माना जाता है. इस फ़ैसले के अनुसार, आयोग यह देखता है कि सांसदों, विधायकों और पार्टी संगठन के अधिकांश नेता किस गुट के साथ हैं.

भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के अनुसार, चुनाव आयोग तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब पार्टी का कोई गुट औपचारिक रूप से विवाद (डिस्प्यूट) का दावा लेकर आयोग के पास पहुंचे.

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक तृणमूल कांग्रेस का कोई भी गुट ख़ुद को 'असली तृणमूल कांग्रेस' बताते हुए चुनाव आयोग के समक्ष नहीं पहुँचा था.

बहुमत के अलावा चुनाव आयोग कुछ अन्य पहलुओं पर भी विचार करता है, जिनका उल्लेख सादिक़ अली मामले में किया गया था, जैसे- कौन-सा गुट पार्टी के संविधान के प्रति अधिक निष्ठा दिखा रहा है.

पार्टी की मूल विचारधारा, उद्देश्यों और कार्यप्रणाली के अधिक निकट कौन-सा गुट है.

अगर इन सभी मानकों के आधार पर भी किसी एक गुट को चुनाव चिह्न का स्पष्ट दावेदार नहीं माना जा सके, तो चुनाव आयोग दोनों गुटों को अलग-अलग राजनीतिक दल के रूप में काम करने और नए चुनाव चिह्न लेने का सुझाव दे सकता है.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, चुनाव आयोग अंतिम न्यायिक प्राधिकारी नहीं है. आयोग का निर्णय चुनौती दिए जाने पर संबंधित पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर तभी हस्तक्षेप करता है, जब चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठे.

तृणमूल कांग्रेस में विभाजन

तृणमूल कांग्रेस में जिस तरह बग़ावत हुई है, वह भारत में पहले हुए अधिकांश दल-विभाजनों से कुछ मायनों में अलग दिखाई देती है.

तृणमूल कांग्रेस के बाग़ी नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला विधायक गुट अब भी ख़ुद को वैचारिक रूप से बीजेपी-विरोधी बताता है.

उन्होंने आठ जून को पत्रकारों से कहा कि दिल्ली में संसदीय दल की बैठक की जानकारी उन्हें है, लेकिन वहाँ लिए गए निर्णयों और क़दमों से उनका कोई संबंध नहीं है.

ऋतब्रत बनर्जी ने यह भी कहा, "हम ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे पहले की तरह बीजेपी को फ़ायदा मिले, जैसा कि जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने के समय हुआ था."

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर केंद्र या राज्य सरकार कोई सकारात्मक क़दम उठाती है, तो उसकी सराहना की जाएगी.

दूसरी ओर, दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मिलने वाले तृणमूल के बाग़ी सांसदों में सांसद शर्मिला सरकार भी शामिल थीं.

बैठक के बाद बताया गया कि काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाला यह नया संसदीय समूह संसद में बीजेपी-नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन करेगा.

जब शर्मिला सरकार से पूछा गया कि क्या यह संसदीय समूह बाग़ी गुट राज्य में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले अलग तृणमूल गुट से जुड़ा हुआ है, तो उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

अगर तर्क के लिए ऋतव्रत बनर्जी और काकोली घोष दस्तीदार के गुटों को अलग-अलग माना जाए, तो तृणमूल कांग्रेस तीन हिस्सों में बँटी हुई दिखाई देती है. भारत के राजनीतिक इतिहास में इस तरह के त्रिस्तरीय विभाजन का कोई बड़ा उदाहरण नहीं मिलता.

इसके अलावा, अब तक किसी भी बाग़ी गुट ने ख़ुद को 'वास्तविक तृणमूल कांग्रेस' बताते हुए चुनाव आयोग के समक्ष औपचारिक विवाद (डिस्प्यूट) दर्ज नहीं कराया है, इसलिए पार्टी के चुनाव चिह्न और संपत्ति पर वास्तविक दावा किसका होगा, इसका जवाब अभी मिलना बाकी है.

उल्लेखनीय है कि 2024-25 की नवीनतम वित्तीय जानकारी के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस की कुल संपत्ति 1,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है.

इसमें लगभग सात करोड़ रुपये की स्थायी संपत्ति (फिक्स्ड एसेट) 250.8 करोड़ रुपये का निवेश और 681.1 करोड़ रुपये बैंक जमा के रूप में शामिल हैं. आय और संपत्ति के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस देश की सबसे संपन्न राजनीतिक पार्टियों में से एक में गिनी जाती है.

ऐसी स्थिति में अगर ममता बनर्जी के विरोधी गुट ने दावा पेश किया और बहुमत साबित किया तो चुनाव चिह्न ही नहीं बल्कि क़ानूनी रूप से पार्टी की बड़ी वित्तीय और संस्थागत संपत्तियों पर भी उसका दावा मज़बूत हो सकता है.

ऐसे में तृणमूल कांग्रेस की संपत्ति और संगठनात्मक नियंत्रण दोनों ही ममता बनर्जी के हाथ से निकल सकते हैं.

पहले किन-किन राजनीतिक दलों में विभाजन हुआ है?

हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित विभाजन महाराष्ट्र में शिव सेना का रहा.

इस विभाजन में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे के हाथों से पार्टी निकल गई.

पार्टी के चुनाव चिह्न पर अधिकार एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को मिला. इसके बाद उन्होंने बीजेपी को समर्थन दिया और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने.

महाराष्ट्र में ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) भी विभाजन का शिकार हुई. पार्टी संस्थापक शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने अलग गुट बनाया और बाद में पार्टी के चुनाव चिह्न पर भी अपना दावा किया. अजित पवार भी महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में शामिल हुए और उपमुख्यमंत्री बने.

1990 के दशक में केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला जनता दल बाद में कई हिस्सों में बँट गया. इसके प्रमुख उत्तराधिकारी दलों में जनता दल यूनाइटेड (बिहार) और जनता दल (सेक्यूलर) (कर्नाटक) शामिल हैं.

1987 में तमिलनाडु में एआईएडीएमके में भी एक असामान्य स्थिति पैदा हुई. पार्टी संस्थापक एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद पार्टी दो गुटों में बँट गई.

इसके बाद उन्होंने एक अलग कांग्रेस गुट बनाकर चुनाव लड़ा और 1971 के आम चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया.

बाद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को ही कांग्रेस की राजनीतिक विरासत का प्रमुख उत्तराधिकारी माना गया. उस समय कांग्रेस का चुनाव चिह्न गाय और बछड़ा था. बाद के वर्षों में इंदिरा गांधी के गुट ने अलग पहचान बनाते हुए 'हाथ' चुनाव चिह्न अपनाया, जो आज भी कांग्रेस का सिंबल है.

इसी तरह 1964 में सीपीआई वैचारिक मतभेदों के कारण दो हिस्सों में बंट गई. इससे सीपीएम का गठन हुआ. दोनों दल अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों के रूप में कार्य करते रहे, लेकिन बाद के वर्षों में वे वामपंथी राजनीति और वाम मोर्चे का हिस्सा बने रहे.

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि भारत में किसी राजनीतिक दल का विभाजन कोई नई घटना नहीं है, लेकिन हर मामले में चुनाव चिह्न, संगठन और संपत्ति पर अधिकार का फैसला परिस्थितियों, बहुमत और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के आधार पर अलग-अलग तरीके से तय किया गया है.

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