Son Dakika
ESEl calor nocturno causa más muertes en Barcelona que el diurno, según estudiosESLa Generalitat pide extremar la precaución por riesgo máximo de incendio forestal en CatalunyaESGran llamarada de gas en obras del Metro de Sants se apaga tras 12 horas; ocho heridosESTrump añade la normalización con Israel como condición para el acuerdo nuclear con Arabia SaudíESPedro Sánchez propone a Yolanda Díaz como directora general de la OITESEmbajador de la UE en Reino Unido: Las relaciones están en buen caminoESZapatero reafirma su inocencia en el caso Plus Ultra y se desvincula de la confesión de su amigoESEl BCE mantiene los tipos de interés sin cambiosESMaduro y Flores asisten a audiencia; juicio programado para junio de 2027ESEl cielo de Madrid se tiñe de un color anormal por la calima y el humo de un incendioESEl calor nocturno causa más muertes en Barcelona que el diurno, según estudiosESLa Generalitat pide extremar la precaución por riesgo máximo de incendio forestal en CatalunyaESGran llamarada de gas en obras del Metro de Sants se apaga tras 12 horas; ocho heridosESTrump añade la normalización con Israel como condición para el acuerdo nuclear con Arabia SaudíESPedro Sánchez propone a Yolanda Díaz como directora general de la OITESEmbajador de la UE en Reino Unido: Las relaciones están en buen caminoESZapatero reafirma su inocencia en el caso Plus Ultra y se desvincula de la confesión de su amigoESEl BCE mantiene los tipos de interés sin cambiosESMaduro y Flores asisten a audiencia; juicio programado para junio de 2027ESEl cielo de Madrid se tiñe de un color anormal por la calima y el humo de un incendio
Newsgather
Geriशिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग: मोदी सरकार की रणनीति और राजनीतिक विश्लेषण
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग: मोदी सरकार की रणनीति और राजनीतिक विश्लेषण
Gelişiyor
BBC हिंदी4 saat önceSiyaset7 dk okumaIndia

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग: मोदी सरकार की रणनीति और राजनीतिक विश्लेषण

Hızlı Bakış

दिल्ली में अभिजीत दीपके, सोनम वांगचुक सहित हज़ारों लोग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार बातचीत को तैयार है, लेकिन इस्तीफ़े के दबाव में न झुकने की अपनी पुरानी नीति पर कायम दिख रही है, जिससे राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

Yapay zekâ özeti

Neden Önemli?

दिल्ली में हज़ारों छात्र, अभिभावक और राजनीतिक दल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसके बाद सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत शुरू हुई है।

Yazı boyutu

इस समय अभिजीत दीपके, सोनम वांगचुक, हज़ारों छात्र, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और कई राजनीतिक दलों के नेता राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

अब विपक्षी पार्टियां भी इस आंदोलन के साथ आ गई हैं।

इन सभी की एक प्रमुख मांग है- केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा।

20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के एक प्रतिनिधिमंडल ने पहली बार केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाक़ात की और उन्हें अपनी मांगों का पत्र सौंपा।

सरकार की ओर से जेपी नड्डा प्रदर्शनकारियों के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहे हैं।

यानी प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच संवाद के दरवाज़े खुले हुए हैं।

इसके साथ ही मोदी सरकार ने संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र में इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा कराने की भी बात कही है।

कांग्रेस कह रही है कि पहले शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिए तब संसद में चर्चा होगी।

दूसरी ओर सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी घोषणा की है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़ा देने तक वे जंतर-मंतर नहीं छोड़ेंगे।

ऐसे में मोदी सरकार के लिए चीज़ें बहुत आसान नहीं दिख रही हैं।

इन तमाम राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच अब एक सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि मोदी सरकार के लिए धर्मेंद्र प्रधान को हटाना क्या मुश्किल काम है?

मोदी सरकार की रणनीति

इससे पहले भी मोदी सरकार के कई मंत्रियों के इस्तीफ़े की मांग उठ चुकी है। बीजेपी अपने मंत्रियों के इस्तीफ़े के मामले में अब तक सख़्त रही है। यानी इन मांगों को अनसुना करती रही है।

वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक विजय त्रिवेदी कहते हैं कि 2014 से मोदी सरकार की राजनीतिक शैली पर नज़र डालें, तो राजनीतिक दबाव में मंत्रियों के इस्तीफ़ा देने के उदाहरण बहुत कम दिखाई देते हैं।

अब तक राज्य मंत्री एम.जे. अकबर को छोड़ दें, तो नैतिक ज़िम्मेदारी के आधार पर शायद ही किसी मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया हो।

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के इस्तीफ़े की मांग उठी थी। एपस्टीन फ़ाइल मामले के बाद हरदीप सिंह पुरी के इस्तीफ़े की मांग हुई। किसान आंदोलन के दौरान नरेंद्र सिंह तोमर से इस्तीफ़ा मांगा गया।"

"रेल हादसे के बाद अश्विनी वैष्णव के इस्तीफ़े की भी मांग हुई। लेकिन इनमें से किसी ने भी तत्काल इस्तीफ़ा नहीं दिया। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि यह सरकार राजनीतिक दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं होती।"

जून 2015 में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह का एक बयान भी इसी सोच की पुष्टि करता है।

तब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे पूछा गया था कि विपक्षी कांग्रेस पार्टी एनडीए सरकार के कुछ मंत्रियों के इस्तीफ़े की मांग कर रही है।

इस पर उन्होंने कहा था, ''यहां इस्तीफे़ नहीं होते हैं, भैया। यह यूपीए नहीं, एनडीए की सरकार है।"

विजय त्रिवेदी का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान का पार्टी के भीतर राजनीतिक कद भी एक अहम कारण है।

वह कहते हैं, "धर्मेंद्र प्रधान के परिवार के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पुराने संबंध रहे हैं। उन्होंने 1984 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का क़रीबी माना जाता है। ऐसे नेता को राजनीतिक दबाव में हटाना सरकार के लिए एक तरह की राजनीतिक हार माना जा सकता है।"

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के फेलो और राजनीतिक वैज्ञानिक राहुल वर्मा ने बीबीसी मराठी से कहा, "पहले मंत्रालय में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार के आरोप या ज़िम्मेदारियां ठीक से नहीं निभाने जैसी वजहों से मंत्री इस्तीफ़ा दे देते थे या उनसे इस्तीफ़ा ले लिया जाता था।"

"लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में जनदबाव के कारण मंत्रियों के इस्तीफ़ा देने की घटनाएं बहुत कम हुई हैं। संभव है कि सरकार का आकलन यह हो कि ऐसे आंदोलन समय-समय पर होते रहेंगे और उन्हें हर बार राजनीतिक महत्व देना ज़रूरी नहीं है।"

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग सबसे अहम मुद्दा है।

चुनावी जीत अहम मुद्दा

इसके अलावा सीजेपी की मांगों में नीट परीक्षा की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक करोड़ रुपये का मुआवजा, आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज पुलिस मामलों को वापस लेना और इस पूरे मुद्दे पर संसद में विस्तृत चर्चा कराना भी शामिल है।

इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि सरकार संसद में नीट परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है।

प्रधान ने लिखा, "हमारी सरकार नीट परीक्षा के मुद्दे पर संसद में चर्चा करने और युवाओं के सभी जायज़ सवालों का जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारे छात्रों को केवल ग़ुस्सा नहीं, बल्कि जवाब, सुधार और जवाबदेही चाहिए।"

हालांकि 21 जुलाई को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा देने का कोई संकेत नहीं दिया।

इस मुद्दे पर बीबीसी मराठी से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने कहा, "नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मंत्रियों का इस्तीफ़ा देना शायद मोदी की राजनीति का हिस्सा नहीं है। वह अकेले नेतृत्व करना चाहते हैं। अगर मंत्री इस्तीफ़ा देते हैं या उनसे इस्तीफ़ा लिया जाता है, तो उनके समर्थकों के बीच यह संदेश जा सकता है कि सरकार प्रभावी नहीं है। मोदी सरकार के लिए नैतिकता से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस्तीफ़ों का चुनावी असर क्या होगा।"

किदवई और राहुल वर्मा दोनों का मानना है कि जब तक जन दबाव बीजेपी की चुनावी जीत की क्षमता को प्रभावित नहीं करता, तब तक मोदी सरकार उसके आगे झुकने वाली नहीं है।

दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषक और लेखक अभिषेक चौधरी का कहना है, "संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी अभी ऐसा इसलिए कर रहे हों क्योंकि उन्हें लग रहा है कि राजनीतिक ज़मीन खिसकने लगी है। अगर एक मंत्री इस्तीफ़ा देता है, तो भविष्य में दूसरे मंत्रियों के ख़िलाफ़ भी विपक्ष का दबाव बढ़ सकता है। शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों से इस्तीफ़ा नहीं मांग रहे हैं।"

इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हुए रशीद किदवई ने कहा, "यह आंदोलन पहले के आंदोलनों से अलग दिखता है। इसमें छात्र, अभिभावक और बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए हैं। अब विपक्षी दल भी इसमें कूद पड़े हैं। अगर सरकार उनके दबाव में आकर मंत्रियों का इस्तीफ़ा लेती है, तो आंदोलनकारियों का मनोबल और बढ़ेगा। यह मोदी की केंद्रीकृत और सख्त राजनीतिक शैली के अनुरूप नहीं माना जाएगा।"

हालांकि विजय त्रिवेदी का कहना है कि यह भी सही नहीं है कि मोदी सरकार कभी विवादों में घिरे मंत्रियों को हटाती ही नहीं।

उनके मुताबिक, जब मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल का समय आया, तब कुछ मंत्रियों के विभाग बदल दिए गए या चुनाव के बाद उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। लेकिन राजनीतिक दबाव के समय मोदी सरकार ने आमतौर पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी।

क्या इससे बीजेपी को राजनीतिक नुक़सान होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा नहीं देते, तो इसका बीजेपी को राजनीतिक नुकसान होगा या नहीं, इसका जवाब केवल समय ही देगा।

उनका कहना है कि कोई भी आंदोलन हमेशा नहीं चलता। फ़िलहाल कोई चुनाव भी नहीं है। इसके अलावा आंदोलन के मुद्दे और चुनाव के मुद्दे अक्सर अलग-अलग होते हैं।

राहुल वर्मा का विश्लेषण है कि बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्षी दल मौजूदा स्थिति का राजनीतिक रूप से कितना फ़ायदा उठा पाते हैं।

उन्होंने कहा कि अगले छह महीनों में देश के कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। तब तक विपक्ष इस मुद्दे को किस तरह उठाता है, यह देखना होगा।

इसी बीच, 21 जुलाई से आम आदमी पार्टी लगातार कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखे हमले कर रही है।

रशीद किदवई का कहना है कि इससे विपक्षी दलों के बीच एकजुटता की कमी उजागर हुई है।

किदवई के अनुसार, यह भी देखना होगा कि जो लोग आज सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, क्या वे चुनाव के समय केवल प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर ही मतदान करेंगे, या फिर उस समय एक बार फिर राजनीतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण हावी हो जाएगा। भारतीय राजनीति का बदला हुआ परिदृश्य इस सवाल को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।

"इस समय देश में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण काफ़ी गहरा है। एक मज़बूत समर्थक वर्ग बन चुका है, जो मोदी पर पूरा भरोसा करता है। वह अपने नेता को कमज़ोर पड़ते हुए नहीं देखना चाहता। उसका यह भी मानना है कि मोदी जो कहते हैं, वही सही है। दूसरी ओर जो लोग मोदी के विरोधी हैं, उनके विचार बदलना भी लगभग असंभव है, चाहे मोदी कुछ भी करें।"

कोरोना महामारी से निपटने के तरीक़े, नोटबंदी, पाकिस्तान और चीन के साथ विदेश नीति, मणिपुर हिंसा, सीएए विरोध प्रदर्शनों और अन्य कई मुद्दों को लेकर मोदी सरकार की व्यापक आलोचना हुई लेकिन रशीद किदवई का कहना है कि इनका चुनावी असर बहुत सीमित रहा।

उन्होंने कहा, "जब सरकार को लगा कि कृषि क़ानून उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में बीजेपी को नुक़सान पहुंचा सकते हैं, तब प्रधानमंत्री मोदी ने वे क़ानून वापस ले लिए। यही मोदी सरकार की चुनावी गणित या 'मैंडेट थ्योरी' है।"

हालांकि, यदि सरकार को जरा भी संकेत मिलता है कि छात्र आंदोलन आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है, तो वह धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय से हटा सकती है या उनका विभाग बदल सकती है। लेकिन विजय त्रिवेदी का कहना है कि फिलहाल ऐसा कोई संकेत दिखाई नहीं देता।

मंत्री इस्तीफ़ा क्यों देते हैं?

राजनीतिक विश्लेषक अभिषेक चौधरी कहते हैं, "जब किसी विवादित मामले की जांच चल रही हो, तो संबंधित मंत्रालय के मंत्री का इस्तीफ़ा देना न्यूनतम राजनीतिक जवाबदेही स्वीकार करने जैसा होता है। अगर उस मंत्री का पार्टी में बड़ा राजनीतिक महत्व हो, तो प्रधानमंत्री बाद में उन्हें दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल भी कर सकते हैं। लेकिन उस समय इस्तीफ़ा देना विफलता की ज़िम्मेदारी तय करने और सरकार की छवि सुधारने का एक तरीक़ा माना जाता है।"

उनका कहना है, "धर्मेंद्र प्रधान को नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में हुई इस गंभीर विफलता की अंतिम ज़िम्मेदारी मंत्रालय की ही है। परीक्षा प्रणाली में फैली अव्यवस्था, तनाव और उससे जुड़ी घटनाओं के कारण कई छात्रों की जान चली गई। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान का पद पर बने रहना उचित नहीं है।"

अभिजीत दीपके का कहना है, "ऐसा इस्तीफ़ा मंत्रिमंडल के दूसरे मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाएगा। उन्हें यह अहसास होगा कि अगर वे गंभीर ग़लती करेंगे, तो उन्हें भी अपने पद से हटाया जा सकता है।"

Bundan Sonra Ne Olabilir?

Yapay zekâ öngörüsü — kesinlik taşımaz

  • मोदी सरकार धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय से हटा सकती है या उनका विभाग बदल सकती है, यदि उसे लगता है कि छात्र आंदोलन आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है।

    Spekülatif · Aylar içinde

Açık Sorular

  • क्या मोदी सरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा लेगी?
  • विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी लाभ में कैसे बदलेगा?
  • क्या यह आंदोलन बीजेपी की चुनावी जीत को प्रभावित करेगा?

İlgili Konular

Bu haber ilk olarak şurada yayınlandı: BBC हिंदी.

İlgili Haberler

Trump Links US-Saudi Nuclear Deal Approval to Saudi-Israel Normalization and No Uranium Enrichment
Gelişiyor·47 dakika önce

Trump Links US-Saudi Nuclear Deal Approval to Saudi-Israel Normalization and No Uranium Enrichment

US President Donald Trump announced that a proposed civil nuclear agreement with Saudi Arabia requires two conditions for approval: Saudi Arabia must normalize relations with Israel via the Abraham Accords, and the deal must prohibit uranium enrichment. This shifts from a previous framework and faces scrutiny from US lawmakers concerned about proliferation risks.

TOI World
1 dk okuma
दक्षिण एशियाई मीडिया भारत में छात्र प्रदर्शनों पर क्या कह रहा है?
Gelişiyor·2 saat önce

दक्षिण एशियाई मीडिया भारत में छात्र प्रदर्शनों पर क्या कह रहा है?

भारत में NEET प्रश्नपत्र लीक के बाद शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर युवा संगठन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल का मीडिया इन प्रदर्शनों को प्रमुखता से कवर कर रहा है, इसे भारत सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बता रहा है।

BBC हिंदी
3 dk okuma