Newsgather
رجوعममता को अब भी अपना नेता बताने वाले ऋतब्रत कैसे बने उनके सियासी करियर का 'सबसे बड़ा संकट'
ममता को अब भी अपना नेता बताने वाले ऋतब्रत कैसे बने उनके सियासी करियर का 'सबसे बड़ा संकट'
يتطور
BBC हिंदी3‏/6‏/2026سياسة6 د قراءةIndia

ममता को अब भी अपना नेता बताने वाले ऋतब्रत कैसे बने उनके सियासी करियर का 'सबसे बड़ा संकट'

نظرة سريعة

ऋतब्रत बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर पर सबसे बड़ा संकट आ गया है। 28 साल में पहली बार, पार्टी से निकाले गए एक नेता ने दो-तिहाई विधायकों को अपने खेमे में कर लिया है।

ملخص مُنشأ بالذكاء الاصطناعي

حجم الخط

ममता को अब भी अपना नेता बताने वाले ऋतब्रत कैसे बने उनके सियासी करियर का 'सबसे बड़ा संकट'

Author, प्रभाकर मणि तिवारी

पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

प्रकाशित 34 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

बुधवार को पार्टी के 58 से ज़्यादा विधायकों के समर्थन से ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का नेता चुन लिया गया. यह विडंबना ही है कि ऋतब्रत के राजनीतिक करियर की यह ऊंचाई ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक करियर के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुई है.

करीब 28 साल पहले तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद पार्टी के तमाम फ़ैसले ममता ही लेती रही हैं. यह पहली बार है कि किसी दूसरी पार्टी (सीपीएम) से आने वाले एक नेता ने पार्टी से निकाले जाने के बाद उसके दो-तिहाई विधायकों को अपने खेमे में कर लिया है.

वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) से छात्र राजनीति की शुरुआत करने वाले ऋतब्रत की ख़ासियत यह है कि वह जिस पार्टी में रहे शीर्ष नेताओं के 'ब्लू आइड बॉय' (चहेते व्यक्ति) रहे. वह चाहे वाममोर्चा सरकार में मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य हों या फिर उसके बाद तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी.

बीते करीब एक दशक के दौरान उनके राजनीतिक करियर का उतार-चढ़ाव किसी को भी अचरज में डाल सकता है.

बीते महीने विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सार्वजनिक तौर पर सलाहकार संस्था आई-पैक और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ख़ासकर महासचिव अभिषेक बनर्जी को कटघरे में खड़ा करने वाले ऋतब्रत ने एक महीने के भीतर ही तृणमूल कांग्रेस को दो-फाड़ की हालत में पहुंचा दिया है.

इससे बंगाल के राजनीतिक हलकों में चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या वह यहां के एकनाथ शिंदे साबित होंगे.

ऋतब्रत के नेतृत्व में बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायकों ने विधानसभा में बैठक के बाद विधानसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपा जिसमें ऋतब्रत को विधायक दल का नेता चुनने की बात कही गई थी.

इस रिपोर्ट को आगे बढ़ाने से पहले ऋतब्रत के राजनीतिक करियर पर एक निगाह डालना ज़रूरी है.

छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें

सबसे अधिक पढ़ी गईं

समाप्त

एसएफ़आई से राज्यसभा तक

15 नवंबर 1979 को कोलकाता के बंगाली परिवार में जन्मे ऋतब्रत के पिता का नाम प्रिय भूषण बनर्जी और माता का नाम अर्चना बनर्जी है.

साउथ प्वाइंट स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने ग्रेजुएशन के लिए कोलकाता के ही आशुतोष कॉलेज में दाखिला लिया. उसी दौरान वह एसएफ़आई के सदस्य बने और पार्टी के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे.

शुरुआती दौर में उनकी मां अर्चना बनर्जी भी उनके कार्यक्रमों में नज़र आती थीं लेकिन उनके पिता सार्वजनिक तौर पर ज़्यादा नहीं दिखे.

फ़िलहाल माता-पिता के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन उच्च-मध्य वर्गीय यह परिवार दक्षिण कोलकाता के जादवपुर इलाके में रहता है.

ऋतब्रत ने ग्रेजुएशन के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और अंग्रेज़ी साहित्य में एमए की डिग्री हासिल की. 90 के दशक में एसएफ़आई से राजनीतिक करियर शुरू करने वाले ऋतब्रत आशुतोष कॉलेज छात्र संघ के महासचिव रहे.

अपनी सांगठनिक क्षमता के बूते वर्ष 2008 में वह एसएफ़आई के राष्ट्रीय महासचिव बन गए. उन्होंने तब तक सीपीएम के प्रमुख युवा चेहरे के तौर पर अपनी पक्की पहचान बना ली थी.

विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान ही बुद्धदेव भट्टाचार्य समेत पार्टी के कई नेताओं से उनकी नज़दीकियां बढ़ी. बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद दोनों के बीच संबंध और बेहतर हुए.

सीपीएम ने वर्ष 2011 में उनको कोलकाता दक्षिण लोकसभा सीट पर अपना उम्मीदवार बनाया था. वह सीट ममता बनर्जी के इस्तीफ़े के कारण खाली हुई थी.

ऋतब्रत वह चुनाव तो हार गए. लेकिन पार्टी ने उन पर भरोसा कायम रखते हुए 2014 में उनको राज्यसभा में भेज दिया. वह तब महज़ 34 साल के थे.

लेकिन पार्टी के साथ उनके संबंधों में खाई बढ़ने लगी. तब तक बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी सत्ता हाथ से निकलने के बाद सक्रिय राजनीति से लगभग संन्यास ले लिया था.

सीपीएम में रहकर उन पर लगे गुटबाज़ी के आरोप

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें

दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

सांसद बनने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली उनकी तस्वीरों ने विवाद खड़ा कर दिया. उनमें वह मोंटब्लैंक की कलम और लक्ज़री घड़ी पहने नजर आए थे. तब सीपीएम में सवाल उठने लगा था कि पार्टी का कोई नेता ऐसी जीवनशैली कैसे अपना सकता है.

वहीं से सीपीएम का उनसे मोहभंग होने लगा. इस दौरान ऋतब्रत के बयानों और शीर्ष नेताओं की आलोचना ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी.

उनके करियर में विवाद कम नहीं रहे हैं. वर्ष 2013 में दिल्ली में एसएफ़आई की ओर से एक प्रदर्शन के दौरान उन पर तृणमूल कांग्रेस सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री अमित मित्रा के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे.

राज्यसभा में चुने जाने के तीन साल बाद ही पार्टी ने उनके चरित्र पर लगे गंभीर आरोप और पार्टी की गोपनीय जानकारियां प्रेस को लीक करने के आरोप में उनको प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया था.

बाद में सीपीएम ने ऋतब्रत को निकाल दिया था. पार्टी से निकाले जाने के बाद एक स्थानीय टीवी चैनल पर अपने इंटरव्यू में ऋतब्रत ने शीर्ष नेताओं की आलोचना करते हुए कहा था कि वह पार्टी के नहीं बल्कि प्रकाश कारत, वृंदा कारत और मोहम्मद सलीम के ख़िलाफ़ हैं.

सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम ने बीबीसी से कहा, "मैं ऋतब्रत पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता. उनको दस साल पहले ही पार्टी से निकाल दिया गया था."

लेकिन सिलीगुड़ी में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "ऋतब्रत का स्वभाव ही यही है. जिस पार्टी में रहता है उसी का नुक़सान करता है. सीपीएम में भी गुटबाज़ी करता रहा था."

'अभिषेक के रहते उनकी दाल नहीं गल रही थी'

तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता भी नाम नहीं छापने की शर्त पर ऋतब्रत के बारे में ठीक यही बात कहते हैं जो सिलीगुड़ी के सीपीएम नेता ने कही थी. उनका कहना था, "अभिषेक के रहते उनकी दाल नहीं गल रही थी. इसलिए उन्होंने बगावत का रास्ता अख़्तियार किया."

सीपीएम से निकले जाने के बाद कुछ दिनों तक ऋतब्रत का राजनीतिक करियर ढलान पर था. लेकिन वर्ष 2018 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल होते ही उनके करियर का ग्राफ़ तेज़ी से चढ़ने लगा. उनको पहले पार्टी की ट्रेड यूनियन की कमान सौंपी गई और फिर राज्यसभा में भेज दिया गया.

तृणमूल कांग्रेस में जल्दी ही ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होने लगी. शुरुआती दौर में वह पार्टी में काफ़ी लो-प्रोफाइल नेता रहे और धीरे-धीरे शीर्ष नेतृत्व के साथ करीबी बढ़ाते रहे.

दिसंबर, 24 से अप्रैल, 2026 तक वह राज्यसभा सांसद रहे. तृणमूल कांग्रेस के सांसद जवाहर सरकार ने जब इस्तीफ़ा दिया तो उनकी जगह पार्टी ने ऋतब्रत को उम्मीदवार बनाया था.

इस साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने हावड़ा जिले की उलूबेड़िया पूर्व सीट से उनको मैदान में उतारा था और भाजपा की भारी लहर के बावजूद वह जीतने में कामयाब रहे.

ऋतब्रत ने चुनाव नतीजों के बाद अभिषेक बनर्जी का नाम लिए बिना कहा था कि तृणमूल कांग्रेस को चलाने वाले नेता ज़मीनी स्तर पर अपनी पकड़ खो चुके हैं.

एक व्यक्ति ने पार्टी को कॉर्पोरेट जैसा चलाया. इसी वजह से लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया.

वर्ष 2024 में राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद अभिषेक बनर्जी ने उनके कामकाज, सांगठनिक क्षमता और निष्ठा की सराहना की थी. लेकिन अब वही अभिषेक ऋतब्रत की बगावत की वजह बन गए हैं.

ऋतब्रत दावा करते रहे हैं कि वह अब भी तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा हैं और ममता बनर्जी ही उनकी नेता हैं. बागी विधायकों की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए समर्थन पत्र में भी पार्टी अध्यक्ष के तौर पर ममता का नाम ही लिखा था.

'अब भी तृणमूल का हिस्सा हूं'

पार्टी से निकाले जाने के बाद ऋतब्रत ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा था, फ़िलहाल भाजपा में शामिल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. मैं अब भी तृणमूल का हिस्सा हूं और व्हिसल ब्लोअर के तौर पर काम करूंगा.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऋतब्रत बनर्जी अपने करियर के शुरू से ही बेहद महत्वाकांक्षी रहे हैं. शायद अभिषेक बनर्जी से टकराव की भी वजह भी उनकी यह महत्वाकांक्षा ही रही. अभिषेक के रहते ऋतब्रत की पार्टी में ज्यादा चल नहीं रही थी.

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "ऋतब्रत की महत्वाकांक्षा और अभिषेक के साथ अहम के टकराव के कारण ही आज तृणमूल कांग्रेस की यह हालत हुई है. ममता बनर्जी ने ऋतब्रत पर बेहद भरोसा किया था. लेकिन आज उनके पास महज बीस विधायक ही बचे हैं."

مواضيع ذات صلة

This article was originally published by BBC हिंदी.

أخبار ذات صلة

झारखंड स्टूडेंट प्रोटेस्ट: मांगें, सरकार का रुख और गतिरोध के कारण
يتطور·قبل 56 دقيقة

झारखंड स्टूडेंट प्रोटेस्ट: मांगें, सरकार का रुख और गतिरोध के कारण

झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर जुलाई के आखिरी सप्ताह से रांची में विद्यार्थियों का प्रदर्शन जारी है। सरकार ने 98 फ़ीसदी मांगें मानने का दावा किया है, लेकिन जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द करने और सीबीआई जांच की मांग पर गतिरोध बना हुआ है।

BBC हिंदी
5 د قراءة
संसद का मॉनसून सत्र: एफसीआरए, उच्च शिक्षा और वंदे मातरम जैसे बिलों पर घमासान के आसार
يتطور·قبل ساعة واحدة

संसद का मॉनसून सत्र: एफसीआरए, उच्च शिक्षा और वंदे मातरम जैसे बिलों पर घमासान के आसार

संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह में एफसीआरए संशोधन, उच्च शिक्षा, वंदे मातरम और ट्रिब्यूनल सुधार बिलों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला होने की संभावना है।

BBC हिंदी
6 د قراءة
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं के ख़िलाफ़ स्टूडेंट आंदोलन का 16वां दिन, सरकार के साथ कई मांगों पर बनी सहमति
يتطور·قبل ساعة واحدة

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं के ख़िलाफ़ स्टूडेंट आंदोलन का 16वां दिन, सरकार के साथ कई मांगों पर बनी सहमति

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़ छात्र आंदोलन के 16वें दिन सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच रांची में बातचीत हुई। 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति बनी, जबकि छात्र सीबीआई जांच की मांग पर अड़े हैं।

BBC हिंदी
5 د قراءة
المزيد حول هذا الموضوعTMC