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अमेरिका-ईरान समझौते से क्यों परेशान हैं नेतन्याहू? जानें पांच वजहें
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BBC हिंदी23‏/6‏/2026سياسة5 د قراءةIndia

अमेरिका-ईरान समझौते से क्यों परेशान हैं नेतन्याहू? जानें पांच वजहें

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इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अमेरिका-ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते से परेशान हैं। इस समझौते ने नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के तीन मज़बूत आधारों को तोड़ दिया है और देश की सुरक्षा को लेकर उन्हें एक नई दुविधा में फंसा दिया है।

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अमेरिका-ईरान समझौते से क्यों परेशान हैं नेतन्याहू? जानें पांच वजहें

प्रकाशित 14 मिनट पहले

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इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि न तो वे और न ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर काम एक-दूसरे की इच्छा से करते हैं. उन्होंने एक बार फिर कहा है कि जब तक ज़रूरी होगा, उनकी सेना दक्षिणी लेबनान में मौजूद रहेगी.

उन्होंने कहा, "हम आज़ाद और गौरवशाली देशों के नेता हैं. कभी-कभी हमारी राय एक-दूसरे से अलग होती है. हम अपने हितों के लिए खड़े होते हैं. मैं इसराइल के हितों और उसकी सुरक्षा के लिए खड़ा हूं."

नेतन्याहू ने कहा, "हम दक्षिणी लेबनान के सुरक्षा क्षेत्र में तब तक मौजूद रहेंगे, जब तक उत्तर में रहने वाले हमारे लोगों और पूरे देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी होगा."

उनका यह बयान ट्रंप के लेबनान में इसराइली कार्रवाई के ख़िलाफ़ दिए गए बयानों पर भी एक तरह की टिप्पणी है.

पिछले सप्ताह फ़्रांस में जी-7 की बैठक के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम बढ़ाने के समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और इस समझौते में एक शर्त यह है कि लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध बंद हो.

हालाँकि, इसके बाद भी लेबनान में इसराइली हमलों में कई लोगों की मौत हो चुकी है. ईरान ने इसे समझौते का स्पष्ट उल्लंघन बताया.

समझौते के पहले पैराग्राफ में ही कहा गया है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी "हर मोर्चे" पर सैन्य अभियान तुरंत और स्थायी रूप से ख़त्म करने की घोषणा करेंगे. इसमें लेबनान भी शामिल है.

इसराइल की इस कार्रवाई को शांति समझौते के लिए भी ख़तरा माना जाता है और इसराइल की इस तरह की कार्रवाई को लेकर ट्रंप पहले भी सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके हैं.

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पिछले हफ़्ते जी-7 समिट में पत्रकारों से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की तीखी आलोचना की और कहा कि इसराइल के लेबनान में किए गए हमले ग़ैर-ज़रूरी थे.

ट्रंप ने इसराइल के बारे में कहा, "इसराइल हिज़्बुल्लाह से कुछ ज़्यादा ही लंबे समय से लड़ रहा है, जिसकी वजह से बहुत सारे लोग मारे जा रहे हैं. जब आप किसी की तलाश में रहते हैं, तो पूरे इलाक़े को तबाह करना कोई समझदारी नहीं है, क्योंकि वहां आम लोग भी रहते हैं. वहां रह रहे सभी लोग हिज़्बुल्लाह के नहीं हैं."

दरअसल, अमेरिका-ईरान समझौता बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए बड़ा झटका माना जाता है. इसने उनके राजनीतिक करियर के लिए भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

आगे हम उन पांच मुद्दों की चर्चा करेंगे, जिनकी वजह से बिन्यामिन नेतन्याहू इस शांति समझौते को लेकर असहज हैं.

1. समझौते में इसराइल को किया गया दरकिनार

ईरान के साथ अमेरिका का युद्धविराम समझौता इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक तौर पर एक बुरे सपने की तरह हो गया है.

इस समझौते ने नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के तीन मज़बूत आधारों को तोड़ दिया है और देश की सुरक्षा को लेकर उन्हें एक नई दुविधा में फंसा दिया है.

नेतन्याहू ने अक्सर ख़ुद को अमेरिका का एक राजनीतिक क़रीबी और अमेरिकी राजनेताओं पर वास्तविक प्रभाव रखने वाला नेता बताया है, लेकिन अमेरिका ने उन्हें ईरान के साथ समझौते के दौरान दरकिनार कर दिया और उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी किया.

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ट्रंप ने यहां तक कहा, 'हमारे बिना इसराइल ही नहीं होता. मेरे बिना इसराइल नहीं होता, क्योंकि उनके लिए किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने वो किया ही नहीं, जो मैंने किया.'

नेतन्याहू की अपनी लिकुड पार्टी के सदस्यों और सरकार में उनके गठबंधन में मौजूद कट्टर दक्षिणपंथी कैबिनेट मंत्रियों के बयानों से भी पता चलता है कि उन पर कितना दबाव है.

इसराइल के कट्टर दक्षिणपंथी नेता और नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-ग्विर ने सोमवार को सोशल मीडिया पर लिखा, "हम ट्रंप के समझौते से बंधे नहीं हैं. हम इस समझौते के साझेदार नहीं हैं, जो हमारी सुरक्षा पक्की नहीं करता."

इसराइल के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार यरूशलम पोस्ट के संपादक ज़विका क्लेइन ने ईरान के साथ अमेरिका के समझौते को एक ख़राब डील कहा.

उन्होंने यरूशलम पोस्ट में लिखा, ''यह समझौता इसराइल के लिए ख़राब है. हमें बातचीत से बाहर रखा गया, लेबनान में पीछे हटने को कहा गया और जिस ट्रंप प्रशासन ने हमें अपना सबसे क़रीबी साझेदार बताया, उसी ने उस शासन के साथ समझौता करने से एक घंटे पहले हमें नसीहत दी, जिसने चार महीने तक हमें मारने की कोशिश की.''

2. ईरान 'मज़बूत स्थिति' में

नेतन्याहू ने इसराइल की सुरक्षा के लिए ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा बताया था. 28 फ़रवरी को अमेरिका के साथ मिलकर इसराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए थे और यह युद्ध क़रीब सौ दिनों तक चलता रहा.

पिछले साल भी इसराइल ने अपनी सुरक्षा के नाम पर ईरान के साथ 12 दिनों तक जंग की थी.

7 अक्तूबर 2023 को हमास के भयानक हमलों के जवाब में उन्होंने इसराइल की सुरक्षा नीति को ज़्यादा आक्रामक रुख़ की ओर मोड़ा. यानी ख़तरों को रोकने के बजाय उन्हें ख़त्म करने की नीति अपनाई.

उस संकट का उनका समाधान था - इसराइल के सामने मौजूद ख़तरों को ख़त्म करके मध्य-पूर्व में बदलाव लाना.

अब नेतन्याहू के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि वह ईरान के साथ युद्ध को एक ऐसे मोड़ पर कैसे ख़त्म कर सकते हैं, जिसमें ईरान मज़बूत स्थिति में दिख रहा हो?

हिज़्बुल्लाह और ईरानी सरकार के साथ बार-बार हुए टकराव से इसराइल के मुख्य दुश्मन ख़त्म नहीं हुए हैं, बल्कि ईरान में अब ज़्यादा कट्टरपंथी नेताओं का दबदबा हो गया है.

ईरान के इन नेताओं को अमेरिका-इसराइल की ताक़त का कम डर है और होर्मुज़ स्ट्रेट के सहारे उन्हें ज़्यादा बढ़त भी हासिल है.

3. इसराइल में आम चुनाव

कुछ ही महीनों में इसराइल में आम चुनाव होने वाले हैं. अमेरिका और ईरान की मांग है कि इसराइल लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर हमला करना बंद कर दे.

अगर इसराइल ऐसा करता है, तो इसराइल के 'मिस्टर सिक्योरिटी' के रूप में नेतन्याहू अपनी राजनीतिक छवि को कैसे बचा पाएंगे?

दूसरी ओर, पिछले पांच साल से नेतन्याहू तीन अलग-अलग मामलों में आरोपों का सामना कर रहे हैं.

उन पर रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप हैं. हालांकि, नेतन्याहू ख़ुद पर लगे आरोपों से इनकार करते रहे हैं.

पिछले साल के अंत में बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपने ख़िलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में देश के राष्ट्रपति आइज़ैक हरज़ोग से औपचारिक तौर पर माफ़ी की दरख़्वास्त की.

नेतन्याहू ने एक वीडियो संदेश में कहा कि वो चाहते थे कि क़ानूनी प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुंचे, लेकिन "राष्ट्रीय हित" में ये ठीक नहीं रहेगा.

घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे नेतन्याहू नहीं चाहेंगे कि इस समझौते से इसराइल का दुश्मन ईरान एक मज़बूत ताक़त बनकर उभरे, क्योंकि फिर चुनाव में उनके विपक्षी इस मुद्दे को भुना सकते हैं.

4. परमाणु कार्यक्रम पर फ़ैसला

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी अमेरिका और इसराइल के लिए तनाव का एक प्रमुख कारण बना हुआ है. कई दशकों से इसराइल का कहना है कि यह "उसके लिए एक ख़तरा" बना हुआ है.

हालांकि, ट्रंप कह चुके हैं कि उन्हें ईरान के संवर्धित यूरेनियम को ज़ब्त करने की कोई जल्दबाज़ी नहीं है.

दूसरी ओर, नेतन्याहू का कहना है कि जब तक वो इसराइल के प्रधानमंत्री हैं, वे ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देंगे.

समझौते के मसौदों से संकेत मिलता है कि ईरान ने दोहराया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दे, जिनमें ईरान के पास पहले से मौजूद संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी शामिल है, अंतिम समझौता वार्ता के लिए छोड़ दिए गए हैं.

यानी इस मुद्दे पर अभी भी ईरान की स्थिति युद्ध से पहले वाली है और ईरान पर हमला करने के बाद भी इसराइल और अमेरिका इस मामले में ईरान पर बड़ा दबाव नहीं बना पाए हैं.

इसराइल उन बातचीत में शामिल नहीं है जिनका मक़सद युद्धविराम को बढ़ाना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम समेत अहम मुद्दों पर बातचीत शुरू करना है.

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5. ईरान को आर्थिक लाभ

युद्ध की समाप्ति के बाद भी ईरान की यह ताक़त बरकरार है.

हालांकि, अमेरिका ने साफ़ नहीं किया है कि ईरान को ये 300 अरब डॉलर का फ़ंड कैसे मिलेगा. लेकिन जिस दुश्मन देश पर इसराइल और अमेरिका ने हमला किया था, उसे 300 अरब डॉलर का संभावित पैकेज मिलना निस्संदेह नेतन्याहू के लिए अच्छी ख़बर तो नहीं ही है.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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