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ममता के साथ सियासी सफ़र शुरू करने वालीं काकोली घोष कैसे बनीं बग़ावत का चेहरा
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BBC हिंदी15‏/6‏/2026سياسة11 د قراءةIndia

ममता के साथ सियासी सफ़र शुरू करने वालीं काकोली घोष कैसे बनीं बग़ावत का चेहरा

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कोलकाता से सटे बारासात से लगातार चार बार सांसद रहीं काकोली घोष दस्तीदार ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के साथ चार दशक से ज़्यादा पुराने संबंधों में आई खाई के बाद पार्टी के संसदीय दल में बग़ावत का चेहरा बन गईं. उन्हें मुख्य सचेतक के पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने संगठनात्मक पदों से इस्तीफ़ा दे दिया.

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ममता के साथ सियासी सफ़र शुरू करने वालीं काकोली घोष कैसे बनीं बग़ावत का चेहरा

Author, प्रभाकर मणि तिवारी

पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

प्रकाशित 2 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

"1976 से परिचय, 1984 से साथ चल रहे हैं. आज मुझे चार दशकों की वफ़ादारी का इनाम मिला है."

कोलकाता से सटे बारासात से लगातार चार बार सांसद रहीं काकोली घोष दस्तीदार ने बीती 15 मई को जब एक्स पर यह पोस्ट डाली थी तभी राजनीतिक हलकों में यह कयास तेज़ हो गया था कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के साथ उनके चार दशक से भी ज़्यादा पुराने संबंधों में ऐसी खाई पैदा हो गई है जिसका पाटना अब संभव नहीं है.

दरअसल, विधानसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय के बाद ममता ने उसी दिन काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में मुख्य सचेतक के पद से हटाकर उनके प्रतिद्वंद्वी समझे जाने वाले कल्याण बनर्जी को दोबारा उस पद पर नियुक्त कर दिया था.

उसके बाद ही काकोली ने एक्स पर यह पोस्ट डाली थी. उसके बाद उन्होंने ज़िला अध्यक्ष समेत पार्टी के तमाम संगठनात्मक पदों से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन दोहराया था कि वो तृणमूल कांग्रेस में बनी रहेंगी.

इसके कुछ दिनों बाद ही वो टीएमसी संसदीय दल में अब तक की सबसे बड़ी बग़ावत का चेहरा बन गईं.

आख़िर क्यों उठाया ये क़दम

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़, यह महज़ संयोग नहीं है कि मुख्य सचेतक पद से हटाए जाने के महज़ चार दिनों बाद 19 मई को केंद्र सरकार ने उनको वाई श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करा दी थी.

इससे यह भी ज़ाहिर होता है कि पहले से ही नए राजनीतिक समीकरण बन रहे थे.

विश्लेषकों का कहना है कि महज़ पैसों या किसी घटना से कोई बाग़ी नही होता. ममता के साथ काकोली के पारिवारिक संबंध रहे हैं. इसके पीछे कई ऐसी घटनाएं हैं जो अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई हैं. इनमें काकोली के डॉक्टर पुत्र वैद्यनाथ घोष दस्तीदार की ओर से ममता समेत तृणमूल के नेताओं की सार्वजनिक आलोचना और क़ानूनी नोटिस भिजवाना भी शामिल है.

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दरअसल, पार्टी के कुछ नेताओं ने दावा किया था कि काकोली ने अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में बारासात विधानसभा से अपने बेटे के लिए टिकट की मांग की थी. लेकिन उनको टिकट नहीं दिया गया.

यह दावा सामने आने के बाद वैद्यनाथ ने ममता, महुआ मोइत्रा और सोनाली गुहा समेत पार्टी के कई नेताओं की कड़ी आलोचना करते हुए उनके दावे को बेबुनियाद ठहराया था.

उन्होंने कहा था कि इन दावों से आहत होने की वजह से वो ममता की ओर से निजी तौर पर परिवार को दिए गए उपहार भी लौटा देंगे.

वैद्यनाथ ने इन नेताओं को क़ानूनी नोटिस भेजकर 15 दिनों के भीतर जवाब मांगा था और ऐसा नहीं करने की स्थिति में उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मामला दायर करने की चेतावनी दी थी.

कौन हैं काकोली घोष दस्तीदार?

नवंबर, 1959 में पैदा होने वाली काकोली ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज से साल 1984 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की. उसके बाद साल 1987 में काकोली ने इंग्लैंड स्थित किंग्स अस्पताल मेडिकल स्कूल से एडवांस्ड अल्ट्रासाउंड में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की.

काकोली का राजनीतिक करियर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति से शुरू हुआ था. वो कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद से जुड़ी थीं.

ठीक उसी समय ममता बनर्जी भी कोलकाता के जोगमाया कॉलेज में छात्र परिषद के बैनर तले छात्र राजनीति में तेज़ी से उभर रही थीं. साल 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर में ममता बनर्जी ने कोलकाता की जादवपुर सीट पर सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया था.

उसी समय से काकोली और ममता के बीच क़रीबी रही है. समय के साथ उनके आपसी संबंध और मज़बूत होते रहे. बाद में ममता ने जब कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की तो काकोली भी उनके साथ आ गईं.

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पेशे से चिकित्सक काकोली घोष दस्तीदार तृणमूल कांग्रेस की सबसे वरिष्ठ महिला नेता रहने के साथ ही ममता बनर्जी की बेहद क़रीबी रही हैं. उन दोनों के बीच पारिवारिक रिश्ते रहे हैं.

साल 2011 में ममता ने उनके पति डॉक्टर सुदर्शन घोष दस्तीदार को टिकट दिया था. चुनाव जीतने के बाद उनको तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की साझा सरकार में पर्यावरण और पीडब्ल्यूडी मंत्री बनाया गया था. सुदर्शन घोष दस्तीदार जाने-माने प्रजनन विशेषज्ञ हैं. इस दंपती के दोनों पुत्र भी डॉक्टर हैं.

काकोली संसद में भी राज्य के मुद्दों पर बेहद मुखर रही हैं. वो विभिन्न मंत्रालयों से जुड़ी संसदीय समितियों की सदस्य रही हैं.

बीते साल महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी के बीच विवाद के बाद कल्याण ने जब मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था तब ममता ने काकोली को इस पर नियुक्त किया था. इस फ़ैसले को काकोली पर उनके गहरे भरोसे का सबूत माना गया था.

राजनीति और सरकार से काकोली के परिवार का पुराना जुड़ाव रहा है. काकोली के नाना पोस्ट मास्टर जनरल रहे थे. उनके चाचा अरुण मैत्र स्वाधीनता सेनानी रह चुके हैं. मामा गुरुदास दासगुप्ता सांसद रहे हैं.

काकोली साल 2009 में उत्तर 24 परगना ज़िले में बारासात सीट से पहली बार 1.22 लाख वोटों के अंतर से जीती थीं. वो उससे पहले भी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी थीं. लेकिन हर बार हार का सामना करना पड़ा था.

साल 2009 से वो उसी सीट से लगातार चौथी बार चुनाव जीत चुकी हैं.

काकोली तृणमूल महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रही हैं. इस साल विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनको इस पद से हटा दिया गया था.

उसके बाद काकोली ने संगठन के तमाम पदों से इस्तीफ़ा देकर पार्टी में भ्रष्टाचार और आरजी कर मामले से निपटने में सरकार के तौर-तरीक़ों की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की थी.

बेटे से जुड़ा विवाद

विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद ममता बनर्जी समेत पार्टी के कई नेताओं ने किसी का नाम लिए बिना एक महिला सांसद पर अपने पुत्र के लिए बारासात सीट से विधानसभा का टिकट मांगने का आरोप लगाया था. इससे रिश्तों में कड़वाहट और बढ़ गई.

दरअसल, ममता ने पत्रकारों से बातचीत में किसी का नाम लिए बिना कहा था कि कुछ लोगों ने उनसे बारासात सीट पर टिकट की मांग की थी. लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने उस मांग को ख़ारिज कर दिया.

ममता यहीं नहीं रुकीं. उनका कहना था कि वो महिला ख़ुद सांसद हैं लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उनके परिवार के हर सदस्य को सांसद या विधायक होना चाहिए? ज़ाहिर था उनका इशारा काकोली की ओर ही था.

ममता बनर्जी की इस टिप्पणी के बाद कई अन्य नेताओं ने भी काकोली के ख़िलाफ़ नाम लिए बिना यही आरोप दोहराए. लेकिन किसी को यह समझने में मुश्किल नहीं हुई कि किसका ज़िक्र किया जा रहा है.

मुख्य सचेतक पद से हटाए जाने के बाद काकोली ने पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी पर भी निशाना साधा है. उन्होंने उनके ख़िलाफ़ ज़ुबानी दुर्व्यवहार करने के अलावा गाली देने और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है.

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजे पत्र में भी उन्होंने इसकी शिकायत की थी. काकोली का आरोप था कि कल्याण पार्टी की महिला सांसदों के साथ अपमानजनक व्यवहार करते रहे हैं.

हालांकि कल्याण बनर्जी ने उन पर पलटवार करते हुए इन आरोपों को निराधार ठहराया था.

इस बग़ावत की क्या वजह है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महज़ मुख्य सचेतक पद से हटाने का फ़ैसला ही चार दशक से भी लंबे संबंधों के टूटने की वजह नहीं बन सकता.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मामला सिर्फ़ उतना ही नहीं है जितना नज़र आता है. अब असली बात तो ममता और काकोली को ही पता होगी. राजनीति में बदलाव तो होते ही रहते हैं. लेकिन महज़ एक फ़ैसले से कोई इतने पुराने रिश्ते को भुलाकर बग़ावत पर नहीं उतर सकता. दोनों के बीच ज़रूर लंबे अरसे से विभिन्न मुद्दों पर मतभेद पनप रहे होंगे."

वो कहते हैं, "इन दोनों नेताओं के आपसी संबंधों में खाई संभवतः विधानसभा चुनाव के पहले से ही पनपने लगी थी. इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. मशहूर शायर बशीर बद्र की ग़ज़ल के शब्दों को थोड़ा बदलते हुए कहें तो 'कुछ तो वजहें रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता.' काकोली को लोकसभा में मुख्य सचेतक पद से हटाना संभवतः आपसी संबंधों के इस ताबूत की आख़िरी कील साबित हुई."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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