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राजस्थान: दलित परिवार के पांच लोगों की हत्या के मामले में सभी 40 अभियुक्त बरी
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BBC हिंदीقبل 17 ساعةLaw7 د قراءةIndia

राजस्थान: दलित परिवार के पांच लोगों की हत्या के मामले में सभी 40 अभियुक्त बरी

पीड़ित परिवार ने कहा कि हमारी दोबारा हत्या हुई है। मेड़ता की एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने 11 साल पुराने डांगावास हत्याकांड में फैसला सुनाया है।

نظرة سريعة

राजस्थान के नागौर ज़िले के डांगावास गांव में 2015 में हुए दलित परिवार के पांच लोगों की हत्या के मामले में सीबीआई द्वारा बनाए गए सभी 40 अभियुक्तों को मेड़ता की एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने बरी कर दिया है। पीड़ित परिवार ने फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट जाने की बात कही है।

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साल 2015 में नागौर ज़िले के डांगावास गांव में एक खेत में काम कर रहे दलित परिवार पर हमला हुआ था जिसमें पांच लोगों की हत्या कर दी गई थी।

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राजस्थान के नागौर ज़िले में 2015 में हुई एक घटना फिर से सुर्ख़ियों में है. उस साल मई महीने की 14 तारीख़ को क़रीब नौ बजे डांगावास में खेत में काम कर रहे एक दलित परिवार पर हमला हुआ था.

इस दौरान पांच लोगों की हत्या कर दी गई और क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए.

अब 11 साल बाद इस मामले में बीती पांच अगस्त को मेड़ता की एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया. इस मामले की जांच में सीबीआई ने चालीस अभियुक्त बनाए थे, जिन्हें अब बरी कर दिया गया.

इस हत्याकांड के पीड़ित किशनाराम कोर्ट के फ़ैसले के बाद बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहते हैं, "ग्यारह साल में हमारे परिवार की दो बार हत्या हो गई है. एक बार हमारे गांव वालों ने हमारे परिवार की हत्या कर दी और अब कोर्ट के फ़ैसले ने हमारी हत्या कर दी. दूसरी बार हत्या हो गई हमारे परिवार की. अब हम न्याय के लिए हाई कोर्ट जाएंगे."

वहीं अभियुक्त पक्ष के वकील ने फ़ैसला पर कहा कि अदालत ने सभी बिंदुओं के अध्ययन के बाद ही अभियुक्तों को दोषमुक्त किया है.

किशनाराम सवाल करते हुए कहते हैं, "सभी अभियुक्त बरी हो गए तो हमारे परिवार की हत्या किसने की?"

अदालत के इस फ़ैसले के बाद दलित समुदाय निराश है और न्याय की मांग के लिए राज्य भर के कई संगठनों ने 12 अगस्त को जयपुर में एक बड़ा प्रदर्शन किया था.

14 मई, 2015 को क्या हुआ था?

नागौर ज़िले के मेड़ता सिटी का जाट बहुल डांगावास गांव मुख्य सड़क पर बसा हुआ एक बड़ी आबादी वाला गांव है. गांव के एक छोर पर अनुसूचित जाति के करीब सवा सौ घर हैं, जिसे मेघवाल मोहल्ला कहा जाता है.

मोहल्ले में रामदेव जी का मंदिर है, उसके ठीक सामने ग्यारह साल से परिवार की सुरक्षा के लिए एक अस्थायी पुलिस पोस्ट बनाई हुई है.

कोर्ट के फ़ैसले के बाद से मंदिर के बाहर लगातार सामाजिक संगठनों और राजनीतिक शख्सियतों का आना-जाना लगा हुआ है.

इस घटना के चश्मदीद और कोर्ट में बयान दर्ज कराने वाले किशनाराम कहते हैं, "14 मई 2015 की सुबह नौ से दस बजे का समय था. हम परिवार के लोग खेत में बैठे हुए थे, अचानक गांव में से ट्रैक्टर और अन्य साधनों से लाठी-डंडे लेकर आई भीड़ ने हमारे परिवार पर हमला कर दिया. मेरे पिता और भाइयों को ट्रैक्टरों से कुचल दिया. परिवार की महिलाओं के साथ मारपीट कर कपड़े तक फाड़ दिए गए."

वो कहते हैं, "मुझे भी मारने का प्रयास किया गया. हमारे परिवार के पांच लोगों की मौत हो गई और ग्यारह गंभीर रूप से घायल हो गए थे."

परिवार के सदस्य रतनाराम और गोगाराम की मौके पर ही मौत हो गई थी जबकि पांचाराम, गणपतराम और गणेश की अजमेर के जेएलएन अस्पताल में मौत हो गई थी.

उनका दावा है कि परिवार के घायल 11 सदस्यों को ठीक होने में क़रीब तीन साल का समय लग गया.

इस परिवार की बुजुर्ग महिला सोनकी देवी उस घटना को याद करते हुए कहती हैं, "हम खेत में थे, वो लोग तेजाजी महाराज की जय बोलते हुए आए और लाठी-कुल्हाड़ियों से हमें मारने लगे. हमने हाथ जोड़े लेकिन हमें पीटते रहे."

सोनकी देवी बताती हैं कि उस घटना में उनका हाथ टूट गया था जो अब भी ठीक से काम नहीं करता है. वो अपने शरीर पर लगे जख़्म को दिखाते हुए कहती हैं कि उनका इलाज दो साल तक चलता रहा था. वो बताती हैं कि उनके पति की भी इस हमले में मौत हो गई थी.

गोविंद मेघवाल बताते हैं, "हमारे परिवार को बेरहमी से पीटा गया, ट्रैक्टरों से कुचल कर परिवार वालों की हत्या कर दी गई. लेकिन, अब तक हमें न्याय नहीं मिला है."

झगड़े की जड़ में क्या था?

इस मामले में गांव के दूसरे लोग बात करने से बचते हैं. कोर्ट से बरी हुए सभी चालीस लोग गांव के ही जाट समुदाय से हैं. बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.

गांव के ही एक जाट समुदाय के बुजुर्ग नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "साल 1960 में मेघवाल परिवार ने अपनी ज़मीन जाट समुदाय को पंद्रह सौ रुपये में खेती के लिए गिरवी रखी थी. जाट समुदाय को परिवार खेत में खेती नहीं करने देता था. इनके बीच इसको लेकर कई बार झगड़े हुए."

गांव में घटना से कुछ दिन पहले इस मसले के हल के लिए ग्रामीणों ने पंचायत भी बुलाई लेकिन पीड़ित परिवार इस पंचायत में नहीं पहुंचा था.

इस घटना को याद करते हुए एक ग्रामीण नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, "दस मई को जाट समुदाय के लोगों ने तत्कालीन कलेक्टर को इस संबंध में ज्ञापन भी सौंपा था. लेकिन 14 मई को भारी संख्या में लोगों के साथ दलित परिवार पर हमला कर दिया गया."

बरी हुए लोगों के वकील महिपाल चौधरी बीबीसी से कहते हैं कि डांगावास के दो परिवारों के बीच ज़मीन विवाद हुआ था और इसमें पांच लोगों की मौत हुई थी और ग्यारह घायल हुए थे.

वो कहते हैं, "कोर्ट ने इस केस में संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर बरी कर दिया है. न्यायाधीश ने इस केस के हर एक बिंदु पर गहराई से विवेचना करके 245 पन्ने का फ़ैसला दिया है."

एडवोकेट चौधरी कहते हैं कि अभियोजन पक्ष की ओर से 41 गवाहों के बयान करवाए थे और 163 दस्तावेज पेश किए थे, 75 आर्टिकल्स भी थे. गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था. गवाहों के पहले पुलिस, फिर दो बार सीबीआई में बयान हुए.

इसी घटना के दौरान दलित परिवार के पांच सदस्यों के अलावा गांव के ही एक अन्य शख्स रामपाल पुरी (गोस्वामी) की भी मौत हुई थी, आरोप ये था कि दलित परिवार ने गोली चला कर उसकी हत्या की है. एडवोकेट महिपाल चौधरी बताते हैं कि उस मामले में सीबीआई जांच के बाद इस मामले में एफआर लग गई थी.

महिपाल चौधरी कहते हैं कि गवाहों ने जो बयान दिए थे उन बयानों के समर्थन में इनकी ओर से पेश दस्तावेज इनके बयानों की पुष्टि नहीं कर रहे थे.

वह साफ़ करते हैं कि ट्रायल के दौरान कोर्ट में दूसरे पक्ष के गवाहों के बयान, अभियोजन की ओर से पेश किए दस्तावेज, मौक़े की स्थिति, मेडिकल रिपोर्ट, सभी आर्टिकल्स सभी एक दूसरे के विरोधाभासी थे. जांच में जिनको अभियुक्त बनाया उनकी पहचान गवाह नहीं कर पाए.

वह कहते हैं कि जांच में कई ऐसे लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, जो घटना के दिन डांगावास गांव में मौजूद ही नहीं थे.

अभियुक्तों को बरी करने पर कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पीड़ित पक्ष के एडवोकेट अब्दुल सलीम अंसारी बीबीसी से कहते हैं, ''हमें ऐसी आशा नहीं थी कि इस केस में सभी आरोपी को बरी कर दिया जाएगा. घटना के चश्मदीद और घायलों के बयानों के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई है, जिसमें अभियुक्त नामजद थे. लेकिन, यह कोर्ट का अपना विवेक है कि उन्होंने बयानों को विरोधाभासी मानते हुए फ़ैसला दिया है.''

इस घटना पर 'डांगावास दलित संहार' किताब के लेखक भंवर मेघवंशी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि जो घटनाक्रम हुआ वो साफ़ तौर पर सामने है कि किस तरह यह नृशंस हत्या की गई. लेकिन, इसमें जातिगत कारण भी था.

कोर्ट के फैसले पर भंवर मेघवंशी कहते हैं, ''मुझे लगता है कि दलितों में न्याय प्रणाली में जो भरोसा था उसे छीन लिया है. न्यायालय यदि इस तरह के निर्णय दे तो न्याय की हत्या हो जाती है.''

कोर्ट ने किस आधार पर किया बरी

मृतक के परिजनों की मांग पर तत्कालीन भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी और सीबीआई ने चालीस लोगों को अभियुक्त बनाया था.

कोर्ट में अभियुक्तों की पैरवी करने वाले एडवोकेट महिपाल चौधरी ने बीबीसी से कहा, ''कोर्ट ने इस केस में संदेह का लाभ देते हुए सभी को बरी कर दिया है. न्यायाधीश ने इस केस के हर एक बिंदु पर गहराई से विवेचना करके 245 पेज का फैसला दिया है.''

एडवोकेट चौधरी कहते हैं, ''अभियोजन पक्ष की ओर से 41 गवाहों के बयान करवाए थे और 163 दस्तावेज पेश किए थे, 75 आर्टिकल्स भी थे. गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था. पुलिस, सीबीआई और न्यायालय में दिए गए गवाहों के बयानों के समर्थन में पेश किए गए दस्तावेज इसकी पुष्टि नहीं कर रहे थे.''

वह साफ़ करते हैं, ''इनके बयान, पेश किए दस्तावेज, मौक़े की स्थिति, मेडिकल रिपोर्ट, सभी आर्टिकल्स सभी एक दूसरे के विरोधाभासी थे. अभियोजन पक्ष न्यायालय में साबित नहीं कर सका कि यह हत्याएं अभियुक्तों ने ही की हैं.''

कोर्ट के फ़ैसले से निराश

किशनाराम मेघवाल कहते हैं, "हम कोर्ट का सम्मान करते हैं. लेकिन, हम फैसले से निराश हैं. हमने हर स्तर पर बयान दिए और कोर्ट को बताया कि किसने हमारे परिवार के लोगों को मारा. हमने तो बयान दिए थे और जो सच था वह हर जगह कहा भी. हम जिसे भी जानते थे उनके नाम बता दिए थे और हम उनको चेहरों से भी पहचानते थे."

सोनकी देवी कहती हैं, "हमें न्याय चाहिए. हमारे परिवार को मारने वालों को बरी कर दिया गया. इस घटना में हमारे अपने मरे हैं, हमें न्याय चाहिए."

दलित परिवार के एडवोकेट अब्दुल सलीम अंसारी बीबीसी से कहते हैं, "न्यायालय के इस फैसले के विरोध में हम उच्च न्यायालय में अपील करेंगे."

वह कहते हैं, "बयानों में विरोधाभास संभव है क्योंकि यह घटना बहुत से लोगों ने मिलकर अंजाम दी है और अचानक हमला हुआ. इसलिए सभी पीड़ित सभी अभियुक्तों का नाम जानते हों यह संभव नहीं है."

भंवर मेघवंशी जांच पर सवाल खड़े करते हैं. वह कहते हैं, "इस घटना की पुलिस ने एफआईआर बहुत कमजोर लिखी और फिर साक्ष्यों के संकलन में कमजोरी की गई. परिजनों की मांग पर यह मामला सीबीआई को सौंपा गया."

वह कहते हैं, "जांच एजेंसियां बदलने के कारण शायद मुख्य पहलुओं में लापरवाही बरती गई है. दस साल तक केस चलने के कारण इसमें जो न्याय देने वाला तंत्र है उस प्रशासन, अभियोजन और जांच एजेंसियों की गलती रही."

भंवर मेघवंशी का मानना है कि न्याय नहीं मिलने का जो कारण है वो प्रशासन और न्याय व्यवस्था है और वो विफल है.

सरकार के दिए आश्वासन नहीं हुए पूरे

घटना के बाद हुए आंदोलन की मांगों पर तत्कालीन सरकार ने मृतकों के परिजनों को पच्चीस-पच्चीस लाख रुपये, घायलों को दस-दस लाख रुपये और एक-एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया था.

लेकिन, अभी तक सरकारी वादा पूरा नहीं हुआ है.

इस पर सवाल उठाते हुए सोनकी देवी कहती हैं, ''ग्यारह साल बीत गए लेकिन सरकार का कोई नुमाइंदा हमारे पास तक नहीं आया है. उस दौरान किए गए वादे भी धरातल पर नहीं उतरे हैं. हमें ना तो कोई मुआवजा मिला और ना ही कोई नौकरी.''

भंवर मेघवंशी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जन आंदोलन होने के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार ने अठारह मांगों पर समझौता किया था. लेकिन, अभी तक वादे पूरे नहीं किए हैं.

वह सरकार को घेरते हुए कहते हैं, "परिवार को न्याय देने का फ़ोकस न तत्कालीन सरकार का था और ना ही अब भी लग रहा है. क्योंकि अभी तक सरकार और उनके पदाधिकारियों ने इस मामले पर कुछ नहीं बोला है."

भंवर मेघवंशी राजनीतिक पार्टियों को घेरते हुए कहते हैं, ''जो अभियुक्त थे उनके समुदाय से आने वाले विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने भी इस मामले पर कुछ नहीं बोला है, यह दिखाता है कि कितनी जबरदस्त सहमति है उसमें.''

बीबीसी के इस सवाल पर राजस्थान हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रवीण बलवदा कहते हैं, "हाल ही के तरुण तेजपाल का केस हमारे सामने है. जहां निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने दोषी मानते हुए दस साल की सजा सुनाई है."

वह आगे बताते हैं, "इस मामले में पीड़ित परिवार हाई कोर्ट में अपील कर सकता है. मैं तो यह भी कहना चाहूंगा कि राज्य सरकार को फौजदारी मामलों के सीनियर एडवोकेट को इस मामले में पीड़ितों की पैरवी के लिए लगाना चाहिए."

ما الذي يجب مراقبته

توقعات الذكاء الاصطناعي — احتمالات وليست حقائق

  • पीड़ित परिवार उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती देगा।

    مرجح جداً · خلال أسابيع

أسئلة مفتوحة

  • क्या उच्च कोर्ट इस मामले में दोषियों को सजा दिला पाएगा?
  • सरकार पीड़ितों को मुआवजा और नौकरी कब देगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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