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क्या टिक पाएगा अमेरिका-ईरान समझौता, ये तीन मुद्दे बिगाड़ सकते हैं बात
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BBC हिंदी18‏/6‏/2026العالم7 د قراءةIndia

क्या टिक पाएगा अमेरिका-ईरान समझौता, ये तीन मुद्दे बिगाड़ सकते हैं बात

نظرة سريعة

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. इस समझौते के तहत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को फिर से खोला जाना है. हालांकि, लेबनान में इसराइल का अभियान, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ स्ट्रेट के संचालन को लेकर मतभेद समझौते को पटरी से उतार सकते हैं.

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व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और यह अब प्रभावी हो गया है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियां-ले-बैं में जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के दौरान इस समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए.

इस समझौते के तहत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को फिर से खोला जाना है.

14 बिंदुओं वाले इस समझौते को मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (सहमति-पत्र) कहा जा रहा है. इसमें कहा गया है कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं रखेगा.

साथ ही इसमें ईरान के "पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास" के लिए 300 अरब डॉलर के एक कोष का प्रावधान भी है, हालांकि इसमें अमेरिका के लिए योगदान देना अनिवार्य नहीं है.

यह समझौता अमेरिका, ईरान और इसराइल के बीच संघर्ष शुरू होने के चार महीने बाद आया है.

विशेषज्ञों के अनुसार, तीन सबसे बड़े ख़तरे हैं जो बातचीत को पटरी से उतार सकते हैं.

1. लेबनान में इसराइल का अभियान

मुख्य मध्यस्थों में से एक की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने प्रारंभिक समझौते की घोषणा के दौरान कहा कि दोनों पक्षों ने "लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने" की घोषणा की है.

मीडिया संस्थानों ने समझौते के मसौदों को देखा है, उसमें भी लेबनान को स्पष्ट रूप से युद्धविराम के दायरे में शामिल किया गया है.

हालांकि, ट्रंप की ओर से फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान बिन्यामिन नेतन्याहू से लेबनान के मामले में 'अधिक ज़िम्मेदारी से पेश आने' को कहने के बाद भी इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं.

लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी एनएनए के अनुसार, बुधवार को इसराइली लड़ाकू विमानों ने नबातियेह अल-फ़ौका क्षेत्र और पड़ोसी कफ़र तेबनित के बाहरी इलाक़ों को निशाना बनाया.

इसके अलावा, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि हालांकि लेबनान युद्धविराम ढांचे के अंतर्गत आता है, लेकिन लेबनानी क्षेत्र से इसराइली सेना की वापसी समझौते की शर्त नहीं है. उनका कहना है कि इसराइल को आत्मरक्षा का अधिकार बना रहेगा.

लेकिन ईरान का कहना है कि लेबनान में युद्ध का अंत 'युद्ध समाप्त करने के समझौते का अभिन्न हिस्सा' है.

लेबनान में ईरान समर्थित हथियारबंद ग्रुप हिज़्बुल्लाह भी इसी रुख़ का समर्थन करता है.

हिज़्बुल्लाह के मीडिया रिलेशन कार्यालय ने रॉयटर्स से कहा कि ईरान ने आश्वासन दिया है कि वह अगली चरण की बातचीत में लेबनान से इसराइली सैनिकों की पूर्ण वापसी की मांग करेगा.

इसराइल ने भी स्पष्ट संकेत दिया है कि वह खुद को समझौते की ईरानी व्याख्या से बंधा हुआ नहीं मानता.

रक्षा मंत्री इसराइल कात्ज़ ने कहा है कि इसराइली सेना लेबनान में सुरक्षा क्षेत्रों में 'अनिश्चितकाल तक' बनी रहेगी और चेतावनी दी है कि यदि लेबनान को लेकर ईरान इसराइल पर हमला करता है तो वे 'पूरी ताक़त से जवाब देंगे.'

ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट के राजनीतिक वैज्ञानिक डॉ. एच. ए. हेलियर का कहना है कि शांति प्रयासों में तेल अवीव 'मुख्य बाधक' रहा है.

उनका तर्क है, "इसराइल का सैन्य दुस्साहस, चाहे वह सीधे ईरान के ख़िलाफ़ हो या लेबनान में जारी विनाश के ज़रिए, कूटनीतिक प्रगति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है."

हेलियर कहते हैं कि यदि तेहरान सीधे टकराव में खिंच जाता है तो 'परमाणु मुद्दे पर ठोस बातचीत शुरू होने से पहले ही' यह प्रक्रिया ध्वस्त हो सकती है.

लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ़ औन ने प्रारंभिक समझौते का स्वागत किया है और कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि यह "ऐसे व्यावहारिक क़दमों में बदलेगा जिससे हिंसा के चक्र को निर्णायक रूप से समाप्त किया जा सकेगा."

खुद लेबनान के लिए युद्ध के परिणाम बेहद विनाशकारी रहे हैं. 3,700 से अधिक लोग मारे गए हैं, लगभग 10 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और दक्षिणी इलाक़ों का बड़ा हिस्सा व्यापक तबाही का शिकार हुआ है.

2. ईरान का परमाणु कार्यक्रम

दशकों पुराने तनाव के केंद्र में रहा ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी तनाव का एक प्रमुख कारण बना हुआ है.

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि यह सुनिश्चित करना कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न करे, 'इस समझौते में शामिल किया गया है' और इसके पालन की पुष्टि की जा सकती है.

उनका कहना है कि अगर ईरान भविष्य के समझौते का पालन करता है तो प्रतिबंधों में राहत दी जाएगी और अमेरिका 'उसे फिर से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में स्वागत करेगा', हालांकि उन्होंने इसके बारे में अधिक ब्योरा नहीं दिया.

इस बीच, ईरान ने कहा है कि समझौते के तहत 60 दिन की वार्ता अवधि के दौरान उसकी फ़्रीज़ हुई परिसंपत्तियों में से अरबों डॉलर जारी किए जाएंगे. वेंस ने इस दावे को ख़ारिज किया है.

समझौते के मसौदे, संभावित रूप से महत्वपूर्ण आर्थिक प्रोत्साहनों की ओर भी संकेत करते हैं.

इनमें अमेरिकी छूट शामिल हैं, जिनसे ईरान फिर से तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्यात शुरू कर सकेगा, फ़्रीज़ हुई परिसंपत्तियों को जारी किया जाएगा और 300 अरब डॉलर तक के दीर्घकालिक विकास ढांचे पर चर्चा होगी.

एक अन्य विवादित मुद्दा ईरान का संवर्धित यूरेनियम है, हालांकि ट्रंप कह चुके हैं कि इसे ज़ब्त करने की कोई जल्दबाज़ी नहीं है.

ईरान बार-बार कहता रहा है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा.

उसका यह भी कहना है कि 60 दिन की अवधि का उपयोग इस बात पर सहमति बनाने के लिए किया जाएगा कि मौजूदा परमाणु सामग्री को कैसे कम किया जाए या हटाया जाए.

समझौते के मसौदों से संकेत मिलता है कि तेहरान ने दोहराया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दे, जिनमें ईरान के पास पहले से मौजूद संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी शामिल है, अंतिम समझौता वार्ता के लिए छोड़े गए हैं.

मसौदे में लिखित शर्तों के अनुसार, 60 दिन की वार्ता अवधि के दौरान दोनों पक्ष यथास्थिति बनाए रखेंगे. ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों का विस्तार नहीं करेगा, जबकि अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा.

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अनुसार, पिछले साल तक ईरान ने लगभग 400 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम जमा कर लिया था जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया गया था. परमाणु हथियार के लिए संवर्धन का स्तर लगभग 90 प्रतिशत होता है.

राष्ट्रपति ओबामा के दौर में हुए 2015 के परमाणु समझौते के तहत तेहरान ने संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित कर दिया था.

साल 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका के समझौते से हटने के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम का काफ़ी विस्तार किया.

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेट के पूर्व डिप्टी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ डैरिन सेल्निक ने बीबीसी रेडियो 4 के टुडे कार्यक्रम से कहा कि यदि राष्ट्रपति को लगता है कि ईरान फिर से हथियार बनाने लायक यूरेनियम का संवर्धन कर रहा है, तो वे फिर से 'सैन्य अभियान फिर शुरू कर सकते हैं.'

3. होर्मुज़ स्ट्रेट

इस समझौते का उद्देश्य होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलना भी है, जो फ़रवरी से लगभग पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है.

जंग से पहले दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से होकर गुज़रती थी.

ट्रंप ने कहा है कि होर्मुज़ 'शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होते ही, बारूदी सुरंगों को हटाने के उद्देश्य से' फिर से खोल दिया जाएगा.

समझौते के मसौदे संकेत देते हैं कि ईरान 30 दिनों के भीतर सुरंगों को हटाने और समुद्री यातायात को युद्ध-पूर्व स्तर पर बहाल करने की ज़िम्मेदारी लेगा, जबकि अमेरिका समुद्री नाकाबंदी हटाएगा.

लेकिन ऐसा लगता है कि स्ट्रेट के दोबारा खुलने के बाद उसके संचालन को लेकर ईरान और अमेरिका की सोच अलग-अलग है.

तेहरान होर्मुज़ स्ट्रेट के प्रबंधन में बड़ी भूमिका चाहता है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बक़ाई का कहना है कि स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों से सेवा शुल्क लिया जाएगा.

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान किस प्रकार की सेवाएं प्रदान करेगा.

इससे पहले ईरान ने वहां से गुज़रने के लिए टोल लगाने का प्रस्ताव दिया था, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत मान्य नहीं है, हालांकि कुछ सेवाओं के लिए शुल्क लिया जा सकता है.

दूसरी ओर, ट्रंप ने ज़ोर देकर कहा है कि यह समुद्री मार्ग 'टोल-मुक्त' रहेगा, और यह व्यवस्था 60 दिन की अवधि के बाद भी जारी रहेगी.

जहाज़रानी कंपनियां तब तक सतर्कता बरतेंगी जब तक उन्हें यह भरोसा नहीं हो जाता कि युद्धविराम वास्तव में कायम है.

क्राइसिस मैनेजमेंट कंपनी ईओएस रिस्क ग्रुप के मार्टिन केली ने बीबीसी वेरिफ़ाई से कहा, "मौजूदा स्थिति को देखते हुए किसी जहाज़ के कप्तान को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने के लिए असाधारण रूप से साहसी होना पड़ेगा."

हालांकि हेलियर चेतावनी देते हैं कि युद्ध समाप्त करने का यह समझौता अभी केवल 'एक सहमति-पत्र है, बातचीत का एक ढांचा, कोई समाधान नहीं.'

वो कहते हैं, "असल कठिन काम अभी शुरू होना बाकी है."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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