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رجوع'मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया
'मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया
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BBC हिंदी17‏/6‏/2026علوم5 د قراءةIndia

'मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया

نظرة سريعة

नासा का वॉयेजर 1, 1977 में लॉन्च हुआ, नवंबर में पृथ्वी से एक लाइट-डे की दूरी पर पहुंचेगा। यह मानव-निर्मित वस्तु से सबसे दूर है और अभी भी डेटा भेज रहा है, जिसने सौर मंडल की हमारी समझ को बदल दिया है।

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मानवता की सबसे बड़ी खोज': वो अंतरिक्ष यान जिसने सौर मंडल को देखने का हमारा नज़रिया बदल दिया

Author, फ़र्नांडो डुआर्टे

पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

प्रकाशित 2 घंटे पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

नासा द्वारा 1977 में छोड़े गए जुड़वा प्रोब्स में से एक, वॉयेजर 1, इस साल नवंबर में पृथ्वी से एक लाइट-डे की दूरी पर पहुँच जाएगा. यानी वह दूरी जो प्रकाश एक दिन में तय करता है - लगभग 26 अरब किलोमीटर.

वॉयेजर 1 पहले ही किसी भी मानव-निर्मित वस्तु से ज़्यादा दूर जा चुका है. लेकिन उससे भी ज़्यादा उल्लेखनीय बात यह है कि नासा अब भी इस प्रोब से ख़बरें सुन रहा है.

पाँच साल तक चलने के लिए बनाए गए वॉयेजर 1 और 2 लगभग 50 साल बाद भी अंतरिक्ष में काम कर रहे हैं, और खगोलविदों को ब्रह्मांड के बारे में अनमोल जानकारी दे रहे हैं.

यह सब उस तकनीक पर चल रहा है जो आज के समय में बेहद पुरानी लगती है.

मिशन की मौजूदा प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉक्टर लिंडा स्पिलकर ने बीबीसी को बताया, "आपकी कार खोलने वाले की-फ़ॉब में जितनी मेमोरी होती है, उतनी ही वॉयेजर के कंप्यूटरों में है."

"यह अपने समय की एक अद्भुत उपलब्धि थी."

महायात्रा

वॉयेजर मिशन इंसानों के सौर मंडल की खोज में आगे बढ़ते कदमों का नतीजा था.

लॉन्च से पंद्रह साल पहले ही नासा ने 1962 में मैरिनर 2 के ज़रिए शुक्र ग्रह तक पहली सफल यात्रा पूरी कर ली थी.

तीन साल बाद, मैरिनर 4 मंगल के पास से गुज़रा और पृथ्वी से बाहर किसी ग्रह की पहली नज़दीकी तस्वीरें लीं.

बाहरी चार विशाल ग्रहों - बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून - तक पहुँचने की योजना तब बनी जब अमेरिकी एयरोस्पेस इंजीनियर गैरी फ़्लैंड्रो ने 1970 के दशक के अंत में उनकी दुर्लभ स्थिति का अनुमान लगाया.

इससे एक संभावित अंतरिक्ष यान को उन्हें ज़्यादा आसानी से देखने का मौका मिल सकता था - वैज्ञानिकों ने इसे ग्रैंड टूर या महायात्रा कहा.

उस समय इस क्षेत्र के बारे में हमारी जानकारी बहुत बुनियादी थी.

अंतरिक्ष इतिहासकार और लेखिका एमी शिरा टाइटल कहती हैं, "प्राचीन यूनानी बृहस्पति और शनि के बारे में जानते थे… लेकिन वे बस रोशनी के धब्बे थे."

वह कहती हैं, लेकिन वॉयेजर मिशन के साथ, "अचानक हम धुंधले-से ग्रहों की अवधारणा से निकलकर हर क्लासरूम में परिचित ग्राफ़िक्स तक पहुँच गए."

नासा का बाहरी ग्रहों तक पहला मिशन पायनियर 10 था, जिसने 1973 में बृहस्पति के पास से उड़ान भरी. इसने साबित कर दिया कि मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित क्षुद्रग्रह बेल्ट को सफलतापूर्वक पार करना और लाखों किलोमीटर दूर से पृथ्वी से संवाद करना संभव है. इसकी बहन प्रोब पायनियर 11 ने छह साल बाद शनि के पास से उड़ान भरी.

दोनों प्रोब्स वॉयेजर्स की तुलना में बेहद साधारण थे.

1969 में अमेरिका ने सोवियत संघ से आगे निकलकर चाँद पर उतरने में सफलता पाई थी. इसके बाद नासा को भविष्य के मिशनों के लिए राजनीतिक समर्थन और फंडिंग में गिरावट का सामना करना पड़ा.

वॉयेजर के ग्रैंड टूर की मूल योजनाओं को बदलकर सिर्फ़ दो बाहरी ग्रहों की यात्रा तक सीमित करना पड़ा.

हालांकि पर्दे के पीछे वैज्ञानिक चुपचाप वॉयेजर्स को और आगे जाने के लिए तैयार कर रहे थे.

डॉक्टर एलन कमिंग्स, अब भी वॉयेजर मिशन पर काम कर रहे एक खगोल भौतिकविद हैं. वह स्वीकार करते हैं कि "आधिकारिक तौर पर हम बृहस्पति और शनि तक पाँच साल के मिशन के लिए प्रोब्स डिज़ाइन कर रहे थे, लेकिन मान लीजिए हमने उन्हें थोड़ा ज़्यादा टिकाऊ बनाया था - सिर्फ़ एहतियातन,"

एक जैसे बनाए गए अंतरिक्ष यान में से वॉयेजर 2 अगस्त 1977 में और वॉयेजर 1 अगले महीने लॉन्च हुए. उन्हें अलग-अलग रास्तों पर भेजा गया, और उसी साल के अंत तक वॉयेजर 1 ने अपने जुड़वा को पीछे छोड़ दिया.

वॉयेजर ने दिखाए नए संसार

आख़िरकार, प्रोब्स ने ख़ुद ही अपनी अहमियत साबित की: दुनिया भर के लोग हैरान रह गए जब उन्होंने अंतरिक्ष में अपने आस-पड़ोस के बारे में खगोलविदों की पुरानी धारणाओं को बदलना शुरू किया.

उदाहरण के तौर पर वॉयेजर 1 ने बृहस्पति के चंद्रमा आयो पर पृथ्वी से बाहर के पहले सक्रिय ज्वालामुखी देखे. इसने बृहस्पति पर बिजली भी दर्ज की - जो हमारे ग्रह से बाहर पहली बार दिखी थी.

वॉयेजर 2 से आई तस्वीरों ने संकेत दिया कि बृहस्पति के दूसरे चंद्रमा यूरोपा की टूटी-फूटी बर्फ़ीली परत के नीचे तरल पानी का महासागर हो सकता है. इसकी वजह से आज तक खगोलविदों का अनुमान है कि वहाँ जीवन भी हो सकता है.

कमिंग्स को याद है जब उन्होंने पहली बार आयो देखा, तो उनकी गर्दन के पीछे के बाल खड़े हो गए थे.

वह याद करते हैं, "मैं कैंपस में था, और वहाँ वीडियो फ़ीड चल रही थी. आयो अपनी पूरी भव्यता में सामने था, और मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा था… हमारा अपना चाँद तो बहुत धूसर और नीरस है, और… मुझे अंदाज़ा ही नहीं था कि चंद्रमाओं में इतनी विविधता हो सकती है."

मिशन के चार साल बाद, नासा ने तय किया कि वॉयेजर 2 यूरेनस और नेपच्यून तक जाएगा. इसने 1986 और 1989 में उनके पास से उड़ान भरी और ग्रैंड टूर पूरा किया.

'धुंधला नीला बिंदु'

वॉयेजर्स ने अपनी उपलब्धियाँ चतुरता और तकनीक के मेल से हासिल कीं.

तथाकथित स्लिंगशॉट तकनीक ने उन्हें हर ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का इस्तेमाल करके गति और दिशा बदलने में मदद की, ताकि वे अगले लक्ष्य तक पहुँच सकें. इससे नेपच्यून तक की यात्रा का समय 30 साल से घटकर सिर्फ़ 12 साल रह गया.

प्रोब्स में प्लूटोनियम आधारित न्यूक्लियर बैटरियाँ लगी थीं. लेकिन वे हर साल लगभग 4 वॉट पावर खोते रहे हैं, और ज़्यादातर वैज्ञानिक उपकरण एक-एक करके बंद कर दिए गए हैं.

1990 में, जब वॉयेजर 1 नेपच्यून से भी आगे निकल चुका था और उसका कैमरा स्थायी रूप से बंद होने वाला था, उसने पीछे मुड़कर पृथ्वी की एक तस्वीर ली. हमारा ग्रह अंतरिक्ष की विशालता में एक छोटा-सा धुंधला नीला बिंदु दिखाई दिया.

यह विचार दिवंगत खगोलविद कार्ल सागन का था. स्पिलकर याद करती हैं, "कार्ल सागन ने कहा था कि इस पेल ब्लू डॉट पर हर इंसान है जो कभी जिया है, हर इंसान है जिसे आपने कभी जाना है - इसी भावना के साथ हमें अपने ग्रह की देखभाल करनी चाहिए."

अंतर तारकीय अंतरिक्ष

2012 में वॉयेजर 1 सूर्य की सौर वायु की बाहरी सीमा - जिसे हेलियोस्फ़ीयर कहते हैं - को पार करने वाला पहला मानव-निर्मित यान बना और तारों के बीच के या अंतर तारकीय अंतरिक्ष (इंटरस्टेलर स्पेस) में प्रवेश कर गया. इसका जुड़वा प्रोब छह साल बाद उसके पीछे आया.

दोनों अब भी पृथ्वी को डेटा भेज रहे हैं - जैसे चुंबकीय क्षेत्रों की जानकारी - और अंतरिक्ष के उस क्षेत्र से नई अंतर्दृष्टियाँ दे रहे हैं, जिसे पहले कभी नहीं खोजा गया था.

डॉक्टर बिल कुर्थ वॉयेजर के एक अब भी चल रहे अनुसंधान पर काम कर रहे हैं. वह कहते हैं, "अभी वॉयेजर ही एकमात्र उपकरण है जो अंतर तारकीय माध्यम का मौके पर अवलोकन कर रहा है. समुद्र को समझना हो तो उसमें उतरकर ही जाना जा सकता है."

नासा का अनुमान है कि 2030 के दशक तक दोनों प्रोब्स में कम से कम एक वैज्ञानिक उपकरण चलता रहेगा.

स्पिलकर वादा करती हैं, "हम मिशन को जारी रखने के लिए जो कुछ कर सकते हैं, करते रहेंगे. हम ऑफ़ बटन नहीं दबाएँगे. बल्कि वॉयेजर ख़ुद तय करेगा कि कब रुकना है."

एक 'अविश्वसनीय खोज'

कुर्थ कहते हैं, "वॉयेजर मानवता की सबसे बड़ी खोज का प्रतीक है… यह सचमुच ब्रह्मांड में अपनी जगह समझने की इंसानों की एक साहसिक यात्रा है."

उनका मानना है कि वॉयेजर ने दिखाया कि बाहरी ग्रह "उतने सरल नहीं हैं जितना हमने पहले सोचा था," और इसने आगे के मिशनों के लिए रास्ता खोला.

नासा का यूरोपा क्लिपर फिलहाल बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा की ओर जा रहा है, जबकि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के ज्यूस (जुपिटर आइसी मून्स एक्सप्लोरर) के 2031 में अपने लक्ष्य तक पहुँचने की उम्मीद है.

जहाँ तक वॉयेजर प्रोब्स का सवाल है, यह सिर्फ़ पृथ्वी को डेटा भेजने तक सीमित नहीं है.

हर प्रोब में 12-इंच की सुनहरी परत चढ़ी डिस्क है, जिसमें पृथ्वी के लोगों की 55 भाषाओं में बोले गए अभिवादन, 115 तस्वीरें और हमारे ग्रह का प्रतिनिधित्व करने वाली अनेक आवाज़ें हैं - जैसे गरज और अलग-अलग क्षेत्रों व युगों का संगीत.

1970 के दशक में, कमिंग्स अपने बनाए उपकरणों में से एक पर अपने शुरुआती अक्षर उकेरने के प्रलोभन से बच नहीं पाए थे.

वह मज़ाक करते हैं, "यह अधिकृत नहीं था. लेकिन अब वे मेरे साथ क्या कर सकते हैं?"

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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