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'मैं वापस आऊंगा': इम्तियाज़ अली की फ़िल्म जो अपने नाम को तक़दीर बना गई
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BBC हिंदी26.6.2026Kultur5 Min. LesezeitIndia

'मैं वापस आऊंगा': इम्तियाज़ अली की फ़िल्म जो अपने नाम को तक़दीर बना गई

दर्शकों की तारीफ़ों से मिली 'मैं वापस आऊंगा' को दूसरी ज़िंदगी, कमाई से ज़्यादा अहसास का सफ़र

Auf einen Blick

इम्तियाज़ अली की फ़िल्म 'मैं वापस आऊंगा' भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी को प्रेम और मनुष्यता के नज़रिए से दिखाती है. नसीरुद्दीन शाह अभिनीत यह फ़िल्म दर्शकों से ख़ामोश जुड़ाव पा रही है, जो इसे बॉक्स ऑफिस की कमाई से परे एक भावनात्मक सफलता बनाती है. सह-लेखिका नयनिका मेहतानी ने फ़िल्म के निर्माण की कहानी साझा की.

KI-generierte Zusammenfassung

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ऐसा कम होता है कि कोई फ़िल्म अपने नाम को ही अपनी तक़दीर बना ले. लेकिन निर्देशक इम्तियाज़ अली की 'मैं वापस आऊंगा' ने ठीक वही किया है.

दर्शकों की ज़ुबान से निकली तारीफ़ों और दिल से दिल तक पहुंची सिफ़ारिशों ने इस फ़िल्म को ऐसी दूसरी ज़िंदगी दी है, जिसका सफ़र कमाई से नहीं, अहसास से मापा जाने लगा है.

'मैं वापस आऊंगा' में ऐसा क्या है कि जब थिएटर में फ़िल्म ख़त्म होती है तो ना शोर उठता है, न तालियां बजती हैं. बस एक ठहरा हुआ मौन रह जाता है, जैसे कहानी अब भी भीतर चल रही हो.

ऐसे समय में जब भारत-पाकिस्तान की बातचीत अक्सर तनाव, कड़वाहट और टकराव के इर्द-गिर्द घूमती हो. जब सिनेमा में राष्ट्रवाद के नाम पर एक दूसरे को मटियामेट करने की चीखें बिक रही हों; तब इम्तियाज़ अली एक बिल्कुल अलग जोखिम उठाते है.

उनकी फ़िल्म विभाजन की त्रासदी तो दिखाती है, लेकिन उसे नफ़रत फैलाने के औज़ार में नहीं बदलती. यह विभाजन के दर्द को स्वीकार करती है और इतिहास की राख में प्रेम की बची हुई चिंगारियां तलाशती है.

राजनीति अपने तर्कों के साथ आती है, इतिहास अपने घावों के साथ. ये फ़िल्म उन घावों को कुरेदने के बजाय उनके भीतर बची हुई मनुष्यता को देखने की कोशिश करती है.

'मैं वापस आऊंगा' भारत में रहते एक बूढ़े आदमी (नसीरुद्दीन शाह) की पाकिस्तान स्थित अपने पुश्तैनी घर वापस लौटने और अपने पुराने प्यार से एक बार मिलने की ख़्वाहिश की कहानी है.

उसकी यादों में साथ-साथ उसकी युवा प्रेम कहानी भी चलती है जो विभाजन के दिनों में जन्म लेती है.

वो यह विश्वास नहीं छोड़ता कि सरहदें चाहे जितनी मज़बूत हों, स्मृतियां उनसे कहीं ज़्यादा दूर तक यात्रा कर सकती हैं.

लिटरेचर फ़ेस्टिवल से हुई फ़िल्म की शुरुआत

नसीरुद्दीन शाह के बेमिसाल अभिनय वाली 'मैं वापस आऊंगा' को दर्शकों ने अपना लिया है लेकिन इसकी कामयाबी की चर्चाओं के बीच ये जानना ज़रूरी है कि एक्शन फिल्मों के दौर में, ऐसे नाज़ुक विषय पर फ़िल्म रचने की शुरुआत कैसे हुई?

लंदन में रहने वाली फ़िल्म 'मैं वापस आऊंगा' की सह-लेखिका और उपन्यासकार नयनिका मेहतानी ने 'मैं वापस आऊंगा' का दिलचस्प सफ़र हमसे साझा किया.

उन्होंने कहा, "मैं देहरादून लिटरेचर फ़ेस्टिवल में इम्तियाज़ और रस्किन बॉन्ड के साथ एक मास्टर स्टोरीटेलर्स सत्र मॉडरेट कर रही थी. वहाँ इम्तियाज़ ने ज़िक्र किया कि वह विभाजन पर आधारित एक फ़िल्म बनाना चाहते हैं. मैंने उनसे कहा कि मैंने हाल ही में विभाजन पर आधारित एक उपन्यास लिखा है."

"लेकिन कोविड के वर्षों ने मुझे अपने काम और उद्देश्य को लेकर सोच में डाल दिया था. मैंने इम्तियाज़ से कहा था कि अगर मैं कभी दोबारा किताब या स्क्रिप्ट न भी लिखूं, तो किसी को क्या फ़र्क़ पड़ेगा? जवाब में इम्तियाज़ अपने सूफ़ीयाना अंदाज़ में मुस्कुराए थे."

"कुछ समय बाद इम्तियाज़ ने एक 95 साल के ऐसे व्यक्ति की कहानी साझा की, जिसकी स्मृति धीरे-धीरे लगभग पूरी तरह मिट चुकी है, लेकिन उसके भीतर एक गहरी चाहत अब भी ज़िंदा है कि मौत भी उसे उससे अलग नहीं कर पाती."

"उन्होंने मुझसे कहा कि मैं 20–30 पन्नों का एक स्टोरी डॉक्यूमेंट लिखूं. मैंने लिखा. उन्होंने उसे पढ़ा और जवाब में लिखा कि हमारी संवेदनशीलताओं में एक मेल है. वहीं से इस ख़ूबसूरत सफ़र की शुरुआत हुई."

नयनिका बताती हैं कि सरगोधा पर आधारित कहानी लिखना उनके लिए भी घर के और क़रीब लौटने जैसा था. उनके दादा-दादी और पिता विभाजन के शरणार्थी थे. उनकी नानी सरगोधा से थीं. विभाजन के समय वे दिल्ली में थीं, जबकि उनका परिवार सरगोधा में ही रह गया था.

उनके जीवन की रक्षा उनके मुस्लिम पड़ोसियों ने की थी, "इम्तियाज़ के साथ फ़िल्म के लेखन के दौरान 'डिमेंशिया' एक शक्तिशाली माध्यम बना, जिसके ज़रिए विभाजन के दर्द को भी एक अलग, कभी टूटे-बिखरे, कभी ट्रेजि-कॉमिक, लेकिन बेहद मानवीय रूप में देखा जा सका."

कई आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि फ़िल्म विभाजन की जटिलता और उसके गहरे सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों से सीधे संवाद नहीं करती.

इस पर सह-लेखिका नयनिका मेहतानी कहती हैं, "विभाजन कभी इस कहानी का 'मुख्य पात्र' नहीं था. वह केवल भावनात्मक पृष्ठभूमि था, जिस पर यह निजी यात्रा घटती है. अंततः यह एक साधारण इंसान की कहानी है, जिसकी चाहतें और प्रेम एक बड़े हादसे के मलबे में दब गया."

"शायद यही वजह है कि ये फ़िल्म उन लोगों को भी छूती हैं जिन्हें 1947 का विभाजन व्यक्तिगत रूप से नहीं पता. इसके जज़्बात सीमाओं से परे जाते हैं."

नफ़रत की कहानियों के बीच कोई फ़िल्मकार इतिहास के भावनात्मक अवशेषों की कहानी कहने का साहस करे तो एक तरह से वह अपने समय के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है. और दर्शक भी जिस तरह इस फ़िल्म के साथ खड़े हो रहे हैं ये शायद उस संभावना की याद दिलाने की कोशिश है जिसे हम भूल चुके होते हैं.

इस फ़िल्म से पहले भी इम्तियाज़ की लगभग हर फ़िल्म प्रेम कहानी है, लेकिन यह प्रेम कभी सीधा या आसान नहीं होता.

जहां प्रेम मंज़िल नहीं, तलाश है

इम्तियाज़ अली की तक़रीबन हर फ़िल्म एक प्रेम कहानी है, मगर उनकी फ़िल्मों में प्रेम कभी सरल नहीं होता.

वह दो लोगों का मिलना भर नहीं है. वह एक सफ़र है, एक बेचैनी है, एक अधूरापन है जो इंसान को लगातार कहीं और, किसी और की तरफ़ खींचता रहता है.

जब वी मेट हो, रॉकस्टार, हाईवे, तमाशा, जब हैरी मेट सेजल से लैला मजनूं तक, उनके किरदार हमेशा किसी खोई हुई चीज़ की तलाश में रहते हैं. कई बार वह प्रेम होता है. कई बार ख़ुद की पहचान और और कई बार दोनों एक-दूसरे में घुल जाते हैं.

अगर ग़ौर करेंगे तो पाएंगे कि इम्तियाज़ की दुनिया में लगभग हर कहानी 'वापसी' की कहानी है.

'जब वी मेट' का आदित्य वापस अपने जीवन में लौटता है. 'रॉकस्टार' का जॉर्डन अपने खोए हुए प्रेम में.

'तमाशा' का वेद अपने असली व्यक्तित्व में, 'जब हैरी मेट सेजल' का हैरी अपने गांव, और अब 'मैं वापस आऊंगा' का बूढ़ा नायक भी वापसी की उसी यात्रा पर है.

1947 में छोड़े गए घर और छूटे हुए समय की ओर लौटने की कोशिश करता हुआ.

यह वापसी सिर्फ़ भूगोल की नहीं है, यह स्मृति की वापसी है. उस वक्त में लौटने की इच्छा है जहां कुछ अधूरा रह गया था. जहां इतिहास ने निजी जीवन में हस्तक्षेप किया था.

समय के दो छोर पर खड़े किरदार

'लव आजकल' से लेकर 'मैं वापस आऊंगा' तक यही इम्तियाज़ का प्रिय क्षेत्र है- वर्तमान और अतीत के प्रेम के बीच पुल बनाना.

इम्तियाज़ के किरदार आधुनिक दुनिया में रहते हैं, लेकिन उनकी आत्मा पुरानी कहानियों से जुड़ी है.

वह मोबाइल और शहरों के बीच रहते हुए भी हीर-रांझा और लैला-मजनूं की विरासत लेकर चलते हैं. उनकी कहानियों में मिलन से ज़्यादा महत्व विरह का है, क्योंकि वही विरह प्रेम को गहराई देता है और याद को ज़िंदा रखता है. विरह में ही लालसा औऱ उम्मीद रहती है.

इन किरदारों के भीतर मलाल हमेशा मौजूद रहता है. वे किसी खोए हुए पल या किसी हादसे के बाद जागते हैं. 'जब वी मेट' का आदित्य हो या 'तमाशा' का वेद. यह मलाल उन्हें तोड़ता भी है और भीतर एक नई संभावना भी जगाता है.

मैं वापस आऊंगा में यह मलाल निजी भी है और ऐतिहासिक भी. सरहदों से बिछड़ने का, और उन मुलाकातों का जो कभी पूरी नहीं हो सकीं.

मगर इम्तियाज़ की दुनिया में प्रेम कभी निराश नहीं करता. उनके पात्र टूटते हैं, भटकते हैं, लेकिन प्रेम को कभी छोड़ते नहीं.

हर कहानी में एक खिड़की खुली रहती है जहां से उम्मीद की हल्की सी धूप अंदर आ सके. और शायद इसी वजह से मैं वापस आऊंगा का शीर्षक भी एक वादा लगता है. ऐसा वादा जो समय और दूरी के बाद भी जीवित रहता है.

क्या इम्तियाज़ ख़ुद को दोहरा रहे हैं?

उनकी फिल्म चाहे हिट हो या फ्लॉप, इम्तियाज़ अली का हस्ताक्षर अलग नज़र आता है. लंबी यात्राएं, अधूरा प्रेम, स्मृतियों में डूबे संवाद, संगीत में घुली उदासी और भीतर के खालीपन से जूझते किरदार, यह सब उनकी फिल्मों का परिचित संसार है.

यही उनकी ताकत भी है और 'मैं वापस आऊंगा' को मिल रही सराहना के बीच यही आलोचना भी है कि इसमें इम्तियाज़ अली फिर अपनी वही पुराना इमोशनल ग्राफ और विजुअल स्टाइल दोहराते नज़र आते हैं.

उनके साथ 'मैं वापस आऊंगा' लिखने वाली सह-लेखिका नयनिका कहती हैं, "मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकती कि क्यों उनकी फिल्मों में कुछ विषय बार-बार लौटते हैं लेकिन मुझे लगता है कि जिन कहानियों की ओर हम बार-बार लौटते हैं, वे अक्सर वही सवाल होते हैं जिनके जवाब हम अभी तक ढूंढ रहे होते हैं. इम्तियाज़ में एक दुर्लभ संवेदनशीलता है. वो हमें याद, अफ़सोस, समय, दूरी और पहचान के धागों में उलझाते हैं और फिर कहीं न अपने भीतर के 'घर' तक पहुंचा देते हैं."

लेकिन क्या सुंदरता बार-बार दोहराए जाने पर अपना असर नहीं खो देती? शुरुआत से उनकी फिल्मों में किरदारों की यात्रा अहम रही (सोचा ना था, जब वी मेट, हाइवे, तमाशा) और वर्तमान और पुराने समय के दो ट्रैक में कहानी सुनाने (लव आजकल, रॉकस्टार) का उनका अंदाज़ भी.

शाहरुख खान जैसे सुपर स्टार के साथ उनकी बेहद कमज़ोर फिल्म जब हैरी मेट सेजल (2017) और फिर लव आज कल 2 (2020) के फ्लॉप बाद यह कहा गया कि उनके पास कुछ भी नया नहीं बचा. उनकी कहानियां वाक़ई आगे बढ़ने के बजाय अपने ही पुराने पड़ावों पर लौटती दिखीं.

उनमें वह ताज़गी नहीं थी जिसने कभी जब वी मेट, रॉकस्टार और तमाशा को खास बनाया था. शायद टिकट खरीदने वाले दर्शकों की उम्मीदों का दबाव भी इसका हिस्सा रहा हो.

थिएटर के दबाव से मुक्त होकर उनकी अगली फिल्म 'अमर सिंह चमकीला (2024)' नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई. इसमें इम्तियाज फिर अपनी खोई हुई आवाज़ तक पहुंचते दिखे, और यहीं से उनके सिनेमा में एक नया बदलाव भी दिखाई देता है.

रूमानी फ़िल्मों में राजनीतिक परतें

दिलचस्प यह है कि वे राजनीति को सीधे राजनीतिक भाषा में नहीं कहते, बल्कि उसे इंसानी अनुभवों के भीतर खोजते नज़र आते हैं.

इम्तियाज़ की फ़िल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता रहा है कि रिलीज़ के समय उन्हें उतना प्यार नहीं मिलता, जितना कुछ साल बाद मिलता है. ख़ुद इम्तियाज़ भी इस बात पर मज़ाकिया वीडियो तक बना चुके हैं.

लेकिन इस बार बॉक्स ऑफिस पर 'मैं वापस आऊंगा' की वापसी की कमाई सिर्फ बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से नहीं नापी जा सकती.इसकी असली कमाई वह ख़ामोश जुड़ाव है, जो इस दौर की तल्ख़ियों को पीछे छोड़कर कुछ पल सिर्फ़ प्रेम को ठहरने की जगह देता.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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