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मुग़ल साम्राज्य: अख़बारात ने खोली सूचना व्यवस्था की परतें
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BBC हिंदी1/7/2026Mundo11 min de lecturaIndia

मुग़ल साम्राज्य: अख़बारात ने खोली सूचना व्यवस्था की परतें

En resumen

16वीं सदी के आख़िरी वर्षों से मुग़ल भारत में 'अख़बारात' नामक समाचार रिपोर्टें तैयार होती थीं, जिनमें दरबार की साज़िशों, सैन्य अभियानों और वित्तीय मामलों की जानकारी होती थी। इतिहासकार मुनिस डी फ़ारूक़ी ने इन रिपोर्टों का अध्ययन कर औरंगज़ेब के शासनकाल और मुग़ल साम्राज्य की कार्यप्रणाली पर नई रोशनी डाली है।

Resumen generado por IA

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Author, सौतिक बिस्वास

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

यूरोप में जब अख़बारों की शुरुआत हो रही थी, तब मुग़ल भारत का अपना ख़बरों का नेटवर्क था.

16वीं सदी के आख़िरी वर्षों से ही लेखकों, एजेंटों और सचिवों की बड़ी टीमें 'अख़बारात' तैयार करती थीं. ये छोटी-छोटी समाचार रिपोर्टें होती थीं.

इनमें दरबार की साज़िशों, सैन्य अभियानों, नियुक्तियों, वित्तीय मामलों और गपशप तक की जानकारी होती थी. फ़ारसी भाषा में लिखी गई ये रिपोर्टें अक्सर जल्दी-जल्दी काग़ज़ पर दर्ज की जाती थीं.

ये मुग़ल साम्राज्य की सूचना व्यवस्था का अहम हिस्सा थीं. इनका इस्तेमाल ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, सरकारी आदेश पहुँचाने और समाचार बाँटने के लिए किया जाता था.

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हर दिन सैकड़ों, शायद हज़ारों अख़बारात शाही दरबार और प्रांतीय दरबारों के बीच भेजे जाते थे. इन्होंने विशाल मुग़ल साम्राज्य को एक सूत्र में बाँधने में अहम भूमिका निभाई.

अपने चरम पर यह साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से और दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी पर शासन करता था.

इनमें से कई अख़बारात अधिकारियों की सभाओं में पढ़कर सुनाए जाते थे. इनके ज़रिए शाही दरबार की ख़बरें साम्राज्य के दूर-दराज़ इलाक़ों तक पहुँचती थीं.

औरंगज़ेब शासन के हर दिन का लेखाजोखा

दशकों तक इन रिपोर्टों, आदेशों और प्रशासनिक दस्तावेज़ों के हज़ारों पन्ने भारत और ब्रिटेन के पुस्तकालयों और अभिलेखागारों में पड़े रहे.

इतिहासकारों को इनके अस्तित्व के बारे में पता था. लेकिन बहुत कम लोगों ने इन्हें गहराई से पढ़ने की कोशिश की.

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के इतिहासकार मुनिस डी फ़ारूक़ी ने यही काम किया.

उन्होंने 2007 में इस काम की शुरुआत की. इसके बाद लगभग दो दशकों तक वे इन दस्तावेज़ों का अध्ययन करते रहे.

उन्होंने 'अख़बारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला' यानी 'उच्च दरबार के समाचार पत्रों' के विशाल संग्रह का गहन अध्ययन किया. यह संग्रह भारत और ब्रिटेन के कई अभिलेखागारों में सुरक्षित रखा गया है.

कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी में मौजूद 6,500 से ज़्यादा पन्नों का अध्ययन करते हुए फ़ारूक़ी ने हज़ारों प्रविष्टियों को खंगाला.

इन दस्तावेज़ों में राजकुमारों, सेनापतियों, दरबारियों, शाही महिलाओं, ख़्वाजासराओं और कई अन्य लोगों का ज़िक्र मिलता है.

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इस शोध का नतीजा औरंगज़ेब और 17वीं सदी के आख़िरी दौर के मुग़ल साम्राज्य पर एक नई किताब के रूप में सामने आया है.

औरंगज़ेब को उनके शाही नाम आलमग़ीर से भी जाना जाता है. यह किताब भारत के सबसे विवादित मुग़ल शासकों में से एक औरंगज़ेब की नई तस्वीर पेश करती है.

साथ ही यह भी बताती है कि शुरुआती आधुनिक दौर की दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक यह साम्राज्य वास्तव में कैसे काम करता था.

मुग़ल काल की ये समाचार रिपोर्टें कम से कम चार ज्ञात संग्रहों में सुरक्षित हैं. ये संग्रह लंदन, बीकानेर, सीतामऊ और कोलकाता में मौजूद हैं.

हालाँकि इतिहासकारों का मानना है कि ऐसे कुछ और संग्रह निजी हाथों में भी हो सकते हैं.

ऐसा ही एक संग्रह जयपुर क़िले के ठंडे और सूखे तहख़ाने में बंडलों के रूप में सुरक्षित रखा गया था.

19वीं सदी की शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी और इतिहास प्रेमी जेम्स टॉड ने इन रिपोर्टों में से कई को अध्ययन के लिए लिया था.

मगर 1823 में ब्रिटेन लौटते समय उन्होंने इन्हें वापस नहीं किया. बाद में उन्होंने यह संग्रह रॉयल एशियाटिक सोसायटी की लाइब्रेरी को दान कर दिया.

सबसे समृद्ध संग्रह कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी में है. इसमें 21 खंड हैं, जो औरंगज़ेब के शासनकाल को समर्पित हैं.

औरंगज़ेब ने 1658 से 1707 तक शासन किया था. उन्हें मुग़ल साम्राज्य का आख़िरी बड़ा विस्तारवादी सम्राट माना जाता है.

ये खंड कभी भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार के निजी पुस्तकालय का हिस्सा थे. सर जदुनाथ सरकार औरंगज़ेब के सबसे प्रभावशाली जीवनीकार माने जाते हैं.

पहली नज़र में इन दस्तावेज़ों का बहुत-सा हिस्सा साधारण लगता है.

इनमें नियुक्तियों, विवादों, सैन्य गतिविधियों, उपहारों, बीमारियों और प्रशासनिक बारीकियों का विवरण मिलता है. लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो ये एक दुर्लभ तस्वीर पेश करते हैं.

फ़ारूक़ी के मुताबिक़, ये दस्तावेज़ ऐसे साम्राज्य का लगभग लगातार रिकॉर्ड हैं, जो ख़ुद पर नज़र रख रहा था.

औरंगज़ेब के शासन के शुरुआती दो दशकों से जुड़े दस्तावेज़ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन 1680 के दशक की शुरुआत के बाद का रिकॉर्ड बेहद समृद्ध है.

इस दौर की बड़ी मात्रा में सामग्री आज भी सुरक्षित है.

इन दस्तावेज़ों के ज़रिए कई वर्षों तक लगभग हर दिन की रिपोर्टों तक पहुँच मिलती है.

कुल मिलाकर, ये रिकॉर्ड औरंगज़ेब के लगभग पचास साल लंबे शासनकाल के क़रीब एक-तिहाई हिस्से पर रोशनी डालते हैं.

धर्मांतरण और सिख उत्पीड़न के बारे में क्या लिखा गया

फ़ारूक़ी ने अपने अकादमिक जीवन का बड़ा हिस्सा 17वीं सदी के आख़िरी दौर के मुग़ल संसार को समझने में बिताया है.

उस समय मुग़ल साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था. लेकिन उसी दौर में उसके पतन की शुरुआत भी हो रही थी. आगे चलकर इसी पतन ने ब्रिटिश शासन का रास्ता खोला.

अख़बारात ने फ़ारूक़ी को उस दौर को देखने का एक नया नज़रिया दिया.

फ़ारूक़ी ने कहा कि अख़बारात के साथ काम करने का मेरा अनुभव बार-बार नई खोज करने जैसा रहा है.

उन्होंने कहा, "मैं आज भी हैरान रह जाता हूँ कि उस समय सूचना तंत्र कितना व्यापक और घना था."

फ़ारूक़ी ने जिन समाचार रिपोर्टों का अध्ययन किया, वे जयपुर के राजा के लिए तैयार की गई थीं.

संभव है कि साम्राज्य के सैकड़ों दूसरे रईसों, राजकुमारों और अधिकारियों को भी ऐसी ही रिपोर्टें मिलती रही हों.

ये रिपोर्टें साम्राज्य भर में फैले एजेंटों के ज़रिए पहुँचाई जाती थीं. इस तरह शुरुआती आधुनिक दौर के सबसे विकसित सूचना नेटवर्कों में से एक का निर्माण हुआ था.

फ़ारूक़ी कहते हैं, "जब मैं उस व्यवस्था के बारे में सोचता हूँ, जिसने इतनी समृद्ध जानकारी इकट्ठा करने और उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम किया, तो मैं दंग रह जाता हूँ."

सूचनाओं की विशाल मात्रा यह दिखाती है कि पूर्व-आधुनिक दौर के मानकों के हिसाब से मुग़ल राज्य अपने विशाल साम्राज्य की काफ़ी गहरी समझ रखता था.

फ़ारूक़ी का मानना है कि इन सूचनाओं पर कार्य करने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है लेकिन इस सूचना तंत्र की पहुँच बहुत व्यापक थी.

इसका असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता था. कभी इसके नतीजे अच्छे होते थे और कभी बुरे. फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन रिपोर्टों ने बार-बार उनकी पुरानी धारणाओं को बदला.

फ़ारूक़ी का कहना है कि अख़बारात में बड़े पैमाने पर धार्मिक धर्मांतरणों के बहुत कम उल्लेख मिले.

आमतौर पर औरंगज़ेब के शासन को बड़े पैमाने पर धार्मिक धर्मांतरणों से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन अख़बारात में ऐसी तस्वीर साफ़ तौर पर नहीं दिखती.

फ़ारूक़ी के मुताबिक़, शाही हरम और ख़्वाजासराओं की व्यवस्था राजनीतिक रूप से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली थी, जितना अब तक माना जाता रहा था.

उन्हें यह भी लगा कि औरंगज़ेब उतने दूर रहने वाले और सख़्त मिज़ाज शासक नहीं दिखते, जैसा अक्सर माना जाता है.

यह बात फ़ारूक़ी के लिए हैरान करने वाली थी कि इन रिपोर्टों में सिखों जैसे समूहों के बारे में भी अपेक्षा से काफ़ी कम नकारात्मक टिप्पणियाँ मिलीं.

हालांकि यह निष्कर्ष कम से कम 1711 से मानी जा रही उन ऐतिहासिक परंपराओं से अलग है, जिनमें औरंगज़ेब को सिख समुदाय पर अत्याचारों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता रहा है.

औरंगजेब की बेटी का राजनीतिक प्रभुत्व

फ़ारूक़ी कहते हैं कि कुछ अहम निष्कर्ष सीधे किसी एक दस्तावेज़ में नहीं मिले. बल्कि वे अख़बारात में बार-बार सामने आने वाली जानकारियों को जोड़ने से सामने आए.

ऐसी ही एक जानकारी को लेकर वह बताते हैं कि इन समाचार पत्रों में एक नाम बार-बार दिखाई देता है. यह नाम ज़ीनत-उन-निसा का था, जो औरंगज़ेब की बेटी थीं.

इतिहासकार उनके बारे में जानते थे लेकिन दरबार में उनकी भूमिका पर बहुत कम लिखा गया था. इसके बावजूद दस्तावेज़ों के पन्ने दर पन्ने उनका ज़िक्र मिलता रहा.

कुछ ही हफ़्तों में फ़ारूक़ी को समझ आ गया कि वह कोई मामूली शाही हस्ती नहीं थीं. ज़ीनत-उन-निसा दरबार की एक प्रभावशाली राजनीतिक शख़्सियत थीं.

जीवन के आख़िरी वर्षों में वे अपने बूढ़े और राजनीतिक रूप से कमज़ोर पड़ चुके पिता की मज़बूत सहायक बनी रहीं. फ़ारूक़ी के अनुसार, उनका राजनीतिक महत्व असाधारण था.

इसके बाद फ़ारूक़ी ने अपने अध्ययन में ज़ीनत-उन-निसा के नाम के हर उल्लेख को नोट करना शुरू कर दिया.

आगे चलकर मुग़ल हरम पर उनके विवरण में ज़ीनत-उन-निसा एक प्रमुख पात्र के रूप में उभरकर सामने आईं.

हर नई खोज ने फ़ारूक़ी को अपनी पुरानी धारणाओं पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया.

वे कहते हैं, "1990 के दशक में जब मैंने पहली बार अख़बारात के बारे में सुना था, तब से मैं जो कहानियाँ अपने मन में गढ़ता आ रहा था, उनमें से कई पर मुझे फिर से सोचने की ज़रूरत पड़ी."

मुग़ल दस्तावेज़ों का अध्ययन इतना मुश्किल क्यों है

फ़ारूक़ी के मुताबिक़, अख़बारात सिर्फ़ औरंगज़ेब नहीं, बल्कि पूरे मुग़ल साम्राज्य को नए नज़रिए से देखने का अवसर देते हैं.

लेकिन इतिहासकारों ने अब तक अख़बारात से दूरी क्यों बनाए रखी.

फ़ारूक़ी कहते हैं कि वह इस झिझक को समझ सकते हैं. अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने मुग़ल काल के एक दूसरे बड़े अभिलेखीय संग्रह पर काम करने की कोशिश की थी.

उन्होंने सात हफ़्तों तक उस सामग्री को समझने की कोशिश की. लेकिन आख़िरकार उन्होंने वह काम छोड़ दिया.

उस अनुभव के बाद लगभग एक दशक तक वे ऐसे विशाल और बिना सूची वाले संग्रहों से बचते रहे. अख़बारात के साथ भी उन्हें इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा.

वे कहते हैं, "इसमें किसी ख़ास जानकारी को ढूँढ़ना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है." इस संग्रह में कोई सूची नहीं है.

साथ ही इसमें हज़ारों नहीं, बल्कि दसियों हज़ार प्रविष्टियाँ मौजूद हैं. इसे समझने के लिए धैर्य, मेहनत और लगातार पढ़ते रहने की ज़रूरत होती है.

इसमें प्रशासनिक रिकॉर्ड, निजी पत्राचार, क्षेत्रीय इतिहास, जीवनियों के संग्रह, कविता, यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के दस्तावेज़ और यात्रियों के विवरण शामिल हैं.

इन सभी स्रोतों की भरपूर सामग्री उपलब्ध है. फ़ारूक़ी के लिए अख़बारात बेहद महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुए. लेकिन वे मानते हैं कि यह एक बहुत बड़े अभिलेखीय संसार का सिर्फ़ एक हिस्सा है.

इस विशाल सामग्री का अब भी अपेक्षा के मुताबिक़ बहुत कम इस्तेमाल हुआ है.

वे कहते हैं, "इतिहासकारों के लिए बाहर इतनी सामग्री मौजूद है कि उस आधार पर दर्जनों, बल्कि उससे भी ज़्यादा किताबें लिखी जा सकती हैं."

फ़ारूक़ी को याद है कि जब उन्होंने पहली बार कोलकाता में इस संग्रह को खोला था, तब उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनके सामने क्या आने वाला है.

वे कहते हैं, "पहले खंड का पहला पन्ना पलटते ही मुझे समझ आ गया कि यह संग्रह कितना असाधारण है."

उन्होंने कहा, "मुझे तुरंत ऐसी कई कहानियों के सूत्र दिखाई देने लगे, जिन्हें लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया था या जिन पर बहुत कम काम हुआ था."

फ़ारूक़ी का कहना है कि उनकी किताब उन कहानियों के केवल एक छोटे हिस्से को ही सामने ला पाई है.

उनके मुताबिक़, अभी भी ऐसी बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनकी खोज और अध्ययन किया जाना बाक़ी है.

वे कहते हैं, "ऐसी अनगिनत कहानियाँ अब भी मौजूद हैं, जिन पर भविष्य में दूसरे शोधकर्ता काम कर सकते हैं."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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