Dernière minute
DENeue Partei in der Türkei gegründet: Özgür Özel führt „Yeni Parti“DEVarta beantragt vorläufige Insolvenz in EigenverwaltungDEOpen AI: KI-Modelle brechen aus Testumgebung aus und verüben HackingangriffDEChefankläger des Internationalen Strafgerichtshofes entlassenDETrump kündigt Zölle gegen Mexiko und Kanada an - Kanada wehrt sich mit Alleingang bei BrückeneinweihungDEKabinettsumbau sorgt für Kritik an Merz und LinnemannDEIStGH-Mitgliedstaaten stimmen für Abberufung von Karim Khan als ChefanklägerDEDeutschlands Exportmodell in schwierigen Zeiten: US-Präsident erschüttert Weltwirtschaft mit neuem HandelsinstrumentDEGordie-Howe-Brücke eröffnet: Symbol der Partnerschaft in angespannter ZeitDEUSA erheben Strafzölle gegen Kanada und andere LänderDENeue Partei in der Türkei gegründet: Özgür Özel führt „Yeni Parti“DEVarta beantragt vorläufige Insolvenz in EigenverwaltungDEOpen AI: KI-Modelle brechen aus Testumgebung aus und verüben HackingangriffDEChefankläger des Internationalen Strafgerichtshofes entlassenDETrump kündigt Zölle gegen Mexiko und Kanada an - Kanada wehrt sich mit Alleingang bei BrückeneinweihungDEKabinettsumbau sorgt für Kritik an Merz und LinnemannDEIStGH-Mitgliedstaaten stimmen für Abberufung von Karim Khan als ChefanklägerDEDeutschlands Exportmodell in schwierigen Zeiten: US-Präsident erschüttert Weltwirtschaft mit neuem HandelsinstrumentDEGordie-Howe-Brücke eröffnet: Symbol der Partnerschaft in angespannter ZeitDEUSA erheben Strafzölle gegen Kanada und andere Länder
Newsgather
Retourअमेरिका-ईरान संघर्ष में क्या बड़ी हार अरब देशों की हुई है?
अमेरिका-ईरान संघर्ष में क्या बड़ी हार अरब देशों की हुई है?
En développement
BBC हिंदी01/07/2026Monde10 min de lectureIndia

अमेरिका-ईरान संघर्ष में क्या बड़ी हार अरब देशों की हुई है?

L'essentiel

अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर से मध्य पूर्व में सैन्य तनाव कम हुआ है, लेकिन खाड़ी देशों को चिंता है कि इससे ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञ इस संघर्ष में इजराइल को सबसे बड़ा हारने वाला मानते हैं, जबकि खाड़ी देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

Résumé généré par IA

Taille de police

अमेरिका-ईरान संघर्ष में क्या बड़ी हार अरब देशों की हुई है?

Author, मनाल ख़लील

पदनाम, बीबीसी न्यूज़ अरबी

प्रकाशित एक घंटा पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

अमेरिका और ईरान के बीच एक मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर साइन होने से मिडिल ईस्ट में मिलिट्री टेंशन कुछ समय के लिए कम हो गया है.

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत अभी शुरुआती स्टेज में है और इसके आख़िरी नतीजों के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी.

फिर भी, एक ज़रूरी सवाल सामने आ रहा है, और वह यह है कि इस पूरे झगड़े में सबसे ज़्यादा नुकसान किसे होगा?

इस मामले पर अलग-अलग राय हैं.

फ़ारस की खाड़ी के अरब देशों को ये आशंका है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत से तेहरान को "बहुत ज़्यादा छूट" मिल सकती है, जिससे इस इलाक़े में ईरान का रसूख और बढ़ सकता है.

ईरान और अमेरिका के बीच साइन किए गए मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर किसी साफ़ रोक का ज़िक्र नहीं है.

यह एक ऐसी बात है जिसने खाड़ी देशों के लिए और चिंता पैदा कर दी है क्योंकि ये वही मिसाइलें हैं जो हाल के झगड़े के दौरान खाड़ी देशों पर दागी गई थीं.

इनसे जान-माल का बहुत नुक़सान हुआ था.

छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें

सबसे अधिक पढ़ी गईं

समाप्त

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें

दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

दिलचस्प बात यह है कि युद्ध के दौरान, डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ईरान की मिसाइल क्षमता को ख़त्म करने को अपने मुख्य लक्ष्यों में से एक बताती रही.

हालांकि, पेरिस दौरे के दौरान ट्रंप ने अपने रुख़ में थोड़ी नरमी दिखाते हुए कहा कि "अगर दूसरे देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, तो ईरान को उनमें से कुछ से दूर रखना ग़लत होगा."

किंग्स कॉलेज लंदन में सिक्योरिटी स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रेग के मुताबिक़, ईरान का मिसाइल प्रोग्राम अभी भी अरब देशों के लिए एक गंभीर सिक्योरिटी चुनौती बना हुआ है.

हालांकि, उनका यह भी मानना है कि इन देशों की लीडरशिप इस बात से वाकिफ़ है कि ईरान के मिसाइल स्टॉक को पूरी तरह ख़त्म करने की मांग एक कामयाब समझौते में रुकावट बन सकती है.

एंड्रियास क्रेग ने बताया कि अब खाड़ी देशों को क्या करना चाहिए.

उनके मुताबिक खाड़ी देशों को अपना इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करना होगा, मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम का विस्तार करना होगा और इंटरसेप्टर मिसाइलें बनानी होंगी.

इसके अलावा क्रेग के मुताबिक खाड़ी देशों को 'भविष्य में सीधे टकराव से बचने के लिए तेहरान के साथ संपर्क बनाए रखना शामिल है.'

'युद्ध लंबा खिंचा तो..'

इस बात के बावजूद कि इस युद्ध के दौरान खाड़ी के अरब देशों को काफ़ी नुक़सान हुआ और उनके इंफ्रास्ट्रक्चर की कमज़ोरियां भी सामने आईं, एंड्रियास क्रेग उन्हें इस लड़ाई में मुख्य रूप से हारने वाला नहीं मानते.

उनके मुताबिक़, "स्ट्रेटेजिक नज़रिए से, इसराइल सबसे बड़ा हारने वाला देश लगता है. उसने अपनी पॉलिटिकल, डिप्लोमैटिक और मिलिट्री कैपिटल का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका के साथ ख़र्च किया है. इसराइल ने वेस्टर्न पब्लिक ओपिनियन में अपनी साख को नुक़सान पहुंचाया है और इस सोच को मज़बूत किया है कि वह अपनी सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी के तहत अमेरिका को इस इलाक़े में महंगे तनाव की ओर धकेल रहा है."

एंड्रियास क्रेग के मुताबिक़, इसके उलट, खाड़ी के देश धीरे-धीरे 'अमेरिका फ़र्स्ट' पॉलिसी की मांगों को मान रहे हैं. इनमें ज़िम्मेदारियों को शेयर करना, अमेरिकन इकॉनमी में इन्वेस्टमेंट, तनाव कम करना और रीज़नल स्टेबिलिटी को बढ़ावा देना शामिल है.

उनका कहना है कि ये देश एनर्जी सप्लाई पक्का करने से लेकर रीज़नल संकटों में बीच-बचाव करने की भूमिका निभाने तक, कई तरह से अमेरिका के लिए मददगार साबित हो रहे हैं, जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण डिप्लोमैटिक और स्ट्रेटेजिक फ़ायदा है.

दूसरी तरफ़, वॉशिंगटन में मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में रिसर्चर और लेक्चरर हसन मुनीमना इस स्थिति को एक अलग एंगल से देखते हैं.

उनके अनुसार, खाड़ी के देश इस संकट से फ़ायदा उठाने वालों में से हो सकते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं है कि उन्होंने बहुत बड़ी सफलता हासिल की है, बल्कि इसलिए है क्योंकि लंबे युद्ध की स्थिति में उन्हें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती.

बीबीसी अरबी के साथ एक इंटरव्यू में, उन्होंने कहा कि हालांकि युद्ध के दौरान खाड़ी के देशों को काफ़ी नुकसान हुआ, लेकिन अगर मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग पर साइन नहीं हुए होते और लड़ाई जारी रहती, तो इस क्षेत्र को ऐसे नुक़सान का सामना करना पड़ता जिसकी भरपाई करना मुमकिन नहीं होता.

उनके अनुसार, ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें, उसके प्रॉक्सी, उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम और होर्मुज़ स्ट्रेट जैसे सेंसिटिव मुद्दे अभी भी खाड़ी के देशों के लिए बड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन वह चेतावनी देते हैं कि अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो इन देशों पर न केवल दबाव पड़ेगा बल्कि उनके अस्तित्व को भी ख़तरा होगा.

हाल के सालों में, खाड़ी के देशों ने अपनी इकॉनमी में विविधता लाने के लिए बड़े प्लान शुरू किए हैं, जिसके तहत टूरिज़्म और टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर में भारी इन्वेस्टमेंट किया जा रहा है.

ऐसी स्थिति में, लंबे समय तक चलने वाले या बढ़ते युद्ध का असर इन सभी कोशिशों को गंभीर रूप से नुक़सान पहुंचा सकता है.

क्या खाड़ी देश युद्ध के बाद शांति की क़ीमत भी चुकाएंगे?

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते में ईरान के रिकंस्ट्रक्शन और इकोनॉमिक डेवलपमेंट के लिए 300 बिलियन डॉलर का एक बड़ा फंड बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है. उम्मीद है कि खाड़ी देश इस फंड के लिए मुख्य फाइनेंशियल रिसोर्स देंगे.

दूसरी ओर, ईरान पहले ही इस इलाक़े के उन देशों से मुआवज़े की मांग कर चुका है जिन्होंने उसके खिलाफ हमलों में हिस्सा लिया या मिलिट्री बेस के रूप में मदद दी.

दूसरी ओर, कतर और यूनाइटेड अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों ने भी मांग की है कि ईरान अपने ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से हुए नुकसान की भरपाई करे.

इस तरह, एक मुश्किल स्थिति बन रही है जिसमें खाड़ी देशों को न केवल युद्ध की कीमत चुकानी पड़ सकती है, बल्कि शांति की भी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

अभी तक, खाड़ी देशों को हुए कुल नुकसान के बारे में कोई ऑफिशियल डेटा जारी नहीं किया गया है.

हसन मुनीमना का कहना है कि जल्दी का मतलब या तो फ़ायदा उठाना है या नुकसान से बचना है.

उनके मुताबिक़, खाड़ी देश अभी फ़ायदा उठाने के बजाय संभावित नुक़सान को कम करने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं, और प्रस्तावित 300 बिलियन डॉलर के फंड को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है.

वह बताते हैं कि अगर खाड़ी देश इस फंड में योगदान देते हैं, तो यह ईरान के लिए मदद नहीं होगी, बल्कि निवेश का रूप लेगी. उनके मुताबिक, इस तरह की पार्टनरशिप साझा आर्थिक हितों के ज़रिए 'ईरान के दबदबे वाले प्लान' को सीमित करने में मदद कर सकती है.

दूसरी ओर, एंड्रियास क्रेग का कहना है कि रिकंस्ट्रक्शन के लिए प्रस्तावित फंड से राजनीतिक बहस छिड़ सकती है क्योंकि इससे यह प्रभाव जा सकता है कि खाड़ी देशों पर सबसे पहले हमला हुआ था और अब उनसे रिकंस्ट्रक्शन का खर्च उठाने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन उनके मुताबिक, तस्वीर इससे कहीं ज़्यादा जटिल है.

उनके मुताबिक, खाड़ी देश ईरान को कभी भी "साफ़ छूट" नहीं देंगे और कोई भी रिकंस्ट्रक्शन पैकेज सिर्फ़ अप्रत्यक्ष रूप से, शर्तों के साथ और कमर्शियल आधार पर ही लागू किया जाएगा. साथ ही, आर्थिक एक-दूसरे पर निर्भरता इन देशों को ईरान के व्यवहार पर असर डालने का एक नया ज़रिया भी दे सकती है.

और भी हैं कई जोखिम

कुछ विश्लेषकों के अनुसार ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने वाले कारकों में होर्मुज़ स्ट्रेट का विशेष महत्व है.

ईरान इस महत्वपूर्ण जलमार्ग का उपयोग बातचीत के दौरान दबाव के प्रभावी स्रोत के रूप में करता रहा है. यह स्थिति खाड़ी देशों के लिए चिंता का कारण है क्योंकि उनका प्रमुख तेल और गैस निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है.

सऊदी अरब पाइपलाइनों और लाल सागर तक पहुंच के माध्यम से कुछ हद तक होर्मुज़ स्ट्रेट के संभावित बंद होने या रुकावट के जोखिम से खुद को बचा सकता है.

यूएई के पास फ़ुजैरा के माध्यम से भी सीमित विकल्प हैं, लेकिन क़तर और कुवैत अपेक्षाकृत कमज़ोर स्थिति में हैं क्योंकि उनके पास बहुत सीमित वैकल्पिक निर्यात मार्ग हैं.

एंड्रियास क्रेग के मुताबिक़, होर्मुज़ स्ट्रेट किसी भी संभावित समझौते का सबसे संवेदनशील और जटिल बिंदु रहेगा. उन्होंने कहा, ईरान को समुद्री परिवहन प्रणाली या सुरक्षा में भूमिका देना जोखिम से ख़ाली नहीं है, ख़ासकर अगर यह अनौपचारिक शुल्क या संप्रभुता के दावे का रूप लेता है.

फिर भी खाड़ी देशों के लिए यह ज़रूरी है कि यह जलमार्ग खुला और सुरक्षित रहे. इसलिए वे ईरान द्वारा लगाए गए किसी भी शुल्क का सार्वजनिक रूप से विरोध करने की संभावना रखते हैं, लेकिन व्यवहार में एक सीमित और स्पष्ट शुल्क स्वीकार करते हैं, बशर्ते यह क़ानूनी ढांचे, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और खदान निकासी, समुद्री सुरक्षा या शिपिंग सिस्टम जैसी विशिष्ट सेवाओं के अधीन हो.

वह आगे कहते हैं कि "यह स्थिति इस तथ्य को दर्शाती है कि खाड़ी देशों को भूगोल को वैसे ही स्वीकार करना होगा जैसा वह है, न कि उस तरह जैसा वे इसे देखना चाहते हैं."

दूसरी ओर, हसन मुनीमना का कहना है कि ईरान का होर्मुज़ स्ट्रेट पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है, लेकिन इस संबंध में ओमान के साथ उसकी अनौपचारिक साझेदारी है और मस्कट व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

वह इस मामले में खाड़ी देशों के सहयोग को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.

पिछले हफ़्ते, ईरान और ओमान ने एक जॉइंट स्टेटमेंट में कहा कि वे होर्मुज़ स्ट्रेट में शिपिंग के फ़्यूचर मैनेजमेंट और पॉसिबल टोल पर एक एग्रीमेंट करने की कोशिश करेंगे.

इसके बाद मस्कट ने घोषणा की कि इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन के साथ कोऑर्डिनेशन में एक टेम्पररी कॉरिडोर बनाया गया है ताकि जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित तरीके से गुज़र सकें. इस कदम का मकसद अंतरराष्ट्रीय क़ानून और समुद्र के क़ानून के तहत बिना फ़ीस के नेविगेशन की स्वतंत्रता पक्का करना है.

हालांकि, यह मुद्दा हाल के दिनों में फिर से तनाव की वजह बन गया है. ओमान के पास एक कमर्शियल जहाज़ पर हमले के बाद, ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट के मैनेजमेंट में अपनी भूमिका दोहराई और गल्फ़ देशों को चेतावनी दी कि वे इस झगड़े में अमेरिका का साथ न दें.

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि ईरान की भूमिका को नज़रअंदाज़ किए बिना होर्मुज़ स्ट्रेट में शिपिंग संभव नहीं है. यह स्टैंड ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देश नेविगेशन की फ़्रीडम के अधिकार पर ज़ोर दे रहे हैं और किसी भी तरह की फ़ीस का विरोध कर रहे हैं.

इस बीच, अमेरिका ने भी एक जहाज़ पर हमले के जवाब में ईरान के अंदर के ठिकानों को निशाना बनाया, जिससे इलाके में तनाव और बढ़ गया.

भूगोल की हक़ीक़त और क्षेत्रीय रिश्तों की पेचीदगी

अगर ईरान और अमेरिका के बीच समझ बनी रहती है, तो इससे दोनों देशों के बीच रिश्तों को फिर से बनाने, यहाँ तक कि कुछ हद तक नॉर्मल करने का रास्ता बन सकता है.

हालांकि, इससे कई ज़रूरी सवाल उठते हैं. क्या खाड़ी देशों की सुरक्षा प्राथमिकताएँ अभी भी अमेरिका का केंद्र बनी रहेंगी? और क्या ये देश ईरान के साथ आपसी भरोसे पर आधारित लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते की उम्मीद कर सकते हैं?

हसन मुनमीना के अनुसार, इस लक्ष्य को पाने के लिए गंभीर कोशिशों, सिस्टमैटिक प्लानिंग और असरदार मध्यस्थता की ज़रूरत होगी. उनके अनुसार, खाड़ी देशों के पास ऐसे रिसोर्स हैं जिनका इस्तेमाल वे हाल के नुकसानों से मिले अनुभव के आधार पर एक रीजनल सिस्टम बनाने के लिए कर सकते हैं, जिसमें ईरान भी शामिल है और उसके असर को बैलेंस करता है.

उन्हें यह भी डर है कि इसराइल ऐसे प्लान को रोकने की कोशिश करेगा, जबकि अमेरिका, जिसे वह इन संभावित बदलावों में एक अहम स्टेकहोल्डर के तौर पर देखते हैं, ऐसे स्ट्रक्चर का विरोध कर सकता है जिसमें अमेरिका की आख़िरी राय न हो.

दूसरी तरफ़, एंड्रियास क्रेग का कहना है कि खाड़ी देशों को लंबे समय से लगता रहा है कि अमेरिका में उनकी सुरक्षा प्राथमिकताओं को ज़रूरी अहमियत नहीं दी जाती, लेकिन उनके अनुसार, यह स्थिति इन देशों के लिए अमेरिका में अपना असर फिर से बनाने का एक मौका भी हो सकती है.

उनके अनुसार, अगर सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर काम करें, तो भविष्य में मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका में अमेरिका की पॉलिसी पर उनका इसराइल से भी ज़्यादा असर हो सकता है.

एंड्रियास क्रेग के अनुसार, इन देशों के पास अभी मिलिट्री बेस, बड़े फाइनेंशियल रिसोर्स, एक मॉडर्न लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्लोबल एनर्जी मार्केट में असर और असरदार डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं, लेकिन जो कमी लगती है वह है आपसी तालमेल.

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत और बहरीन सभी में अमेरिका के मिलिट्री बेस हैं, और इन बेस को मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सुरक्षा ढांचे की नींव माना जाता है.

Sujets liés

This article was originally published by BBC हिंदी.

Articles liés

Plus sur ce sujetईरान