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मेघालय के बर्नीहाट में प्रदूषण का हाल: क्या हालात सुधरे?
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BBC हिंदी24/05/2026Environment8 min de lectureIndia

मेघालय के बर्नीहाट में प्रदूषण का हाल: क्या हालात सुधरे?

L'essentiel

मेघालय के बर्नीहाट, जिसे कभी दुनिया का सबसे प्रदूषित मेट्रोपॉलिटन एरिया कहा गया था, वहां अब भी प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। फैक्ट्रियों का धुआं, सड़कों की धूल और भौगोलिक स्थिति मिलकर हवा को जहरीला बना रहे हैं, जिससे लोगों को सांस और त्वचा संबंधी बीमारियां हो रही हैं।

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दुनिया के 'सबसे प्रदूषित' कहे गए मेघालय के इस इलाके में अब कैसे हैं हालात?

Author, प्रेरणा

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 5 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

कुछ शहर अपनी ख़ूबसूरत फ़िज़ाओं के लिए याद रखे गए और कुछ अपनी ज़हरीली हवाओं के लिए.

पर कुछ शहर ऐसे भी हैं, जहां एक तरफ़ बेशुमार ख़ूबसूरती भी है, तो दूसरी तरफ़ इस ख़ूबसूरती को हर दिन फ़ीका करता प्रदूषण भी.

दस दिन पहले हम भारत के पूर्वोत्तर इलाके के एक ऐसे ही इलाक़े में पहुंचे थे.

पूर्वोत्तर भारत वैसे तो अपनी वादियों के लिए मशहूर है, लेकिन दो साल पहले आईक्यू एयर नाम की एक स्विस संस्था ने यहां के एक इलाक़े (बर्नीहाट) को दुनिया का सबसे प्रदूषित मेट्रोपॉलिटन एरिया बताया.

यह संस्था दुनियाभर में हवा की गुणवत्ता को मॉनिटर करती है.

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संस्था ने पाया कि साल 2024 में असम-मेघालय की सीमा पर बसे बर्नीहाट में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की तय सुरक्षित सीमा से क़रीब 25 गुना अधिक था.

(पीएम 2.5 हवा में मौजूद...बेहद छोटे प्रदूषित कण होते हैं, जो सांस के ज़रिए शरीर के अंदर जाकर फेफड़ों और खून तक पहुंच सकते हैं.)

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फिर साल 2025 में भी IQAir की वैश्विक वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में बर्नीहाट दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल रहा.

शीर्ष से तीसरे नंबर पर. और इस साल यहां की हवा में पीएम 2.5 का औसत स्तर 101.1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया.

पर इन रिपोर्ट्स से परे क्या है इस औद्योगिक शहर की असल तस्वीर?

आम ज़िंदगियों पर प्रदूषण का असर

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चारों तरफ़ हरियाली और इस हरियाली के बीच से चौबीसों घंटे निकलता फैक्ट्रियों का धुआं. पहली नज़र में बर्नीहाट की कुछ ऐसी ही तस्वीर नज़र आती है लेकिन जैसे-जैसे शहर से आपकी नज़दीकी बढ़ती है, तस्वीर की दूसरी परतें भी खुलने लगती हैं.

जैसे हम एक घास के मैदान में थे, दूर से हमें यह पूरी हरी-भरी नज़र आई, पर जैसे ही हमने इसे नज़दीक से देखा, हमें घास के ऊपर प्रदूषण की एक काली परत दिखाई दी.

प्रदूषण की इस महीन परत की छाप यहां की हर सतह पर दिखाई देती है.

घरों की छत, दीवारें, सड़कें यहां तक कि दो दिनों से बंद पड़े चर्च की चारदीवारी के भीतर भी.

यहां रहने वाले तारजिन सांगमा हमें चर्च के भीतर जमा प्रदूषण दिखाने के लिए ले गए. उनका कहना था कि चौबीस घंटे में ही चर्च इतना गंदा हो जाता है कि सफ़ाई करने वाले अब अधिक पैसा मांगते हैं.

वह कहते हैं, चर्च को हम इतना साफ़ रखते हैं लेकिन यहां कि किसी भी सतह पर आप हाथ फेरेंगी, आपके हाथ काले हो जाएंगे.''

पास के एक निजी स्कूल में टीचर सर बेनस मकरे भी कुछ ऐसी ही शिकायत सामने रखते हैं.

उनका कहना है, ''स्कूल के कई छात्र सांस लेने से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं. फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाली बदबू और प्रदूषण की वजह से कई बार क्लास में बैठना मुश्किल हो जाता है. बदबू इतनी अधिक होती है कि ज़्यादातर छात्रों को रुमाल से अपना चेहरा ढंकना पड़ता है. एक दिन में कई-कई बार बेंच और डेस्क साफ़ करवाना पड़ता है.''

यहां के लोग खुले में कपड़े सुखाने से बचते हैं. एक स्थानीय महिला बताती हैं कि रातभर अगर एक सफ़ेद शर्ट बाहर छोड़ दी जाए, तो सुबह काली पड़ जाती है.

हवा में तैरते ये काले कण इतने महीन हैं कि धीरे-धीरे शहर की सतह से लेकर लोगों की सांसों तक में उतर जाते हैं.

कॉलेज में पढ़ने वाले जोहान सांगमा बताते हैं, '' बीमार का गोदाम जैसा है ये बर्नीहाट. जब से पैदा हुआ तब से यही देख रहा हूं. किसी को चक्कर आता है, किसी को उलटी, सांस लेने में भी बहुत परेशानी होती है. बूढी लोगों को सांस लेने में दिक्कत होती है, अगर वो लोग सांस लेंगे तो खांसेंगे, खांसने के बाद जब हॉस्पिटल जाएंगे तो बहुत सारा बीमारी मिलेगा. जैसे डॉक्टर बोलेगा टीबी हो रहा, दूसरा बीमारी हो रहा है.''

16 साल की बीबाली ने भी हाल ही में टीबी का इलाज पूरा किया है. वो बताती हैं, ''पहले मैं जानती भी नहीं थी कि टीबी हो रहा है. शरीर तो इतना कमज़ोर हो गया था. शुरू में गले में बहुत खुजली हुई थी और खांसी होने के टाइम में थोड़ा-थोड़ा खून निकलता था इसलिए डॉक्टर के पास गई. डॉक्टर ने बोला कि टेस्ट करना पड़ेगा. उसके बाद बोला कि टीबी है. छह महीने तक इलाज चला. मैं तो अभी पूरी तरह ठीक नहीं महसूस कर रही. दोबारा चेकअप कराने का सोच रही हूं.''

स्किन इंफेक्शन के बढ़ते मामले

शहर से होकर गुज़रने वाली उमट्रू नदी भी प्रदूषण की चपेट में है. स्थानीय लोग बताते हैं कि कभी साफ़ दिखने वाली यह नदी भी अब फैक्ट्रियों की गंदगी से बदरंग हो चुकी है. मेघालय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी उमट्रू नदी के बर्नीहाट वाले हिस्से की गुणवत्ता को असंतोषजनक माना है. नतीजा है कि कई परिवार यहां स्किन इंफेक्शन से जूझ रहे हैं.

अल्मा मारक और उनका पूरा परिवार स्किन के डॉक्टर से अपना इलाज करवा रहे हैं. स्थानीय चिकित्सालय में त्वचा से जुड़ी बीमारियों के इलाज की सुविधा नहीं है.

वह कहती हैं कि एक हफ़्ते में प्रति व्यक्ति हज़ार से पंद्रह सौ रुपए का ख़र्च है. लेकिन कई परिवार ऐसे भी हैं जो यह ख़र्च नहीं उठा सकते और बिना किसी इलाज के जीने को मजबूर हैं.

यहां की मेडिकल एंड हेल्थ ऑफ़िसर डॉ सेंगरी मराक ने हमें बताया, ''यहां प्रदूषण इतना ज़्यादा है कि हमारे पास आने वाले ज़्यादातर मरीज़ सांस से जुड़ी बीमारियों के होते हैं. टीबी, ऑक्सीजन डी-सैचुरेशन, निमोनिया और अस्थमा के केस बहुत आम हैं. यहां तक कि नवजात बच्चों में भी सांस से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं. शायद ही कोई ऐसा परिवार हो, जहां किसी न किसी को ऐसी परेशानी न हो. इसके अलावा स्किन इंफेक्शन के मामले भी बड़ी संख्या में आते हैं. खासकर फंगल इंफेक्शन… स्किन के ज़्यादातर केस पानी के प्रदूषण से जुड़े होते हैं.''

ऐसे में सवाल है कि बर्नीहाट की हवा, मिट्टी और पानी इतनी प्रदूषित हुई कैसे?

इलाक़ा कैसे बना इतना प्रदूषित?

मेघालय और असम की सीमा पर बसा बर्नीहाट कभी एक छोटा-सा कस्बा हुआ करता था. लेकिन 1990 के दशक के आख़िरी वर्षों में यहां तेज़ी से औद्योगिकीकरण शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह पूर्वोत्तर भारत के बड़े औद्योगिक केंद्रों में बदल गया.

पर्यावरण और जलवायु नीति के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे विशेषज्ञ और फिलहाल आई-फ़ॉरेस्ट नाम की संस्था के सीईओ चंद्र भूषण के अनुसार, ''बर्नीहाट में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह कोयले पर आधारित उद्योग हैं. लेकिन वह कहते हैं कि सिर्फ़ उद्योग ही नहीं, बल्कि इस इलाके की भौगोलिक स्थिति भी हालात को गंभीर बनाने में बड़ी भूमिका निभाती है.''

वह बताते हैं, "बर्नीहाट का औद्योगिक इलाका दो राज्यों असम और मेघालय में फैला हुआ है. ऐसे में प्रदूषण से जुड़े नियमों को लागू करने और उनकी निगरानी में कई तरह की दिक्कतें आती हैं. इसके अलावा, यह पूर्वोत्तर के सबसे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्गों में से एक के किनारे बसा हुआ है, जहां भारी वाहनों की आवाजाही लगातार बनी रहती है."

चंद्र भूषण के मुताबिक, बर्नीहाट की भौगोलिक बनावट भी प्रदूषण को बढ़ाने का काम करती है.

"यह एक घाटी वाला इलाका है, जो चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरा हुआ है. ऐसे में हवा का बहाव सीमित हो जाता है और प्रदूषक कण लंबे समय तक इसी इलाके में फंसे रहते हैं. यानी उद्योग, ट्रैफिक और भौगोलिक स्थिति...तीनों मिलकर यहां प्रदूषण को और गंभीर बना देते हैं."

आंकड़ों को देखें तो असम के हिस्से वाले बर्नीहाट में कुल 39 फ़ैक्ट्रियां हैं, जिनमें 20 को रेड यानी सबसे अधिक प्रदूषण पैदा करने वाली फ़ैक्ट्रियों, 15 को ऑरेंज मतलब की मॉडरेट और 4 को ग्रीन फ़ैक्ट्रियों की श्रेणी में रखा गया है.

वहीं मेघालय के हिस्से वाले बर्नीहाट में कुल फ़ैक्ट्रियों की संख्या 41 है. इनमें 6 रेड कैटेगरी वाली फैक्ट्रियां हैं , 21 ऑरेंज कैटेगरी और 14 ग्रीन कैटेगरी वाली.

सबसे अधिक प्रदूषण की ज़िम्मेदार रेड कैटेगरी वाली फ़ैक्ट्रियां हैं.

चूंकि बर्नीहाट दो प्रदेशों में बंटा हुआ है इसलिए हमने दोनों ही राज्यों के अधिकारियों से भी बात की.

दोनों ही चेयरमैन ने दावा किया कि इलाके में प्रदूषण कम करने के लिए पिछले सालों में कई कदम उठाए गए हैं. मसलन फैक्ट्रियों के निरीक्षण बढ़ाए गए, कई रेड कैटेगरी उद्योगों को चेतावनी और नोटिस जारी किए गए...और कुछ मामलों में बंद करने के निर्देश भी दिए गए. केंद्र सरकार की क्लीन एयर प्रोग्राम योजना के तहत मिलने वाले फंड से भी मदद मिली है. लेकिन अभी संगठित स्तर पर और काम किया जाना बाकी है.

असम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन अरूप कुमार मिश्रा कहते हैं, ''मुझे यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि बर्नीहाट प्रदूषित है. मान लीजिए कि कोई छोटी सी जगह में, इतनी फ़ैक्ट्री हों, बीच में इतना ट्रैफ़िक हो, उससे ज़ाहिर तौर पर प्रदूषण होगा. पर इसके बावजूद उधर के सालों में बर्नीहाट कभी भी प्रदूषित इलाक़ों में नहीं आया, जबकि यहां तो नब्बे के दशक से फ़ैक्ट्री हैं. ऐसा इसलिए था क्योंकि प्रकृति में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की क्षमता थी. लेकिन पहाड़ियों की कटाई और बड़े स्तर पर चल रहे निर्माण कार्यों के कारण ग्रीन बेल्ट कम हो रहा है और प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है.''

कई कदम उठाने का दावा

इसे कम करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं, '' पिछले दो साल में असम और मेघालय सरकार के बीच, मुख्यमंत्री स्तर से लेकर बोर्ड स्तर तक, इस मुद्दे पर कई बार बातचीत हुई है. मेघालय प्रदूषण बोर्ड और असम प्रदूषण बोर्ड के बीच भी लगातार चर्चा हुई है. हमने अपने अधिकारियों, ज़िला प्रशासन, असम प्रशासन और उद्योग के मालिकों को साथ लेकर एक जॉइंट मॉनिटरिंग कमेटी बनाई है. तीनों पक्ष अब मिलकर रोज़ाना हालात पर नज़र रख रहे हैं.''

वहीं मेघालय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन आर. नैनामलाई ने हमसे कहा कि दोनों ही प्रदेशों ने प्रदूषण के स्रोतों पर एक अध्ययन किया है. उनके मुताबिक़ सबसे अधिक प्रदूषण उद्योगों से हो रहा है. इसके बाद सड़कों की धूल और फिर वाहनों से निकलने वाला धुएं से भी.

वह कहते हैं, ''हम एक जॉइंट एक्शन और कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाने का प्रस्ताव रख रहे हैं. जब यह पूरी तरह काम करना शुरू कर देगी, तब हम मिलकर प्रदूषण को कम करने की दिशा में काम कर पाएंगे.''

पर वह हंसते हुए ये भी कहते हैं, ''हमारे यहां दो एक्सट्रीम हैं...एक तरफ़ एशिया का सबसे साफ़-सुथरा गांव हैं, तो दूसरी तरफ़ दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर भी.''

हालांकि पिछले एक साल में यहां की हवा की गुणवत्ता में सुधार दर्ज किया गया है लेकिन एक्सपर्ट्स बताते हैं कि इसका असर आम ज़िंदगियों पर इसलिए नहीं नज़र आता क्योंकि जहां एक्यूआई 400 हो और वहां आपने उसे 300 कर दिया, तो आंकड़ों में तो यह बड़ी गिरावट की तरह नज़र आती है, लेकिन लोग अपनी सांसों में इस गिरावट को महसूस नहीं कर पाते. उनकी शिकायतें जारी रहती हैं क्योंकि हवा अब भी ज़हरीली है.

औद्योगिक क्षेत्रों की प्लानिंग

आदर्श स्थिति में बर्नीहाट इंडस्ट्रियल क्लस्टर की पहले से सही प्लानिंग होनी चाहिए थी. इलाके की क्षमता का अध्ययन होना चाहिए था, ज़मीन के इस्तेमाल की योजना बननी चाहिए थी. किस तरह के उद्योग लग सकते हैं, कौन से प्रदूषण नियंत्रण उपकरण ज़रूरी होंगे, इस पर साफ़ गाइडलाइन होनी चाहिए थी. मॉनिटरिंग और नियमों के पालन को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए थी.

एक सही और व्यवस्थित इंडस्ट्रियल एरिया प्लान तैयार होना चाहिए था. हालांकि अब भी देर नहीं हुई है. सिर्फ़ प्रदूषण नियंत्रण पर ध्यान देने के बजाय, सरकार बेहतर इंडस्ट्रियल प्लानिंग पर फोकस कर सकती है और उसे लागू कर सकती है.''

हालांकि बर्नीहाट अकेली जगह नहीं है, जहां कि तस्वीर कुछ ऐसी हो, देश के कई औद्योगिक शहर आज विकास और प्रदूषण के इसी दोराहे पर खड़े दिखाई देते हैं. और साथ ही खड़े दिखाई देते हैं इन औद्योगिक शहरों की क़ीमत चुकाते वहां रहने वाले लोग.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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