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भारतीय शेयर बाज़ार ताइवान और दक्षिण कोरिया से पिछड़ा
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BBC हिंदी6/2/2026Business4 min readIndia

भारतीय शेयर बाज़ार ताइवान और दक्षिण कोरिया से पिछड़ा

Quick Look

भारतीय शेयर बाज़ार मार्केट कैपिटलाइजेशन में ताइवान और दक्षिण कोरिया से पिछड़ गया है. भारत सातवें स्थान पर खिसक गया है, जबकि दक्षिण कोरिया छठी और ताइवान पांचवें स्थान पर है. इसका मुख्य कारण AI और सेमीकंडक्टर उद्योग में उछाल है, जिसमें भारत कमजोर है.

AI-generated summary

Why It Matters

भारतीय शेयर बाज़ार मार्केट कैपिटलाइजेशन के मामले में फिसलकर सातवें स्थान पर आ गया है, जबकि दक्षिण कोरिया छठी और ताइवान पांचवें स्थान पर पहुंच गया है. यह बदलाव मुख्य रूप से AI और सेमीकंडक्टर उद्योग में आई तेजी के कारण हुआ है, जिसमें भारत पिछड़ रहा है.

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इस वजह से पिट रहे भारतीय शेयर बाज़ार, ताइवान के बाद दक्षिण कोरिया से भी पिछड़े

प्रकाशित 3 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

शेयर बाज़ार के कैपिटलाइजेशन के मामले में ताइवान के बाद अब दक्षिण कोरिया ने भी भारत को पीछे छोड़ दिया है.

भारत स्टॉक मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी शेयर बाज़ार की वैल्युएशन रैंकिंग में फिसलकर सातवें स्थान पर पहुंच गया है. दक्षिण कोरिया छठी रैंकिंग पर है.

मार्केट कैपिटलाइजेशन पर ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक़, दक्षिण कोरिया में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन इस साल 86 फ़ीसदी बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया है. वहीं भारत का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन घटकर 4.8 ट्रिलियन डॉलर रह गया है.

पिछले सप्ताह ताइवान ने भारत को इस मामले में पीछे छोड़ दिया था. यानी लगातार दो हफ़्तों में दो एशियाई बाज़ार भारत से आगे निकल गए हैं.

पिछले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली और डॉलर के मुक़ाबले रुपये में बढ़ती कमज़ोरी से भारतीय शेयर बाज़ार दबाव में हैं, जबकि ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाज़ारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल आया है.

स्टॉक मार्केट वैल्युएशन या मार्केट कैपिटलाइजेशन किसी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सभी कंपनियों की कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन का संयुक्त मूल्य होता है.

ब्लूमबर्ग के मुताबिक 1 जून तक दक्षिण कोरिया का शेयर मार्केट कैपिटलाइजेशन 5.04 ट्रिलियन डॉलर था, जो भारत के 4.84 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है.

ताइवान का मार्केट कैपिटलाइज़ेशन 5.15 ट्रिलियन डॉलर है और वह दुनिया में पांचवें स्थान पर है.

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यह बदलाव एशियाई बाज़ारों में आई पूंजी के बड़े अंतर को दिखाता है.

दक्षिण कोरिया का शेयर मार्केट इंडेक्स कोस्पी साल 2026 में अब तक 110 फ़ीसदी से अधिक उछल चुका है.

वहीं ताइवान का बाज़ार 65 फ़ीसदी ज्यादा बढ़ा है. इस वजह से ये दोनों दुनिया के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले प्रमुख शेयर बाज़ार बन गए हैं.

दक्षिण कोरिया की बढ़त का राज क्या है?

मनी कंट्रोल के मुताबिक़ इस तेज़ी की सबसे बड़ी वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर उद्योग में आया उछाल है.

टीएसएमसी, सैमसंग और एसके हिंक्स जैसी कंपनियों ने मुनाफे़ में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है.

दक्षिण कोरिया और ताइवान के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन का लगभग 60 फ़ीसदी सेमीकंडक्टर और हाई-बैंडविड्थ मेमोरी (एआई डेटा सेंटरों को चलाने वाले सबसे अहम घटक) में निवेश का है. यही वजह है कि ये दोनों देश ग्लोबल एआई वैल्यू चेन के सेंटर में आ गए हैं.

वहीं इकोनॉमिक टाइम्स ने लिखा है कि एआई मेमोरी चिप्स के क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ के दम पर सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हिंक्स से दक्षिण कोरिया के शेयर बाज़ार में जबरदस्त तेज़ी आई है.

हाल ही में एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक मार्केट कैपिटलाइजेशन वाले क्लब में शामिल हुई इन कंपनियों की बदौलत 2026 में कोस्पी (दक्षिण कोरिया का प्रमुख शेयर सूचकांक) की बढ़त 100 फ़ीसदी से अधिक हो गई है.

भारत क्यों पिछड़ रहा है

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इसके उलट भारत के लिए ये मुश्किल दौर रहा है.

वर्ष 2026 में अब तक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स क़रीब 12 फ़ीसदी और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ़्टी लगभग 15 फ़ीसदी गिर चुके हैं.

भारत में मार्केट कैपिटलाइजेशन की कमजोरी सितंबर 2024 के आख़िर से ही बनी हुई है.

इसकी वजह शेयरों के ऊंचे वैल्यूएशन, कंपनियों की सुस्त कमाई और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली रही है.

मनी कंट्रोल के मुताबिक़ ''हाल के महीनों में भारत पर दबाव और बढ़ गया है. दुनिया भर में छिड़े ट्रे़ड वॉर, एआई से जुड़ी बड़ी कंपनियों की कमी, रुपये की कमजोरी और अमेरिका-ईरान-इसराइल तनाव ने मिलकर कच्चे तेल की कीमत को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया है.''

इससे महंगाई बढ़ने और भारत के व्यापार संतुलन पर दबाव पड़ने का ख़तरा पैदा हुआ है.

बाज़ार में सुधार की राह फिलहाल अनिश्चित दिखाई दे रही है. मध्यपूर्व में संघर्ष थमता नजर नहीं आ रहा है.

दूसरी ओर भारत के मौसम विभाग ने सामान्य बारिश की तुलना में 90 फ़ीसदी मानसून का अनुमान लगाया है. इससे भारतीय बाज़ार में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.

विश्लेषकों का कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती लागत, सप्लाई चेन में अड़चनें महंगाई की वजह से इस पूरे वित्त वर्ष में भारतीय कंपनियों पर दबाव बना रह सकता है.

भारत से विदेश निवेशक क्यों बाहर जा रहे हैं

इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड स्तर पर विदेशी निवेशकों ने अपने पैसे निकाले हैं.

इसके पीछे शेयरों के महंगे दाम, कमज़ोर होता रुपया और बढ़ती ऊर्जा लागत जैसे कारण बताए जा रहे हैं.

इस साल अब तक भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक क़रीब 24 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.

विदेशी निवेशकों का पूरा ज़ोर एआई के शेयरों पर है और भारत के पास एआई में अभी कोई मज़बूत विकल्प मौजूद नहीं है.

एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी भी पिछले वर्ष के 19 प्रतिशत से घटकर लगभग 12 प्रतिशत रह गई है.

मई महीने के आख़िर में ग्लोबल इन्वेस्टर और आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट रुचिर शर्मा ने भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ''अब भारत से पूँजी इसलिए निकल रही है क्योंकि आज दुनिया का लगभग पूरा ध्यान एआई पर है.''

''निवेशक एआई की वैश्विक दौड़ को लेकर दीवाने हो चुके हैं और इस दौड़ में भारत को एक कमज़ोर खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है. अभी दुनिया एआई के "पिक्स एंड शॉवेल्स" चरण में है. यानी सेमीकंडक्टर, मेमरी और कंप्यूटिंग क्षमता पर फ़ोकस है. इन क्षेत्रों में भारत कमज़ोर है.''

रुचिर शर्मा ने कहा था, ''पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 50 अरब डॉलर निकाल लिए हैं. नेट एफ़डीआई भी लगभग शून्य है. निवेश के अपने 30 वर्षों के अनुभव में मैंने भारत के प्रति इतनी उदासीनता कभी नहीं देखी. 2013 के "फ्रैजाइल फ़ाइव" दौर में भारत को लेकर नकारात्मकता थी, लेकिन आज स्थिति उससे भी ख़राब है. निवेशकों का पूरा ध्यान एआई पर है और भारत की कमज़ोरियाँ अब साफ़ दिखाई दे रही हैं.''

ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''एआई आधारित टेक शेयरों में भारत की ग़ैर-मौजूदगी उस पर भारी पड़ रही है. दूसरी तरफ़ ईरान युद्ध के चलते स्थानीय कंपनियों के मुनाफ़े पर दबाव बढ़ने से यह स्थिति और ख़राब हो सकती है. "

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • भारतीय कंपनियों पर कच्चे माल की बढ़ती लागत और सप्लाई चेन में अड़चनों के कारण इस पूरे वित्त वर्ष दबाव बना रहेगा.

    Likely · Medium term

  • मध्यपूर्व में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहेगी, जिससे भारत में महंगाई बढ़ेगी और व्यापार संतुलन पर दबाव पड़ेगा.

    Likely · Medium term

  • भारत से विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना जारी रहेगा, क्योंकि उनका ध्यान AI के शेयरों पर है और भारत इस क्षेत्र में कमजोर है.

    Likely · Medium term

Open Questions

  • What specific policy changes can India implement to boost its AI sector and attract foreign investment?
  • How long will the current geopolitical tensions in the Middle East persist, and what will be their long-term impact on global oil prices and emerging markets?
  • Will the current trend of foreign investor outflow from India continue in the coming months?
  • What is the projected growth rate for the AI and semiconductor sectors in South Korea and Taiwan over the next year?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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