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ईरान और अमेरिका के बीच 100 दिनों के संघर्ष के बाद समझौता, दोनों पक्ष जीत का दावा कर रहे हैं
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BBC हिंदी6/19/2026World10 min readIndia

ईरान और अमेरिका के बीच 100 दिनों के संघर्ष के बाद समझौता, दोनों पक्ष जीत का दावा कर रहे हैं

Quick Look

ईरान और अमेरिका के बीच 100 दिनों के संघर्ष के बाद एक समझौता हुआ है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। यह समझौता युद्धविराम से कहीं बढ़कर है और दोनों देशों के बीच कठिन बातचीत का मार्ग प्रशस्त करता है।

AI-generated summary

Why It Matters

ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों के 100 दिन बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है। यह समझौता युद्धविराम से कहीं बढ़कर है और दोनों देशों के बीच कठिन बातचीत का मार्ग प्रशस्त करता है।

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Author, आमिर अज़ीमी

पदनाम, वरिष्ठ समाचार संपादक, फ़ारसी सेवा

प्रकाशित 2 घंटे पहले

पढ़ने का समय: 11 मिनट

ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों के 100 दिन बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं.

यह इस बात का संकेत है कि दोनों इस संघर्ष से निकलने का रास्ता चाहते थे.

समझौता होने के बाद जंग भले ही आधिकारिक तौर पर खत्म हो गई हो, लेकिन असली और कठिन बातचीत अब शुरू होगी.

दोनों पक्षों ने इस समझौते को अपनी जनता के सामने जीत के तौर पर पेश किया है.

लेकिन, जैसा कि हमारे विश्लेषक बताते हैं, वे अपने लोगों को पूरी तरह भरोसा नहीं दिला पाए हैं.

दोनों देशों में आलोचकों का कहना है कि इस समझौते में जरूरत से ज्यादा रियायतें दी गई हैं.

ईरान क्या दावे कर रहा है?

ईरान के लिए यह समझौता सिर्फ युद्धविराम नहीं है. यह उससे कहीं ज्यादा अहम है.

इससे ईरान यह दावा कर सकता है कि उसने बिना आत्मसमर्पण किए जंग में खुद को टिकाए रखा. वह यह भी कह सकता है कि वह इस संघर्ष से पहले से ज़्यादा मजबूत होकर बाहर निकला है.

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शुरुआत से ही ईरान का मक़सद पारंपरिक सैन्य अर्थों में अमेरिका और इसराइल को हराना नहीं था. उसका लक्ष्य यह था कि संघर्ष ख़त्म होने के बाद इस्लामिक गणराज्य की व्यवस्था बनी रहे.

उसका नेतृत्व काम करता रहे. उसकी बातचीत की स्थिति पूरी तरह कमजोर न हो.

एमओयू कहे जाने वाला यह समझौता ईरान को यह कहने का मौका देता है कि वह अपने इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल रहा.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर वाले इस समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए 60 दिनों का ढांचा तय किया गया है.

इसमें सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकने की बात कही गई है. इसमें लेबनान भी शामिल है. समझौते में एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने की बात भी कही गई है.

साथ ही होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने और ईरानी जहाजों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की पुष्टि की गई है.

फिलहाल ईरान की जिम्मेदारियां अहम हैं, लेकिन सीमित हैं.

ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित व्यावसायिक आवाजाही सुनिश्चित करने में मदद करने पर सहमति जताई है. उसने यह प्रतिबद्धता भी दोहराई है कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा.

साथ ही उसने अपने उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम के भंडार और यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम के भविष्य पर बातचीत में शामिल होने पर भी सहमति जताई है.

वहीं, अमेरिका की प्रतिबद्धताएं कहीं ज़्यादा बड़ी दिखाई देती हैं.

शॉर्ट वीडियो देखिए

एमओयू के मुताबिक़, अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा. वह ईरानी तेल निर्यात के लिए छूट भी जारी करेगा. साथ ही फ़्रीज़ की गई और प्रतिबंधित ईरानी संपत्तियां उपलब्ध कराएगा. अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की दिशा में भी काम करेगा.

इसके अलावा वह अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना पर काम करेगा.

यही वजह है कि अब तक ईरान के आलोचकों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही है.

एमओयू की यही बातें ईरानी नेतृत्व को इस समझौते को जीत के रूप में पेश करने का पर्याप्त आधार देती हैं.

ईरान कह सकता है कि उसकी संप्रभुता को मान्यता मिली है. नाकेबंदी हटने वाली है. प्रतिबंधों में राहत मिलने की संभावना है.पुन र्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है.

लेकिन यह खामोशी ज्यादा समय तक रहने की संभावना नहीं है. यहां तक कि ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की पहली प्रतिक्रिया भी काफ़ी संतुलित थी. उन्होंने समझौते को आगे बढ़ने की अनुमति दी.

लेकिन साथ ही यह भी साफ़ कर दिया कि इसे ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ज़िम्मेदारी पर स्वीकार किया गया है. सबसे कठिन मुद्दों को फिलहाल टाल दिया गया है. उनका समाधान अभी नहीं हुआ है.

उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम के भंडार, यूरेनियम संवर्धन उद्योग के आकार और जंग में क्षतिग्रस्त परमाणु संयंत्रों के पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर अब भारी दबाव के बीच बातचीत होगी.

यह ईरान के नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती है.

ईरानी नेतृत्व की चुनौतियां

सरकारी मीडिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, संसद और कट्टरपंथी नेताओं ने कई हफ़्तों तक अपने समर्थकों से कहा है कि ईरान ने अमेरिका और इसराइल को हरा दिया है.

ऐसे में जनता और समर्थकों की उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई हैं.

अब अगर उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम या परमाणु ढांचे को लेकर कोई समझौता होता है, तो आलोचक इसे ऐसी रियायत बता सकते हैं जो जीत का दावा करने के बाद दी गई. लेकिन कोई समझौता न करना भी उतना ही ख़तरनाक हो सकता है.

अगर ईरान अपने उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम या अपने परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर आगे बढ़ने से इनकार करता है, तो पूरी प्रक्रिया विफल हो सकती है. साथ ही युद्धविराम भी ख़तरे में पड़ सकता है.

ऐसी स्थिति ईरान और इसराइल में उन लोगों की दलीलों को मजबूत करेगी, जो पहले से कहते रहे हैं कि ईरान ने एमओयू का इस्तेमाल सिर्फ़ समय हासिल करने के लिए किया है.

इससे दोनों पक्ष फिर से जंग की ओर बढ़ सकते हैं.

ईरानी संसद के अध्यक्ष और ईरान की वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने बातचीत को चुनौतीपूर्ण और मजबूत रुख़ के साथ पेश करने की कोशिश की है.

उन्होंने सरकारी टीवी पर कहा, "मैं राजनयिक नहीं हूं. लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूं कि अमेरिका को कैसे समझाना है."

ख़ामेनेई की प्रतिक्रिया ने इस काम को और मुश्किल बना दिया है. उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक रूप से उनकी 'एक अलग राय' थी. लेकिन उन्होंने एमओयू को मंजूरी दे दी.

उन्होंने कहा कि ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में मसूद पेज़ेश्कियान ने ईरान और उसके सहयोगियों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी.

इस तरह की भाषा ख़ामेनेई को समझौते के इतना क़रीब रखती है कि वह इसे आगे बढ़ा सकें. साथ ही वह खुद को इससे इतना दूर भी रखते हैं कि अगर समझौता विफल हो जाए, तो पूरी ज़िम्मेदारी उन पर न आए.

ईरानी वार्ताकारों के लिए इसका मतलब है कि समझौते की गुंजाइश और सीमित हो सकती है. उन्हें अमेरिका को संतुष्ट भी करना है. साथ ही ऐसी कोई सीमा भी पार नहीं करनी है, जिसे खुद सर्वोच्च नेता ने पूरी तरह स्वीकार न किया हो.

ग़ालिबाफ़ की भाषा सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं है. यह ईरान की घरेलू राजनीति से जुड़े लोगों के लिए भी है. पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कमांडर होने के नाते उन्हें इस समझौते को अपने कट्टर समर्थकों के बीच भी स्वीकार्य बनाना है.

ये वे लोग हैं, जो अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को शक़ की नज़र से देखते हैं.

2015 के परमाणु समझौते से इस समझौते की तुलना होना लगभग तय माना जा रहा है. अमेरिका में कुछ लोग इस एमओयू को जेसीपीओए से भी ख़राब बता सकते हैं.

उनका तर्क है कि ट्रंप ने ऐसा ढांचा स्वीकार कर लिया है, जो ईरान को प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक लाभ देता है. जबकि सबसे कठिन परमाणु मुद्दों को बाद के लिए टाल दिया गया है.

लेकिन ईरान में ख़तरा अलग है. वहां कट्टरपंथी सरकार और वार्ता टीम पर 2015 की 'ग़लती' दोहराने का आरोप लगा सकते हैं.

उस समय राष्ट्रपति हसन रूहानी को सांसदों, रूढ़िवादी मीडिया और राजनीतिक विरोधियों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था. उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा रियायतें दी थीं.

मसूद पेज़ेश्कियान और मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है. उन्हें इस युद्धविराम के ढांचे को राजनीतिक सफलता में बदलना होगा. उन्हें यह काम विरोध की आवाज़ और मजबूत होने से पहले करना होगा.

फिलहाल ईरान ने समय हासिल कर लिया है. उसे तत्काल सैन्य दबाव से राहत मिली है. उसे बड़े आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी बनी है. साथ ही वह उस नतीजे से भी बच गया है, जिसकी अमेरिका सबसे ज़्यादा मांग कर रहा था.

अमेरिका ईरान से पूर्ण समर्पण चाहता था.

लेकिन ईरान अभी अंतिम समझौते तक नहीं पहुंचा है. फ़िलहाल एमओयू ने उसकी स्थिति मजबूत की है. उसकी राजनीतिक व्यवस्था सुरक्षित बनी हुई है. अमेरिका ने भी कुछ स्पष्ट प्रतिबद्धताएं की हैं.

हालांकि, ईरान के सामने सबसे बड़ा जोखिम अभी बाकी है. अगले 60 दिनों में घरेलू स्तर पर पेश की गई "जीत" की तस्वीर और युद्ध दोबारा शुरू होने से रोकने के लिए ज़रूरी समझौतों के बीच का अंतर साफ़ दिखाई दे सकता है.

युद्ध के पहले चरण से ईरान कई लोगों की उम्मीद से ज़्यादा मजबूत होकर निकला है. लेकिन उसकी अगली चुनौती शायद इससे भी कठिन होगी. उसे अपने राजनीतिक समर्थकों को अंतिम समझौते तक अपने साथ बनाए रखना होगा.

साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी समझौता रियायत या हार जैसा न दिखे.

'बड़ी जीत' के ट्रंप के दावे और रिपब्लिकन में मतभेद

बर्न्ड डिबशमैन जूनियर, व्हाइट हाउस संवाददाता

शॉर्ट वीडियो देखिए

डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अमेरिका के लिए 'बड़ी जीत' बताया है. उनका कहना है कि इससे युद्ध का सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा होता है. वह उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना था.

हालांकि, निकट भविष्य में इससे भी बड़ी 'जीत' वैश्विक अर्थव्यवस्था का फिर से खुलना माना जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया है.

जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया और होर्मुज़ स्ट्रेट लगभग बंद रहा, जनमत सर्वेक्षण लगातार यही दिखाते रहे कि अमेरिकी जनता पेट्रोल की बढ़ती क़ीमतों और युद्ध के घरेलू आर्थिक असर से परेशान थी.

2024 में आर्थिक असंतोष की वजह से ही मतदाताओं ने ट्रंप को दोबारा व्हाइट हाउस भेजा था. ऐसे में यह धारणा बनने लगी कि राष्ट्रपति की ओर से शुरू किया गया युद्ध आम लोगों की जेब पर बोझ डाल रहा है.

यह ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से नुक़सानदेह साबित होने लगा था. भले ही नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव में ट्रंप खुद उम्मीदवार नहीं होंगे.

लेकिन यह चिंता उनके साथी रिपब्लिकन नेताओं के लिए मुश्किलें पैदा कर रही थी. उनमें से कई अपने निर्वाचन क्षेत्रों में नाराज़ मतदाताओं का सामना कर रहे थे. लोगों में यह डर भी बढ़ रहा था कि यह संघर्ष लंबे समय तक चल सकता है.

इसी वजह से यह समझौता ट्रंप को कुछ राहत देता है. उनके राजनीतिक सहयोगियों को उम्मीद है कि अब वे ट्रंप को ऐसे नेता के रूप में पेश कर पाएंगे, जिसने संघर्ष को अपेक्षाकृत जल्दी ख़त्म किया.

साथ ही उन्होंने उन अंतहीन विदेशी युद्धों जैसी स्थिति से भी बचा लिया, जिनका उन्होंने अपने चुनाव अभियान में विरोध किया था. हालांकि, इस समझौते के आलोचक पहले ही ट्रंप पर ज़रूरत से ज़्यादा रियायतें देने का आरोप लगा चुके हैं.

इन आलोचकों में रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेता भी शामिल हैं. इस आलोचना का सबसे बड़ा कारण 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण कोष है, जिससे ईरान को फ़ायदा मिलने की बात कही गई है.

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "अमेरिका की ओर से ईरान को 300 अरब डॉलर का कोई भुगतान नहीं किया जा रहा है. यह फ़र्जी ख़बर है. अमेरिका के हिस्से में सिर्फ़ सफलता, तेल की कम क़ीमतें और जीत आई है."

ट्रंप और उनके प्रशासन के दूसरे अधिकारियों ने भी साफ़ किया है कि यह पैसा सीधे अमेरिका नहीं देगा. फिर भी रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं में इसे लेकर असहजता बनी हुई है.

टेड क्रूज ने समाचार वेबसाइट 'द हिल' से कहा, "इतिहास हमें सिखाता है कि ऐसे धर्मतांत्रिक कट्टरपंथियों को अरबों डॉलर देना, जो हमें मारना चाहते हैं, अच्छा विचार नहीं है. मुझे लगता है कि राष्ट्रपति को बहुत ख़राब सलाह दी जा रही है."

रूढ़िवादी टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने भी इस समझौते की तीखी आलोचना की. हाल के महीनों में उन्होंने ट्रंप प्रशासन की आलोचना की है. इसके बावजूद उन्हें अब भी मागा समर्थकों के बीच प्रभावशाली शख़्सियत माना जाता है.

शुरुआती लक्ष्यों का एमओयू में ज़िक्र नहीं

एक और अहम बात यह है कि ट्रंप प्रशासन को यह स्वीकार करना पड़ा है कि उसके कई युद्ध लक्ष्य अब प्राथमिकता में नहीं हैं. एमओयू में उनका कोई उल्लेख भी नहीं है.

यही वजह है कि आलोचकों का एक वर्ग इसे पूरी जीत नहीं मानता. उनका कहना है कि यह सिर्फ़ समझौते के जरिए संघर्ष को रोकने की कोशिश है. संघर्ष की शुरुआत में ट्रंप ने कहा था कि अमेरिकी सेना ईरान की मिसाइलों को नष्ट कर देगी.

उन्होंने यह भी कहा था कि ईरान के मिसाइल उद्योग को पूरी तरह ख़त्म कर दिया जाएगा. लेकिन एमओयू में इन बातों का कोई ज़िक्र नहीं है.

इसी तरह, एमओयू में ईरान के क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों के साथ उसके संबंधों का भी कोई उल्लेख नहीं है. मार्च में ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि ईरानी शासन अपनी सीमाओं के बाहर मौजूद समूहों को हथियार, पैसा और निर्देश न दे सके.

लेकिन अब प्रशासन इस लक्ष्य से पीछे हटता दिखाई दे रहा है.

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि हिज़्बुल्लाह इसराइल पर गोलीबारी से परहेज करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि युद्धविराम अक्सर 'थोड़े अव्यवस्थित' होते हैं.

उन्होंने कहा कि बीच-बीच में तनाव या हिंसा की घटनाएं होना असामान्य नहीं है. यानी अब प्रशासन का जोर पूरी सैन्य जीत पर नहीं दिखता. वह ईरान के सभी क्षेत्रीय प्रभाव को ख़त्म करने की बात भी नहीं कर रहा है.

अब उसकी प्राथमिकता संघर्ष को नियंत्रित रखना और युद्धविराम को बनाए रखना दिखाई देती है. सिर्फ यही बात रिपब्लिकन नेताओं और उनके समर्थकों के बीच इस समझौते को अलोकप्रिय बना सकती है.

ये वे लोग हैं, जो इसराइल की सुरक्षा के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता को अमेरिकी राजनीति का अटूट हिस्सा मानते हैं.

दूसरे शब्दों में, उनकी चिंता यह है कि समझौते में इसराइल की सुरक्षा से जुड़े कुछ अहम मुद्दों को या तो पीछे छोड़ दिया गया है या उनका साफ़ उल्लेख नहीं किया गया है.

यही वजह है कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इस समझौते को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं.

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • ईरान और अमेरिका के बीच अगले 60 दिनों में परमाणु कार्यक्रम पर कठिन बातचीत होगी।

    Very likely · Within months

  • समझौते को लेकर ईरान और अमेरिका दोनों देशों में घरेलू राजनीतिक मतभेद बढ़ेंगे।

    Likely · Within weeks

Open Questions

  • क्या ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर रियायतें देगा?
  • क्या अमेरिका प्रतिबंधों में ढील देगा?
  • क्या यह समझौता स्थायी शांति लाएगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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