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मध्य प्रदेश के रुठिया परिवार का दावा: 1917 में पूर्वज ने ब्रिटिश सरकार को दिया था 35 हज़ार का कर्ज़
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BBC हिंदी7 hours agoWorld5 min readIndia

मध्य प्रदेश के रुठिया परिवार का दावा: 1917 में पूर्वज ने ब्रिटिश सरकार को दिया था 35 हज़ार का कर्ज़

मध्य प्रदेश के सीहोर के रहने वाले रुठिया परिवार का दावा है कि उनके पूर्वज जुम्मालाल रुठिया ने 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को 35 हज़ार रुपए का कर्ज़ दिया था, जिसे अब लौटाने की मांग की जा रही है।

Quick Look

मध्य प्रदेश के सीहोर के रुठिया परिवार ने 109 साल बाद ब्रिटिश सरकार से 1917 में अपने पूर्वज जुम्मालाल रुठिया द्वारा दिए गए 35 हज़ार रुपए के कर्ज़ को लौटाने की मांग की है। ब्रिटेन के डीएमओ ने मामले की जांच के लिए दस्तावेज़ मांगे हैं।

AI-generated summary

Why It Matters

मध्य प्रदेश के सीहोर के एक परिवार ने दावा किया है कि उनके पूर्वज ने 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को 35 हज़ार रुपए का कर्ज़ दिया था।

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मध्य प्रदेश के सीहोर के रहने वाले रुठिया परिवार ने दावा किया है कि उनके पूर्वज जुम्मालाल रुठिया ने 1917 में ब्रिटिश सरकार को 35 हज़ार रुपए का कर्ज़ दिया था। अब 109 साल बाद उनके परिवार ने ब्रिटिश सरकार से इस रकम को लौटाने की मांग की है।

जुम्मालाल रुठिया के परिवार ने कहा है कि उनके पास 4 जून 1917 का एक सर्टिफिकेट है जिसमें ब्रिटिश सरकार को 35 हज़ार रुपए दिए जाने का रिकॉर्ड है।

परिवार का कहना है कि ये रकम भोपाल एजेंसी में ब्रिटिश सरकार के पॉलिटिकल एजेंट के ज़रिए दी गई थी।

अब ब्रिटेन के डेट मैनेजमेंट ऑफिस यानी डीएमओ ने परिवार से इस मामले से जुड़े दस्तावेज़ और परिवार की जानकारी मांगी है।

जुम्मालाल रुठिया के परपोते गौतम रुठिया के मुताबिक़, ब्रिटिश अधिकारियों ने मामले को आगे जांच के लिए भेजा है और दस्तावेज़ों के सत्यापन के लिए कुछ जानकारी मांगी है।

गौतम रुठिया ने फ़ोन पर बीबीसी से कहा, "देखिए, हमें ब्रिटिश सरकार से एक ईमेल आया जिसमें वो मामले की पुष्टि करने के लिए कुछ जानकारी चाह रहे हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अभी इस प्रकरण की जांच के लिए मामला आगे भेज दिया है। और वेरिफ़िकेशन के लिए जो जानकारी उन्हें चाहिए, वो हम अपनी ओर से उन्हें भेज रहे हैं।"

हालांकि, ब्रिटिश अधिकारियों की ओर से परिवार के दावे को स्वीकार किए जाने की बात अभी नहीं कही गई है। दस्तावेज़ मांगे जाना फिलहाल दावे की जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है।

जुम्मालाल के पोते और गौतम के पिता विनय रुठिया ने कहा कि परिवार ब्रिटिश सरकार की पहली प्रतिक्रिया से काफ़ी उत्साहित है।

उन्होंने कहा कि, "हम लोगों को इतने महीनों में पहली बार यूके सरकार से प्रतिक्रिया मिली है। हमारी उम्मीद बढ़ गई है। ये मामला पैसे से ऊपर उठ चुका है। ये हमारे लिए एक तरह से हमारे पूर्वज की विरासत का मामला है"।

विनय रुठिया के मुताबिक़, परिवार को इस दस्तावेज़ के बारे में इसी साल फ़रवरी में पता चला।

उन्होंने कहा, "इसी साल शुरुआत में हम किसी और मामले में पुराने काग़ज़ात खंगाल रहे थे तब हमें यह ब्रिटिश सरकार दिए हुए कर्ज़ का दस्तावेज़ मिला। इसके बाद हमने वकील के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से संपर्क किया।"

1917 में जुम्मालाल ने ब्रिटिश सरकार को क्यों दिया था क़र्ज़?

परिवार के मुताबिक़, जुम्मालाल रुठिया ने ये रकम प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को दी थी।

विनय रुठिया से जब हमने इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि, "प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार की ओर से भारतीय जवान भी युद्ध में शामिल हुए थे। उस समय ब्रिटिश सरकार जवानों के रखरखाव के लिए पैसे इकट्ठा कर रही थी। इसी कड़ी में उस समय मेरे दादा जी जुम्मालाल जी ने यह पैसा ब्रिटिश सरकार के लिए युद्ध पर गए भारतीय जवानों के ख़र्च के लिए दिया था।"

परिवार के पास मौजूद दस्तावेज़ में क़र्ज़ देने की तारीख़ 4 जून 1917 की तारीख़ दर्ज है।

जुम्मालाल का परिवार इसे वॉर लोन बताता है। उसका कहना है कि यह सामान्य बैंक लोन की तरह नहीं था, जिसमें दो या पाँच साल के भीतर रकम लौटाने की कोई तय समय सीमा हो।

गौतम रुठिया कहते हैं, "अगर बैंकिंग डॉक्यूमेंट होता तो उसमें एक समय सीमा तय होती जैसे कि पाँच साल में क़र्ज़ अदा करना या 10 साल में। लेकिन यह वॉर लोन यानी कि युद्ध के लिए दिया गया लोन था। यह निश्चित नहीं था कि युद्ध कितने समय में रुकेगा, कब रुकेगा।"

गौतम रुठिया के मुताबिक़, परिवार के पुराने रिकॉर्ड में ये दस्तावेज़ मौजूद था, लेकिन इसके बारे में उन्हें इसी साल फ़रवरी में जानकारी मिली।

गौतम ने बताया कि अब ब्रिटिश अधिकारियों ने परिवार से जुड़े दस्तावेज़, वंशावली, पुराने सर्टिफ़िकेट, रकम और उस समय की फ़र्म से संबंधित जानकारी मांगी है।

गौतम रुठिया के मुताबिक़, अधिकारियों को ये वेरिफ़ाई करना है कि 1917 में रकम देने वाला परिवार और अब दावा करने वाला परिवार एक ही है या नहीं।

35 हज़ार रुपए के क़र्ज़ का आज कितना मूल्य होगा?

रुठिया परिवार, 1917 में दिए गए 35 हज़ार रुपए की आज की क़ीमत का भी हिसाब लगा रहा है।

गौतम रुठिया के मुताबिक़, परिवार अपने दावे में मूल रकम के साथ ब्याज़, कंपाउंडिंग इंटरेस्ट और दूसरे ख़र्चों को भी शामिल करेगा।

वो कहते हैं, "हम लोग पूरा क्लेम करेंगे। 35 हज़ार तो अपना प्रिंसिपल अमाउंट है, प्लस उस पर ब्याज़ है, कंपाउंडिंग इंटरेस्ट है और जो ख़र्च आएगा, इसमें महँगाई को भी शामिल करेंगे और तमाम चीज़ों को कैलकुलेट करने के बाद आज की करेंसी से उसकी तुलना करेंगे।"

परिवार ने अभी यह तय नहीं किया है कि 109 साल बाद इस कथित क़र्ज़ के बदले वो कुल कितने पैसों की मांग करेंगे।

2015 में ब्रिटेन ने प्रथम विश्व युद्ध का 2.2 अरब पाउंड का क़र्ज़ चुकाया

विनय रुठिया के मुताबिक़, ब्रिटिश सरकार ने 2015 में प्रथम विश्व युद्ध के समय लिए गए पुराने क़र्ज़ का बड़ा हिस्सा चुकाया था।

वो कहते हैं, "रिसर्च करने के दौरान ये आया कि 2015 में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर का काफ़ी अमाउंट चुकाया था। ये 1917 के आसपास के लोन थे जिसे उन्होंने 2015 में चुकाया।"

ब्रिटिश संसद में सरकार के दिसंबर 2014 में दिए गए एक जवाब के मुताबिक़, उस समय सरकार के पास प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ा क़रीब 2.2 अरब पाउंड का क़र्ज़ बाकी था। इसमें से कुछ फ़ीसदी वॉर लोन था, जिसे 9 मार्च 2015 को चुकाया गया। इसके अलावा कुछ फ़ीसदी कंसॉलिडेटेड लोन और कन्वर्ज़न लोन था जिसे भी 2015 में चुकाया गया था।

ब्रिटिश संसद में दिए गए एक दूसरे जवाब के मुताबिक़, 4 फ़ीसदी कंसॉलिडेटेड लोन और 3.5 फ़ीसदी वॉर लोन ऐसे सरकारी बॉन्ड थे, जिन्हें प्रथम विश्व युद्ध के लिए पैसा जुटाने के मक़सद से जारी किया गया था। इन दोनों बॉन्ड में उस समय युद्ध के लिए जारी किए गए कुल बॉन्ड का क़रीब 99 फ़ीसदी हिस्सा था।

हालांकि, 2015 में ब्रिटेन की ओर से इन पुराने क़र्ज़ का पैसा लौटाए जाने से यह साबित नहीं होता कि जुम्मालाल रुठिया ने 1917 में जो 35 हज़ार रुपए दिए थे, वो भी इन्हीं बॉन्ड में शामिल थे।

जुम्मालाल रुठिया कौन थे?

परिवार के मुताबिक़, जुम्मालाल रुठिया उस समय इलाक़े के बड़े कारोबारी थे।

उनके पोते विनय रुठिया बताते हैं कि जुम्मालाल रुठिया की क़रीब 3,000 गायों वाली गोशाला भी थी।

परिवार के पास जुम्मालाल रुठिया की पुरानी तस्वीरें और उस समय उनके इस्तेमाल की जाने वाली गाड़ी की तस्वीर भी मौजूद है।

परिवार का कहना है कि उनके पुराने कारोबार और परिवार से जुड़े दूसरे दस्तावेज़ भी मौजूद हैं।

उन्होंने आगे कहा, "इसके अलावा मेरे दादा जी का बहुत बड़ा कारोबार था। वो उस समय अफ़ीम की भी खेती करवाते थे। उनके पास रोल्स रॉयस गाड़ी थी। तो सवाल इसका नहीं है कि उन्होंने क़र्ज़ दिया या नहीं। उनके पास पैसे थे और क़र्ज़ देने का डाक्यूमेंट भी है। सवाल ये है कि ब्रिटिश सरकार इस पर क्या कार्रवाई करेगी।"

सेठ जुम्मालाल रुठिया की 1937 में मौत हो गई थी। यानी क़र्ज़ दिए जाने के क़रीब दो दशक बाद। इसके क़रीब 10 साल बाद 1947 में ब्रिटिश शासन को भारत छोड़ना पड़ा था। परिवार का दावा है कि इस रकम का कभी भुगतान या निपटारा नहीं हुआ।

दस्तावेज़ों और जानकारी का सत्यापन होना बाक़ी

फ़िलहाल ब्रिटिश अधिकारियों ने परिवार के दावे को स्वीकार नहीं किया है।

अभी परिवार से मांगे गए दस्तावेज़ों और जानकारी का सत्यापन होना है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 1917 में दिए गए 35 हज़ार रुपए से जुड़े दस्तावेज़ ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड से किस तरह मेल खाते हैं।

परिवार की ओर से आगे की कानूनी प्रक्रिया और आर्बिट्रेशन की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।

Open Questions

  • क्या ब्रिटिश सरकार इस दावे को स्वीकार करेगी?
  • दस्तावेज़ों का सत्यापन कैसे होगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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