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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद ममता बनर्जी की दिल्ली में बैठक, विलय की अटकलें
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BBC हिंदी6/12/2026Politics6 min readIndia

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद ममता बनर्जी की दिल्ली में बैठक, विलय की अटकलें

Quick Look

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में भाग लिया. सोनिया और राहुल गांधी से मुलाक़ात के बाद तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में विलय की अटकलें तेज हो गई हैं, हालांकि दोनों पार्टियों ने इसे बेबुनियाद बताया है. विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी में बगावत और नेताओं के पार्टी छोड़ने से टीएमसी का भविष्य अनिश्चित है.

AI-generated summary

Why It Matters

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के नेताओं के बीच बगावत और इस्तीफे का सिलसिला जारी है. इसी बीच ममता बनर्जी ने दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में भाग लिया, जिससे कांग्रेस में विलय की अटकलें तेज हो गई हैं.

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के चंद दिनों बाद ही नई दिल्ली में ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल हुईं.

गठबंधन की बैठक के दौरान सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मुलाक़ातों के बाद इस तरह के कयास तेज हो गए हैं कि ममता बनर्जी अपने साथ के सांसदों और विधायकों के साथ कांग्रेस में विलय कर सकती हैं.

हालांकि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने कहा है कि विलय की संभावना वाली ख़बरें बेबुनियाद हैं.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि राजनीति में कुछ भी संभव है.

इस राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र रखने वालों का तर्क है कि अगर विलय की बातों में दम नहीं होता तो पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी में बढ़ती बगावत के बीच ममता तीन दिनों तक दिल्ली में नहीं रहतीं.

क्या तृणमूल कांग्रेस का वजूद बचा रहेगा

सवाल ये है अगर ममता बनर्जी कांग्रेस में अपनी पार्टी का विलय करने का फ़ैसला करती हैं तो क्या टीएमसी का वज़ूद ख़त्म हो जाएगा या पार्टी तब भी ज़िंदा रहेगी.

दूसरा सवाल ये है कि ममता के साथ आने से कांग्रेस को क्या फ़ायदा होगा? क्या ममता जैसी तेज़-तर्रार और कद्दावर नेता कांग्रेस के काम करने के तरीके और राजनीतिक संस्कृति से तालमेल बिठा पाएंगी.

विश्लेषकों का कहना है कि अब तक के घटनाक्रम से ये संकेत मिलने लगे हैं कि ममता बनर्जी की पार्टी में सांसदों और विधायकों का एक बड़ा धड़ा उनका साथ छोड़ रहा है.

तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से पहले ही 58 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के साथ चले गए हैं. ये गुट ममता के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का विरोध कर रहा है.

पार्टी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि 28 में से 20 सांसद उनके साथ हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता का कहना है कि अगर ममता कांग्रेस में चली जाती हैं तो भी टीएमसी का वजूद बचा रहेगा और ये बीजेपी के लिए फ़ायदे की बात होगी.

वो कहते हैं, ''अगर पार्टी के ज़्यादातर सांसद और विधायक तृणमूल कांग्रेस के दूसरे गुट में चले जाते हैं तो पार्टी पर उसका नियंत्रण हो जाएगा. अदालत और चुनाव आयोग अगर इस गुट को असली पार्टी के तौर पर मान्यता दे देता है तो यही असली तृणमूल कांग्रेस मानी जाएगी.''

शरद गुप्ता कहते हैं, ''महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के मामले में ऐसा हो चुका है. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में ज्यादातर विधायकों के चले जाने के बाद इसे असली शिवसेना के तौर पर मान्यता मिल गई थी. वहीं अजित पवार के नेतृत्व में ज्यादातर विधायकों के चले जाने के बाद पार्टी के इसी गुट को असली एनसीपी माना गया.''

उन्होंने कहा, ''भले ही ममता कांग्रेस में चली जाएं लेकिन तृणमूल कांग्रेस का दूसरे धड़ा वजूद में रहेगा और एनडीए का सपोर्ट करता रहेगा. बीजेपी के लिए इससे अच्छा और क्या होगा कि जो पार्टी अब तक उसका विरोध कर रही थी वो अब संसद और विधानसभा में उसका सपोर्ट करेगी.''

कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा

इन हालात में ममता बनर्जी का साथ क्या कांग्रेस को फ़ायदा पहुंचाएगा?

विश्लेषकों का मानना है कि इससे कांग्रेस को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वीर सांघवी ने 'द प्रिंट' में लिखा है,''ममता बनर्जी खुद एक पावर सेंटर रही हैं. वो कभी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं रहीं.''

वो लिखते हैं, "जब वह कांग्रेस में थीं, तब भी लगभग सभी से उनका टकराव हुआ. जब उन्होंने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया, तब भी वहां उनके विवाद रहे. जब वह दोबारा कांग्रेस के साथ गठबंधन में आईं, तब उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को टीएमसी में शामिल होने के लिए प्रेरित करके बंगाल कांग्रेस संगठन को कमज़ोर किया.''

""निर्णायक क्षण आने पर ममता बनर्जी किसी की नहीं सुनतीं.""

टीएमसी के बिखरने से बीजेपी को कितना फ़ायदा

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस की पश्चिम बंगाल में बुरी हार हुई है. इतनी निर्णायक हार के बाद भी भाजपा टीएमसी को बिखरने नहीं देना चाहती. क्योंकि टीएमसी का पतन वामपंथी दलों को पुनर्जीवित कर सकता है.

इसका अर्थ ये होगा उस विचारधारा का मुख्यधारा में आना जिसका भाजपा ही नहीं, बल्कि संघ परिवार भी दशकों से पुरजोर विरोध करता रहा है.

'द प्रिंट' में राजनीतिक टिप्पणीकार दीप हालदार ने ससेक्स विश्वविद्यालय में ब्रिटिश अकादमी के अंतर्राष्ट्रीय फेलो, अयान गुहा के हवाले से लिखा , ''टीएमसी ने वामपंथी राजनीतिक मुहावरों, बयानबाज़ी और आंदोलनकारी लामबंदी को सतही तौर पर अपनाकर वामपंथी राजनीति को फलने-फूलने नहीं दिया. साथ ही इसने पहचान की राजनीति को खुलेआम मंज़ूरी और प्रोत्साहन दिया. ये सीपीएम जैसी पारंपरिक वामपंथी ताकतों के कई लोगों को नामंजूर था.''

हालदार ने अपनी किताब 'बंगाल 2021- एक डायरी' के एक इंटरव्यू का हवाला दिया है. जिसमें आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा था कि तात्कालिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी हो सकती हैं, लेकिन असली "दुश्मन" हमेशा वामपंथी ही रहेंगे.

उन्होंने कहा "टीएमसी का शासन, चाहे कितना भी समस्याग्रस्त क्यों न हो, राज्य की संरचना को नुकसान नहीं पहुंचाएगा. लेकिन वामपंथियों में पूरे देश को नुकसान पहुंचाने की ताक़त है.''

तृणमूल में बगावत का सिलसिला

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की 35 साल तक चली सरकार को हटाकर सत्ता में आईं ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 15 सालों तक प्रदेश में शासन किया.

हालिया विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही है.

पार्टी के नेता एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं. पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साथ विधानसभा में बग़ावत हुई उसके बाद राष्ट्रीय नेताओं में इस्तीफ़े का सिलसिला शुरू हुआ.

कोलकाता मेयर और ममता के एक और क़रीबी नेता फिरहाद हकीम ने मेयर के बाद से इस्तीफ़ा दे दिया. ममता बनर्जी के घर हुई बैठक में उन्होंने खुद इस्तीफ़े की पेशकश की थी.

लोकसभा में पार्टी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पिछले दिनों दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठाने की मांग की. उन्होंने एनडीए को समर्थन देने की भी बात कही.

बुधवार को राज्यसभा में पार्टी की सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया और राज्यसभा की सदस्यता भी छोड़ दी.

सुष्मिता देव से पहले टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने भी राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.

लोकसभा में टीएमसी के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद थे. लेकिन सुखेंदु शेखर और सुष्मिता देव के इस्तीफ़ा देने के बाद राज्यसभा में टीएमसी के 11 सांसद ही रह गए हैं.

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • तृणमूल कांग्रेस का एक धड़ा एनडीए का समर्थन कर सकता है, भले ही ममता बनर्जी कांग्रेस में चली जाएं.

    Likely · Medium term

  • टीएमसी का पतन वामपंथी दलों को पुनर्जीवित कर सकता है.

    Possible · Long term

Open Questions

  • क्या टीएमसी का कांग्रेस में विलय होगा?
  • विलय होने पर टीएमसी का वजूद बचेगा?
  • कांग्रेस को ममता के आने से कितना फायदा होगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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