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भारत-पाकिस्तान के बीच कोलंबो में कथित 'ट्रैक-2' वार्ता पर विवाद
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भारत-पाकिस्तान के बीच कोलंबो में कथित 'ट्रैक-2' वार्ता पर विवाद

Quick Look

लंदन स्थित थिंक टैंक द्वारा कोलंबो में आयोजित एक क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन में भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत को 'ट्रैक-2 वार्ता' बताए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। भारत सरकार ने इससे दूरी बनाते हुए कहा है कि यह निजी पहल थी और इसमें कोई आधिकारिक भागीदारी नहीं थी।

AI-generated summary

Why It Matters

लंदन स्थित थिंक टैंक आईआईएसएस ने कोलंबो में एक क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक को 'ट्रैक-2 वार्ता' बताए जाने पर भारत सरकार ने आधिकारिक भागीदारी से इनकार कर दिया है।

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डिप्लोमेसी के बारे में कई बार कहा जाता है कि जो हो रहा होता है, वो दिखता नहीं है और जो दिखता है, वो होता नहीं है.

पाकिस्तान और भारत के संबंधों को राजनीतिक बयानों के आधार पर देखेंगे तो ऐसा ही लगता है कि तनाव इतना ज़्यादा है कि सांस लेने की भी जगह नहीं है.

27 जून को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया है कि लंदन स्थित एक थिंक टैंक ने कोलंबो में क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडलों ने ट्रैक 2 वार्ता में हिस्सा लिया था.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) के सुरक्षा सम्मेलन में भारत, मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान और ब्रिटेन समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे.

हिन्दुस्तान टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के बीच हिल्टन कोलंबो में डेढ़ दिन तक अलग-अलग दौर की बातचीत हुई थी.

भारत के प्रतिनिधिमंडल में राम माधव शामिल थे, जो 2014 से 2020 तक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं और फ़िलहाल नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष हैं.

इस रिपोर्ट पर राम माधव ने 27 जून को ही प्रतिक्रिया दी थी.

राम माधव ने एक्स पर लिखा था, ''इसे पूरी तरह ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है. यह किसी तरह का ट्रैक-2 संवाद नहीं था. यह आईआईएसएस का सालाना साउथ एशिया डायलॉग था, जिसमें भारत, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों ने हिस्सा लिया.''

राम माधव ने लिखा था, ''अतीत में इस सालाना संवाद में अधिकारी भी शामिल होते रहे हैं. इतने सारे देशों के साथ कोई ट्रैक-2 वार्ता नहीं होती. मैं दो दिन के इस संवाद में शामिल नहीं हुआ था. मुझे सिर्फ़ एक सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. मैंने उस सत्र में हिस्सा लिया, अपनी बात रखी और वहाँ से चला गया. इसे बेवजह बड़ा बनाकर पेश किया गया है.''

जनरल एमएम नरवणे भी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, जो 2019 से 2022 तक भारतीय सेना प्रमुख थे. 24 जून को एमएम नरवणे ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए कोलंबो दौरे की पुष्टि की थी.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व भारतीय उच्चायुक्त रुचि घनश्याम भी इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. वह 1990 के दशक के अंत में इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में सेवा देने वाली शुरुआती महिला राजनयिकों में से एक रही हैं.

एचटी के मुताबिक़, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में कार्यरत एक राजनयिक के साथ दक्षिण एशिया और 'सार्क' मामलों के महानिदेशक सज्जाद हैदर ख़ान शामिल थे.

उनके साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता और पूर्व मंत्री शेरी रहमान भी मौजूद थीं, जो 2011 से 2013 तक अमेरिका में पाकिस्तान की राजदूत रह चुकी हैं.

इसके अलावा मेजर जनरल (रिटायर्ड) इसफ़ानदियार अली पटौदी भी पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे. उन्होंने इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) में सेवा दी थी और एक मैकेनाइज़्ड डिवीजन की कमान संभाली थी.

पीपीपी, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन पार्टी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है.

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन तक चले संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच इसे काफ़ी अहम माना जा रहा है.

यह तनाव तब शुरू हुआ था जब अप्रैल 2025 में पहलगाम चरमपंथियों के हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के भीतर सैन्य ऑपरेशन शुरू किया था.

अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री एस पॉल कपूर ने 21 से 24 जून के बीच श्रीलंका का दौरा किया था.

एचटी ने लिखा है कि कपूर भी आईआईएसएस की ओर से आयोजित सम्मेलन के प्रतिभागियों के लिए रखे गए डिनर में शामिल हुए थे.

29 जून को विदेश मंत्रालय ने भारत और पाकिस्तान के बीच कथित ट्रैक-2 संवाद से ख़ुद को अलग कर लिया.

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने स्पष्ट किया कि ये बैठकें निजी पहल हैं और इनमें सरकार की कोई आधिकारिक भागीदारी या समर्थन नहीं है.

संवाद से जुड़ी खबरों पर सवालों का जवाब देते हुए मिसरी ने कहा कि इस तरह की बातचीत न तो नई है और न ही भारत सरकार इन्हें किसी आधिकारिक प्रक्रिया का हिस्सा मानती है.

उन्होंने कहा, "मैंने ये रिपोर्ट्स देखी हैं और इनके बारे में जानता हूँ. मैं इतना कहना चाहूंगा कि सबसे पहले, दुनिया भर में कई जगहों पर इस तरह के दर्जनों कार्यक्रम विभिन्न विषयों पर होते रहते हैं. इसलिए इनमें कुछ नया या ख़ास कुछ भी नहीं है."

मिसरी ने कहा था, "मैं पाकिस्तान सरकार की ओर से नहीं बोल सकता लेकिन भारत सरकार की ओर से इतना स्पष्ट है कि इनमें कोई आधिकारिक भागीदारी, कोई आधिकारिक समर्थन या किसी प्रकार की आधिकारिक संलिप्तता नहीं है."

विदेश मंत्रालय के इस बयान पर पाकिस्तान की रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा ने एक्स पर लिखा, ''आईआईएसएस लंदन के साउथ एशिया सेक्शन के प्रमुख यह सुनकर शायद काफ़ी निराश होंगे. लंदन लगातार दो पड़ोसी देशों के बीच पुल बनाने की कोशिश में पैसा ख़र्च करता रहा है, जबकि इसका कोई स्पष्ट नतीज़ा नज़र नहीं आता. संभव है कि मुद्दा यह भी हो कि उसका ट्रैक-2 संवाद वास्तव में पुल बनाने के लिए है ही नहीं.''

दरअसल कोलंबो में हुई जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वह आईआईएस-एईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ एडिशन था.

इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, जो ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद थी.

ऐसी बैठकें होती रहती थीं और मीडिया पहले इसे बहुत तवज्जो नहीं देता था. लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के अलावा संवाद से जुड़ी कोई भी बात आती है तो मीडिया इसे ख़ासा तवज्जो देता है.

इस फॉर्मेट को लेकर अचानक सार्वजनिक चर्चा शायद इसलिए बढ़ी है क्योंकि कुछ हलकों की कोशिश यह संदेश देने की है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संपर्क पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है.

यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब आरएसएस के शीर्ष नेता मोहन भागवत, दत्तात्रेय होसबाले और सुनील आंबेकर भारत-पाकिस्तान के बीच "लोगों के आपसी संवाद" की वकालत कर रहे हैं.

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं.

ख़ासकर इसलिए क्योंकि होसबाले, जो अपने संगठन की ओर से यह कहने वाले पहले नेता थे कि भारत को पाकिस्तान के लिए अपने दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए, उन्होंने यह टिप्पणी अमेरिका दौरे के तुरंत बाद की थी.

इस दौरे में वे और आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव वॉशिंगटन डीसी के एक कंज़र्वेटिव थिंक टैंक में बोलने के लिए आमंत्रित किए गए थे.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की पाकिस्तान में रिपोर्टर रहीं निरूपमा सुब्रमण्यम ने ट्रैक-2 संवाद को लेकर अंग्रेज़ी अख़बार द ट्रिब्यून में एक लेख लिखा है.

सुब्रमण्यम ने लिखा है, ''पश्चिमी परिभाषा के अनुसार, ट्रैक 2 संवाद दो या अधिक देशों के प्रभावशाली लेकिन ग़ैर-आधिकारिक व्यक्तियों के बीच होने वाली बैठक है. ट्रैक 1 आधिकारिक कूटनीति होती है.''

''वहीं ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-आधिकारिक प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं. लेकिन भारत में ट्रैक 2 या ट्रैक 1.5 को अक्सर 'गुप्त' या 'बैकचैनल' कूटनीति के साथ मिला दिया जाता है. जबकि बैकचैनल कूटनीति इससे अलग होती है.''

इस बीच भारत और पाकिस्तान की 100 से ज़्यादा प्रमुख हस्तियों की ओर से बयान जारी किया गया है.

"आख़िर वह कौन-सी अदृश्य ताक़त है, जो पाकिस्तान के साथ छद्म सामान्यीकरण को बढ़ावा दे रही है, जबकि इस बात की कोई ठोस और सत्यापित गारंटी नहीं है कि पाकिस्तान पिछले 55 सालों में खड़े किए गए अपने सैन्य-जिहादी ढांचे को ख़त्म करेगा?"

Open Questions

  • क्या यह बैठक वास्तव में भारत-पाकिस्तान संपर्क को जीवित रखने का प्रयास थी?
  • क्या भविष्य में ऐसे अनौपचारिक संवादों को बढ़ावा मिलेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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