सीजेपी विरोध प्रदर्शन और सरकार की प्रतिक्रिया: दिल्ली पुलिस कमिश्नर का तबादला और नड्डा की मुलाकात
Quick Look
भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने मोदी सरकार को चिंतित किया है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर का अचानक तबादला और जे.पी. नड्डा का CJP प्रतिनिधियों से मिलना सरकार की शुरुआती अनदेखी के बाद बदली रणनीति को दर्शाता है।
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Why It Matters
भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का गठन लोकतांत्रिक ढांचे में सुधार की मांग को लेकर हुआ है। यह आंदोलन वर्चुअल दुनिया से ज़मीन पर आया है और सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से जुड़ गया है।
भारत जैसे विविधता से भरे लोकतांत्रिक देश में विरोध-प्रदर्शन बहुत ही आम बात रही है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक मज़बूत सरकार में ऐसे विरोध प्रदर्शन बहुत कम देखने को मिले हैं, जिनसे सरकार चिंतित दिखे।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का गठन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे से हुई एक टिप्पणी से ही हुआ था और यह पार्टी उसके ढाँचे में सुधार की मांग को लेकर वर्चुअल दुनिया से ज़मीन पर आ गई है।
मोदी सरकार ने सीजेपी के आंदोलन और सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को अब तक जिस तरह से हैंडल किया, उससे यही लग रहा है कि उसे इसकी तीव्रता का अंदाज़ा नहीं था।
सरकार को ऐसा लग रहा था कि यह आंदोलन ख़ुद से ही ख़त्म हो जाएगा। लेकिन सोमवार (20 जुलाई) को जो कुछ भी हुआ, उससे यही लग रहा है कि यह विरोध महज सीजेपी का नहीं है बल्कि वैसे लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं, जिन्हें सरकार से नाराज़गी थी।
इन सबके बीच सीजेपी और सरकार दोनों तरफ़ से कई ऐसी चीज़ें हुईं, जिनसे घटनाओं का सिलसिला पता नहीं चलता है और कई तरह के सवाल उठते हैं। पहले बात सरकार के कुछ क़दमों की।
1. अचानक दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाना
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 17 जुलाई को अचानक दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा को उनके पद से हटा दिया और 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी अनुराग कुमार को तीन वर्ष के लिए नया पुलिस आयुक्त नियुक्त कर दिया था।
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि गोलचा की समय से पहले विदाई के बाक़ी कारणों में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से निपटने का तरीक़ा भी शामिल था। टेलीग्राफ़ ने अपनी रिपोर्ट में गोलचा को हटाने का कारण सीजेपी का विरोध प्रदर्शन बताया है।
टेलीग्राफ़ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''गृह मंत्रालय ने सतीश गोलचा को हटाने के पीछे कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई। हालांकि सूत्रों के अनुसार, सरकार उनके कुछ प्रशासनिक फ़ैसलों से संतुष्ट नहीं थी। इनमें जंतर-मंतर के पास कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के जारी प्रदर्शन से निपटने का तरीक़ा भी शामिल था।''
टेलीग्राफ़ ने लिखा है, ''गोलचा को हटाए जाने की ख़बर उस समय आई, जब वह दिल्ली सरकार के एक मंत्री के साथ एक सार्वजनिक पौधारोपण कार्यक्रम में शामिल थे। पिछले एक वर्ष के भीतर यह दूसरी बार है जब दिल्ली पुलिस आयुक्त को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से हटाया गया है।''
''पिछले वर्ष अगस्त में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर उनके आवास पर आयोजित एक जनसभा के दौरान हुए हमले के एक दिन बाद केंद्र सरकार ने तत्कालीन पुलिस आयुक्त एस.बी.के. सिंह का तबादला कर दिया था।''
नए पुलिस आयुक्त की नियुक्ति संसद के मॉनसून सत्र शुरू होने से कुछ दिन पहले की गई। संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ है। गोलचा की समय से पहले विदाई और अनुराग कुमार की नियुक्ति को इस रूप में देखा जा रहा है कि सरकार सीजेपी से जैसे निपटना चाहती थी, वैसे निपट नहीं पाई।
2. जेपी नड्डा को क्यों मिलना पड़ा?
सीजेपी ने सोमवार को दावा किया था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू होने के बाद पहली बार केंद्र सरकार ने बातचीत के लिए उससे संपर्क किया है।
'चलो संसद' मार्च के लिए हज़ारों समर्थकों के जुटने के बीच सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मिलने भी गए। दूसरी तरफ़ जेपी नड्डा ने दावा किया कि बातचीत के लिए सीजेपी के लोगों ने संपर्क किया था। मतलब सरकार ने अगर बातचीत के लिए संपर्क किया तो वह सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर रही है और सीजेपी ने संपर्क किया तो वो भी इसे स्वीकार नहीं कर रही है।
मुलाक़ात के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला। सरकार की तरफ़ से कोई भी आश्वासन नहीं दिया गया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की मांग मानी जाएगी या नहीं।
जब हज़ारों छात्र संसद तक पहुँचने के लिए पुलिस बैरिकेड पार करने की कोशिश कर रहे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद सत्र शुरू होने से पहले अपना परंपरागत संबोधन दे रहे थे। उन्होंने अपने भाषण में उस घटनाक्रम का कोई उल्लेख नहीं किया, जो उनसे कुछ सौ मीटर की दूरी पर भारत के युवाओं के साथ हो रहा था। प्रधानमंत्री ने पूरी तरह से इसकी उपेक्षा की।
हैदराबाद की एक कंपनी की ओर से रॉकेट के सफल प्रक्षेपण की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी पर परोक्ष टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि औसतन 28 वर्ष की आयु वाले युवाओं ने हासिल की है, "किसी 56 वर्षीय युवा ने नहीं।" यह टिप्पणी संदर्भ से हटकर मानी गई। इसका निशाना लोकसभा में विपक्ष के 56 वर्षीय नेता राहुल गांधी को माना गया।
मोदी सरकार ने सीजेपी के प्रदर्शनों और सोनम वांगचुक के तीन सप्ताह लंबे अनशन को औपचारिक रूप से स्वीकार तक नहीं किया था। लेकिन जब यह आंदोलन संसद के सामने सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनने लगा, तो पुलिस ने वांगचुक को जबरन अस्पताल पहुँचा दिया। उनकी पत्नी उन्हें एक प्राइवेट हॉस्पिटल में स्थानांतरित करना चाहती हैं, लेकिन अधिकारियों ने इसकी अनुमति नहीं दी है।
सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि देश भर से छात्र और युवा सोशल मीडिया तक सीमित रहने के बजाय हज़ारों की संख्या में दिल्ली पहुँचकर वांगचुक और सीजेपी के समर्थन में सड़कों पर उतर आएंगे।
स्थिति ऐसी बनी कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात करनी पड़ी। दूसरी ओर पुलिस के लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के बावजूद युवा प्रदर्शनकारियों का मनोबल टूटता नहीं दिखा।
इससे पहले मोदी सरकार केवल एक बार बड़े जन आंदोलन के दबाव में पीछे हटी थी, जब दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के लंबे आंदोलन के बाद उसे कृषि क़ानून वापस लेने पड़े थे।
कई विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा मांग सकते थे, लेकिन ऐसा करना उनकी सरकार की विफलता स्वीकार करने जैसा होता।
इसलिए सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया यह रही कि आमरण अनशन कर रहे लोगों की अनदेखी की जाए और उसके समर्थक सोशल मीडिया पर उन्हें बीजेपी के कट्टर वैचारिक विरोधी के रूप में पेश करें।
लेकिन जैसे-जैसे सोनम वांगचुक और उनके साथ अनशन कर रहे अन्य लोगों की तबीयत बिगड़ती गई, सरकार को शायद यह एहसास हुआ कि अगर कुछ अनहोनी होती है, तो उसका ठीकरा उसी पर फूटेगा।
3. सोनम वांगचुक की शर्तों पर सवाल
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने रविवार को यह घोषणा की थी कि वांगचुक अपना अनशन समाप्त कर देंगे अगर राजनीतिक दलों के नेता उनसे मिलें और यह आश्वासन दें कि सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र में शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही का मुद्दा उठाया जाएगा। यह एक ऐसी शर्त थी, जो सीधे सरकार से कोई मांग नहीं कर रही थी। इसे बहुत आसान शर्त के रूप में देखा गया।
कई लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया कि यह एकतरफ़ा घोषणा है और एक तरीक़े से सरकार की जीत है। पॉलिटिकल कॉमेंटेटर प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने वांगचुक की भूख हड़ताल ख़त्म करने की इन शर्तों पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ''बहुत ही निराशाजनक है। अब जवाबदेही का बोझ सरकार से हटकर विपक्ष पर डाल दिया गया है। अब वह विपक्षी नेताओं से अपने पास आने और यह भरोसा देने को कह रहे हैं कि वे संसद के इस सत्र में शिक्षा को मुद्दा बनाएंगे। यह बेहद विडंबनापूर्ण है। आपने जवाबदेही को वैकल्पिक बना दिया है और उसे जवाबदेही मांगने के बराबर मान लिया है।''
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने लिखा है, ''अब केंद्र में वांगचुक नहीं हैं। अब मायने लोग रखते हैं। वे अपने अधिकार को फिर से स्थापित करने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुटना सरकार के लिए एक चेतावनी है। यह जनता का क्षण है और इसका अपना महत्व है। दिल्ली और दूसरे शहरों की सड़कों पर उमड़ी भीड़ को देखिए। लोगों ने अपनी आवाज़ पा ली है। ऐसे हर क्षण से लोकतंत्र को नई ऊर्जा मिलती है। अब वांगचुक पृष्ठभूमि में चले गए हैं। अब जनता बोल रही है।''
हालांकि जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन तब तक अपेक्षाकृत धीमा पड़ता दिख रहा था, जब तक सोनम वांगचुक ने आमरण अनशन शुरू नहीं किया था। उनके अनशन के पहले दिन जंतर-मंतर पर बहुत भीड़ नहीं थी। पुलिस जब वांगचुक को हॉस्पिटल लेकर गई तो वहाँ भीड़ बढ़ने लगी।
सीजेपी शुरू से ही संवाद के लिए तैयार दिख रही थी। लेकिन शुरू में सरकार ने इसे बहुत तवज्जो नहीं दी। सोनम वांगचुक को पहले भी सरकार जेल में भेज चुकी थी। ऐसे में वांगचुक को अंदाज़ा रहा होगा कि इस सरकार को झुकाना आसान नहीं है।
4. अभिजीत दीपके ने की भूख हड़ताल क्यों तोड़ी?
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल ले जाने के बाद आमरण अनशन की घोषणा की थी। इससे पहले वह ख़ुद भूख हड़ताल पर नहीं थे।
अभिजीत दीपके ने अचानक से सोमवार सुबह अपना आमरण अनशन समाप्त कर दिया। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला सोनम वांगचुक के अनुरोध पर किया।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन स्थल से वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने बताया कि वांगचुक ने दीपके से अनशन ख़त्म करने का आग्रह किया है, क्योंकि आंदोलन को आगे जारी रखने के लिए उन्हें ऊर्जा की ज़रूरत होगी। इसके बाद दीपके ने जूस पीकर अपना अनशन तोड़ा।
अनशन समाप्त करने के तुरंत बाद दीपके और गीतांजलि आंगमो संसद मार्च में शामिल हो गए।
अभिजीत दीपके का उभार की भारत की यूनिर्सिटी में होने वाली राजनीति से नहीं हुआ है।
अभिजीत ने पहले भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे पर राजनीति करने वाली आम आदमी पार्टी के लिए वॉलंटियर के रूप में काम किया था। इस बात को लेकर बीजेपी सहित उनके राजनीतिक विरोधियों को उन पर निशाना साधने का मौक़ा भी मिला। हालांकि, अभिजीत दीपके का कहना है कि सीजेपी एक स्वतंत्र आंदोलन बनी रहेगी।
वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक अमु जोसेफ़ अभिजीत की एक उपलब्धि मानती हैं। उन्होंने अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू से कहा था, ''भारत के चीफ़ जस्टिस की ओर से युवा भारतीयों के लिए इस्तेमाल किए गए चौंकाने वाले और पूरी तरह अस्वीकार्य शब्दों के ख़िलाफ़ जिस तेज़ी और पूरी तरह उचित सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखने को मिली, वह उत्साहजनक रही है।''
''कई प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समाचार संस्थानों ने खुली अदालत में एक वकील को संबोधित करते हुए की गई, उनकी मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्ट की थी। ऐसे में यह दावा कि उनके बयान को ग़लत ढंग से पेश किया गया, भरोसेमंद नहीं लगता।"
"चीफ़ जस्टिस की यह टिप्पणी कुछ महीने पहले न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी का अपमान करने के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों की याद दिलाती है। हालांकि उस मामले में यह टिप्पणी एक दक्षिणपंथी रेडियो होस्ट ने की थी और सार्वजनिक आलोचना के बाद उसे तुरंत माफ़ी मांगनी पड़ी और अपना पोस्ट हटाना पड़ा। सीजेपी जिस तेज़ी से अस्तित्व में आई है, अपनी वेबसाइट, अपना गीत, अपना घोषणापत्र और अन्य सामग्री के साथ वह सचमुच आश्चर्यजनक है। मैं निश्चित रूप से इस आंदोलन पर नज़र बनाए रखूंगी।"
Open Questions
- सरकार ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाने का आधिकारिक कारण क्यों नहीं बताया?
- जेपी नड्डा और सीजेपी प्रतिनिधियों की मुलाकात का असली उद्देश्य क्या था?
- सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए इतनी 'आसान' शर्त क्यों रखी?


