
समुद्र, नदियों और तालाबों की सतह के नीचे एक ऐसी दुनिया है जो शोर और संगीत से भरी है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
समुद्र और मीठे पानी के भीतर की दुनिया आवाज़ों से जीवंत है। व्हेल, मछलियां, झींगे और कीड़े संचार और शिकार के लिए ध्वनियों का उपयोग करते हैं। मानवीय गतिविधियों का शोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।
AI-generated summary
समुद्र के भीतर प्रकाश की कमी के कारण ध्वनि समुद्री जीवों के लिए संचार और नेविगेशन का प्राथमिक साधन है। मानवीय औद्योगिक शोर समुद्री जीवों के तनाव और प्रजनन व्यवहार को प्रभावित कर रहा है।
समुद्र, नदियों और तालाबों की सतह के नीचे एक छिपी हुई दुनिया है. ये दुनिया चुटकी बजाने, चटकने और गीतों की आवाज़ों से जीवंत है.
मछलियां क्लीनिंग स्टेशन को लेकर झगड़ रही हैं. झींगे अपने शिकार को "सोनिक वेपन" से बेहोश कर रहे हैं. एक छोटा सा कीड़ा तो ऑर्केस्ट्रा जितना शोर मचा रहा है.
फिर भी ज़मीन पर रहने वाले लोगों के लिए यह साउंडट्रैक ज़्यादातर अनसुना ही रहता है. ऐसा कहना है भौतिक विज्ञानी हेलेन ज़र्स्की का.
हेलेन बीबीसी रेडियो प्रोग्राम 'रेयर अर्थ' की प्रेज़ेंटर हैं और 'ब्लू मशीन' किताब की लेखिका भी हैं. यह किताब बताती है कि समुद्र हमारी दुनिया को कैसे आकार देता है.
"समुद्र की सतह एक टू-वे मिरर की तरह काम करती है. हवा से आवाज़ नीचे आती है और सतह से टकराकर सीधे ऊपर चली जाती है. पानी के नीचे की सारी आवाज़ सतह तक तो आ सकती है. लेकिन वह टकराकर वापस नीचे चली जाती है. इसलिए वह कभी हम तक नहीं पहुंच पाती."
देखने से ज़्यादा ज़रूरी है आवाज़
इंसानों के लिए देखने की क्षमता सबसे अहम होती है. लेकिन पानी के अंदर नियम अलग होते हैं.
पानी में 200 मीटर से ज़्यादा गहराई तक ज़्यादा रोशनी नहीं पहुंचती. इसलिए समुद्री जानवरों के लिए रास्ता खोजने और बातचीत करने का मुख्य ज़रिया आवाज़ बन जाती है. खासकर लंबी दूरी के लिए.
ब्रिटेन में ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के मरीन बायोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर स्टीव सिम्पसन कहते हैं, "पानी आवाज़ को बहुत अच्छे से आगे पहुंचाता है. यह हवा की तुलना में लगभग साढ़े चार से पांच गुना तेज़ी से यात्रा करती है."
उनकी टीम की हालिया स्टडी में पाया गया कि मछलियां सबसे पहले कोरल रीफ़ का पता लगाने के लिए आवाज़ का इस्तेमाल करती हैं. बाकी संकेत उसके बाद ही अहम होते हैं.
सिम्पसन कहते हैं, "एक बार जब वे इसकी तरफ़ पहुंच जाती हैं, तो वे ख़ास तरह के हैबिटैट की गंध महसूस कर सकती हैं. और जब वे अपने झुंड के साथियों के करीब पहुंचती हैं, तो वे एक-दूसरे को देख सकती हैं."
शोर मचाने वाले जीवों से मिलिए
समुद्री जीवों ने आवाज़ निकालने के कई अनोखे तरीक़े विकसित किए हैं, जिनसे पानी के नीचे शोर का स्तर बढ़ जाता है.
व्हेल मछली अपने शरीर में मौजूद ख़ास आवाज़ निकालने वाले अंगों से हवा गुज़ारकर आवाज़ पैदा करती हैं.
सिम्पसन कहते हैं, "ब्लू व्हेल और फ़िन व्हेल जैसी 'बेलीन-फ़ीडिंग' व्हेल बहुत तेज़ और कम फ़्रीक्वेंसी वाली आवाज़ें निकालती हैं. जो समुद्र में बहुत दूर तक जा सकती हैं."
व्हेल की कुछ प्रजातियां तो शायद "प्रशांत महासागर के एक छोर से दूसरे छोर तक या अटलांटिक महासागर के एक छोर से दूसरे छोर तक एक-दूसरे से बात" भी कर सकती हैं.
आस-पास के इलाक़े में दांत वाली व्हेल और डॉल्फ़िन अपनी जगह का पता लगाने के लिए 'इकोलोकेशन' तकनीक का इस्तेमाल करती हैं. जिसमें वे क्लिक और बज़ जैसी आवाज़ें निकालती हैं.
कुछ मछलियां आवाज़ निकालने के लिए अपने शरीर के अंदर मौजूद हवा से भरी थैली, जिसे 'स्विम ब्लैडर' कहते हैं, उसमें कंपन पैदा करती हैं. वहीं कुछ मछलियां अपने दांत रगड़ती हैं या जबड़े चटकाती हैं.
सिम्पसन कहते हैं कि स्पाइनी लॉबस्टर अपनी एंटीना के एक हिस्से को अपनी आंखों के नीचे मौजूद एक खुरदरी सतह पर रगड़कर घरघराहट जैसी आवाज़ निकालते हैं. वो वैसी ही होती है "जैसे कोई फ़िडलर वायलिन बजाता है."
पश्चिमी प्रशांत महासागर में नर एम्बोन डैमसेल्फ़िश ने मादाओं को अपने घोंसले में अंडे देने के लिए आकर्षित करने के लिए एक खास तरह की तेज़ आवाज़ निकालने की क्षमता विकसित की है. वो कुछ हद तक पक्षी की आवाज़ जैसी होती है.
सिम्पसन कहते हैं कि यह एक ऐसी फ़्रीक्वेंसी है जिसका इस्तेमाल शायद ही कोई दूसरा जानवर करता हो. इससे शोर-शराबे वाली जगह पर भी उनकी आवाज़ अलग से सुनाई देती है.
"यह कुछ-कुछ उस दोस्त की जानी-पहचानी हंसी जैसा है जिसे आप बहुत भीड़-भाड़ वाली पार्टी में भी पहचान सकते हैं."
कभी-कभी अलग-अलग प्रजातियों के बीच भी आवाज़ों का आदान-प्रदान होता है. सिम्पसन की टीम ने हाल ही में एक स्नैपर और एक एंजेलफ़िश को "एक छोटी सी चट्टान के नीचे बने क्लीनिंग स्टेशन पर राइट्स के लिए" झगड़ते हुए रिकॉर्ड किया.
यहां तक कि जो जानवर हमें शांत लगते हैं, वे भी पानी के नीचे की आवाज़ों की दुनिया में अपना योगदान देते हैं.
सिम्पसन बताते हैं कि न्यूज़ीलैंड में सी अर्चिन अपने शेल का इस्तेमाल नैचुरल एम्प्लीफ़ायर के तौर पर करते हैं, जब बड़ी संख्या में सी अर्चिन चट्टानी रीफ़ पर खाना खाते हैं, तो वे एक "अद्भुत कोरस" पैदा करते हैं.
"बहुत से जानवर सी अर्चिन की आवाज़ सुनकर समुद्र तट का रास्ता ढूंढ सकते हैं."
लेकिन उनके लिए आवाज़ निकालने वाले जानवरों में सबसे अद्भुत 'स्नैपिंग श्रिम्प' है.
सिम्पसन बताते हैं कि यह छोटा सा जीव बिजली की तेज़ी से अपने पंजे को बंद करता है, जिससे एक बुलबुला बनता है. दबाव के कारण यह बुलबुला अंदर की ओर फटता है, जिससे "ज़बरदस्त धमाका" होता है. तापमान लगभग 3,000°C तक पहुंच जाता है और रोशनी की एक चमक भी पैदा होती है.
इस आवाज़ से शिकार सुन्न हो सकता है और सिम्पसन इसे "सबसे अद्भुत सोनिक वेपन" कहते हैं.
सिर्फ़ समुद्री जीव ही आवाज़ नहीं निकालते. तालाब, झील और नदियां भी शोर-शराबे वाली जगहें हो सकती हैं.
कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी में इकोलॉजिस्ट और एकोस्टिशियन डॉ. जैक ग्रीनहाल्घ कहते हैं कि पानी में रहने वाले कीड़े 'स्ट्रिडुलेशन' यानी शरीर के दो कठोर हिस्सों को आपस में रगड़कर आवाज़ पैदा कर सकते हैं.
वह कहते हैं कि मीठे पानी में रहने वाला एक कीड़ा, 'पिग्मी वॉटर बोटमैन' "जानवरों की दुनिया में सबसे तेज़ आवाज़ निकालने में सक्षम है. बेशक यह उसके छोटे शरीर के आकार के हिसाब से है."
लगभग 2 एमएम लंबे इस कीड़े में "अपने लिंग को पेट से रगड़कर" लगभग 100 डेसिबल की आवाज़ निकालने की क्षमता होती है. ग्रीनहाल्घ इस शोर के स्तर की तुलना ऑर्केस्ट्रा कॉन्सर्ट की पहली पंक्ति में बैठने से करते हैं.
शायद सबसे हैरानी की बात यह है कि पानी के अंदर मौजूद पौधे और शैवाल भी प्रकाश संश्लेषण के दौरान आवाज़ निकालते हुए प्रतीत होते हैं.
ग्रीनहाल्घ कहते हैं, "एक समुदाय के तौर पर हमें अभी तक पूरी तरह से पक्का नहीं पता है कि वे ऐसा कैसे करते हैं."
ग्रीनहाल्घ का कहना है कि हो सकता है कि यह उनके छोड़े जाने वाले ऑक्सीजन के बुलबुलों की वजह से हो, जिनसे "इस तरह की अजीब टिक-टिक वाली आवाज़ें" आती हैं, जो जैज़ ड्रमर की याद दिलाती हैं.
पानी के नीचे की आवाज़ों में बदलाव
लेकिन इंसानों का शोर भी पानी के नीचे के साउंडस्केप में योगदान दे सकता है.
ज़र्स्की एक ऐसी रिसर्च का ज़िक्र करती हैं जिसमें 20वीं सदी के दौरान बेलिन व्हेल के कान के मैल (इयरवैक्स) के नमूनों में स्ट्रेस हार्मोन 'कॉर्टिसोल' के लेवल का विश्लेषण किया गया था.
कॉर्टिसोल का लेवल औद्योगिक स्तर पर व्हेल के शिकार के बढ़ने और घटने के साथ-साथ बदलता हुआ दिखाई दिया.
हालांकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब "इंसान एक-दूसरे को मारने में व्यस्त थे और व्हेल का शिकार कम हो गया था," तब भी कॉर्टिसोल का लेवल ज़्यादा था.
ज़र्स्की कहती हैं कि हो सकता है कि व्हेल "समुद्र में लड़ाई की आवाज़, बंदूकों, बमों, डिस्ट्रॉयर जहाज़ों, विमान दुर्घटनाओं और शायद सोनार" की वजह से तनाव में रही हों.
सिम्पसन का कहना है कि बड़ी संख्या में जहाज़ों, मछली पकड़ने वाली नावों और मोटरबोट के साथ-साथ तेल और गैस की ड्रिलिंग जैसी कई ऑफशोर गतिविधियों से "सभी स्तरों पर जानवरों को तनाव" होता है. इससे शिकारियों का पता लगाने से लेकर प्रजनन की सफलता तक की गतिविधियां प्रभावित होती हैं.
ग्रेट बैरियर रीफ़ पर उनकी टीम ने पाया कि रीफ़ के पास नावों की आवाजाही का संबंध "मछलियों के प्रजनन में लगभग 40 फीसदी की कमी" से था. नावों को दूर ले जाने से रीफ़ का शांत वातावरण फिर से बहाल हो गया.
लेकिन यह समझने से कि हम प्राकृतिक साउंडस्केप पर क्या असर डाल रहे हैं, इंसान अपने प्रभाव को कम करने और सकारात्मक बदलाव के लिए आवाज़ों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं.
वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या हवा के बुलबुलों का पर्दा, जिसमें केल्प जैसे प्राकृतिक स्रोतों से निकलने वाले बुलबुले भी शामिल हैं, बंदरगाहों जैसी जगहों पर समुद्री जीवों को शोर-शराबे से बचाने में मदद कर सकता है.
सिम्पसन का कहना है कि जब ब्लीचिंग की वजह से रीफ़ ख़राब हो जाती हैं, तो शोर करने वाले जीव या तो वहां से चले जाते हैं या मर जाते हैं. इससे वहां का शोर का स्तर "लगभग एक-चौथाई" रह जाता है.
"पॉप, क्लिक, गड़गड़ाहट, तुरही जैसी आवाज़ें और टर्र-टर्र जैसी आवाज़ें, सब गायब हो जाती हैं. बस कभी-कभार सुनाई देने वाली उदास सी चटकने की आवाज़ ही बताती है कि कभी यहां कोई रीफ़ हुआ करती थी."
Jerry Xu, a 17-year-old student from Lexington, Massachusetts, has developed an AI model that converts complex protein structures into numerical strings to accelerate biological research, earning him $90,000 in the Regeneron Science Talent Search.
India celebrates National Space Day, marking 60 years of space exploration, from humble beginnings with sounding rockets at Thumba to recent achievements like Chandrayaan-3's lunar landing, highlighting a journey from developmental challenges to scientific frontiers.
John Liu, a Minnesota high school student, developed a method using corn stalk pith and wheat straw to pre-concentrate lithium from dilute brines, earning him state and international science fair awards.
Apollo 15 astronauts discovered green volcanic glass beads on the Moon in 1971, which later revealed evidence of trapped water, challenging the belief that the Moon was extremely dry.
Florida State University researchers found that juvenile bonnethead sharks can use Earth's magnetic field as a navigational map. In lab tests, sharks oriented themselves toward their home range when exposed to magnetic conditions mimicking southern locations.
In 1971, Apollo 15 astronauts discovered green volcanic glass beads on the Moon. Decades later, researchers analyzing these samples detected trapped water, overturning long-held scientific beliefs that the lunar interior was entirely dry.