Backचीन की परमाणु रणनीति: क्या बीजिंग सचमुच 'नो फर्स्ट यूज़' नीति पर कायम है?
चीन की परमाणु रणनीति: क्या बीजिंग सचमुच 'नो फर्स्ट यूज़' नीति पर कायम है?
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BBC हिंदी6/30/2026World6 min readIndia

चीन की परमाणु रणनीति: क्या बीजिंग सचमुच 'नो फर्स्ट यूज़' नीति पर कायम है?

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चीन अपनी परमाणु नीति को आत्मरक्षा के लिए बताता है और 'नो फर्स्ट यूज़' पर ज़ोर देता है, लेकिन पश्चिमी विशेषज्ञ उसकी बढ़ती क्षमता और अपारदर्शिता पर चिंता जताते हैं.

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टॉम लैम

बीबीसी मॉनिटरिंग

29 जून 2026

चीन अपने परमाणु हथियारों के भंडार और उनकी रणनीति को लेकर बहुत अपारदर्शी रहा है.

उसका आधिकारिक रुख़ यह है कि उसकी परमाणु नीति मुख्य रूप से आत्मरक्षा के लिए है. वह लगातार अपनी "नो फर्स्ट यूज़" यानी पहले परमाणु हमला न करने की नीति पर ज़ोर देता आया है.

लेकिन साथ ही, वह त्रिपक्षीय परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता में अमेरिका और रूस के साथ शामिल होने की मांग को भी ठुकराता रहा है.

पश्चिमी देशों के विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में चीन ने अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाया है.

उनके आकलन के अनुसार, 2023 से 2025 के बीच चीन हर साल लगभग 100 नए परमाणु हथियार (वॉरहेड) जोड़ रहा था. हालांकि पिछले एक साल में यह बढ़ोतरी घटकर करीब 20 रह गई है.

हम चीन की परमाणु रणनीति की समीक्षा कर रहे हैं, यह दो लेखों की एक श्रृंखला है. आप इसका पहला भाग पढ़ रहे हैं.

पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपने मिसाइल साइलो सिस्टम को भी काफ़ी मजबूत किया है.

इसका मकसद उसके "सेकेंड स्ट्राइक" यानी जवाबी परमाणु हमले की क्षमता को बेहतर बनाना है.

बता दें कि मिसाइल साइलो का मतलब ऐसी मिसाइल प्रक्षेपण सुविधा से है जो जमीन के अंदर बनी होती है.

इसका इस्तेमाल अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों, मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों, या मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के स्टोरेज और प्रक्षेपण के लिए किया जाता है.

बीजिंग ने अपनी परमाणु ताक़त को दिखाने में भी हिचक़ नहीं दिखाई है. 2024 में उसने बिना हथियार वाली एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल प्रशांत महासागर में दागी थी.

इसके अलावा, 2025 में द्वितीय विश्व युद्ध की जीत की वर्षगांठ पर आयोजित परेड में उसने पहली बार अपनी "न्यूक्लियर ट्रायड" को दिखाया.

इसमें ज़मीन, समुद्र और हवा से परमाणु हथियार ले जाने वाली प्रणालियां शामिल होती हैं.

बीजिंग अपने परमाणु हथियारों के भंडार के बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं करता है.

उसका आधिकारिक रूप से कहना है कि उसकी परमाणु नीति "स्थिर, सुसंगत और व्यावहारिक" है. वह इसे मुख्य रूप से आत्मरक्षा के लिए जरूरी बताता है.

चीन का यह भी दावा है कि उसने अपने परमाणु हथियारों को हमेशा न्यूनतम स्तर पर रखा है. यानी उतना ही जितना उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी है.

वह यह भी ज़ोर देकर कहता है कि वह कभी परमाणु हथियारों की दौड़ में हिस्सा नहीं लिया. उसका कहना है कि वह वैश्विक रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता रहा है.

चीन इन आरोपों को भी ख़ारिज़ करता है कि वह तेजी से अपने परमाणु हथियार बढ़ा रहा है. वह इन्हें "बेबुनियाद अटकलें और प्रचार" बताता है.

चीन अपनी "नो फर्स्ट यूज़" यानी एनएफयू पॉलिसी का भी लगातार प्रचार करता है.

2024 में उसने परमाणु हथियारों के "नो फर्स्ट यूज़" (एनएफयू) से जुड़ी पहल भी पेश की थी. उसने इसे परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) को लागू करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम बताया.

चीन ने अन्य परमाणु शक्तियों से भी अपील की कि वे भी एनएफयू पॉलिसी अपनाएं. साथ ही उसने यह प्रस्ताव भी रखा कि ऐसे देश एक समझौता करें, जिसके तहत तय हो कि वे ग़ैर-परमाणु देशों के ख़िलाफ़ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे और न ही इसकी धमकी देंगे.

इसके बावजूद, बीजिंग ने बार-बार अमेरिका के उस प्रस्ताव को ठुकराया है जिसमें उसे वॉशिंगटन और मॉस्को के साथ त्रिपक्षीय हथियार नियंत्रण वार्ता में शामिल होने के लिए कहा गया था.

यह मांग उस समय और बढ़ गई जब अमेरिका और रूस के बीच नई स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (स्टार्ट) फरवरी में समाप्त हो गई.

चीन के अधिकारियों ने इन मांगों को "अनुचित, गैर-ज़रूरी और अव्यावहारिक" बताया है.

उनका कहना है कि दुनिया के ज़्यादातर परमाणु हथियार अमेरिका और रूस के पास हैं. इसलिए निरस्त्रीकरण की मुख्य जिम्मेदारी भी इन्हीं दोनों देशों की है.

चीन के गोपनीयता रखने के बावजूद, पश्चिमी विशेषज्ञों ने हाल के वर्षों में उसकी परमाणु क्षमता में तेज़ आधुनिकीकरण देखा है.

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संगठन सिपरी की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 तक चीन के पास करीब 620 परमाणु वॉरहेड थे. यह संख्या पिछले साल 600 थी.

सिपरी के मुताबिक, चीन ने 2023 से 2024 के बीच अपने भंडार में 90 वॉरहेड बढ़ाए. इसके बाद 2024 से 2025 के बीच इसमें 100 की बढ़ोतरी हुई.

यह पिछले दस सालों में सबसे तेज़ बढ़ोतरी थी. हालांकि अब इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ गई है.

अमेरिका के रक्षा विभाग की 2024 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2030 तक चीन के परमाणु वॉरहेड 1000 से ज्यादा हो सकते हैं.

2022 की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2035 तक यह संख्या 1500 तक पहुंच सकती है. लेकिन 2024 की रिपोर्ट में इस अनुमान को शामिल नहीं किया गया.

सिपरी ने यह भी बताया कि अगर 2030 तक चीन के पास 1000 से ज्यादा वॉरहेड हो जाते हैं, तब भी यह संख्या अमेरिका और रूस के मौजूदा परमाणु भंडार का सिर्फ लगभग एक-चौथाई ही होगी.

इसके बावजूद, सिपरी ने यह चिंता जताई है कि चीन ने देश के उत्तरी हिस्से में तीन बड़े साइलो क्षेत्रों में सैकड़ों मिसाइलें तैनात की हैं. साथ ही, पूर्वी पहाड़ी इलाकों में करीब 30 नए साइलो बनाने का काम जारी है.

मई में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में बताया गया कि चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र शिनजियांग के रेगिस्तान में बड़े पैमाने पर ढांचा तैयार किया गया है.

यहां 80 से ज़्यादा लॉन्च पैड, मजबूत बंकर और अष्टकोण आकार के कमांड सेंटर बनाए गए हैं.

इन तैयारियों का मक़सद साइलो आधारित और मोबाइल, दोनों तरह की मिसाइलों को सपोर्ट करना है. यह चीन की जवाबी परमाणु हमले यानी "सेकेंड स्ट्राइक" क्षमता को काफ़ी मजबूत करने का संकेत देता है.

हालांकि चीन का सरकारी मीडिया पश्चिमी आंकड़ों पर अक्सर टिप्पणी नहीं करता, लेकिन हाल के वर्षों में बीजिंग ने अपनी परमाणु क्षमता को खुलकर दिखाया है.

उदाहरण के तौर पर, 2024 में चीन ने एक बिना हथियार वाला अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल प्रशांत महासागर में दागा. 1980 के बाद पहली बार ऐसा किया गया.

हालांकि चीन के रक्षा मंत्रालय ने इस पर बहुत कम जानकारी दी. लेकिन चीनी मीडिया ने बताया कि डीएफ़-31एजी मिसाइल ने हवाई द्वीप से दक्षिण-पूर्व में 2000 किलोमीटर दूर तय लक्ष्य को निशाना बनाया.

इस मिसाइल ने कुल 12,000 किलोमीटर की दूरी तय की.

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि इसकी मारक क्षमता इतनी है कि यह दक्षिणी ध्रुव, पूरे यूरोप और अमेरिका के पश्चिमी तट के बड़े शहरों तक पहुंच सकती है.

चीन के सैन्य विशेषज्ञ डू वेनलॉन्ग ने कहा कि यह परीक्षण एक रणनीतिक संदेश देने के लिए था. इसका मक़सद यह दिखाना था कि चीन के पास मजबूत लॉजिस्टिक और मैपिंग क्षमता है.

विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि चीन को भरोसा है कि उसकी मिसाइलें किसी भी हवाई रक्षा और एंटी-मिसाइल सिस्टम को भेद सकती हैं.

वहीं, ताइवान के सैन्य विश्लेषकों ने इस परीक्षण को एक अलग संदर्भ में देखा. उनका कहना था कि यह परीक्षण उस समय हुआ, जब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान चल रहा था.

इस ट्रायड में हवा, समुद्र और ज़मीन से लॉन्च होने वाली परमाणु मिसाइलें शामिल थीं.

इसमें जेएल सीरीज की मिसाइलें, पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल (एक से दूसरे महाद्वीप तक पहुंच वाली), और डीएफ़-31 तथा डीएफ़ -61 जैसी जमीन आधारित मिसाइलें शामिल हैं.

इसके अलावा, डीएफ़-5C नाम की नई तरल ईंधन वाली इंटरकॉन्टिनेंटल परमाणु मिसाइल भी दिखाई गई, जिसकी मारक क्षमता पूरी दुनिया तक बताई जाती है.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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