मनोरमा नदी: पीएम मोदी ने की सफ़ाई की सराहना, लेकिन ज़मीनी हकीकत चिंताजनक
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प्रधानमंत्री मोदी ने 'मन की बात' में बस्ती के आकाश गुप्ता और उनके साथियों द्वारा मनोरमा नदी की सफ़ाई के प्रयासों की सराहना की। हालांकि, बीबीसी की पड़ताल में नदी का अधिकांश हिस्सा प्रदूषित, सूखा और जलकुंभी से ढका पाया गया, जिससे स्थानीय जीवन और पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ रहा है।
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Why It Matters
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में बस्ती ज़िले में मनोरमा नदी की सफ़ाई के प्रयासों की सराहना की, जिसे आकाश गुप्ता और उनके साथियों ने शुरू किया था। हालांकि, बीबीसी की पड़ताल में नदी की वास्तविक स्थिति चिंताजनक पाई गई, जिसमें प्रदूषण, जलकुंभी और बहाव की कमी प्रमुख समस्याएं हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मई को अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में मनोरमा नदी की सफ़ाई करने वाले युवकों का ज़िक्र करते हुए उनके काम को पर्यावरण संरक्षण की एक प्रेरक मिसाल बताया।
पीएम मोदी ने कहा, "श्रीमान आकाश ने तय किया शिकायत नहीं एक नई शुरुआत करेंगे।"
मनोरमा नदी के किनारे बसे लजघटा गांव के एक युवक आकाश गुप्ता लगभग दो महीने से अपने छह साथियों के साथ नदी की सफ़ाई कर रहे हैं और रोज़ रील्स बनाकर सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर कर रहे हैं।
उनका वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुंच रहा है। उन्हें कुछ लोग आर्थिक और नदी साफ़ करने वाले उपकरण देकर मदद भी कर रहे हैं।
उनका कहना है कि नदी सफ़ाई की एक रील काफ़ी वायरल हो गई जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके काम की सराहना की।
बीबीसी की टीम जब लजघटा गांव में पहुंची तो पाया कि मनोरमा नदी लगभग दो सौ मीटर साफ़ नज़र आती है। लेकिन अहम सवाल है कि लगभग 115 किलोमीटर लंबी मनोरमा नदी के बाकी हिस्से की तस्वीर कैसी है?
बीबीसी की टीम ने मनोरमा नदी के उद्गम से विलय तक की यात्रा कर उसका हाल देखा तो तस्वीर काफ़ी चिंताजनक नज़र आई। मनोरमा के एक बड़े हिस्से में पानी नहीं है और जहां पानी है वहां बहाव नहीं है। कई जगह पानी काला पड़ गया है और नदी के किनारे पानी से उठने वाली दुर्गंध महसूस की जा सकती है।
जबकि स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ साल पहले तक मनोरमा नदी गोंडा और बस्ती ज़िले के हज़ारों गांवों के जीवनयापन का अहम हिस्सा रही है।
मखौड़ा निवासी संजय पांडे ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम बचपन में मनोरमा नदी में स्नान करते थे। अपने जानवरों को नदी में पानी पिलाने और उन्हें नहलाने लाते थे। तब पानी का बहाव काफ़ी तेज़ था लेकिन आज मनोरमा विषम परिस्थितियों से जूझ रही है। अपने आपको बचाने के लिए लड़ रही है। जो मनोरमा सबकी मनोकामना पूरी करती है आज उनकी मनोकामना पूरी करने वाला कोई नहीं है।"
उन्होंने व्यथित होकर कहा, "जिस मनोरमा में हम कभी डुबकी लगाते थे और जिसमें तैरना सीखा आज वही मनोरमा हम पैदल पार कर लेते हैं और पैर सूखे रहते हैं।"
दो ज़िलों से गुज़रने वाली मनोरमा कितनी महत्वपूर्ण?
मनोरमा को साफ़ करने की बात समय-समय पर होती रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2019 में मनोरमा नदी की सफ़ाई परियोजना की शुरुआत की थी।
जिसके बाद तत्कालीन ज़िलाधिकारी राजशेखर ने अपने बेटे के साथ नदी में उतर कर सफ़ाई अभियान को आगे बढ़ाया था।
लेकिन मनोरमा नदी की स्थिति में आज भी ख़ास परिवर्तन नज़र नहीं आता है।
मनोरमा नदी गोंडा ज़िले के तिर्रेमनोरमा गांव में तिर्रे ताल से निकल कर लगभग 115 किलोमीटर की लंबी यात्रा कर बस्ती में कुआनो नदी में मिलती है। कुआनो गोरखपुर में घाघरा (सरयू) नदी में मिलती है।
मनोरमा का विशेष पौराणिक महत्व है। इसके उद्गम स्थल से लेकर कुआनो नदी में विलय तक इसके तट पर अनेक धार्मिक स्थल और मंदिर स्थित हैं। इनमें मखौड़ा धाम सबसे प्रमुख और चर्चित धार्मिक स्थल है।
लेकिन मखौड़ा धाम में भी नदी का पानी काला पड़ चुका है और जल कुम्भी ने नदी को ढक लिया है। रुके हुए पानी में तेज़ गति से फैलने वाले इस जलीय खरपतवार ने पूरी मनोरमा को अपनी ज़द में ले लिया है।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय में लैब सहायक परासर पाण्डेय मानते हैं कि जल कुम्भी ने नदी के बहाव को रोक दिया है, हर्रैया नगर पंचायत का मानव जनित अपशिष्ट और मखौड़ा धाम में पूजा सामग्री नदी में प्रवाहित होने के कारण मनोरमा नदी प्रभावित होती है।
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हम मनोरमा नदी के पानी की गुणवत्ता की जांच मासिक आधर पर करते रहते हैं। मनोरमा के ऊपरी हिस्से के पानी में घुलित ऑक्सीजन 8.39 और निचले हिस्से में 8.24 मिलीग्राम प्रति लीटर है। जो जलीय जीवों और नहाने के लिए उपयुक्त है। हमारे अध्ययन में बीओडी और सीओडी मानक के अनुरूप ही हैं। लेकिन मनोरमा का पानी पीने योग्य नहीं है।"
मनोरमा गोंडा और बस्ती ज़िले के सैकड़ों गांवों से होकर गुज़रती है। इसके किनारे बसे गांवों के लिए मनोरमा धार्मिक, सांस्कृतिक, कृषि, आजीविका और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रही है।
मनोरमा के उद्गमस्थल तिर्रेमनोरमा गांव के निवासी अयोध्या सिंह बीबीसी हिंदी को बताते हैं, "माना जाता है कि काशी में गंगा नहाने से पाप कर्म समाप्त हो जाता है लेकिन यहां कहावत है, 'मन कय पाप कटै मनोरामा' यानी मनोरमा में नहाने से मन का पाप क्षीण हो जाता है।"
"यहां कार्तिक पूर्णिमा, संगम नहान, प्रयागराज, भदई गंगा और चैत रामनवमी नहावन होता है। कार्तिक नहावन में बहुत बड़ा मेला लगता है। एक हफ्ते पहले से लोग यहां अपनी-अपनी जगह चिन्हित कर लेते हैं। लगभग तीस हज़ार लोग तिर्रे ताल में नहाते हैं। चारों तरफ बड़े-बड़े झूले लगे होते हैं, यहां बैठने की जगह नहीं मिलती है। लेकिन आज जब मनोरमा का प्रवाह थम चुका है और जल कुम्भी, गाद व अतिक्रमण ने नदी का स्वरूप बदल दिया है, तब इसके किनारे रहने वाले लोगों की चिंताएं बढ़ गई हैं।"
लजघटा निवासी शीतला प्रसाद तिवारी का घर मनोरमा नदी के ठीक किनारे पर है। उन्होंने अपना बचपन, युवावस्था और अधेड़ उम्र का बड़ा हिस्सा मनोरमा नदी के किनारे खेलते-कूदते और उससे अपनी ज़रूरतें पूरी करते हुए बिताया है।
लेकिन नदी की वर्तमान स्थिति देख कर उनके माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ नज़र आती हैं।
शीतला प्रसाद तिवारी बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "जिन्होंने मनोरमा की तरुणाई को देखा है और उसका लाभ लिया है वे इसके होने का महत्व समझ सकते हैं। हमें यह लगता है कि मनोरमा का अस्तित्व ख़त्म होने से बहुत कुछ ख़त्म हो जाएगा।"
इतना बोलने के बाद शीतला प्रसाद कुछ समय के लिए शांत हो जाते हैं और मनोरमा को निहारने लगते हैं।
फिर खुद को संभालते हुए उन्होंने कहा, "कुदरत ने हमारे बगल में मनोरमा को दिया है, जिसे बनाया नहीं जा सकता है। नदी कोई बनाता नहीं है। यह नदी सदियों पुरानी है जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं। हम तो सिर्फ उसके लाभ और महत्व को जानते हैं, जो बुज़ुर्गों ने हमें बताया है।"
"हमें नहीं पता नई पीढ़ी जो इसके किनारे नहीं गई वह इसका कितना महत्व समझती है। लेकिन जो इसमें नहाया है, इसका पानी पिया है और खेत की सिंचाई की है उनके लिए नदी की हालत देख कर चिंतित होना स्वाभाविक है।"
पीएम मोदी ने जिन आकाश गुप्ता का ज़िक्र 'मन की बात' में किया था, वो बीबीसी से कहते हैं, "हमारे गांव का नाम लजघटा है। गर्मियों में लाइट की दिक्कत रहती थी। गांव के लोग और हम लोग यहां पीपल के नीचे आकर बैठते थे। देखते थे कि इसमें कचड़ा भरा पड़ा है। पूजा पाठ का सामान भरा पड़ा है। इतनी ज्यादा गंदगी थी कि इसमें कोई नहाने वाला नहीं था। हम लोगों ने सोचा अगर सरकार के भरोसे बैठेंगे तो बहुत समय लग जायेगा। पता नहीं कब नदी साफ होगी और कब बजट पास होगा। तो हम लोगों ने सोचा इसको साफ करने की एक मुहिम शुरू की जाए।"
मनोरमा के किनारे बदलती ज़िंदगी
जो मनोरमा नदी कुछ साल पहले तक कई गांवों के लिए जीवनधारा थी अब वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है।
ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि मनोरमा नदी के बदहाल होने का उसके आसपास के जनजीवन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है क्योंकि घरों में पानी के लिए हैंडपंप और सबमर्सिबल पंप है। खेती की सिंचाई भी अब बोरिंग पर निर्भर हो चुकी है।
लेकिन नज़दीक से देखने पर पता चलता है कि नदी के क्षरण का असर भूजल स्तर, जलीय जीव-जंतुओं और मछली पालन व व्यापार पर पड़ रहा है।
मनोरमा किनारे थरूवापुर निवासी राजकुमार निषाद बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "हमारी जानकारी में मनोरमा नदी बहुत बढ़िया बहती थी। नदी साफ़-सुथरी थी। घाट बने थे जहां लोग हमेशा नहाते मिल जाते थे। अब नदी एकदम नाला टाइप हो गई है। इस नदी की स्थिति काफी बिगड़ गई है।"
उन्होंने बताया, "पहले नदी में शिकार कर मछली बेचते थे तो दिनभर का दो-चार सौ की कमाई हो जाती थी लेकिन अब बेचने की बात छोड़िए खाने के लिए तालाब से खरीद कर लाते हैं। अब कहीं से गंदा पानी छोड़ दिया जाता है सब मछलियां मर जाती हैं। मनोरमा में रोहू, भाकुर, कुर्सा, टेंगना, सींगी, बाम और मोय जैसी देसी मछलियां रहती थीं अब तो ये मछलियां दिखती ही नहीं हैं।"
गुनगा देवी की शादी कम उम्र में ही थरूवापुर गांव में हो गई थी। उन्होंने बताया उनके माता-पिता ने मनोरमा नदी को देख कर ही उनकी शादी इस गांव में की थी।
वह कहती हैं, "पहले घर पर खाना खाते थे और बर्तन नदी में साफ़ करते थे। नदी में नहाते थे, कपड़े धुलते थे और गाय-भैंस को नहलाया जाता था लेकिन अब नदी नाला हो गई है। अब सारा काम नल से होता है। अब नदी में कोई नहीं नहाता है क्योंकि गंदे पानी में नहाने से खुजली हो जाएगी।"
उन्होंने अपनी शादी का ज़िक्र करते हुए मनोरमा का महत्व बताया, "जब हमारी शादी हुई थी मैं बहुत छोटी थी। जब यहां आई तो देखा मनोरमा बहुत सुंदर थी। इसमें बहुत साफ़ पानी होता था। इसी मनोरमा को देख कर ही मेरे मां-बाप शादी कर दिए थे, क्योंकि वह सोचते थे गांव के बगल से नदी जा रही है कभी खाने-कमाने की दिक्कत नहीं होगी।"
"लेकिन उनको क्या पता था कि एक दिन मनोरमा सूख जाएगी? मेरे पति पहले मनोरमा में घाट उतराई और मछली मार कर जीवनयापन करते थे।"
पहले बारह मासी अब बरसाती
बीबीसी हिंदी की टीम जब मनोरमा के उद्गम स्थल गोंडा ज़िले के तिर्रे ताल, नदी का हाल जानने पहुंची तो पाया कि जहां मनोरमा के उद्गम स्थल होने की बात की जा रही है वहां नदी का कोई स्वरूप नज़र नहीं आता है।
तिर्रे ताल से एक पतली नाली नुमा स्वरूप नज़र आता है लेकिन उससे ताल का पानी नहीं बल्कि ट्यूबवेल का पानी ताल में आ रहा था।
ग्रामीण जहां मनोरमा नदी होने की बात कर रहे थे वहां किसान गन्ने और गेहूं की खेती कर रहे हैं। उनके समतल और उपजाऊ खेत मौजूद हैं। तिर्रे ताल से दो किलोमीटर दूर ताड़ी ताल से नहरनुमा नदी नज़र आती है, जिसकी खुदाई हाल ही में प्रशासन ने कराई है।
अवधेश सिंह ने बीबीसी को बताया, "जहां नदी थी चकबंदी में वहां सबके नाम चक हो गया है। गांव के लोग वहां खेती कर रहे हैं। मनोरमा नदी सिर्फ़ बारिश में नज़र आती है। अगर नदी को स्वरूप में लाना है तो सरकार को किसानों से ज़मीन लेना होगी और उसकी खुदाई करके नदी का स्वरूप दिया जा सकता है "
इतना ही नहीं, जहां नदी के होने का अस्तित्व बताया जाता है वहां खेतों के बीच से सड़कें बना दी गई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार बारिश में सड़कों के ऊपर से पानी बहता है। कई बार सड़कें भी पानी के साथ बह जाती हैं।
हमारी मुलाकात रामपुर गांव में नदी के किनारे पेड़ के नीचे बैठकर चर्चा कर रहे कुछ ग्रामीणों से हुई। सबने एक स्वर में नदी की बदहाल होती स्थिति पर दुख जताया।
उन्हीं में से एक कृष्णमणि मिश्रा ने बीबीसी से कहा, "हम लोगों के लिए यह नदी जीवनरेखा है। हम लोगों के पशु, पक्षी, खेत-खलिहान सब इसी से हैं। बीस साल पहले इस नदी का पानी खत्म नहीं हुआ लेकिन आज यह इतना बर्बाद हो गई कि यह तालाब है। यह कोई बरसाती नदी नहीं थी लेकिन अब इसमें पानी सिर्फ बरसात में ही नज़र आता है।"
"पहले यहां दस-बीस गांव के लोग नहाते-धोते थे। तब और आज में ज़मीन-आसमान का फर्क है। इस नदी से ज्यादा सुंदर हमारे जीवन में कुछ था ही नहीं। इस नदी को बर्बाद करने का श्रेय यहां के ज़िम्मेवार नेताओं और अधिकारियों को जाता है।"
लैब सहायक परासर पाण्डेय मनोरमा को बरसाती नदी बताते हैं।
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "एक तरह से यह बरसाती नदी के रूप में जानी जाती है। बरसात के महीनों में नदी अच्छी तरह बहती है लेकिन अन्य माह में नदी का बहाव कम रहता है। गहराई कम होने के कारण नीचे से पानी का स्रोत नहीं है।"
वह आगे कहते हैं, "बस्ती जनपद में मनोरमा के किनारे कोई औद्योगिक एक्टिविटी नहीं हो रही है लेकिन हर्रैया नगर पंचायत में मानव जनित अपशिष्ट जाने से नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। वहां सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की आवश्यकता है, हमने वहां के लिए एसटीपी की मांग की है लेकिन अभी वह लंबित है।"
वाटर शेड इकोलॉजी एंड द एन्वायर्नमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मनोरमा के आलावा अन्य मौसमी नदियों की स्थिति बेहतर नहीं है।
अध्ययन में पाया गया, "भारत में नदी पुनर्जीवन के प्रयास मुख्यतः बड़ी नदियों पर केन्द्रित हैं लेकिन अब तक इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। इसका प्रमुख कारण है कि नदी बेसिन में होने वाली मानवीय गतिविधियां अत्यधिक विविध और असमान रूप से वितरित होती हैं।"
वहीं रिवर रेस्टोरेशन एंड कंज़र्वेशन (2019) रिपोर्ट के अनुसार, "बड़ी नदी प्रणालियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए छोटी नदियों के संरक्षण और उनके पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखना अति आवश्यक है। छोटी नदियाँ जल पोषक तत्त्वों की आपूर्ति के साथ-साथ मुख्य नदी धारा में महत्वपूर्ण जैव विविधता भी प्रदान करती हैं।"
'पूरे वाटर इको सिस्टम पर संकट है'
'नदी पुनर्जीवन और नदियों के अधिकार: भारत में उभरते विमर्श' किताब की सह-लेखिका रुचि श्री छोटी नदियों के संकट को केवल छोटी नदियों का नहीं बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का संकट मानती हैं।
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "हम बहुत सारी छोटी नदियों को नाला कहने लगे हैं। बनारस में अस्सी, वरुणा और भागलपुर में चंपा पहले नदी हुआ करती थीं लेकिन अब नाला हैं। हम छोटी नदियों पर ज़्यादा बात नहीं करते हैं। योजनाएं भी बड़ी नदियों पर ज़्यादा होती हैं।"
मनोरमा सफ़ाई अभियान चलाने वाले बीजेपी नेता ने क्या बताया?
स्थानीय भाजपा नेता चंद्रमणि पाण्डेय पिछले डेढ़ दशक से मनोरमा सफ़ाई का अभियान चला रहे हैं। उन्होंने मनोरमा नदी की ख़राब स्थिति को लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। हालांकि उस याचिका को अदालत ने ख़ारिज कर दिया था।
चंद्रमणि पाण्डेय ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मैं 2011 से मनोरमा सफ़ाई का अभियान चला रहा हूं। मनोरमा नदी को बचाने के लिए मेरे ज़ेहन में कोई ऐसा उपाय नहीं आया, जो हमने न अपनाया हो। मनोरमा नदी की दुर्दशा का मुख्य कारण अधिकारियों की कार्य शिथिलता है।"
"इस सरकार में अमृत सरोवर से लेकर तालाबों और नदियों के लिए पैसा आ रहा है लेकिन फिर भी नदियां साफ़ नहीं हो रही हैं। अगर आंकड़े खंगाले जाएं तो पता चलेगा हर साल नरेगा के तहत नदियों की सफ़ाई होती है और उसका पैसा खर्च होता है लेकिन नदियों की हालत जस की तस बनी हुई है। मैंने ज़िलाधिकारी से भी कई बार कहा कि नदी सफ़ाई में जो दिक्कत आ रही है उसे बता दीजिए, हम इसके लिए सरकार से मांग करेंगे लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।"
वहीं बस्ती ज़िलाधिकारी कृतिका ज्योत्स्ना ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा कि मनोरमा नदी को लेकर हमारे पास कोई योजना नहीं है।
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "मनोरमा को लेकर ऊपर से कोई आदेश या बजट आवंटित नहीं हुआ है तो हम कुछ कह नहीं सकते हैं। इस सन्दर्भ में जनप्रतिनिधि ही कुछ कह सकते हैं। अभी हमारे पास इस नदी को लेकर कोई योजना नहीं है।"
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हर्रैया नगर पंचायत में सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की स्थापना की मांग पर विचार किया जाएगा।
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- मनोरमा नदी के पुनर्जीवन के लिए सरकार की भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
- एसटीपी की मांग लंबित क्यों है और इसे कब तक पूरा किया जाएगा?
- नरेगा के तहत नदी सफ़ाई के लिए आवंटित धन का उपयोग कैसे हो रहा है?

