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सुमन कल्याणपुर का निधन: हिंदी पार्श्व गायन के एक सुनहरे दौर का अंत
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BBC हिंदी6/1/2026Culture5 min readIndia

सुमन कल्याणपुर का निधन: हिंदी पार्श्व गायन के एक सुनहरे दौर का अंत

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प्रतिष्ठित गायिका सुमन कल्याणपुर का निधन हिंदी पार्श्व गायन के एक सुनहरे युग के अंत का प्रतीक है। लता मंगेशकर से तुलना ने उन्हें पहचान दिलाई लेकिन अलग मुकाम हासिल करने से रोका।

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Author, यतीन्द्र मिश्र

पदनाम, संगीत समीक्षक, बीबीसी हिन्दी के लिए

प्रकाशित 19 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

हिन्दी फ़िल्म पार्श्व गायन की दुनिया लगातार सिमटती जा रही है.

अभी आशा भोसले को गये कुछ ही दिन बीते हैं और अब 31 मई को उसी दौर की प्रतिष्ठित गायिका सुमन कल्याणपुर का निधन- जैसे पिछली सदी के सुनहरे दौर वाले संगीत का लगभग समाप्त हो जाने सरीखा मामला बन गया है.

आज ग़ौर से याद करें, तो एकमात्र सुधा मल्होत्रा ही बची हैं, जिनके अलावा उस दौर की गायिकी का सदाबहार दृश्य पटल लगभग ओझल हो चुका है.

ब्रिटिशकालीन भारत के दौर में ढाका में जन्मीं सुमन कल्याणपुर के पिता 1943 में जब बंबई (आज मुंबई) आकर बसे, तब वहीं से छोटी सी उम्र में उनकी संगीत की तालीम शुरू हुई.

सुमन कल्याणपुर ने यह स्वीकारा भी किया था कि बचपन का संगीत रुझान बाद में उन्हें बाक़ायदा इस क्षेत्र में सीखने की ओर ले आया, जिसका नतीजा यह रहा कि उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान ख़ाँ और नवरंग मास्टर, जिनका पूरा नाम वामनराव सादोलिकर (शास्त्रीय गायिका श्रुति सादोलिकर के पिता) था, से संगीत सीखा.

1952 में उनका बाक़ायदा गायन का सफ़र शुरू हुआ और 1953 में स्टंट फ़िल्मों के महारथी कलाकार शेख मुख़्तार ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'मंगू' में गायन का मौक़ा दिया. इस फ़िल्म को पहले मोहम्मद शफ़ी संगीतबद्ध कर रहे थे, जिनकी जगह बाद में ओ.पी. नैय्यर ने ली.

पहली ही फ़िल्म से हटाए गए दो गाने

क़िस्मत का खेल देखिए, पहली ही फ़िल्म में तीन गाने पा चुकीं सुमन कल्याणपुर के दो गाने नैय्यर ने फ़िल्म से हटा दिए और मात्र एक लोरी गीत 'कोई पुकारे तुझे धीरे से' ही फ़िल्म में रखा.

उनकी इस हरकत से सुमन कल्याणपुर दुखी हुईं और बाद में जब 'आर-पार' के लिए भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नैय्यर ने नहीं दिया, तब वो पूरी तरह नैय्यर की फ़िल्मों में गाने से विमुख हो गयीं.

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नियति का खेल, बड़ी सी बड़ी कला को आसमान पर पहुँचा देता है और दूसरी तरफ़ अत्यधिक श्रेष्ठ कलावन्त को उभरने का मौक़ा तक नहीं देता.

सुमन कल्याणपुर इन दोनों ही परिस्थितियों के बीच फँसी हुई पार्श्व गायिका थीं. उनकी आवाज़ की लता मंगेशकर से तुलना, जहाँ उन्हें तुरन्त परिदृश्य पर विमर्श के लिए ले आया, वहीं उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनकर भी उभरा.

उनकी मधुरता में लता मंगेशकर की आवाज़ से साम्य ने उनको पहचान दिलाने और स्थापित होने के बाद भी हमेशा पीछे ही रखा.

लता मंगेशकर से तुलना

शायद वो अपनी अलग राह बनातीं, तो आशा भोसले और गीता दत्त की तरह का मुकाम उन्हें ज़रूर मिलता.

इस बात की इसी तथ्य से पुष्टि की जा सकती है कि लता-रफ़ी मनमुटाव के बाद उनके हिस्से आये रफ़ी साहब के साथ युगल गीत, बाद में मिलने एकदम बंद हो गए, जब लता मंगेशकर और रफ़ी विवाद निपट गया. बाद में फिर उस तरह से उनको गायिकी के स्तरीय मौके कम मिले.

यह देखना अचम्भित करता है, कई बार रेडियो के प्रसारण में मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर के गीतों की सूचना देने में उद्घोषक ग़लती से यह कह जाते थे कि अब ये जो गीत आप सुन रहे हैं, वह लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में है. ...और थोड़ी देर बाद ही, भूल सुधार की तरह यह आवाज़ गूँजती थी- 'हमें खेद है कि पीछे सुने गये इस गीत को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने नहीं, बल्कि मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने आवाज़ दी है.'

लता को किस बात का अफ़सोस

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बहुत सारे लोग इस तरह की घटनाओं से वाकिफ़ होंगे, जिन्होंने रेडियो पर विशेष जयमाला, विविध भारती और भूले-बिसरे गीत, छाया गीत जैसे कार्यक्रमों में न जाने कितनी बार उन गीतों को सुना होगा.

आज जब वो नहीं हैं, तो यह सोचकर सिहरन होती है कि उनके खाते में आई हुई ख्याति भी अकसर धूमिल हो जाती थी, जब उनकी आवाज़ को लता जी की आवाज़ मान लिया जाता था. वो कैसे इसे बर्दाश्त कर पाती होंगी, आज सोच पाना मुश्किल है.

हालाँकि फ़िल्मी हल्कों में प्रचलित तमाम विवादों और गॉसिप से अलग सुमन कल्याणपुर की उपस्थिति बेहद सादगी भरी और विश्वसनीय रही.

मैंने जब लता मंगेशकर पर 'लता: सुर-गाथा' किताब लिखी, तो उस दौरान सुमन जी पर उनसे बहुत बातें हुई थीं. लता जी स्वयं उनके बारे में क्या सोचती थीं, यह किताब में दर्ज है, उसकी कुछ पंक्तियाँ उन्हीं की ज़ुबानी यहाँ लिख रहा हूँ-

"उसके कई गानों से तो ऐसा ही लगता था, जैसे लता ही गा रही हों. वह लड़की बहुत अच्छी थी, मतलब इसमें कोई शक नहीं कि वह सुरीली थी और भली महिला थी. बाद में जाकर उसका संगीत इसलिए ख़ारिज हो गया, क्योंकि उसकी आवाज़ मेरी जैसी लगती थी. मुझे इस बात का अफ़सोस है कि उसकी आवाज़ अच्छी थी, लेकिन उसे निखारने और अलग तरीक़े से डेवलप करने के लिए उसने ध्यान नहीं दिया. सुमन कल्याणपुर ऐसा कर पातीं, तो निश्चित ही उनका एक बड़ा और अलग मुकाम बनता."

यह स्वीकारोक्ति बहस तलब हो सकती है, अपने-अपने ढंग से.लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर के प्रशंसक इसकी विवेचना कर सकते हैं. मगर, जो बात मुझे इसमें सबसे काम की लगती है, वह यह कि सुरों के शिखर पर बैठी हुई लता मंगेशकर जैसी पार्श्व गायिका भी यह मानने से नहीं हिचकतीं कि उनकी आवाज़ और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ लगभग एक सी थी.

सुमन कल्याणपुर के लिए इससे बड़ा कॉम्पलीमेंट कुछ नहीं हो सकता कि इतनी बड़ी पार्श्व गायिका को उनकी आवाज़ में अपनी छाया दिखे और इस बात से वो चिंतित हों.

जो हम पे गुज़रती है...

फिर भी इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि सुमन कल्याणपुर लाजवाब ढंग से सुरीली पार्श्व गायिका थीं.

कर्णप्रिय और रागदारी को समझ से बरतने वाली ऐसी आवाज़, जिन्होंने लता मंगेशकर और आशा भोसले के समानान्तर धीमी गति से अपने पार्श्व गायन की शानदार यात्रा जारी रखी, जो बहुत बाद में 1981 तक आते-आते 'नसीब' फ़िल्म के गीत 'ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है' के बाद एकदम से थम सी गई.

यह भी जानना दिलचस्प होगा कि लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर ने मिलकर एक ही युगल गीत साथ में गाया था, जो हेमन्त कुमार के संगीत निर्देशन में था शैलेन्द्र का लिखा था- 'कभी आज कभी कल कभी परसो, ऐसे ही बीते ज़रा' (चाँद, 1959) था.

आप उनकी गायिकी के सदाबहार कैटलॉग से इन चन्द गीतों को याद कीजिए-जूही की कली मेरी लाडली (दिल एक मंदिर), शराबी शराबी ये सावन का मौसम (नूरजहाँ), मन गाए वो तराना जिसे सुनकर आ जाना (चालाक), छोड़ो-छोड़ो मोरी बइयाँ साँवरे (मियाँ बीबी राजी), मैं तो बनी रे जोगनिया अपने पिया की (कण कण में भगवान), मेरे महबूब ना जा (नूर महल), ना तुम हमें जानो (बात एक रात की), पहला पहला प्यार है (बदतमीज), नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले (जुआरी), कहती है झुकी झुकी नज़र (ज़िन्दगी और ख़्वाब), मेरे संग गा, गुनगुना कोई गीत सुहाना (जानवर), चले जा चले जा चले जा (जहाँ प्यार मिले), दिल गम से जल रहा है (शमा), तारों की गोरी चाँद की गुड़िया (देखा प्यार तुम्हारा), जो हम पे गुज़रती है (मुहब्बत इसको कहते हैं) और ढेरों ऐसे गीत.

'पाकीज़ा' के लंबे एल.पी. रिकॉर्ड 'पाकीज़ा रंग-बरंग' का उनका वो अनूठा गीत 'गिर गई रे मोरे माथे की बिंदिया..' अपनी बेहतरीन अदायगी और उतनी ही लोक रंग की मिठास के कारण अलग से याद किया जाता है.

इसी तरह उनका भोजपुरी फ़िल्मों के लिए पार्श्व गायन कमाल का था. एक उदाहरण देना चाहूँगा, जिसे संगीतकार रोशन ने 'हीरा मोती' फ़िल्म के लिए सुधा मल्होत्रा के साथ एक युगल लोकगीत के रूप में रचकर अमर बनाया था. 'कौन रंग मुंगवा कौन रंग मोतिया' आज भी अपनी संरचना में बहा ले जाता है, संगीत प्रेमी जब भी इस गीत को याद करते हैं.

जीवन में देर से मिला सम्मान

उनकी लोकप्रियता का बड़ा आधार वे युगल प्रणय-गीत हैं, जिसे उन्होंने सर्वाधिक मोहम्मद रफ़ी और मुकेश के साथ गाकर पॉपुलर किया. इन सदाबहार डुएट्स में- आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे (ब्रह्मचारी), तुमने पुकारा और हम चले आए (राजकुमार), ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे (जब जब फूल खिले), चुरा ले ना तुमको ये मौसम सुहाना (दिल ही तो है), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), अंखियों का नूर है तू (जौहर महमूद इन गोवा), अजहुं ना आए बालमा, सावन बीता जाए (सांझ और सवेरा), मनमोहन मन में हो तुम्हीं (कैसे कहूँ ), ये किसने गीत छेड़ा (मेरी सूरत तेरी आँखें), ठहरिए होश में आ लूं तो चले जाइएगा (मुहब्बत इसको कहते हैं), बाद मुद्दत के ये घड़ी आई (जहाँआरा)... न जाने कितने अविस्मरणीय गीत!

उनके जीवन में सम्मान भी बहुत देर से आया. यह एक विचित्र बात है कि जीवन भर लता मंगेशकर के नाम से होती रही तुलना और अवहेलना के बाद भी उन्हें महाराष्ट्र राज्य सरकार का 'लता मंगेशकर सम्मान' 2009 में दिया गया और बहुत देर से 2023 में भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से सम्मानित हुईं.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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