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Backनेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत को लेकर रुख़, क्या है इसके पीछे की वजह?
नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत को लेकर रुख़, क्या है इसके पीछे की वजह?
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BBC हिंदी5/21/2026World7 min readIndia

नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत को लेकर रुख़, क्या है इसके पीछे की वजह?

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नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत के राजदूत से व्यक्तिगत मुलाक़ात से इनकार कर भारत को विशेष तवज्जो न देकर नई परंपरा की शुरुआत की है। पूर्व राजदूत इसे राष्ट्रवाद की छवि बनाने का प्रयास बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे प्रोटोकॉल स्थापित करने का कदम मानते हैं।

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Author,रजनीश कुमार

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 21 मई 2026, 10:20 IST

अपडेटेड 21 मई 2026, 15:44 IST

पढ़ने का समय: 7 मिनट

नेपाल में 2008 में राजशाही व्यवस्था ख़त्म होने के बाद से कम्युनिस्ट पार्टियां किसी न किसी रूप में सत्ता में रहीं.

पिछले साल सितंबर महीने में जेन ज़ी आंदोलन से कम्युनिस्ट पार्टियां पूरी तरह से हाशिए पर चली गईं.

इस साल नेपाल में हुए चुनाव में बालेन शाह का उभार हुआ और नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार किसी पार्टी ने अपने दम पर सरकार बनाई.

पाँच मार्च को हुए संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और बालेन शाह ने 27 मार्च को सरकार की कमान संभाली.

बालेन शाह को लेकर भारत में उम्मीद थी कि संबंधों में गर्मजोशी आएगी. नेपाल के चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन शाह को भेजे अपने बधाई संदेश में खुलकर ख़ुशी ज़ाहिर की थी.

लेकिन बालेन शाह ने भारत को लेकर न तो कोई जल्दबाज़ी दिखाई और न ही बहुत उत्साह दिखाया. नेपाली मीडिया में इस बात की बहुत चर्चा हुई कि काठमांडू में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव बालेन शाह से मिलकर बधाई देना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

पहले यह बहुत ही आम था कि भारत का राजदूत नेपाल के नए प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से मिलकर बधाई देता था.

बालेन शाह ने विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत मुलाक़ात की परंपरा तोड़ दी और उन्होंने काठमांडू में मौजूद सभी राजदूतों को सामूहिक रूप से मुलाक़ात का समय दिया. यानी भारत के राजदूत के लिए कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं रहा.

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प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बधाई संदेश के साथ शाह को भारत आने का निमंत्रण भी दिया था, जिसे शाह ने स्वीकार कर लिया था. नेपाल में नए प्रधानमंत्री पहला विदेश दौरा पुरानी परंपरा के हिसाब से भारत का करते थे. हालांकि प्रचंड ने 2008 में यह परंपरा तोड़ दी थी और पहला दौरा चीन का किया था.

मुलाक़ात नहीं

बालेन शाह को लेकर उम्मीद थी कि वह जल्द ही भारत का दौरा करेंगे लेकिन अचानक आरएसपी ने बयान जारी कर कहा कि नेपाली प्रधानमंत्री कम से कम एक साल तक कोई विदेश यात्रा नहीं करेंगे.

नेपाली मीडिया में तो यहाँ तक लिखा जा रहा था कि भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री काठमांडू जाकर प्रधानमंत्री मोदी का औपचारिक निमंत्रण सौंपने वाले थे.

नेपाल के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, बालेन शाह ने मिस्री से मिलने पर भी सहमति नहीं दी क्योंकि उनका कहना था कि वह मंत्री स्तर से नीचे के किसी भी विदेशी अधिकारी से मुलाक़ात नहीं करेंगे.

बालेन शाह आख़िर इस रुख़ से क्या हासिल करना चाहते हैं? नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत मानते हैं कि बालेन शाह ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि लोगों को भी ये रास आ रहा है. यानी पॉप्युलर पब्लिक ओपिनियन भी ऐसा ही है.

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रंजीत राय ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''बालेन शाह राष्ट्रवादी नेता की छवि हासिल करना चाहते हैं और यह छवि भारत की कई बातें नहीं मानने से ही मज़बूत होगी. बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर रहते हुए भी इसी तरह की राजनीति की थी लेकिन मुझे लगा था कि मेयर और प्रधानमंत्री में बहुत फ़र्क़ होता है.''

''अब तक यही लगा है कि बालेन शाह की मेयर वाली राजनीति की निरंतरता प्रधानमंत्री के रूप में भी है. नेपाल में जब कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में थीं तो भारत विरोधी राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिलता था लेकिन बालेन शाह के आने के बाद भी यह थमा नहीं है.''

रंजीत राय कहते हैं, ''यह सही बात है कि अब तक भारत के राजदूत के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलना कोई बड़ी बात नहीं होती थी. बालेन शाह इसे रोकना चाहते हैं तो यह उनका अधिकार है. लेकिन सवाल यह है कि इससे हासिल क्या होगा? नेपाल के लिए भारत एक अहम देश है और मुझे लगता है कि संबंधों में सहजता ही दोनों देशों के हक़ में. बालेन शाह अब भी नेपाल में बहुत लोकप्रिय हैं. इसीलिए वह अपने मन का कर पा रहे हैं. लेकिन लोकप्रियता भी स्थायी नहीं होती है. प्रचंड की लोकप्रियता का क्या हुआ?''

भारत में नेपाल के राजदूत रहे दीप कुमार उपाध्याय बालेन शाह के फ़ैसलों को सही ठहराते हैं. उपाध्याय ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''भारत और नेपाल के संबंध प्रोटोकॉल से बाहर के थे लेकिन इससे किसी का भला नहीं हो रहा था. मुझे लगता है कि डिप्लोमैसी और अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रोटोकॉल से बाहर नहीं होने चाहिए."

"भारत के राजदूत के लिए भी नेपाल में प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए. यह प्रोटोकॉल हमलोग के लिए भी नई दिल्ली में होता था. मुझे लगता है कि दोनों देशों के संबंधों में कार्पेट के नीचे बहुत धूल जमी थी, जिसे बालेन शाह झाड़ रहे हैं. ये ज़रूर है कि बालेन शाह जियोपॉलिटिक्स कैसे हैंडल करना चाहते हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. मुझे लगता है कि बालेन शाह को थोड़ा वक़्त देना चाहिए.''

बालेन हासिल क्या करना चाहते हैं?

हालांकि बालेन शाह के इस रुख़ का काठमांडू पोस्ट ने 11 मई के अपने संपादकीय में बचाव किया था.

काठमांडू पोस्ट ने संपादकीय में लिखा था, ''बालेन शाह ने प्रधानमंत्री का पद संभालते ही एक अहम परंपरा स्थापित की, जब उन्होंने विदेशी राजदूतों को संयुक्त रूप से नई सरकार की प्राथमिकताओं की जानकारी दी. इससे पहले अक्सर देखा जाता था कि शक्तिशाली देशों के राजदूत नए नेपाली प्रधानमंत्री के निजी आवास पर मिलने जाते थे. इन बैठकों का कोई रिकॉर्ड नहीं होता था और न ही विदेश मंत्रालय का कोई प्रतिनिधि मौजूद रहता था.''

काठमांडू पोस्ट ने लिखा है, ''भारत, चीन और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों के राजदूत प्रधानमंत्री से निजी और अनौपचारिक मुलाक़ातें आसानी से कर लेते थे. इन बैठकों का केंद्र अक्सर द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने की बजाय व्यक्तिगत रिश्ते बनाना होता था. इससे हितों का टकराव पैदा होता था. वर्षों से विदेशी राजनयिकों की हमारे शीर्ष सरकारी अधिकारियों के निजी दायरों तक आसान पहुँच नेपाली राष्ट्रीय हितों के लिए नुक़सानदेह रही है. लेकिन शाह से पहले किसी ने भी इस पर स्पष्ट सीमा रेखा खींचने की हिम्मत नहीं की थी.''

आरएसपी का नेपाल की राजनीति में उभार असाधारण रहा है.

पार्टी की स्थापना जून 2022 में हुई थी और उसी वर्ष नवंबर में हुए अपने पहले राष्ट्रीय चुनाव में उसने प्रतिनिधि सभा की 21 सीटें जीत ली थीं.

ख़ुद बालेन शाह ने भी चुनावी राजनीति में एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में एंट्री की थी और मई 2022 में काठमांडू के मेयर चुने गए थे.

इस वर्ष पाँच मार्च को हुए चुनावों में आरएसपी ने प्रतिनिधि सभा की 275 में से 182 सीटें जीत लीं, जिनमें 125 प्रत्यक्ष चुनाव से और 57 समानुपातिक प्रतिनिधित्व के ज़रिए मिलीं.

इतनी नई पार्टी के लिए यह बहुत बड़ा जनादेश था. इस जीत को भारत में सकारात्मक रूप में लिया जा रहा था. लेकिन भारत को भी इसका अंदाज़ा था कि इस पार्टी में सत्ता के दो केंद्र हैं. एक पार्टी प्रमुख रबि लामीछाने और दूसरे प्रधानमंत्री बालेन शाह. पीएम मोदी ने बधाई के लिए फोन किया तो दोनों से बात की थी.

नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और माओवादी पार्टियों के शासनकाल में अक्सर ऐसा होता था कि प्रधानमंत्री पद संभालने के कुछ घंटों के भीतर ही विदेशी राजदूतों से मुलाक़ात कर लेते थे. ऐसा कई बार विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी के बिना होता था. लेकिन बालेन शाह ने इसे बदल दिया.

अपने संपादकीय में पोस्ट ने लिखा है, ''बालेन शाह ने केवल विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत मुलाक़ातें ही नहीं ठुकराईं बल्कि कुछ शीर्ष विदेशी अधिकारियों से मिलने से भी इनकार किया. हाल ही में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की प्रस्तावित काठमांडू यात्रा रद्द हो गई क्योंकि नेपाली प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के लिए उनके बार-बार किए गए अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला.

''इससे पहले दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर भी शाह से मुलाकात हासिल नहीं कर सके थे. दिलचस्प बात यह रही कि मिस्री और गोर दोनों मामलों में मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य, जैसे स्वर्णिम वाग्ले और सिसिर खनाल, शाह से अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह कर चुके थे. लेकिन शाह अपने रुख़ पर अडिग रहे.''

पार्टी और सरकार में समन्वय नहीं

यही भी कहा जा रहा है कि बालेन शाह और उनकी पार्टी की सोच एक नहीं है. भारत के साथ समझ आरएसपी के पुराने नेतृत्व की थी. बालेन शाह चुनाव से केवल कुछ महीने पहले ही पार्टी में शामिल हुए थे.

डेनमार्क में नेपाल के राजदूत रहे विजयकांत कर्ण कहते हैं, ''आरएसपी के कई नेता बालेन शाह के रुख़ से सहमत नहीं हैं. मुझे लगता है कि इस सरकार में कई अच्छे लोग हैं लेकिन बालेन शाह जियोपॉलिटिक्स को ठीक से हैंडल नहीं कर रहे हैं. अगर वह राष्ट्रवाद की सवारी कर लोकप्रियता बनाए रखना चाहते हैं तो इससे नेपाल का भला नहीं होगा. हाँ उन्होंने कई अच्छे काम भी किए हैं. ख़ास कर भ्रष्टाचार को लेकर और यह काम कोई और सरकार नहीं कर सकती थी.''

बालेन शाह के इस रुख़ से लगता है कि काठमांडू और नई दिल्ली के संबंधों में दूरियां बढ़ रही हैं. लेकिन बालेन शाह की नीतियों को लेकर नेपाल के भीतर भी कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं.

बालेन शाह ने संसद के प्रश्न का में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया. इसके कुछ ही दिन पहले संसद के उद्घाटन सत्र के दौरान, जब राष्ट्रपति उनकी ही सरकार की योजनाएं और कार्यक्रम पढ़ रहे थे, शाह बीच में ही सदन से बाहर चले गए थे.

शाह के इस रुख़ पर सवाल उठाते हुए नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कनक मणि दीक्षित ने एक्स पर लिखा था, ''नेपाल के प्रधानमंत्री संसद के औपचारिक सत्र में मानो संस्था, राष्ट्रपति, सांसदों और मतदाताओं के प्रति उपेक्षा का संदेश देने पहुँचे थे. यह उपेक्षा सदन को संबोधित करने से इनकार, संसद से दूरी बनाए रखना और बिना मुस्कान वाले व्यवहार, बेहद अनौपचारिक कपड़ों और फुटवियर के साथ राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच में ही सदन से बाहर चले जाने में साफ़ दिखाई देती है.''

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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