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Backनेतन्याहू के भाई की शहादत: इसराइल के सबसे दुस्साहसी एन्तेबे मिशन की कहानी
नेतन्याहू के भाई की शहादत: इसराइल के सबसे दुस्साहसी एन्तेबे मिशन की कहानी
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नेतन्याहू के भाई की शहादत: इसराइल के सबसे दुस्साहसी एन्तेबे मिशन की कहानी

Quick Look

1976 में एयर फ़्रांस के विमान के अपहरण के बाद इसराइली कमांडो ने युगांडा के एन्तेबे में बंधकों को छुड़ाने के लिए एक दुस्साहसी मिशन चलाया, जिसमें लेफ़्टिनेंट कर्नल योनाथन नेतन्याहू शहीद हुए.

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Why It Matters

1976 में एयर फ़्रांस की फ्लाइट 139 का अपहरण कर लिया गया था और बंधकों को युगांडा के एन्तेबे ले जाया गया था। इसराइल ने बंधकों को छुड़ाने के लिए एक साहसिक सैन्य अभियान चलाया।

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प्रकाशित 8 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 10 मिनट

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने रविवार को कहा है कि वे अमेरिका की हर इच्छा के मुताबिक़ काम नहीं करते हैं.

उन्होंने लेबनान में इसराइली कार्रवाई का समर्थन करते हुए ट्रंप की टिप्पणियों पर अपनी प्रतिक्रिया दी.

बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपने भाई को याद करते हुए इसराइल की सुरक्षा की शपथ भी ली और कहा, "50 साल पहले मैंने अपने बड़े भाई, इसराइल के हीरो लेफ्टिनेंट कर्नल योनी नेतन्याहू को खो दिया था. उनकी स्मृति हमेशा हमारे साथ है."

इस कहानी में हम जानेंगे बिन्यामिन नेतन्याहू के भाई लेफ़्टिनेंट कर्नल योनाथन नेतन्याहू कौन थे और जिस इसराइली ऑपरेशन में उनकी मौत हुई थी, उसे क्यों आज भी इसराइल के इतिहास का सबसे दुस्साहसी मिशन माना जाता है.

यह कहानी मूल रूप से रेहान फ़ज़ल की विवेचना पर आधारित है जो बीबीसी पर 4 जुलाई 2015 को प्रकाशित हुई थी. उस कहानी को इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

एयर फ़्रांस के विमान का अपहरण

इस घटना की शुरुआत होती है 27 जून 1976 को, जब तेल अवीव से पेरिस जा रही एयर फ़्रांस की 'फ़्लाइट 139' ने एथेंस में रुकने के बाद फिर से उड़ान भरी ही थी. इस दौरान विमान में बैठे चार यात्री हाथों में पिस्टल और ग्रेनेड लिए एकदम से उठे और विमान को अपने नियंत्रण में ले लिया.

उन्होंने यात्रियों को चेतावनी की कि अगर किसी ने विरोध करने की कोशिश की तो वे विमान में धमाका कर देंगे.

उन्होंने पायलट को लीबिया के शहर बेनग़ाज़ी चलने का आदेश दिया. इन चार अपहरणकर्ताओं में दो फ़लस्तीनी थे और दो जर्मन.

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बेनग़ाज़ी में सात घंटे रुकने और ईंधन लेने के बाद अपहरणकर्ताओं ने पायलट को आदेश दिया कि विमान को युगांडा के एन्तेबे हवाई अड्डे ले चलें.

उस समय युगांडा में तानाशाह ईदी अमीन का शासन था. उनकी पूरी सहानुभूति अपहरणकर्ताओं के साथ थी. एन्तेबे हवाई अड्डे पर उनके चार अन्य साथी उनसे आ मिले.

उन्होंने विमान में सवार यहूदी बंधकों को अलग कर दिया और दुनिया के अलग अलग देशों की जेलों में रह रहे 54 फ़लस्तीनी कैदियों को रिहा करने की मांग की.

अपहरणकर्ताओं ने धमकी दी कि ऐसा नहीं किया गया तो वे यात्रियों को एक-एक करके मारना शुरू कर देंगे.

एन्तेबे इसराइल से क़रीब 4000 किलोमीटर दूर था, इसलिए किसी बचाव मिशन के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता था.

इस बीच यात्रियों के रिश्तेदारों ने तेल अवीव में प्रदर्शन करने शुरू कर दिए थे. तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री रबीन पर दबाव बढ़ता जा रहा था कि बंधकों को हर हाल में छुड़ाया जाए.

मोसाद के जासूसों ने संभाला मोर्चा

बंधकों में से एक सारा डेविडसन रेहाल फ़ज़ल को बताया था कि अपहरणकर्ताओं ने बंधकों को दो समूहों में बांट दिया था, ''उन्होंने लोगों के नाम पुकारे और उन्हें दूसरे कमरे में जाने के लिए कहा. थोड़ी देर बाद पता चल गया कि वो सिर्फ यहूदी लोगों के नाम पुकार रहे हैं.''

इस बीच अपहरणकर्ताओं ने 47 ग़ैर यहूदी यात्रियों को रिहा कर दिया. उन्हें एक विशेष विमान से पेरिस ले जाया गया.

मोसाद के जासूसों ने पेरिस में उन यात्रियों से बात कर एन्तेबे के बारे में छोटी से छोटी जानकारी जुटाने की कोशिश की.

मोसाद के एक एजेंट ने कीनिया में एक विमान किराए पर लेकर एन्तेबे के ऊपर उड़ान भरकर उसकी बहुत सारी तस्वीरें खींची.

दिलचस्प बात यह थी कि एन्तेबे हवाई अड्डे के टर्मिनल को जहाँ बंधकों को रखा गया था, उसे एक इसराइली कंपनी ने बनाया था.

कंपनी ने उस टर्मिनल का नक्शा उपलब्ध कराया और रातों रात इसराइल में एक नकली टर्मिनल खड़ा कर लिया गया ताकि इसराइली कमांडो उस पर हमले का अभ्यास कर सकें.

योनाथन नेतन्याहू की एंट्री

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जिस अभियान को कुछ घंटे पहले तक तकरीबन असंभव माना जा रहा था, इसराइल ने उसकी तैयारी कर ली. इसके लिए इसराइली सेना के 200 सर्वश्रेष्ठ सैनिकों को चुना गया.

ब्रिगेडियर जनरल डैम शॉमरॉन को पूरे मिशन की ज़िम्मेदारी दी गई, जबकि लेफ़्टिनेंट कर्नल योनाथन नेतन्याहू को फ़ील्ड ऑपरेशन का इंचार्ज बनाया गया.

कमांडो मिशन में सबसे बड़ी अड़चन इस बात की थी कि कहीं एन्तेबे हवाई अड्डे के रनवे की बत्तियाँ रात में बुझा तो नहीं दी जाएंगी और ईदी अमीन के सैनिक विमान को उतरने से रोकने के लिए रनवे पर ट्रक तो नहीं खड़ा कर देंगे.

इस बीच इसराइल की सरकार ने संकेत दिया कि वो अपहरणकर्ताओं से बातचीत करने के लिए तैयार है ताकि कमांडोज़ को तैयारी के लिए थोड़ा समय मिल जाए. ईदी अमीन के दोस्त समझे जाने वाले पूर्व सैनिक अधिकारी बार लेव को उनसे बात करने की ज़िम्मेदारी दी गई.

उन्होंने अमीन से कई बार फ़ोन पर बात की लेकिन वो बंधको को छुड़ा पाने में असफल रहे.

इस बीच ईदी अमीन अफ़्रीकी एकता संगठन की बैठक में भाग लेने के लिए मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुई चले गए जिससे इसराइल को और समय मिल गया.

इस पूरे मिशन की सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि चार हज़ार किलोमीटर जाकर वापस भी आना था. इसलिए हवा में ही उड़ते विमान से दूसरे विमान में ईधन भरा गया.

सिर्फ़ छह मिनट का समय

इसराइल के पास तीन विकल्प थे. पहला हमले के लिए विमानों का सहारा लिया जाए. दूसरा नौकाओं से वहाँ पहुंचा जाए और तीसरा कीनिया से सड़क मार्ग से युगांडा में घुसा जाए.

लेकिन अंत में तय हुआ कि एन्तेबे पहुंचने के लिए विमानों का इस्तेमाल होगा और इस काम को ऐसे अंजाम दिया जाएगा कि युगांडा के सैनिकों को लगे कि इन विमानों में राष्ट्रपति अमीन विदेश यात्रा से लौट रहे हैं.

4 जुलाई को इसराइल के साइनाइ बेस से चार हरक्यूलिस जहाज़ों ने उड़ान भरी. सिर्फ़ 30 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए उन्होंने रेड सी को पार किया ताकि मिस्र, सूडान और सऊदी अरब के रडार उन्हें न पकड़ पाएं.

रास्ते में इसराइली कमांडोज़ ने युगांडा के सैनिकों की वर्दी पहन ली.

विमानों के उड़ान भरने के बाद ही प्रधानमंत्री राबीन ने इस मिशन की जानकारी मंत्रिमंडल को दी.

सात घंटे लगातार उड़ने के बाद रात के एक बजे पहला हरक्यूलिस विमान एन्तेबे के ऊपर पहुंचा. उसके पास लैंड करने और अपहरणकर्ताओं पर काबू पाने के लिए सिर्फ छह मिनट का समय था.

उस समय रनवे की लाइट जल रही थी. लैंड करने से आठ मिनट पहले ही हरक्यूलिस के रैंप खोल दिए गए ताकि अभियान में कम से कम समय लगे.

लैंड करते ही पायलट ने विमान को रनवे के बीचोंबीच रोक लिया ताकि पैराट्रूपर्स के एक दल को नीचे उतारा जा सके और वो रनवे पर पीछे आ रहे विमानों के लिए एमरजेंसी लाइट लगा सकें.

ईदी अमीन बदल चुके थे अपनी कार

इसराइली जहाज़ से एक काली मर्सिडीज़ कार उतारी गई. यह उस कार से बहुत मिलती-जुलती थी जिसे राष्ट्रपति अमीन इस्तेमाल किया करते थे.

उसके पीछे कमांडोज़ से भरी हुई दो लैंड रोवर गाड़ियाँ भी उतारी गईं. इन वाहनों ने तेज़ी से टर्मिनल की तरफ बढ़ना शुरू किया.

कमांडोज़ को आदेश थे कि वो तब तक गोली न चलाएं जब तक वो टर्मिनल तक नहीं पहुंच जाते.

इसराइली उम्मीद कर रहे थे कि काली मर्सिडीज़ कार देखकर युगांडा के सैनिक समझेंगे कि ईदी अमीन बंधकों से मिलने आए हैं. लेकिन उन्हें पता नहीं था कि कुछ दिन पहले ही अमीन ने अपनी कार बदल दी थी और अब वो सफेद मर्सिडीज़ का इस्तेमाल कर रहे थे.

यही वजह थी कि टर्मिनल के बाहर खड़े युगांडा के सैनिकों ने अपनी राइफ़लें निकाल लीं. इसराइली कमांडोज़ ने उन्हें साइलेंसर लगी बंदूकों से वहीं मारना शुरू कर दिया. अब तक इसराइल के मिशन का भेद खुल चुका था.

गोली चलते ही कमांडर ने आदेश दिया कि वाहनों से उतरकर पैदल ही उस टर्मिनल के भवन पर धावा बोल दिया जाए जहाँ यात्रियों को रखा गया था. कमांडोज़ ने बुल हॉर्न के ज़रिए बंधकों से अंग्रेज़ी और हिब्रू में कहा कि वो इसराइली सैनिक हैं और उन्हें बचाने के लिए आए हैं.

उन्होंने यात्रियों से फ़ौरन लेट जाने के लिए कहा. उन्होंने यात्रियों से हिब्रू में पूछा कि अपहरणकर्ता कहाँ हैं.

यात्रियों ने मुख्य हॉल में खुलने वाले दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया. कमांडोज़ हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए हॉल में घुसे. इसराइली कमांडोज़ को देखते ही अपहरणकर्ताओं ने गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया.

दोनों तरफ से हुई इस गोलीबारी में सभी अपहरणकर्ता मारे गए. इस दौरान बंधक माता-पिता अपने बच्चों को बचाने के लिए उनके ऊपर लेट गए.

इस दौरान तीन बंधक भी गोलियों का निशाना बने. इस बीच दो और इसराइली विमान वहाँ उतर चुके थे. उनमें भी इसराइली सैनिक थे.

चौथा विमान पूरी तरह से खाली था ताकि उसमें बचाए गए बंधकों को ले जाया जा सके.

एन्तेबे पर उतरने के बीस मिनटों के भीतर ही बंधकों को लैंडरोवर्स में भरकर खाली विमान में पहुंचाया जाने लगा था. इस बीच युगांडाई सैनिकों ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दी थी और पूरे हवाई अड्डे की बत्ती गुल कर दी गई थी.

इतिहास के सबसे दुस्साहसी मिशन में योनाथन नेतन्याहू की मौत

4 जुलाई की सुबह बचाए गए 102 यात्री और इसराइली कमांडो नैरोबी होते हुए तेल अवीव पहुंचे. इस पूरे अभियान को इसराइल के इतिहास का सबसे दुस्साहसी मिशन माना जाता है.

योनाथन नेतन्याहू ने वापसी उड़ान के दौरान दम तोड़ दिया. इस मिशन में सभी सात अपहरणकर्ता और 20 युगांडाई सैनिक मारे गए.

इसराइली ऑपरेशन में एक बंदी डोरा ब्लॉक को वापस नहीं लाया जा सका क्योंकि वो हमले के समय कंपाला के मुलागो अस्पताल में थी.

बाद में युगांडा के अटॉर्नी जनरल ने वहाँ के मानवाधिकार आयोग को बताया कि इस मिशन के बाद ईदी अमीन के आदेश पर दो सैनिक अफ़सरों ने डोरा ब्लॉक की अस्पताल में हत्या कर दी थी.

Open Questions

  • क्या ईदी अमीन की भूमिका केवल सहानुभूति तक सीमित थी?
  • क्या मोसाद की जानकारी पूरी थी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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