Newsgather
Backअमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों और टैरिफ़ वाले बिल को किया पारित
अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों और टैरिफ़ वाले बिल को किया पारित
Developing
BBC हिंदी16 hours agoPolitics5 min readIndia

अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों और टैरिफ़ वाले बिल को किया पारित

रूस से तेल और गैस ख़रीदने वाले देशों पर कड़े टैरिफ़ का प्रावधान, भारत और चीन पर भी पड़ सकता है असर।

Quick Look

अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों और कड़े टैरिफ़ वाले एक बिल को 86 के मुक़ाबले 11 वोटों से पारित कर दिया है। इस बिल में रूस से ऊर्जा ख़रीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने का प्रावधान है, जिससे भारत और चीन जैसे बड़े ख़रीदार प्रभावित हो सकते हैं।

AI-generated summary

Why It Matters

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत और चीन ने रियायती रूसी तेल का आयात काफ़ी बढ़ा दिया है।

Font size

अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े एक बिल को पारित कर दिया है. इसमें रूस से तेल और गैस ख़रीदने वाले देशों पर कड़े टैरिफ़ लगाने का प्रावधान है.

रूसी ऊर्जा का चीन और भारत सबसे बड़े ख़रीदार हैं. इसके साथ ही ईरान पर लगे प्रतिबंधों को भी कड़ा किया गया है.

सीनेटर लिंडसे ग्राहम की ओर से इस बिल को आगे बढ़ाया गया था. इसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों का समर्थन मिला और अंततः 86 के मुक़ाबले 11 वोटों से पारित किया गया.

साउथ कैरोलाइना के रिपब्लिकन सीनेटर ग्राहम की पिछले महीने यूक्रेन की यात्रा से लौटने के कुछ समय बाद मृत्यु हो गई थी.

वोटिंग से ठीक पहले अपने भाई की सीट पर नियुक्त सीनेटर डार्लिन ग्राहम ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का ज़िक्र करते हुए कहा, "यह क़ानून पुतिन को वहीं चोट पहुंचाएगा, जहाँ उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ होगी."

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन हासिल करने के लिए इस बिल को पिछले साल तैयार किए गए मूल मसौदे की तुलना में काफ़ी सीमित कर दिया गया है.

ट्रंप ने यूक्रेन को सीधे दी जाने वाली अधिकांश अमेरिकी सहायता बंद कर दी है और इसके बजाय यूक्रेन को हथियार बेचने की नीति अपनाई है, जिसका भुगतान अक्सर अमेरिका के यूरोपीय सहयोगी करते हैं.

हालांकि, इस बिल को अभी प्रतिनिधि सभा से पारित होना बाक़ी है.

ट्रंप ने यूक्रेन को सीधे दी जाने वाली अधिकांश अमेरिकी सहायता बंद कर दी है और इसके बजाय यूक्रेन को हथियार बेचने की नीति अपनाई है, जिसका भुगतान अक्सर अमेरिका के यूरोपीय सहयोगी करते हैं.

हालांकि, इस बिल को अभी प्रतिनिधि सभा से पारित होना बाक़ी है.

कुछ डेमोक्रेटिक सांसदों और केंटकी के रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल ने चेतावनी दी है कि ट्रंप इस बिल का इस्तेमाल चीन और भारत जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों पर व्यापक नए टैरिफ़ लगाने के लिए क़ानूनी आधार के रूप में कर सकते हैं.

नए टैरिफ़ लगाने के अधिकार को रोकने के लिए पॉल का संशोधन ख़ारिज हो गया.

इस क़ानून के तहत ट्रंप को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस ख़रीदने वाले पांच सबसे बड़े ख़रीदार देशों के साथ-साथ रूस को ऊर्जा संबंधी प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले पांच प्रमुख देशों पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने का अधिकार मिल जाएगा.

हालांकि दोनों दलों के सीनेटरों ने इस क़दम को रूस के लिए बड़ा झटका बताया है, लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप वास्तव में इन नए अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे या नहीं.

व्हाइट हाउस ने व्यापक छूट का प्रावधान करवाया है, जिससे राष्ट्रपति के पास दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का काफ़ी व्यापक अधिकार रहेगा.

बिल में 1996 के ईरान प्रतिबंध अधिनियम को भी 2031 तक बढ़ाने का प्रावधान है.

इस क़ानून के तहत ईरान के साथ कारोबार करने वाली ग़ैर-अमेरिकी कंपनियों पर सेकेंडरी आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं. यह क़ानून इसी साल समाप्त होने वाला था.

बिल राष्ट्रपति को अमेरिका में आयात होने वाले रूसी सामान पर 500 फ़ीसदी का व्यापक टैरिफ़ लगाने का अधिकार भी देता है.

नए टैरिफ़ लगाने का यह अधिकार पांच साल तक लागू रहेगा.

व्हाइट हाउस पहले भी रूस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर चुका है, लेकिन ईरान के साथ युद्ध के दौरान होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने के बाद तेल बाज़ार में पैदा हुए संकट के चलते उसने रूस के तेल निर्यात पर कई अस्थायी छूट दी थीं.

पिछले साल ट्रंप ने रूस से भारत की ऊर्जा ख़रीद को लेकर भारतीय सामान पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया था, लेकिन बाद में अमेरिका-भारत के व्यापक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में मदद के लिए इसे हटा दिया.

हालांकि जुलाई में ट्रंप ने 'जबरन मजदूरी' करवा कर सामान निर्यात करने का आरोप लगाते हुए भारत पर दस फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने का आदेश दिया था.

रूस के सबसे बड़े तेल ख़रीदारों में शामिल चीन को इसी तरह की पाबंदियों से पूरी तरह छूट मिली क्योंकि ट्रंप ने चीन के साथ व्यापारिक तनाव को सीमित रखने की कोशिश की है.

चीन के बाद भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है.

रूस से सबसे ज़्यादा तेल और गैस आयात करने वाले देशों चीन, भारत, अज़रबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं.

अगर अमेरिका ने भारत को 100 फ़ीसदी टैरिफ़ के दायरे में रखने का फ़ैसला किया तो भारत का तेल आयात बिल काफ़ी बढ़ जाएगा.

हालांकि, बिल के पारित होते ही टैरिफ़ अपने आप लागू नहीं होंगे.

यह राष्ट्रपति को अपने अधिकार के तहत टैरिफ लगाने को मंज़ूरी देता है.

टैरिफ़ कब और किस रूप में लागू होंगे, यह क़ानून के अंतिम स्वरूप और उसके क़ानून बनने के बाद राष्ट्रपति के फ़ैसले पर निर्भर करेगा.

2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी दुनिया में प्रतिबंध लगने शुरू हुए तो उस समय उसने रियायती कीमत पर तेल बेचना शुरू किया.

भारत रूसी रियायती तेल के सबसे बड़े ख़रीदारों में एक हो गया. इससे भारतीय रिफाइनरियों को अपनी लागत घटाने और ईंधन सप्लाई को स्थिर करने में मदद मिली.

इसके बाद मध्य-पूर्व में संघर्ष की वजह से होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पर लगभग रूक गई. इससे भारत की रूसी तेल पर निर्भरता और बढ़ गई.

2026 में भारत के रूसी कच्चे तेल के आयात में तेज बढ़ोतरी हुई. अकेले जून में इसमें 34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया.

ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका ने कुछ समय के लिए छूट देकर प्रतिबंधों में ढील दी थी, जिसके बाद यह वृद्धि और तेज हुई.

भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि रूस से तेल ख]रीदने के उसके फ़ैसला राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा के मद्देनज़र है.

कई अमेरिकी सांसद ये आरोप लगाते रहे हैं कि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध में उसकी मदद कर रहा है.

जुलाई में भारत की ओर से आयात किए गए हर दो बैरल कच्चे तेल में से एक से अधिक बैरल रूस से आया.

यह पहली बार है, जब भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी के पार चली गई.

कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म कैप्लर के मुताबिक़, जुलाई में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 27.8 लाख बैरल प्रतिदिन (एमबीडी) कच्चा तेल आयात किया. यह जून की तुलना में 1.5 फ़ीसदी अधिक है.

इस दौरान भारत का कुल कच्चा तेल आयात 49.6 लाख बैरल प्रतिदिन रहा.

संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब दूसरे और तीसरे सबसे निर्यातक बने रहे, लेकिन दोनों देशों ने मिलकर भी रूस की तुलना में काफ़ी कम तेल की आपूर्ति की.

भारत पर 100 फीसदी तक टैरिफ़ लगाने की आशंकाएं जताई जा रही थीं. अगर ये टैरिफ़ लग गया तो भारत और चीन को काफ़ी नुक़सान होगा.

अंतिम क़ानून में कितनी और किस तरह की छूट दी जाती है, इससे तय होगा कि क़ानून बनने के बाद भारत पर इसका असर कितना सीधा और कितना बड़ा होगा.

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • प्रतिनिधि सभा में बिल पर होगी आगे की चर्चा

    Likely · Within weeks

Open Questions

  • क्या प्रतिनिधि सभा इस बिल को पारित करेगी?
  • क्या राष्ट्रपति ट्रंप नए टैरिफ़ अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे?

Related Topics

This article was originally published by BBC हिंदी.

Related Stories

जुलाई 1990: बेनज़ीर भुट्टो की सरकार की बर्ख़ास्तगी और उससे जुड़े घटनाक्रम
Politics·9 hours ago

जुलाई 1990: बेनज़ीर भुट्टो की सरकार की बर्ख़ास्तगी और उससे जुड़े घटनाक्रम

जुलाई 1990 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को हटाने की अफ़वाहों और 6 अगस्त 1990 को राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान द्वारा उनकी सरकार की बर्ख़ास्तगी से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम और विभिन्न संस्मरणों के दावे।

BBC हिंदी
7 min read
More on this topicअमेरिका