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मलबे में दबने के कितने दिनों बाद तक ज़िंदा रह सकते हैं लोग?
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मलबे में दबने के कितने दिनों बाद तक ज़िंदा रह सकते हैं लोग?

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वेनेज़ुएला में आए भीषण भूकंपों के बाद, विशेषज्ञ बताते हैं कि मलबे में फंसे लोग कितने समय तक जीवित रह सकते हैं, यह हवा, पानी, चोटों की गंभीरता और जलवायु जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

AI-generated summary

Why It Matters

वेनेज़ुएला में हाल ही में आए दो भीषण भूकंपों ने भारी तबाही मचाई है, जिससे कई इमारतें गिर गई हैं और लोग मलबे में फंस गए हैं।

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मलबे में दबने के कितने दिनों बाद तक ज़िंदा रह सकते हैं लोग?

Author, केजल कसापोग्लू

पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

प्रकाशित 30 जून 2026, 13:41 IST

पढ़ने का समय: 8 मिनट

वेनज़ुएला में बीते सप्ताह 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो भीषण भूकंप एक मिनट के अंतर पर आए थे, जिससे भारी तबाही हुई है.

इन भूकंपों से कम से कम 250 इमारतों को भारी नुक़सान पहुंचा है. इनमें से कई इमारतें पूरी तरह गिर गई हैं.

मलबे में फंसे लोगों को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय टीमें मौक़े पर पहुंचीं.

लेकिन सवाल यह है कि मलबे में दबे लोग कितने समय तक ज़िंदा रह सकते हैं?

विशेषज्ञों ने बीबीसी को बताया कि यह कई बातों पर निर्भर करता है.

इनमें यह शामिल है कि व्यक्ति किस स्थिति में फंसा है. उसे हवा और पानी मिल पा रहा है या नहीं. मौसम और जलवायु कैसी है. साथ ही उस व्यक्ति की शारीरिक स्थिति भी अहम भूमिका निभाती है.

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आमतौर पर ज़्यादातर लोगों को 24 घंटे के भीतर बचा लिया जाता है. लेकिन कई मामलों में लंबे समय बाद भी लोग मलबे से ज़िंदा निकाले गए हैं.

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संयुक्त राष्ट्र आमतौर पर पाँच से सात दिन बाद बचाव अभियान रोक देता है. ऐसा तब किया जाता है जब एक या दो दिनों तक कोई जीवित व्यक्ति नहीं मिलता.

अब सवाल यह है कि कौन-सी चीज़ें ऐसी हैं जो मलबे में फंसे लोगों को ज़िंदा रखती हैं?

भूकंप में बचाव के लिए तैयारी ज़रूरी

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विशेषज्ञ कहते हैं कि भूकंप या इमारत गिरने का समय पहले से बताना आसान नहीं होता.

लेकिन ऐसे समय में किसी की जान बचने में यह कारक अहम होता है कि वह किस स्थिति में दबा हुआ है.

वे कहते हैं कि भूकंप आने पर छिपने के लिए अगर सही जगह चुनी जाए तो मलबे के नीचे भी कुछ सुरक्षा मिल सकती है.

साथ ही मलबे में सांस लेने के लिए हवा भी मिल सकती है.

तुर्की की बचाव संस्था एकेयूटी के समन्वयक मुरात हारुन ओंगोरेन का कहना है कि बचाव के लिए तीन बातों का अभ्यास ज़रूरी है, ये हैं ड्रॉप, कवर और होल्ड.

इससे मलबे में दबे व्यक्ति के लिए हवा आने का एक छोटा सा सुरक्षित स्थान बन सकता है.

ड्रॉप, कवर और होल्ड का मतलब है कि छिपने के लिए पहले घुटनों के बल नीचे बैठ जाएं. फिर किसी मज़बूत मेज़ या चीज़ के नीचे छिप जाएं. और झटके रुकने तक उसे मजबूती से पकड़ कर रखें.

वे कहते हैं कि आपदा से पहले जागरूकता, शिक्षा और प्रशिक्षण बहुत ज़रूरी है. लेकिन अक्सर लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

उनका कहना है कि यही चीज़ तय करती है कि मलबे के नीचे आपकी ज़िंदगी कितनी देर तक सुरक्षित रह सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की आपातकालीन कार्यक्रम की अधिकारी डॉ. जेत्री रेग्मी भी आपदा में खुद को बचाने से जुड़ी तैयारी पर ज़ोर देती हैं.

वे कहती हैं कि किसी सुरक्षित जगह, जैसे मज़बूत मेज़ के नीचे छिपना, ज़िंदा बचने की संभावना बढ़ा देता है.

हालांकि वह यह भी कहती हैं कि हर आपदा अलग होती है इसलिए किसी बात की पूरी गारंटी नहीं होती. लेकिन शुरुआती बचाव इस बात पर निर्भर करता है कि स्थानीय लोग कितने तैयार हैं.

हवा और पानी की पहुंच मददगार

मलबे में फंसे लोगों के लिए हवा और पानी बहुत ज़रूरी होते हैं. इन्हीं के सहारे वे ज़िंदा रह सकते हैं.

लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि व्यक्ति को कितनी चोट लगी है. अगर ज़्यादा खून बह गया है, तो 24 घंटे के बाद बचना मुश्किल हो जाता है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर व्यक्ति को गंभीर चोट नहीं लगी है और वह जहां पर दबा हुआ है, वहां उसे सांस लेने के लिए हवा मिल रही है, जैसे मलबे में कोई खाली जगह या एयर पॉकेट हो, तो बचने की संभावना बढ़ जाती है.

इसके बाद बचने के लिए अगली ज़रूरत होती है शरीर को हाइड्रेट रखना.

अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के गहन चिकित्सा विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर रिचर्ड एडवर्ड मून कहते हैं कि पानी और ऑक्सीजन की कमी सबसे बड़ी समस्या होती है.

वे कहते हैं कि हर वयस्क व्यक्ति के शरीर से रोज़ करीब 1.2 लीटर पानी बाहर निकलता है. यह डिहाइड्रेशन मूत्र के ज़रिए, सांस लेने से, भाप और पसीने के ज़रिए भी निकलता है.

उनका कहना है कि जब शरीर से 8 लीटर या उससे ज़्यादा पानी निकल जाता है, तब व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो सकता है.

कुछ अनुमान बताते हैं कि बिना पानी के इंसान करीब तीन से सात दिन तक ज़िंदा रह सकता है.

चोटों से तय होता है जान का ख़तरा

अगर किसी व्यक्ति के सिर में चोट आई है या उसे कई गंभीर चोटें लगी हैं और उसे सांस लेने के लिए मलबे में जगह भी नहीं मिल पा रही है, तो ऐसे हालात में उसका आपदा के अगले दिन तक भी ज़िंदा रह पाना मुश्किल होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आपातकालीन कार्यक्रम की अधिकारी डॉ. जेत्री रेग्मी का कहना है कि ऐसे में चोट की गंभीरता को समझना बहुत ज़रूरी है. रीढ़, सिर या छाती में चोट वाले लोग अस्पताल पहुंचने से पहले ही जान गंवा सकते हैं.

शरीर से ज़्यादा खून बहना, हड्डी टूटना या अंदरूनी अंगों को नुकसान होना मौत का ख़तरा बढ़ा देता है.

डॉ. रेग्मी कहती हैं कि बचाव के बाद इलाज भी उतना ही ज़रूरी है. वे बताती हैं कि मलबे से निकाले जाने के बाद भी कुछ लोगों की जान जा सकती है.

उनके मुताबिक़, इसकी एक वजह क्रश सिंड्रोम होती है. यह आमतौर पर भूकंप जैसी आपदाओं में देखा जाता है, जब लोग लंबे समय तक मलबे के नीचे दबे रहते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के तकनीकी अधिकारी का कहना है कि यह सिंड्रोम तब होता है, जब भारी दबाव से मांसपेशियों को नुकसान पहुंचता है.

इससे शरीर में जहरीले पदार्थ बनते हैं. और जब मलबा हटाया जाता है, तो ये ज़हर पूरे शरीर में फैल जाते हैं. इससे व्यक्ति की हालत गंभीर हो सकती है.

जलवायु और मौसम भी अहम फ़ैक्टर

किसी इलाके की जलवायु भी यह तय करती है कि लोग कितने समय तक ज़िंदा रह सकते हैं.

अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के गहन चिकित्सा विशेषज्ञ प्रोफेसर रिचर्ड एडवर्ड मून के मुताबिक तुर्की जैसे ठंडे इलाकों में हालात और खराब हो जाते हैं.

वे कहते हैं कि सामान्य स्थितियों में एक वयस्क व्यक्ति 21 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकता है.

इस दौरान शरीर अपनी गर्मी बनाए रख सकता है.

लेकिन जब तापमान इससे कम हो जाता है तो हालात बदल जाते हैं.

ऐसे समय में शरीर का तापमान आसपास के तापमान के जैसा होने लगता है.

वे कहते हैं कि हाइपोथर्मिया कितनी जल्दी होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति मलबे में कितना अलग-थलग दबा हुआ है या वहां पर उसे कितना सहारा मिला है.

कुछ कम भाग्यशाली लोगों को ऐसे हालात में जल्दी हाइपोथर्मिया हो जाता है.

वहीं गर्मियों में स्थिति उलट हो जाती है.

अगर मलबे के अंदर बहुत ज्यादा गर्मी हो तो व्यक्ति का शरीर जल्दी पानी खो देता है.

इससे डिहाइड्रेशन बढ़ जाता है.

और इससे उसके ज़िंदा बचने की संभावना कम हो जाती है.

मुश्किल हालात में मानसिक ताक़त ज़रूरी

विशेषज्ञों के अनुसार मानसिक स्थिति एक अहम पहलू है. लेकिन इसे अक्सर लोग कम महत्व देते हैं.

वे कहते हैं कि मजबूत मन और जीने की इच्छा ही ज़िंदा रहने में बड़ी भूमिका निभाती है.

रेस्क्यू विशेषज्ञ ओंगोरेन का कहना है,

"डर लगना स्वाभाविक है. लेकिन ऐसे हालात में फंसने पर घबराना नहीं चाहिए.

डर को काबू में करना बहुत ज़रूरी है. और खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए.

अपने मन में यह भावना होनी चाहिए कि अब मैं यहां हूं. और मुझे ज़िंदा रहने का तरीका ढूंढना है."

ऐसा करने से व्यक्ति चिल्लाने और शरीर को इधर-उधर हिलाने में कम ऊर्जा खर्च करेगा.

इससे शरीर में डर और घबराहट को नियंत्रित करने में मदद मिलती है."

ज़िंदा बचने की हैरान करने वाली कहानियां

1995 में दक्षिण कोरिया में भूकंप आया था. इसके बाद एक व्यक्ति को 10 दिन बाद मलबे से ज़िंदा निकाला गया.

बताया गया कि वह बारिश का पानी पीकर ज़िंदा रहा. उसने गत्ते का डिब्बा खाकर गुज़ारा किया. वह अपना मन बहलाने के लिए एक बच्चे के खिलौने से खेलता रहा.

हैती में जनवरी 2010 में भूकंप आया था. इसमें 2 लाख 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी.

लेकिन एक व्यक्ति 12 दिनों तक मलबे में ज़िंदा रहा. वह एक लुट चुकी दुकान के मलबे में दबा हुआ था.

इसके बाद भूकंप के मलबे से एक और व्यक्ति 27 दिनों बाद ज़िंदा मिला.

अक्तूबर 2005 में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भूकंप आया था. इसके दो महीने बाद 40 साल की नक़्शा बीबी को बचाया गया. उन्हें उनके रसोईघर से ज़िंदा निकाला गया.

उनके शरीर में जकड़न थी. वह इतनी कमज़ोर थीं कि ठीक से बोल भी नहीं पा रही थीं.

बीबीसी से बात करते हुए उनके रिश्तेदार ने कहा कि पहले लगा था कि वह मर चुकी हैं.

लेकिन जैसे ही उन्हें बाहर निकाला जा रहा था, उन्होंने अपनी आंखें खोल दीं.

Open Questions

  • बचाव अभियान कब तक जारी रहेगा?
  • क्या सभी फंसे हुए लोगों को बचाया जा सकेगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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