तालिबान सरकार शियाओं पर कौन-कौन सी पाबंदियां लगा रही है?
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तालिबान सरकार शिया समुदाय पर पाबंदियां बढ़ा रही है, जिसमें अस्थायी निकाह पर रोक और धार्मिक आयोजनों को सीमित करना शामिल है। वरिष्ठ शिया आलिमों को तलब कर दुर्व्यवहार किया जा रहा है, जबकि जाफ़री फ़िक़्ह को नज़रअंदाज़ कर हनफ़ी फ़िक़्ह को बढ़ावा दिया जा रहा है।
AI-generated summary
Why It Matters
The Taliban government, a hardline Sunni group, has been gradually increasing restrictions on Afghanistan's Shia community since returning to power in August 2021. They have prioritized the Hanafi Fiqh, disregarding other Islamic schools of thought, including the Jaafari Fiqh followed by most Shia Muslims.
अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार शियाओं पर कौन-कौन सी पाबंदियां लगा रही है?
Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
प्रकाशित एक घंटा पहले
पढ़ने का समय: 9 मिनट
तालिबान की सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान के शिया समुदाय पर अपनी पाबंदियों में धीरे-धीरे इज़ाफ़ा किया है.
हाल ही में काबुल में एक वरिष्ठ शिया आलिम ने आरोप लगाया कि तालिबान ने अस्थायी निकाह (निकाह-ए-मुतआ) का अनुबंध कराने पर उन्हें तलब किया और उनके साथ हिंसा की गई.
यह प्रथा शिया जाफ़री फ़िक़्ह (धार्मिक क़ानून की परंपरा) में मान्य है, लेकिन सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह में नहीं.
जाफ़रिया फ़िक़्ह को तालिबान से पहले की अफ़ग़ान सरकार ने बाक़ायदा मान्यता दी थी. लेकिन तालिबान ने पूर्ववर्ती सरकार की क़ानून-व्यवस्था को रद्द कर दिया और अन्य इस्लामी फ़िक़्ह को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल हनफ़ी फ़िक़्ह को बढ़ावा दिया.
'अस्थायी निकाह अनुबंध कराने पर तलब'
काबुल में वरिष्ठ शिया आलिम आयतुल्लाह हुसैनदाद शरीफ़ी ने आरोप लगाया कि तालिबान अधिकारियों ने उन्हें अस्थायी निकाह का अनुबंध कराने पर बुलाया और मारपीट की, जबकि यह शिया जाफ़री फ़िक़्ह में स्वीकार्य है.
15 मई को दिए गए एक भाषण में शरीफ़ी ने कहा कि तालिबान के धर्म प्रोत्साहन और बुराई निवारण एवं शिकायत निवारण मंत्रालय के अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की, उन्हें पीटा और देश के शिया समुदाय पर और पाबंदियाँ लगाईं.
तालिबान एक कट्टर सुन्नी समूह है और 15 अगस्त 2021 को सत्ता में लौटने के बाद से उन्होंने देश में हनफ़ी फ़िक़्ह को ही प्रमुख बनाया है. सुन्नी फ़िक़्ह अस्थायी निकाह (निकाह-ए-मुतआ) को मान्यता नहीं देता.
शरीफ़ी ने कहा कि तालिबान ने उन्हें बुलाया और एक अधिकारी ने 'मुक्का मारा जिससे उनकी पगड़ी गिर गई". हालाँकि कमरे में मौजूद अन्य लोगों ने उन्हें और ज़्यादा आक्रामक होने से रोक दिया.
उन्होंने आगे कहा कि उन्हें और कई अन्य शिया आलिमों को इस बात का लिखित आश्वासन देने पर मजबूर किया गया कि वे अस्थायी निकाह नहीं करवाएंगे.
उन्होंने कहा, "उन्होंने दर्जनों आलिमों को अपराध के नाम पर तलब किया है, उन्हें मदरसों में ले जाकर दस्तख़त, तस्वीरें और लिखित आश्वासन लिए हैं कि अगर आगे यह काम किया गया तो छह महीने जेल में रखा जाएगा. इसका क्या मतलब है? ख़ुदा की क़सम, क्या यह हमारे लिए अपमान नहीं? क्या यह हमारे धार्मिक परंपरा का अपमान नहीं?"
इस आलिम ने यह भी दावा किया कि तालिबान के अधिकारी सड़कों पर हज़ारा शिया जोड़ों को रोककर, अस्थायी निकाह के शक में हिरासत में ले रहे हैं.
उन्होंने ज़ोर दिया कि वे कोई राजनीतिक शख़्सियत नहीं हैं और उन्होंने राजनीति में एक दिन भी नहीं बिताया. उन्होंने तालिबान से अपील की, "कम से कम हमारी निजी ज़िंदगी में दख़ल न दें."
विदेश में स्थापित अफ़ग़ान निजी संस्थानों - जिनमें ब्रिटेन स्थित अफ़ग़ानिस्तान इंटरनेशनल, अमेरिका स्थित अमो टीवी और इत्तिलाआत-ए-रोज़ शामिल हैं- ने शरीफ़ी के बयानों को रिपोर्ट किया है.
क़ानून क्या कहता है?
अफ़ग़ानिस्तान की लगभग 20 प्रतिशत आबादी शिया है और पूर्ववर्ती सरकार ने शिया नागरिकों के लिए नागरिक मामलों में बाक़ायदा शिया फ़िक़्ह को मान्यता दी थी.
शिया नागरिकों की ज़्यादातर आबादी जाफ़री फ़िक़्ह पर अमल करती है और तालिबान से पहले की सरकार ने 2009 के शिया पर्सनल स्टेटस क़ानून के तहत पारिवारिक मामलों- जैसे निकाह, तलाक़, विरासत और अन्य नागरिक मामलों में इसे क़ानूनी दर्जा दिया था.
लेकिन अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान का संविधान और वे क़ानून निलंबित कर दिए जो पूर्व इस्लामी गणराज्य की सरकार के तहत पारित हुए थे.
इसके बजाय तालिबान लगातार सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह को तरजीह दे रहे हैं.
इसी आधार पर सुन्नी तालिबान अधिकारी अस्थायी निकाह के अमल को मान्यता नहीं देते, जबकि शिया जाफ़री फ़िक़्ह इसे जायज़ मानता है.
तालिबान के 2024 के अख़लाक़ी क़ानून ने उनके मंत्रालय को यह अधिकार दिया कि वे "इस्लामी शरीअत और हनफ़ी फ़िक़्ह की शर्तों के मुताबिक़ नेकी का हुक्म दें और बुराई से रोकें."
क़ाबिले-ग़ौर है कि इसी मंत्रालय के अधिकारियों पर शरीफ़ी को कथित तौर पर हिरासत में लेने और बदसलूकी करने का आरोप है. तालिबान के 2026 के फ़ौजदारी क़ानून ने भी अन्य इस्लामी विचारधाराओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के मुक़ाबले सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह की प्रधानता को और मज़बूत किया.
ख़ास तौर पर इसमें किसी व्यक्ति के लिए हनफ़ी फ़िक़्ह को छोड़ने पर पाबंदी लगाई गई है, जबकि आम तौर पर चारों सुन्नी स्कूलों को बराबर दर्जा दिया जाता है.
इसी तरह फ़रवरी 2026 में तालिबान ने इस्लामी प्रचारकों के तौर-तरीक़ों को नियंत्रित करने के लिए एक क़ानून जारी किया, जिसके मुताबिक़ धार्मिक प्रचारक का संबंध हनफ़ी फ़िक़्ह से होना ज़रूरी है.
शिया समुदाय पर क्या पाबंदियाँ हैं?
शिया अफ़ग़ान और विपक्षी समूह वक़्त-ब-वक़्त तालिबान पर आशूरा के सार्वजनिक आयोजनों को सीमित करने का आरोप लगाते रहे हैं. इस दिन शिया मुसलमान पैग़ंबर इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन की शहादत का मातम करते हैं.
हालाँकि तालिबान अधिकारी इन पाबंदियों को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए 'सख़्त एहतियाती क़दम' बताते हैं, क्योंकि ये आयोजन अक्सर चरमपंथी संगठन आईएस (दाएश) के हमलों का निशाना बने हैं.
जब इस्लामी त्योहारों के निर्धारण में मामूली मतभेद हुआ तो तालिबान ने शिया नागरिकों को ज़बरदस्ती अपनी फ़िक़्ह के मुताबिक़ ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-अज़हा मनाने पर मजबूर किया.
हाल ही में ग़ज़नी प्रांत के दक्षिण-पूर्वी इलाक़े में तालिबान की अख़लाक़ी मंत्रालय के अधिकारियों ने कथित तौर पर शिया नमाज़ियों को चेतावनी दी कि वे सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ नमाज़ पढ़ें, वरना उनकी मस्जिदें बंद कर दी जाएँगी और उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा.
ग़ज़नी शहर के नज़दीकी इलाक़े नवााबाद में तालिबान अधिकारियों ने स्थानीय शिया लोगों को चेतावनी दी कि उन्हें मग़रिब और ईशा की नमाज़ें अलग-अलग अदा करनी होंगी, जबकि शिया जाफ़री फ़िक़्ह के मुताबिक़ इन नमाज़ों को एक साथ पढ़ना आम है.
और किन धार्मिक समूहों को निशाना बनाया जा रहा है?
सत्ता में वापसी के बाद तालिबान अधिकारियों ने उन मुस्लिम समूहों को भी निशाना बनाया है जिन्हें वे गैर-रवायती समझते हैं. इनमें शिया, ख़ास तौर पर इस्माइली शिया, कुछ सूफ़ी समूह और सलफ़ी शामिल हैं.
ज़्यादातर मामलों में तालिबान के नैतिकता मंत्रालय या उसकी स्थानीय शाखाओं ने ये पाबंदियाँ लगाई और लागू की हैं.
शिया इस्लाम की इस्माइली शाखा ख़ास तौर पर तालिबान की तरफ़ से निशाने पर दिखाई देती है.
दिसंबर 2025 में ब्रिटेन स्थित एक मानवाधिकार संगठन रवादारी ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान की इस्माइली शिया अल्पसंख्यक को इबादत, धार्मिक रस्मों और जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिशों समेत भेदभाव और पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है.
जनवरी 2026 में विदेश में स्थापित अफ़ग़ान मीडिया ने रिपोर्ट किया कि उत्तर-पूर्वी प्रांत बदख़्शां में तालिबान अधिकारियों ने उन इस्माइली नागरिकों को रियायतें देने की पेशकश की जो सुन्नी इस्लाम स्वीकार करें. इन रियायतों में आर्थिक मदद, सुरक्षा की गारंटी और सरकारी नौकरियों तक पहुँच शामिल थी.
सितंबर 2025 में तालिबान के नैतिकता मंत्रालय ने एक सुन्नी सूफ़ी नेता, सैयद इब्राहीम गिलानी, और उनके कई अनुयायियों को 'सूफ़ीवाद के ग़लत इस्तेमाल' और शरीअत-विरोधी गतिविधियों के आरोप में हिरासत में लिया था.
तालिबान ने पूर्वी प्रांत कुनर में सुन्नी सलफ़ियों के मदरसों को बंद करके उन्हें भी निशाना बनाया.
मार्च 2026 में तालिबान ने शैक्षिक संस्थानों पर पाबंदियाँ लगाईं, जिनमें सुन्नी इस्लाम की पाबंदी का ऐलान शामिल था.
तालिबान का रुख़ क्या है?
तालिबान ने शरीफ़ी के साथ कथित बदसलूकी और शिया तौर-तरीक़ों पर पाबंदियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की, हालाँकि ख़बरें हैं कि शिया नेताओं ने इस मामले पर विरोध दर्ज कराया है.
17 मई को तालिबान के अधीन वज़ारत-ए-देही बहाली व तरक़्क़ी ने कहा कि मंत्री मुल्ला अब्दुल लतीफ़ मंसूर ने एक प्रभावशाली शिया नेता सैयद हसन फ़ाज़िलज़ादा और अन्य प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की.
हालाँकि बयान में और विवरण नहीं दिया गया, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान इंटरनेशनल टीवी ने मंसूर के हवाले से कहा कि वे सभी फ़िक़्ह का सम्मान करते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया: "यह बयान शिया नागरिकों पर बढ़ते दबाव और शिया आलिमों की गिरफ़्तारी व हिंसक व्यवहार की ख़बरों के बाद दिया गया."
अफ़ग़ानिस्तान के शिया आलिमों के उच्च आयोग ने 13 मई को घोषणा की कि उसने 'आयतुल्लाह शरीफ़ी के साथ अपमानजनक व्यवहार' का मामला तालिबान के नैतिकता मंत्रालय के सामने उठाया और ऐसे अनुचित रवैये को रोकने की माँग की.
बयान में कहा गया: "आयोग के अधिकारियों के स्वागत के दौरान मंत्रालय के अधिकारियों ने सहयोग और इस मामले को गंभीरता से आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया और तय हुआ कि मंत्रालय की कार्रवाई के नतीजे आयोग के अधिकारियों के साथ साझा किए जाएँगे."
अतीत में तालिबान नेता आम तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाली तमाम क़ौमियतों और धार्मिक समूहों के बीच एकता पर ज़ोर देते रहे हैं, हालाँकि कुछ ने सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह की प्रधानता पर भी ज़ोर दिया है.
आलोचक क्या कहते हैं?
पूर्व सूचना और संस्कृति मंत्री अब्दुलबारी जहानी ने तालिबान को एक खुले ख़त में शिया समुदाय के साथ व्यवहार पर सख़्त आलोचना की.
उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान से राजनीतिक दूरी के बारे में चेतावनी देते हुए कहा: "आपके शिया भाइयों का विरोध अब नफ़रत में बदल चुका है. यह नफ़रत का जज़्बा रोज़-ब-रोज़ बढ़ रहा है और एक से दूसरे में फैल रहा है. और आप या इससे भी बड़ी ताक़तें, छह से सात मिलियन लोगों की दुश्मनी का मुक़ाबला नहीं कर सकतीं."
Open Questions
- What specific actions will the Taliban take in response to the High Commission of Shia Clerics' demands?
- Will the Taliban's favoritism towards Hanafi Fiqh lead to further widespread persecution of religious minorities?
- What is the extent of international reaction to these restrictions?
- How will these policies affect the stability and internal cohesion of Afghanistan?

