फ़ास्ट बॉलर शोएब अख़्तर को सही तरीके से समझना ज़रूरी है
Quick Look
यह लेख पूर्व पाकिस्तानी फ़ास्ट बॉलर शोएब अख़्तर के विवादास्पद लेकिन शानदार करियर, उनके बचपन की कठिनाइयों, क्रिकेट में आने के संघर्षों और मैदान के बाहर के अनुभवों पर प्रकाश डालता है। इसमें उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं और विवादों को भी शामिल किया गया है।
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Why It Matters
शोएब अख़्तर, एक पूर्व पाकिस्तानी फ़ास्ट बॉलर, अपने विवादास्पद करियर और तेज़ गेंदबाज़ी के लिए जाने जाते हैं, और अब वह एक टीवी विश्लेषक के रूप में सक्रिय हैं।
फ़ास्ट बॉलर शोएब अख़्तर के बारे में बात करने से पहले उन्हें सही तरीके से समझना ज़रूरी है।
यह मामला इतना आसान नहीं है। अलग-अलग लोग उन्हें अलग नज़रिए से देखते रहे हैं। इसी वजह से उनकी शख़्सियत की अलग-अलग तस्वीर सामने आती रही है।
कुछ लोगों के लिए वह ऐसे बॉलर थे जो अपनी रफ़्तार से बल्लेबाज़ों को परेशान कर देते थे। वहीं, कई लोग उन्हें एक अक्खड़ मिज़ाज और बाग़ी क्रिकेटर मानते थे, जो अनुशासन की परवाह नहीं करते थे।
उनके आलोचक अक्सर विवादों की एक लंबी सूची गिना देते थे। इसमें संदिग्ध बॉलिंग एक्शन, बॉल टैंपरिंग और डोपिंग के आरोप शामिल थे।
उन पर प्रतिबंध भी लगे। जुर्माने भी हुए। उन्हें कई जांच समितियों और अदालतों के सामने भी पेश होना पड़ा। अनुशासन के उल्लंघन के मामले तो पूरे करियर में उनका पीछा करते रहे।
लेकिन सच यह है कि शोएब अख़्तर का करियर किसी सुपरहिट फ़िल्म की तरह रहा। उसमें वह सब कुछ था जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचे रखे।
उन्हें क्रिकेट से संन्यास लिए 15 साल से ज़्यादा हो चुके हैं। अब वह अक्सर टीवी पर विश्लेषक के तौर पर दिखाई देते हैं। उनके बयान आज भी उतने ही तेज़ और धारदार होते हैं जितनी उनकी गेंदबाज़ी हुआ करती थी।
नाना ने कहा था इलाज पर पैसे मत ख़र्च करो
शोएब अख़्तर का जन्म रावलपिंडी के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता अटक ऑयल रिफ़ाइनरी के पेट्रोल स्टेशन पर रात में चौकीदारी करते थे। उनके आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे। फिर भी उनके माता-पिता ने बच्चों की ज़रूरतों का पूरा ख़याल रखा।
अपनी किताब कॉन्ट्रोवर्शियली योर्स में शोएब लिखते हैं कि बचपन में उन्हें बहुत तेज़ खांसी की बीमारी हो गई थी। इसकी वजह से वह कमज़ोर होते जा रहे थे। डॉक्टरों ने कहा था कि उनके फेफड़े हमेशा कमज़ोर रहेंगे।
शोएब के मुताबिक़, एक दिन उनके नाना ने उनकी मां से कहा कि यह बच्चा शायद ज़िंदा नहीं बचेगा। इसलिए इसके इलाज पर समय और पैसे बर्बाद मत करो। लेकिन उनकी मां ने हार नहीं मानी। वह लगातार उन्हें अस्पताल ले जाती रहीं।
शोएब लिखते हैं कि बाद में उन्हीं फेफड़ों में इतनी ताक़त आ गई कि वह मैदान में हवा की तरह दौड़ने लगे।
पतंगबाज़ी और गिल्ली-डंडे का शौक़ बना मददगार
शोएब को बचपन में पतंग उड़ाने का बहुत शौक़ था। वह पतंगबाज़ी के मौसम का बेसब्री से इंतज़ार करते थे। उनके बड़े भाई ताहिर अक्सर उन्हें पतंगें दिलाने ले जाते थे।
वह बताते हैं कि पतंग पकड़ने के लिए दौड़ना उनकी रफ़्तार बढ़ाने में मददगार साबित हुआ। वहीं गिल्ली-डंडा खेलने से थ्रो और फ़ील्डिंग की कला विकसित हुई। आगे चलकर यह सब क्रिकेट में काम आया।
तांगे वाले से किया गया वादा
जब शोएब ने क्रिकेट को गंभीरता से लेना शुरू किया तो वह मौक़ों की तलाश में शहर-शहर जाने लगे।
एक बार उन्हें पता चला कि पीआईए टीम के ट्रायल लाहौर में हो रहे हैं। वह अपने दोस्त एजाज़ अरशद के साथ रावलपिंडी से रवाना हो गए। उनकी जेब में सिर्फ़ 12 रुपये थे और दोस्त के पास 13 रुपये।
शोएब बताते हैं कि सात घंटे का सफ़र बिना टिकट बस में तय किया। लाहौर पहुंचने के बाद होटल में रुकने के पैसे भी नहीं थे।
रेलवे स्टेशन के पास उनकी मुलाक़ात एक तांगे वाले अज़ीज़ ख़ान से हुई। शोएब ने उसे खाने का प्रस्ताव दिया और बदले में रात गुज़ारने के लिए जगह मांगी।
तांगे वाले ने पूछा, "क्या तुम पाकिस्तान के लिए खेलते हो?"
शोएब ने जवाब दिया, "अभी नहीं। लेकिन एक दिन ज़रूर खेलूंगा।"
उन्होंने उससे वादा किया कि अगर वह पाकिस्तान टीम में चुन लिए गए तो वापस आकर उससे मिलेंगे।
कुछ साल बाद भारत के ख़िलाफ़ शानदार प्रदर्शन करके जब शोएब स्टार बनकर लौटे, तो वह अपना वादा निभाने लाहौर पहुंचे। उन्होंने अज़ीज़ ख़ान को ढूंढ़ निकाला। दोनों ने साथ खाना खाया। फिर तांगे वाले ने उन्हें उसी रास्ते पर तांगे की सवारी कराई जहां वह उन्हें ट्रायल के लिए छोड़ने गया था।
फायरिंग, लाशें, हड़तालें और कर्फ़्यू
पीआईए टीम में चयन के बाद शोएब कराची पहुंच गए। लेकिन रहने का इंतज़ाम नहीं किया गया। उन्हें लियाक़ताबाद और लालूखेत जैसे इलाक़ों में साधारण कमरों में रहना पड़ा।
यह वह दौर था जब कराची में राजनीतिक हिंसा और ऑपरेशन चल रहे थे। शहर में अक्सर हड़तालें होती थीं। फायरिंग होती थी। कर्फ़्यू लग जाता था।
शोएब बताते हैं कि उन्हें रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलकर नेशनल स्टेडियम जाना पड़ता था। कई बार अचानक गोलीबारी शुरू हो जाती थी। तब वह ज़मीन पर बैठ जाते थे ताकि किसी गोली का निशाना न बन जाएं।
उन्होंने लगभग डेढ़ साल ऐसे हालात में गुज़ारे।
ज़िंदगी में पहली बार बम धमाका देखा
मई 2002 में कराची में पाकिस्तान और न्यूज़ीलैंड टीम के होटल के बाहर बड़ा बम धमाका हुआ था।
शोएब बताते हैं कि वह अपने कमरे में बैठे थे। अचानक तेज़ धमाका हुआ और बाहर आग दिखाई दी। उन्हें लगा जैसे कान के पर्दे फट गए हों।
राशिद लतीफ़ ने कमरे का दरवाज़ा तोड़कर उन्हें बाहर निकाला।
नीचे पहुंचने पर उन्होंने न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ियों को रोते हुए देखा। वह बेहद डरे हुए थे।
शोएब कहते हैं कि इस घटना का उन पर गहरा मानसिक असर पड़ा और लंबे समय तक वह कराची आने से डरते रहे।
शाहरुख़ ख़ान की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए था
साल 2008 में आईपीएल का पहला सीज़न शुरू हुआ। शोएब अख़्तर भी इसका हिस्सा बने।
वह बताते हैं कि उस समय आईपीएल और आईसीएल दोनों लीग शुरू हो रही थीं। अभिनेता शाहरुख़ ख़ान ने उनसे संपर्क किया और कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेलने का प्रस्ताव दिया।
शोएब शाहरुख़ ख़ान और ललित मोदी से मिले। उनके मुताबिक़ उनसे कुछ आर्थिक वादे किए गए थे। लेकिन बोली प्रक्रिया के बाद उन्हें निराशा हुई।
शोएब कहते हैं कि उन्होंने शाहरुख़ ख़ान से साफ़ कहा था कि उन्हें मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं हैं। उनके मुताबिक़ मामला सिर्फ़ पैसे का नहीं, बल्कि खिलाड़ी की हैसियत और सम्मान का भी था।
वह लिखते हैं कि आज उन्हें लगता है कि उन्हें ललित मोदी और शाहरुख़ ख़ान की बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।
आसिफ़ ज़रदारी और अल्ताफ़ हुसैन से मदद क्यों मांगी
शोएब के मुताबिक़ केंद्रीय अनुबंध को लेकर दिए गए एक बयान पर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड उनसे नाराज़ हो गया था। उन पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया। इसकी वजह से उनका आईपीएल में खेलना भी ख़तरे में पड़ गया।
शोएब का दावा है कि उस समय पीसीबी चेयरमैन नसीम अशरफ़ उनके विरोधी थे।
वह बताते हैं कि इस स्थिति से निकलने के लिए उन्होंने एक दोस्त के ज़रिए आसिफ़ अली ज़रदारी से संपर्क किया। साथ ही एमक्यूएम नेता अल्ताफ़ हुसैन को भी फ़ोन किया।
उनके मुताबिक़ रहमान मलिक ने इस मामले में दख़ल दिया। बाद में उनकी और नसीम अशरफ़ की मुलाक़ात कराई गई। इसके बाद उन पर लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया गया और वह आईपीएल खेलने के लिए पात्र हो गए।
आईपीएल में उन्होंने कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से खेलते हुए दिल्ली डेयरडेविल्स के ख़िलाफ़ शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, एबी डिविलियर्स और मनोज तिवारी को आउट किया। टीम की जीत के बाद शाहरुख़ ख़ान ख़ुशी में उन्हें गले लगाने पहुंच गए थे।
ब्रायन लारा से क्या कहा था
शोएब की इच्छा थी कि वह अपने पसंदीदा बल्लेबाज़ ब्रायन लारा को गेंदबाज़ी करें। यह मौक़ा 2004 की चैंपियंस ट्रॉफ़ी में मिला।
शोएब बताते हैं कि उन्होंने लारा से कहा था, "आप मेरे पसंदीदा बल्लेबाज़ हैं और आपके लिए गेंदबाज़ी करना मेरे लिए सम्मान की बात है।"
लेकिन मज़ाक में लारा ने रामनरेश सरवन से कहा कि शोएब कह रहे हैं कि वह उन्हें मार देंगे।
संयोग से कुछ देर बाद शोएब की एक गेंद लारा की गर्दन पर लगी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। बाद में यह अफ़वाह फैल गई कि शोएब ने धमकी दी थी।
हालांकि लारा ने ख़ुद इस ग़लतफ़हमी को दूर किया और शोएब से माफ़ी भी मांगी।
रोमांच के बिना ज़िंदगी अधूरी
शोएब अख़्तर को रोमांच पसंद था। उन्होंने स्काई डाइविंग की। बंजी जंपिंग की। जंगलों में घूमे। बी-52 बमवर्षक विमान की उड़ान का अनुभव लिया। पार्टियों में खुलकर नाचे।
वह अंपायर रूडी कर्टज़न के साथ अपनी शरारतों का भी ज़िक्र करते हैं। शोएब के मुताबिक़ वह मज़ाक में अक्सर उनकी शर्ट खींच देते थे। रूडी कभी नाराज़ नहीं होते थे।
साल 2006 में घुटने के ऑपरेशन के दौरान शोएब कुछ समय के लिए होश में आ गए थे। डॉक्टरों ने उन्हें दोबारा बेहोश किया और ऑपरेशन पूरा किया।
फ़िल्म गैंगस्टर में काम न कर पाने का अफ़सोस
लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने संकेत दिया कि अगर वह फ़िल्म करेंगे तो उन पर कार्रवाई हो सकती है। साथ ही उनके दोस्तों ने भी सलाह दी कि अगर वह क्रिकेट करियर को गंभीरता से लेना चाहते हैं तो फ़िल्मों से दूर रहें।
आख़िरकार शोएब ने फ़िल्म में काम नहीं किया। बाद में उन्हें इसका कुछ अफ़सोस भी रहा।
Open Questions
- शाहरुख़ ख़ान और ललित मोदी ने शोएब अख़्तर से क्या आर्थिक वादे किए थे?
- पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शोएब अख़्तर पर किस बयान के लिए पाँच साल का प्रतिबंध लगाया था?
- फ़िल्म "गैंगस्टर" में काम न करने के पीछे पीसीबी की कार्रवाई की धमकी का सटीक स्वरूप क्या था?

