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Geriऊना घटना के 10 साल: सरवैया परिवार की बदली पहचान और न्याय की लड़ाई
ऊना घटना के 10 साल: सरवैया परिवार की बदली पहचान और न्याय की लड़ाई
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BBC हिंदी12.07.2026Siyaset8 dk okumaIndia

ऊना घटना के 10 साल: सरवैया परिवार की बदली पहचान और न्याय की लड़ाई

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गुजरात के ऊना में 2016 की दलित अत्याचार की घटना के दस साल बाद, सरवैया परिवार ने मृत पशुओं की खाल उतारने का काम छोड़कर दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं के रूप में अपनी पहचान बनाई है। परिवार का कहना है कि न्याय के लिए उनकी लड़ाई जारी है, क्योंकि सरकार के कई वादे अभी पूरे नहीं हुए हैं।

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Author, रॉक्सी गागडेकर छारा

पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता

प्रकाशित 4 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 9 मिनट

घर में दाख़िल होते ही सबसे पहले जो चीज़ नज़र आती है, वो है दीवार पर टंगीं चार तस्वीरें- डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, गौतम बुद्ध, महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की.

घर के हर एक सदस्य के लिए ये न केवल महान व्यक्तित्वों की तस्वीरें हैं, बल्कि पिछले दस सालों में उनके जीवन में आए बदलावों का प्रमाण भी हैं.

यह वही घर है जहां एक दशक पहले लोग अपनी संवेदना व्यक्त करने आते थे. देशभर के राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के लिए यह घर दलितों पर हुए अत्याचारों का प्रतीक बन गया था.

11 जुलाई 2016 को गुजरात के ऊना में सरवैया परिवार के चार सदस्यों को सार्वजनिक रूप से पीटा गया और अर्धनग्न अवस्था में घुमाया गया. परिवार के मुखिया बालूभाई सरवैया पर भी हमला किया गया था.

इस घटना ने पूरे देश में दलितों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचारों पर बहस छेड़ दी थी और गुजरात में एक व्यापक दलित आंदोलन को जन्म दिया.

जब बीबीसी इस घटना के दस साल बाद सरवैया परिवार के घर पहुँचा, तो सिर्फ़ समय ही नहीं बदला था. घर की दीवारें, उनके विचार और यहां तक कि परिवार की पहचान भी बदली दिखी.

सरवैया परिवार कभी मृत पशुओं की खाल उतारकर अपना गुज़ारा करता था. आज यह परिवार डॉ. आंबेडकर के विचारों को अपने जीवन का आधार मानता है और जाति आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को उनके अधिकारों के लिए लड़ने में मदद करता है.

परिवार का कहना है कि 2016 की घटना ने उनसे बहुत कुछ छीन लिया, लेकिन साथ ही उन्हें एक ऐसी पहचान भी दी जो उनके पास पहले कभी नहीं थी.

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उनके लिए ये दस साल न केवल न्याय के लिए संघर्ष के रहे हैं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीना सीखने की यात्रा भी रहे हैं.

घटना को दस साल बीत चुके हैं, लेकिन सरवैया परिवार का कहना है कि उनकी लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है. घटना के बाद राज्य सरकार ने परिवार के लिए वैकल्पिक रोज़गार, पुनर्वास और न्याय सहित कई वादे किए थे.

परिवार का कहना है कि इनमें से कई वादे आज भी पूरे नहीं हुए.

जब बीबीसी की टीम सरवैया परिवार के घर पहुँची, तो परिवार ने पिछले दस सालों के संघर्ष की पूरी कहानी सुनाई.

पुलिस में शिकायत से लेकर जांच-पड़ताल, राजनेताओं और सरकार के सामने अपनी बात रखना, विरोध प्रदर्शन, रैलियों और 2018 में हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म को अपनाने का फ़ैसला.

2016 की घटना के दिन से मैंने भी इस परिवार को नज़दीक से फ़ॉलो किया है.

10 साल पहले यह साधारण परिवार मृत मवेशियों की खाल उतारने का काम करता था. और आज यह परिवार दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं के तौर पर जाना जाता है.

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वशराम सरवैया 11 जुलाई, 2016 की घटना के चार पीड़ित युवकों में से एक हैं. आज, वह अपने इलाक़े में जाति आधारित अत्याचारों के पीड़ितों की लड़ाई में क़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिए मदद करते हैं.

उनका कहना है कि 2016 से पहले का उनका जीवन और आज का जीवन बहुत अलग है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "2016 से पहले, मैं एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे दुनिया के बारे में कुछ भी पता नहीं था. मुझे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर या हमारे देश की अन्य महान हस्तियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मुझे भारतीय संविधान और अनुसूचित जाति के सदस्यों के रूप में हमारे अधिकारों के बारे में पता भी नहीं था."

वह आगे कहते हैं, "इस भयावह घटना के बाद जब मैंने लोगों से मिलना शुरू किया, तो मुझे धीरे-धीरे इन सभी विषयों की समझ आने लगी. उसके बाद मुझे सरकारी अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों से आत्मविश्वास से बात करने का साहस मिला."

वह कहते हैं, "2016 से पहले हम जो ज़िंदगी जी रहे थे, वह आज बदल गई है. हम अब हिंदू धर्म का पालन नहीं करते हैं. मैं उपवास, अनुष्ठानों या त्योहारों पर पैसा ख़र्च नहीं करता. आज जब कोई जाति आधारित भेदभाव या अत्याचार से प्रताड़ित होता है, तो बहुत से लोग मदद के लिए मेरे पास आते हैं."

हालांकि, इस संघर्ष की उनकी यादों में उनकी मां कुंवरबेन का संघर्ष सबसे बड़ा है.

वशराम सरवैया के अनुसार, हमले के दौरान उनकी मां हाथ जोड़कर हमलावरों से अपने बेटों की जान बचाने की गुहार लगा रही थीं.

कुंवरबेन उस घटना को याद करते हुए कहती हैं, "जब मैं वहां पहुंची तो मेरे बेटों की पिटाई हो रही थी. मैं चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें समझा रही थी कि मेरे बेटों ने गाय को नहीं मारा, वे तो बस मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे."

"फिर भी वे मेरे बेटों और मेरे पति को पीटते रहे. लेकिन फिर हमने ख़ुद को संभाला और आज हम जिस तरह की ज़िंदगी जी रहे हैं, वैसा जीना शुरू किया."

बीबीसी से बात करते हुए वह कहती हैं, "शुरुआत में मेरे लिए हिंदू धर्म का त्याग करना आसान नहीं था. मैं कई व्रतों और धार्मिक अनुष्ठानों में विश्वास करती थी. लेकिन फिर मुझे अहसास हुआ कि जीवन में सबसे अहम चीज़ जाति आधारित भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ना है."

उनका कहना है कि 10 साल बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने उस समय किए गए सभी वादों को पूरा नहीं किया है.

हालांकि, बीबीसी गुजराती ने इस संबंध में गुजरात राज्य के सामाजिक सशक्तिकरण मंत्री प्रद्युमन वाजा से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.

उनका जवाब आते ही उसे इस रिपोर्ट में जोड़ दिया जाएगा.

न्याय के लिए 10 साल से इंतज़ार

सरवैया परिवार के मुखिया बालूभाई सरवैया का कहना है कि 2016 की घटना उनके लिए एक ऐसा मोड़ साबित हुई जिसने उनकी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी.

वह कहते हैं, "इस घटना ने हमें गौरव दिया. इससे पहले हम अपमान और दुर्व्यवहार का जीवन जी रहे थे, लेकिन इस घटना ने हमें हमेशा के लिए बदल दिया. आज कई दलित भाई हमारे रास्ते पर चल रहे हैं. मृत पशुओं की खाल उतारने के गंदे धंधे को छोड़कर सम्मानजनक रोज़गार अपना रहे हैं."

बालूभाई कहते हैं कि वे आज भी इस काम को करने वाले लोगों को यही बात कहते हैं.

वह कहते हैं, "डॉ आंबेडकर ने हमें यह काम छोड़ने को कहा है. लोग अपने मृत जानवरों के साथ जो चाहें वो करें, लेकिन हमें गरिमा के साथ जीना चाहिए."

स्थानीय दलित समुदाय में बालूभाई को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जो अपने विचारों पर अडिग रहते हैं. हालांकि, परिवार का कहना है कि न्याय के लिए उनकी लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है.

वेरावल सेशन्स कोर्ट ने कुल 40 अभियुक्तों में से पांच को दोषी पाया और उन्हें पांच साल की कैद की सज़ा सुनाई, जबकि बाकी को बरी कर दिया. परिवार ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ गुजरात हाई कोर्ट में अपील दायर की है.

बालूभाई कहते हैं, "हमें ऐसा लग रहा है जैसे हमारे साथ मज़ाक हो रहा है. अदालत का कहना है कि सिर्फ़ पांच लोगों ने हमारी पिटाई की, तो फिर वहां मौजूद सैकड़ों लोगों का क्या, जो हमारी पिटाई कर रहे थे और नारे लगा रहे थे? न्याय मिलने तक हम अपनी क़ानूनी लड़ाई जारी रखेंगे."

आजकल बालूभाई का अधिकांश समय खेती-बाड़ी में बीतता है. उनके घर में अब भी गाय और भैंस हैं.

वह कहते हैं, "मेरे पास 2016 से पहले भी गायें थीं. हम आज भी गायों से प्यार करते हैं. भले ही हम हिंदू नहीं हैं, लेकिन गायों के प्रति हमारा भावनात्मक जुड़ाव वैसा ही बना हुआ है."

पिछले दस सालों में इस परिवार ने कई राजनेताओं के दौरे भी देखे हैं.

इस घटना के बाद गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, बहुजन समाज पार्टी की मायावती और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं ने उनके घर का दौरा किया.

बालूभाई कहते हैं, "राहुल गांधी और मायावती को छोड़कर लगभग किसी ने भी अपने वादे पूरे नहीं किए हैं."

परिवार का कहना है कि दलित अधिकारों के कुछ कार्यकर्ता पूरे संघर्ष के दौरान उनके साथ रहे.

वेव फाउंडेशन की संयोजक और मानवाधिकार कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप का कहना है कि सरवैया परिवार ने पिछले दस सालों में न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी संघर्ष किया है.

वह कहती हैं, "पहले उनकी आय का मुख्य स्रोत मृत जानवरों की खाल उतारना था. वो अब यह काम नहीं करते. वो फिलहाल खेतिहर मजदूर के रूप में काम करते हैं और अपनी गायों का दूध बेचकर अपना गुज़ारा करते हैं."

मंजुला प्रदीप कहती हैं, "सरकार को इस परिवार को तुरंत रोज़गार, खेती के लिए ज़मीन या पेट्रोल पंप जैसे आय का एक स्थिर स्रोत उपलब्ध कराना चाहिए, जिससे वे आर्थिक रूप से स्थिर जीवन जी सकें."

"उनका कहना है कि वेरावल सेशन्स कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ गुजरात हाई कोर्ट में अपील दायर की गई है और अब अगली सुनवाई का इंतज़ार है."

दलितों की क्या शिकायत थी?

इस साल मार्च में वेरावल की एक विशेष अदालत ने ऊना मामले में 40 अभियुक्तों में से पांच को दोषी ठहराया था और सबको पांच साल की कठोर कारावास और पांच हज़ार रुपये के ज़ुर्माने की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने 35 अभियुक्तों को बरी कर दिया था.

सज़ा सुनाए जाने के बावजूद सभी पांच दोषियों को एक तरह से रिहा कर दिया गया, क्योंकि उनकी गिरफ़्तारी के बाद जब अदालत में सुनवाई चल रही थी, तब तक ये अभियुक्त श्रम कैदियों के तौर पर छह साल से अधिक समय से जेल में थे.

अदालत ने सज़ा की अवधि को पांच साल कर दिया और इसी वजह से दोषी पाए जाने के बावजूद पांचों को छूट मिल गई.

सरकार ने इस मामले में अभियुक्तों पर हत्या के प्रयास सहित अन्य गंभीर अपराधों का आरोप लगाया है, जिसके लिए 10 साल की कारावास की सज़ा का प्रावधान है.

11 जुलाई 2016 को ऊना में क्या हुआ था?

सरकारी चार्जशीट के अनुसार, वशरामभाई के पिता बालूभाई, माता कुंवरबेन और रिश्तेदार अरजनभाई बाबरिया ने वशरामभाई और अन्य लोगों को बचाने के लिए बीच-बचाव किया, लेकिन कथित गोरक्षकों ने उन पर भी हमला कर दिया.

इसके बाद अभियुक्तों ने वशरामभाई, रमेशभाई, बेचरभाई और अशोकभाई को एक गाड़ी में बिठाया और उन्हें ऊना शहर ले गए.

उन्होंने उन चारों को गाड़ी के पीछे रस्सी से बांध दिया. फिर ऊना बस स्टैंड से ऊना पुलिस स्टेशन तक सार्वजनिक तौर पर उन्हें मारते मारते ले गए.

इस मामले का वीडियो सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर वायरल हो गया और गुजरात समेत पूरे देश में चर्चा का केंद्र बन गया.

सरकार ने वेरावल अदालत को बताया कि ऊना में दलितों पर हुए अत्याचारों के बाद गुजरात में दंगे और पुलिस पर हमले के 74 मामले सामने आए. इसके अलावा 23 दलितों ने आत्महत्या की कोशिश की, जिनमें से एक की मौत भी हो गई थी.

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Bu haber ilk olarak şurada yayınlandı: BBC हिंदी.

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