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Geriपुलिस से पिटने का मज़ाक और विरोध प्रदर्शनों में मीम: युवाओं का नया तरीक़ा
पुलिस से पिटने का मज़ाक और विरोध प्रदर्शनों में मीम: युवाओं का नया तरीक़ा
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पुलिस से पिटने का मज़ाक और विरोध प्रदर्शनों में मीम: युवाओं का नया तरीक़ा

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दिल्ली में पीएम मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान, युवा प्रदर्शनकारी पुलिस कार्रवाई के बावजूद सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक वीडियो और मीम साझा कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति इंटरनेट युग में पली-बढ़ी पीढ़ी के लिए विरोध प्रदर्शन को अनुभव करने का एक नया तरीक़ा दर्शाती है, जहाँ हास्य डर और राजनीतिक संदेश के साथ मौजूद है।

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पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के हज़ारों समर्थकों द्वारा परीक्षा में गड़बड़ियों और प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में युवा सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं।

Yazı boyutu

सोमवार को 20 वर्षीय छवि (बदला हुआ नाम) दिल्ली में एक मेट्रो स्टेशन के बाहर कुछ देर के लिए रुकीं. छवि पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने आई थीं.

उन्होंने अपना फ़ोन रेलिंग के सहारे टिकाया, कुछ क़दम पीछे गईं और एक छोटा-सा 'फ़िट चेक' वीडियो रिकॉर्ड किया. इसमें उन्होंने प्रदर्शन पर जाने से पहले अपना पहनावा दिखाया.

उन्होंने कैमरे की तरफ़ मुस्कुराते हुए कहा, "दोस्तों, पुलिस से पिटने जा रही हूं."

कुछ घंटों बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया. इस दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के हज़ारों समर्थक संसद की ओर मार्च कर रहे थे.

युवाओं के नेतृत्व वाला यह आंदोलन परीक्षा में गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ विरोध से शुरू होकर सरकार की जवाबदेही की व्यापक मुहिम में बदल गया.

प्रदर्शनकारी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं. प्रधान ने इस्तीफ़ा देने से इनकार किया है.

उनका आरोप है कि विपक्ष राजनीतिक फ़ायदे के लिए छात्रों का इस्तेमाल कर रहा है.

सोमवार को प्रशासन ने प्रदर्शन स्थल के आसपास मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी थी. शाम तक प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों की पिटाई की है, जबकि पुलिस का कहना था कि उसके कई अधिकारी भी घायल हुए हैं.

जब छवि ने उस शाम अपने वीडियो अपलोड किए तो एक बात सबसे अलग नज़र आई. मार्च शुरू होने से पहले उन्होंने पुलिस से पिटने का मज़ाक किया था.

शाम के वीडियो में वे मुस्कुरा रही थीं. छवि पुलिसकर्मियों के साथ खड़ी होकर तस्वीरें खिंचवा रही थीं, जीत का निशान बना रही थीं, भीड़ के बीच वीडियो रिकॉर्ड कर रही थीं और यहां तक कि एक घायल प्रदर्शनकारी का इंटरव्यू भी ले रही थीं.

ये उन हज़ारों रीलों और मीम वाले वीडियो में शामिल थे, जिन्होंने इंस्टाग्राम पर एक बाढ़-सी ला दी.

कुछ में ग़ुस्सा साफ़ झलक रहा था. कुछ बेचैनी, डर या शांत प्रतिरोध से भरे थे. लेकिन सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाली चीज़ अक्सर उनका व्यंग्यात्मक अंदाज़ था.

एक युवा महिला पुलिसकर्मियों के सामने खड़ी होकर आराम से अपनी लिपस्टिक लगा रही थी.

दूसरी ने मज़ाक में कहा कि वह "प्रदर्शन में अच्छी दिखने की कोशिश कर रही है, क्योंकि सरकार न्याय नहीं दे सकी."

एक रील की शुरुआत सामान्य 'आउटफ़िट रिवील' वीडियो की तरह हुई, लेकिन अचानक सीन बदलकर आंसू गैस से बचकर भागते प्रदर्शनकारियों पर पहुंच गया. एक अन्य रील में आंसू गैस का ऐसे 'रिव्यू' किया गया, जैसे किसी नए रेस्तरां की समीक्षा हो.

ऑनलाइन देखने वाले कई लोगों को यह हास्य हिंसा के बिल्कुल विपरीत लगा. लेकिन जिन युवाओं ने ये वीडियो बनाए, उनके लिए इसमें कोई विरोधाभास नहीं था.

इस रिपोर्ट के लिए जिन प्रदर्शनकारियों से बात की गई, उनमें से किसी ने भी एल्गोरिद्म, एंगेजमेंट या वायरल होने की बात नहीं की. उनका कहना था कि वीडियो रिकॉर्ड करना उनके लिए प्रदर्शन का ही लगभग अभिन्न हिस्सा था.

और जब उन्होंने हास्य का सहारा लिया, तो वह लगभग हमेशा ख़ुद पर ही केंद्रित था.

जैसे लाठीचार्ज से बचने के लिए कई किलोमीटर भागने का मज़ाक उड़ाना या आंसू गैस के बीच भागने से कुछ ही पल पहले 'आउटफ़िट रिवील' रिकॉर्ड करने पर हंसना. इन चुटकुलों ने डर को ख़त्म नहीं किया. डर और हास्य साथ-साथ मौजूद थे.

रील्स, मीम और सियासत का मिलन

विशेषज्ञों का कहना है कि यह रुझान इस बात की ओर इशारा करता है कि इंटरनेट के दौर में पली-बढ़ी एक पीढ़ी प्रदर्शन को किस तरह अनुभव करती है.

तकनीक और समाज का अध्ययन करने वाले मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जॉयोजीत पाल कहते हैं, "पुरानी पीढ़ियां राजनीतिक जीवन और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को अलग-अलग मानती थीं."

उन्होंने कहा, "नई पीढ़ियां ऐसे माहौल में बड़ी होती हैं, जहां राजनीति उनके मीम, पारिवारिक तस्वीरों और रोज़मर्रा की यात्राओं के साथ-साथ मौजूद रहती है."

दूसरे शब्दों में, प्रदर्शन भी रिकॉर्ड किए जाने वाले एक और पल में बदल जाता है.

छवि ने पुलिस कार्रवाई शुरू होने के बाद भी वीडियो रिकॉर्ड करना जारी रखा. बाद में कुछ लोगों ने उन पर हिंसा को 'कॉन्टेंट' की तरह पेश करने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, "लेकिन उस समय में जोश में थी. मैं डरी हुई थी, सहमी हुई थी. मेरे सामने या तो डर का सामना करते हुए हंसने का विकल्प था या रोने का."

यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी में डिजिटल मानवशास्त्री पायल अरोड़ा कहती हैं कि हालात हिंसक होने के बाद भी रिकॉर्डिंग जारी रखने की यह प्रवृत्ति दुनिया भर में तेज़ी से आम होती जा रही है.

स्मार्टफ़ोन ने आम लोगों को राजनीतिक उथल-पुथल का दस्तावेज़ तैयार करने वाला बना दिया है. वे ऐसे पल रिकॉर्ड कर रहे हैं, जो शायद अन्यथा गुम हो जाते.

उन्होंने कहा, "किसी प्रदर्शन को रिकॉर्ड करना अपने आप में ही एक मक़सद बन जाता है. उनका संदेश कुछ ऐसा होता है, 'यह हुआ था. हम वहां थे.' हम इसे याद रखेंगे."

हास्य भी एक तय पैटर्न के तहत सामने आया. किसी भी युवा प्रदर्शनकारी ने उस दिन को मज़ेदार नहीं बताया. उन्होंने आंसू गैस, लाठीचार्ज और शांतिपूर्ण मार्च के अचानक अफ़रातफ़री में बदल जाने की उलझन के बारे में बात की.

चुटकुले तो बाद में आए, लगभग सहज रूप से ये उस अनुभव को अपने साथ लेकर चलने के एक तरीक़े के रूप में सामने आए.

'अब राजनीति रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है'

निशांत शाह हांगकांग की चाइनीज़ यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म एंड कम्युनिकेशन में डिजिटल नैरेटिव्स सेंटर के निदेशक हैं.

निशांत शाह कहते हैं कि लोग अक्सर इस हास्य को उदासीनता समझने की ग़लती करते हैं. उनके मुताबिक़ वास्तव में इसका मक़सद लगभग विपरीत होता है.

उन्होंने कहा, "राजनीति रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है. यह भावनात्मक भी है और अनुभव से जुड़ी हुई भी."

हास्य लंबे समय से विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा रहा है. यह एकजुटता पैदा कर सकता है, तनाव कम कर सकता है और लोगों को डर के क्षणों से गुज़रने में मदद कर सकता है.

शाह ने कहा, "भले ही मक़सद बेहद कठिन हो और संघर्ष कितना भी तीखा हो, फिर भी उसमें ख़ुशी, हंसी, गीत और उम्मीद मौजूद रहते हैं. इनके बिना आंदोलन लंबे समय तक टिक नहीं सकते."

नए दौर के नए तरीके

21 वर्षीय ईशान (नाम बदल दिया गया है) पहली बार किसी प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आए हैं. जब उनके पास आंसू गैस के गोले गिरे तो उन्होंने कुछ देर के लिए वहां से जाने के बारे में सोचा.

लेकिन इसके बाद उन्होंने अपना फ़ोन निकाल लिया.

बाद में उन्होंने जो रील पोस्ट की, उसमें सड़क पर फैला सफ़ेद धुआं दिखाई दे रहा था. उसके साथ एक साधारण-सा कैप्शन था, "दिल्ली पुलिस को नहीं पता कि मैं जमना (यमुना) पार से हूं."

ईशान हंसते हुए कहते हैं, "वहां की बदबू आंसू गैस से भी ज़्यादा है."

उन्होंने बीबीसी से कहा कि इस मज़ाक का मक़सद यह दिखाना नहीं था कि कुछ हुआ ही नहीं.

उन्होंने कहा, "मक़सद यह था कि उस दिन की याद पर डर का नियंत्रण न होने दिया जाए."

विरोध प्रदर्शनों ने हमेशा डर और उम्मीद को एक ही तस्वीर में साथ रखने का रास्ता खोजा है.

आज़ादी के आंदोलन में गीत और भाषण थे. ट्रेड यूनियनें बैनरों के साथ मार्च निकालती थीं. छात्र आंदोलनों ने पोस्टर और नुक्कड़ नाटक अपनाए.

हाल के वर्षों में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों की पहचान ग्रैफ़िटी और सार्वजनिक रूप से संविधान पढ़ने से बनी, जबकि किसान आंदोलन ट्रैक्टर रैलियों और दिल्ली की सीमाओं से होने वाली लाइवस्ट्रीम के लिए जाना गया.

सीजेपी के कई प्रदर्शनकारियों की तरह ईशान भी उस पीढ़ी की भाषा में बात करते हैं, जो इंटरनेट के दौर में बड़ी हुई है. शाह का कहना है कि इस भाषा को सतही समझकर ख़ारिज कर देना, उसके असली मक़सद को न समझना है.

शाह ने कहा, "हम अक्सर नई तकनीकों को पुरानी सोच के ज़रिए समझने की ग़लती करते हैं."

लेकिन उनके मुताबिक़, मीम सिर्फ़ राजनीतिक पोस्टर का आधुनिक रूप नहीं है. लोग जब उसे दोबारा बनाते हैं, उसकी पैरोडी करते हैं और उसे आगे साझा करते हैं, तो उसके अर्थ भी बदलते जाते हैं. उसे शेयर करना भी प्रदर्शन में भागीदारी का एक तरीका बन जाता है.

18 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र मनीत के साथ भी ऐसा ही हुआ. यह उनका पहला प्रदर्शन था और उन्होंने लगभग तय कर लिया था कि वे वीडियो रिकॉर्ड नहीं करेंगे.

फिर उन्होंने चारों ओर देखा और कहा, "हर कोई रिकॉर्डिंग कर रहा था, कैमरे से बात कर रहा था, बस ख़ुद जैसा था. तब मैंने अपने दोस्त से कहा कि वह मेरा वीडियो रिकॉर्ड करे."

मनीत के लिए यही विडंबना सबसे अहम थी.

उन्होंने कहा, "हर युवा ख़बरें नहीं पढ़ता. अगर हास्य अहम बातचीत को ज़्यादा लोगों तक पहुंचा सकता है, तो हम उसका इस्तेमाल क्यों न करें?"

Açık Sorular

  • क्या सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों पर कोई कार्रवाई करेगी?
  • प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई का क्या परिणाम होगा?
  • भविष्य के विरोध प्रदर्शनों में सोशल मीडिया का उपयोग कैसे विकसित होगा?

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Bu haber ilk olarak şurada yayınlandı: BBC हिंदी.
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