Son Dakika
RUМЧС Москвы опровергло сообщения о возгорании на Московском НПЗCN今年第9号台风“巴威”逼近 福建宁德提升防台风应急响应至Ⅱ级JPJR東日本、モバイルSuica障害の原因と対策を発表、運賃等の補償も実施DEBundesrat stimmt über Gesundheitsreform ab - reicht es für die Pläne der Regierung?DEBundesrat will Leugnung des Existenzrechts Israels unter Strafe stellenEUVolkswagen Labour Representatives Block Restructuring PlanRUГенконсульство РФ: Задержанная в Анталье Людмила Инан не является гражданкой РоссииCN巴威颱風來襲,5人違規在觀音海水浴場玩風箏衝浪遭舉發TRGirit'te Tarım Alanında Başlayan Yangın Ormanlık Alana SıçradıCN蘇志燮新劇《金特務》收視破21.6% Netflix奪冠 盤點6部經典代表作RUМЧС Москвы опровергло сообщения о возгорании на Московском НПЗCN今年第9号台风“巴威”逼近 福建宁德提升防台风应急响应至Ⅱ级JPJR東日本、モバイルSuica障害の原因と対策を発表、運賃等の補償も実施DEBundesrat stimmt über Gesundheitsreform ab - reicht es für die Pläne der Regierung?DEBundesrat will Leugnung des Existenzrechts Israels unter Strafe stellenEUVolkswagen Labour Representatives Block Restructuring PlanRUГенконсульство РФ: Задержанная в Анталье Людмила Инан не является гражданкой РоссииCN巴威颱風來襲,5人違規在觀音海水浴場玩風箏衝浪遭舉發TRGirit'te Tarım Alanında Başlayan Yangın Ormanlık Alana SıçradıCN蘇志燮新劇《金特務》收視破21.6% Netflix奪冠 盤點6部經典代表作
Newsgather
Geriभारत में इस्लाम का आगमन: तलवार की धार से या व्यापार के ज़रिए?
भारत में इस्लाम का आगमन: तलवार की धार से या व्यापार के ज़रिए?
Dünya
BBC हिंदी22 sa önceDünya7 dk okumaIndia

भारत में इस्लाम का आगमन: तलवार की धार से या व्यापार के ज़रिए?

Hızlı Bakış

भारत में इस्लाम के आगमन को लेकर प्रचलित धारणा है कि यह 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ तलवार के बल पर हुआ। हालांकि, कई इतिहासकार इस विचार से असहमत हैं और मानते हैं कि यह एक लंबी सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था, जिसमें व्यापार, सूफी संतों का प्रभाव और कृषि विकास जैसी कई वजहें शामिल थीं।

Yapay zekâ özeti

Neden Önemli?

भारत में इस्लाम के आगमन को लेकर आम धारणा है कि यह 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ तलवार के बल पर हुआ। कई विद्वान इस विचार से असहमत हैं और इसे एक ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम मानते हैं।

Yazı boyutu

Author, मिर्ज़ा एबी बेग

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 9 जुलाई 2026

पढ़ने का समय: 12 मिनट

भारत में एक आम धारणा यह पेश की जाती है कि देश में इस्लाम का आगमन 712 ईस्वी में उमय्यद शासन के दौरान मोहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ यानी तलवार के बल पर हुआ था.

कई विद्वान इस विचार से सहमत नहीं हैं.

कई इतिहासकारों का कहना है कि भारत में इस्लाम का आगमन किसी एक घटना का नतीजा नहीं था, बल्कि यह कई सदियों तक चलने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम था.

इतिहासकार और समाजशास्त्री इस प्रक्रिया को अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं और इसकी व्याख्या के लिए कई प्रमुख सिद्धांत पेश करते हैं.

इनमें एक सिद्धांत यह है कि भारत में इस्लाम के प्रचार में व्यापार की अहम भूमिका थी.

प्राचीन काल से ही भारत मसालों के लिए दुनिया भर में जाना जाता रहा है. इन मसालों में सबसे अधिक मांग काली मिर्च की रही है. अरब देशों से लेकर ग्रीक और रोमन साम्राज्य तक भारतीय काली मिर्च पहुँचती रही है.

काली मिर्च के व्यापार को समझने के लिए हम केरल के कोच्चि शहर और वहां से कोडुंगल्लूर पहुंचे. स्थानीय परंपराओं के मुताबिक़, यहीं प्राचीन बंदरगाह मुज़िरिस मौजूद थी. ये बंदरगाह 15वीं सदी में आई विनाशकारी बाढ़ में पूरी तरह नष्ट हो गई थी.

अरब व्यापारियों का समुद्री सफर

हालांकि केरल जाने से पहले हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और मध्यकालीन इतिहास के प्रमुख इतिहासकार सैयद ज़हीर हुसैन जाफ़री से बातचीत की.

छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें

सबसे अधिक पढ़ी गईं

समाप्त

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें

दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

उनके मुताबिक़, बंगाल की खाड़ी की तुलना में अरब सागर ज्यादा शांत था. सैयद ज़हीर हुसैन ने बताया कि अगर इस समुद्र में एक तिनका या लकड़ी का टुकड़ा भी छोड़ दिया जाए, तो वह अरब और ओमान के तट तक पहुंच सकता था.

लंबे समय तक इस समुद्री मार्ग पर अरबों का प्रभाव रहा. वे मानसून के साथ भारत आते, यहां कुछ समय ठहरते और मानसून लौटने पर वापस अरब चले जाते. प्रोफेसर जाफ़री के अनुसार, इसी समुद्री रास्ते से अरब के लोग श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, मलेशिया और इंडोनेशिया तक भी पहुंचे.

प्रसिद्ध इतिहासकार सैयद सुलेमान नदवी अपनी किताब 'अरब और हिंद के ताल्लुकात' में लिखते हैं, "यूरोप और भारत के बीच का समुद्री मार्ग बेहद ख़ास था. शुरुआत में यह पूरी तरह अरबों के नियंत्रण में था. लेकिन ईसा मसीह के जन्म से क़रीब 300 साल पहले जब यूनानियों ने मिस्र पर क़ब्ज़ा किया, तो इस समुद्री मार्ग पर उनका नियंत्रण हो गया."

वह आगे लिखते हैं, "ईसा के क़रीब 600 साल बाद जब इस्लाम का उदय हुआ और अरबों का प्रभाव बढ़ा, तो छठी सदी में उन्होंने मिस्र से लेकर स्पेन तक अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया. इसके साथ ही भूमध्य सागर पर भी उनका नियंत्रण हो गया. इसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया का सबसे अहम व्यापारिक मार्ग अरबों के हाथ में आ गया और कई सदियों तक वह उसी के नियंत्रण में रहा."

प्रोफेसर जाफ़री के मुताबिक़, भारत में अपने प्रवास के दौरान कई अरब व्यापारियों ने स्थानीय महिलाओं से विवाह भी किए. अरबों और भारत के बीच इसी लंबे संपर्क के कारण दक्षिण भारत में एक ऐसे मुस्लिम समुदाय का विकास हुआ, जिन्हें 'मप्पिला मुस्लिम' कहा जाता है.

ऐतिहासिक साक्ष्यों की कमी

मुसलमान दक्षिण भारत में कब आए, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि इसके पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम हैं.

अरब नाविकों ने भी अपने सफर का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं छोड़ा. उन्होंने जो इमारतें बनाईं, उन पर भी शिलालेख नहीं लगाए गए. अगर कहीं शिलालेख थे भी, तो 16वीं सदी में पुर्तगालियों के आने और मुसलमानों के साथ हुए संघर्ष के दौरान बड़े पैमाने पर उन्हें नष्ट कर दिया गया.

शशि थरूर अक्सर इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि इस्लाम के उदय से कई सदियों पहले ही अरब व्यापारी और नाविक मालाबार तट पर आते-जाते थे.

उनके मुताबिक़, जब इस्लाम का उदय हुआ, तो वह केरल में तलवार के बल पर नहीं, बल्कि उन परिचित और भरोसेमंद अरब व्यापारियों के जरिए पहुंचा, जिन्हें स्थानीय लोग पहले से जानते थे. इसके साथ ही केरल के हिंदू राजा चेरामन पेरुमल के इस्लाम स्वीकार करने की कथा भी इस विषय से जुड़े प्रचलित विवरणों का हिस्सा है.

हम केरल के फोर्ट कोच्चि से सुबह-सुबह कोच्चि हेरिटेज प्रोजेक्ट के संस्थापक योहान बेनी कुरुविला और अपने कैमरामैन बिमल थंकाचन के साथ कोडुंगल्लूर में पेरियार नदी के किनारे पहुंचे.

वहां जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में इंडिया-अरब कल्चर सेंटर के पूर्व निदेशक और केरल के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के प्रोफेसर एमएच इलियास हमारा इंतजार कर रहे थे.

दक्षिण भारत में इस्लाम

प्रोफेसर इलियास के मुताबिक़, दक्षिण भारत में इस्लाम के आगमन को लेकर चार प्रमुख सिद्धांत हैं.

पहला सिद्धांत यह है कि पैग़ंबर मोहम्मद के जीवनकाल में ही इस्लाम प्राचीन मुज़िरिस बंदरगाह के रास्ते भारत पहुंच गया था

इस दावे के समर्थन में चेरामन जुमा मस्जिद का ज़िक्र किया जाता है. कहा जाता है कि इसका निर्माण 629 ईस्वी में मलिक बिन दीनार ने कराया था. मस्जिद पर लगे शिलालेख में भी यही उल्लेख मिलता है.

हालांकि, कई इतिहासकार इस तारीख को लेकर निश्चित राय देने से बचते हैं. इसकी वजह यह है कि कुछ परंपराओं में मलिक बिन दीनार को सहाबी माना गया है, जबकि कुछ में उन्हें ताबईन में शामिल किया गया है.

सहाबी उन्हें कहा जाता है जिन्होंने मुसलमान होने की स्थिति में पैगंबर हजरत मोहम्मद को देखा हो, जबकि ताबईन वे हैं जिन्होंने इस्लाम स्वीकार करने के बाद किसी सहाबी से मुलाक़ात की हो.

इस मस्जिद की स्थापना को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. कोडुंगल्लूर के हिंदू राजा चेरामन पेरुमल को अरब व्यापारियों ने बताया कि अरब में एक पैगंबर प्रकट हुए हैं. इसके बाद राजा अरब की यात्रा पर निकल पड़े. एक परंपरा के अनुसार, वहां उनकी मुलाक़ात पैगंबर हजरत मोहम्मद से हुई और उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया.

वहीं दूसरी परंपरा में कहा जाता है कि भारत लौटते समय ओमान के सलालाह में उनका निधन हो गया, जहां उनकी क़ब्र होने का दावा किया जाता है.

दूसरी परंपरा

प्रोफ़ेसर इलियास के मुताबिक़, दूसरी परंपरा के अनुसार राजा की पैगंबर हज़रत मोहम्मद से मुलाक़ात नहीं हो सकी और ओमान में ही उनका निधन हो गया.

हालांकि, दोनों परंपराओं में इस बात का ज़िक्र मिलता है कि उनकी मुलाक़ात मलिक बिन दीनार से हुई थी. उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के नाम एक पत्र भी भेजा, जिसमें मलिक बिन दीनार और उनके साथियों का सम्मान करने और उनके साथ अच्छा व्यवहार करने की बात कही गई थी.

जब मलिक बिन दीनार मुज़िरिस बंदरगाह, यानी आज के कोडुंगल्लूर पहुंचे, तो राजा के उत्तराधिकारी ने उनका स्वागत किया. साथ ही, मस्जिद बनाने के लिए राजमहल के पास ज़मीन भी दी. यह मस्जिद आज भी मौजूद है.

प्रोफ़ेसर इलियास ने कहा, "अरब मुख्य रूप से मसालों, ख़ासकर काली मिर्च के व्यापार के लिए यहां आए थे. लेकिन उन्होंने केवल इस्लाम ही नहीं, बल्कि कई दूसरी चीजें भी यहां पहुंचाईं."

"उदाहरण के तौर पर, हिसाब-किताब और नाप-तौल की कई पद्धतियां, जिनका इस्तेमाल आज भी किया जाता है. इसके अलावा उन्होंने बेहतर नाव और जहाज़ बनाने की तकनीक भी सिखाई."

चेरामन जामा मस्जिद

दोपहर की नमाज़ के समय, गर्म और उमस भरे मौसम में हम इस ऐतिहासिक मस्जिद पहुंचे. यहां हमारी मुलाक़ात मस्जिद के इमाम सलीम नदवी से हुई, जिन्होंने लखनऊ की प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्था नदवातुल उलेमा से शिक्षा प्राप्त की है.

उन्होंने बताया कि मस्जिद से लगे बरामदे में मलिक बिन दीनार के बेटे यूसुफ बिन दीनार और उनकी पत्नी की क़ब्रें हैं. वहीं, मलिक बिन दीनार और उनके साथियों ने उसी दौर में इस क्षेत्र में क़रीब दस मस्जिदें और खानकाहें स्थापित की थीं.

मलिक बिन दीनार की क़ब्र यहां से क़रीब 300 किलोमीटर उत्तर में अरब सागर के तट पर स्थित कासरगोड में बताई जाती है.

प्रोफेसर इलियास के मुताबिक़, अलग-अलग परंपराओं के बावजूद सभी एक बात पर सहमत हैं कि भारत में इस्लाम का परिचय राजा चेरामन के माध्यम से हुआ.

सातवीं और आठवीं सदी में अरब व्यापारी अरब सागर और हिंद महासागर के समुद्री व्यापार मार्गों पर प्रमुख भूमिका निभाते थे. वे अपने साथ केवल व्यापारिक सामान ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और धार्मिक परंपराएं भी लेकर आए.

केरल और गुजरात के तटीय इलाक़ों में स्थानीय शासकों ने इन व्यापारियों का स्वागत किया. उन्हें मस्जिदें बनाने और यहाँ में बसने की अनुमति भी दी गई.

युद्ध में जीत से इस्लाम का आगमन

एक सिद्धांत 'अरबों की जीत और राजनीतिक विस्तार' से जुड़ा है.

इसके अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम को पहली बड़ी राजनीतिक सफलता 712 ईस्वी में मिली, जब मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरब सेनाओं ने सिंध और मुल्तान पर क़ब्ज़ा किया.

बाद में गजनवी और गौरी शासकों के हमलों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी.

हालांकि, कुछ पुराने इतिहासकारों ने इसे 'तलवार के ज़रिए इस्लाम का आगमन' बताया.

लेकिन आधुनिक शोधकर्ताओं के मुताबिक़ इन विजयों का मुख्य मक़सद सत्ता स्थापित करना था, न कि लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन करना.

उनका कहना है कि धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया अधिकतर धीरे-धीरे और सामाजिक वजहों से हुई.

सूफ़ियों का असर

प्रोफ़ेसर जाफ़री का कहना है कि 'द ग्रेव्स ऑफ तरीम' नाम की पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद यह बात सामने आई कि यमन और हदरमौत के लोग जहां-जहां पहुंचे, वहां मस्जिदें, मकबरे और खानकाहें स्थापित हुईं.

ये केंद्र राजनीतिक इस्लाम के आगमन से पहले ही शांतिपूर्ण धार्मिक और सामाजिक केंद्रों के रूप में मौजूद थे, जहां से इस्लाम का प्रचार-प्रसार हुआ.

इस पुस्तक के अनुसार, भारत के तटीय इलाक़े सूफी संतों के महत्वपूर्ण केंद्र थे. यहां से वे न केवल व्यापार करते थे, बल्कि इस्लाम का संदेश लेकर मलेशिया और इंडोनेशिया तक भी पहुंचे.

11वीं सदी के बाद चिश्ती, सुहरावर्दी और अन्य सूफी सिलसिलों से जुड़े संत भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए. सूफी खानकाहें और दरगाहें ऐसे आध्यात्मिक केंद्र बनकर उभरीं, जहां हर धर्म के लोग आते थे.

अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां हिंदू और मुसलमान दोनों श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं. इस तरह सूफी आंदोलन ने भारत में इस्लाम के प्रसार में अहम भूमिका निभाई.

कृषि और राज्य का विस्तार

इस सिद्धांत के अनुसार, बंगाल और पंजाब जैसे क्षेत्रों में इस्लाम का प्रसार मुख्य रूप से कृषि विकास और राज्य की नीतियों से जुड़ा था.

इस्लाम धर्म मानने वाले शासकों ने बंज़र या खाली पड़ी ज़मीनें धार्मिक संस्थानों, सूफी खानकाहों और मस्जिदों को दीं. इन संस्थानों ने नई कृषि बस्तियां बसाईं. इन क्षेत्रों में रहने वाले किसानों ने धीरे-धीरे इस्लाम अपनाया, क्योंकि वे लोग राज्य की आर्थिक प्रगति और प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुके थे.

इन सभी सिद्धांतों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का प्रसार किसी एक कारण से हुआ नहीं था. बल्कि यह कई ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक वजहों के संयुक्त असर से हुआ.

व्यापार, आध्यात्मिक परंपराएं, राजनीति, सामाजिक न्याय और आर्थिक अवसर, इन सभी ने मिलकर एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसने इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को गहराई से प्रभावित किया.

Açık Sorular

  • मलिक बिन दीनार को सहाबी माना जाए या ताबईन?
  • चेरामन पेरुमल ने इस्लाम कब स्वीकार किया?
  • पुर्तगालियों ने कितने शिलालेख नष्ट किए?

İlgili Konular

Bu haber ilk olarak şurada yayınlandı: BBC हिंदी.

İlgili Haberler

Bu konuda daha fazlaइस्लाम