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رجوعक्या ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं?
क्या ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं?
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BBC हिंदी3‏/6‏/2026سياسة6 د قراءةIndia

क्या ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं?

نظرة سريعة

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी तृणमूल कांग्रेस पार्टी में बढ़ते विद्रोह और इस्तीफों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे पार्टी के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। कथित फर्जी हस्ताक्षर घोटाले और नेताओं की गिरफ्तारी ने पार्टी को संकट में डाल दिया है।

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Author, प्रभाकर मणि तिवारी

पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

प्रकाशित एक घंटा पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

नई पार्टी के गठन के बाद महज़ 13 साल के भीतर वाममोर्चा की 34 साल पुरानी सरकार को हटाकर तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने वाली ममता बनर्जी क्या अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं?

विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद पार्टी में तेज़ होती बग़ावत और इस्तीफ़ों के सिलसिले को देखते हुए राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है.

इसके साथ ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या सत्ता ही तृणमूल कांग्रेस को एकजुट रखने का एकमात्र ज़रिया थी?

सत्ता हाथ से निकलते ही सार्वजनिक तौर पर तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल और पार्टी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं.

पार्टी के दो-फाड़ होने या बिखरने पर कयासों का सिलसिला भी लगातार तेज़ हो रहा है. रोज़ नए-नए कयास और दावे सामने आ रहे हैं.

यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या बंगाल में भी महाराष्ट्र मॉडल दोहराया जाएगा? क्या तृणमूल कांग्रेस भी उसी तरह टूट जाएगी जिस तरह वर्ष 2022 में शिवसेना टूटी थी?

बीते सप्ताह पार्टी में ममता के बाद नंबर दो रहे लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी पर हमले के लिए पूर्व मुख्यमंत्री ने भले बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराया हो, लेकिन इस घटनाक्रम से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पार्टी की ज़मीनी पकड़ ढीली हो रही है?

'वह इस बार भी हार नहीं मानेंगीं'

चुनाव नतीजों के बाद पार्टी में बग़ावती सुर अचानक तेज़ होने लगे हैं. कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस हार के लिए तृणमूल सरकार के कामकाज के तरीके़ और पार्टी की चुनावी रणनीति को ज़िम्मेदार ठहराया है.

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उसके बाद नगरपालिका से लेकर प्रवक्ता स्तर तक के नेताओं के इस्तीफ़ों का सिलसिला लगातार तेज़ हो रहा है. इसके साथ ही भ्रष्टाचार के आरोप में नेताओं की गिरफ़्तारियां भी बढ़ रही हैं.

लेकिन कथित फ़र्ज़ी हस्ताक्षर घोटाला और कई पुराने नेताओं की नाराज़गी ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रही है.

ममता बनर्जी ने चार बार की सांसद रही काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक के पद से हटा दिया था. उसके बाद काकोली ने सोशल मीडिया पर अपनी एक पोस्ट में कहा था कि उनको चार दशकों की निष्ठा का फल मिला है.

तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहते हैं, "चुनाव नतीजों के बाद का घटनाक्रम ममता दीदी के लिए परेशानी का सबब ज़रूर रहा है. लेकिन वह ज़मीनी नेता रही हैं और प्रतिकूल हालात में लड़ने का उनको लंबा अनुभव रहा है. वह इस बार भी हार नहीं मानेंगी. उन्होंने पार्टी को बचाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है."

फ़र्ज़ी हस्ताक्षर घोटाला

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आख़िर वह फ़र्ज़ी हस्ताक्षर घोटाला क्या है जिसने पार्टी को सांसत में डाल दिया है?

दरअसल बीते सप्ताह विधानसभा में पार्टी विधायक दल का नेता चुनने के लिए जो बैठक हुई थी उसमें पारित प्रस्ताव पर कथित तौर पर उन विधायकों के भी हस्ताक्षर थे जो उस बैठक में हाज़िर ही नहीं थे.

इस पर तृणमूल के ही दो विधायकों - ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से इसकी शिकायत की थी.

उसके बाद सरकार ने इस मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी थी. सोमवार को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन दोनों विधायकों के नाम को सार्वजनिक किया था. उसके पंद्रह मिनट के भीतर ही दोनों को पार्टी से निकाल दिया गया.

उसके एक दिन बाद ही तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता रहे रिजू दत्त ने तो पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि उन लोगों के पास 50 विधायकों का समर्थन है और वही असली तृणमूल कांग्रेस हैं. चुनावी नतीजों के बाद पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में दत्त को निलंबित कर दिया गया था.

इससे पहले पार्टी को एकजुट रखने के मक़सद से ममता ने अपने आवास पर तमाम विधायकों की बैठक बुलाई थी. लेकिन उसमें क़रीब 20 विधायक ही पहुंचे. उसके कारण बैठक रद्द करनी पड़ी.

अभिषेक बनर्जी या कल्याण बनर्जी पर हमला हो, पार्टी के नेताओं की गिरफ़्तारी या फिर पार्टी के दो-फाड़ होने की अटकलें, ममता बनर्जी इसके लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराती रही हैं.

उनका आरोप है कि विधायकों को धमकियों के साथ पैसों का लालच दिया जा रहा है और इस काम में पुलिस की भी मदद ली जा रही है.

चुनाव बाद की हिंसा के विरोध में ममता ने मंगलवार को धर्मतल्ला इलाके़ में धरना दिया. हालांकि पुलिस की ओर से अनुमति न मिल पाने के कारण आख़िर तक इस पर संशय बना रहा. लेकिन बाद में उनको तीन घंटे तक धरना देने की अनुमति मिली. वह भी दूसरी जगह.

ममता ने कहा, "बीजेपी सरकार दिल्ली से तृणमूल कांग्रेस को ख़त्म करने की साज़िश कर रही है. लेकिन मैं उसे इसमें कामयाब नहीं होने दूंगी. पार्टी के विधायकों, पार्षदों और नेताओं को ग़ैरक़ानूनी तरीके़ से धमकियां दी जा रही हैं."

पूर्व मुख्यमंत्री का कहना था कि अगर वह जीवित रहीं तो बीजेपी को सत्ता से हटा कर दम लेंगी. उन्होंने बीजेपी पर कम से कम 177 सीटों पर चुनावी धांधली का भी आरोप दोहराया.

बीजेपी का रुख़

क्या बीजेपी सचमुच तृणमूल कांग्रेस में विभाजन की कोशिश कर रही है? ममता के ऐसे आरोपों में कितना दम है?

प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता रहे रितेश तिवारी, हाल के चुनाव में कोलकाता की काशीपुर-बेलगछिया सीट से जीत कर विधायक बने हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की ज़रूरत नहीं है. वह स्वाभाविक मौत मरेगी. वह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि सत्ता में बने रहने और उसका उपभोग करने का मंच था. उसमें तमाम राजनीतिक दलों के स्वार्थी तत्वों का जमावड़ा था. अब जब सत्ता ही नहीं रही तो वो स्वार्थी तत्व वहां क्यों रहेंगे?"

उनका कहना था कि बंगाल की जनता ने तृणमूल को ख़त्म कर दिया है. अब किसी को कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है. कोलकाता नगर निगम चुनाव के बाद इस पार्टी का वही हश्र होगा जो लेफ़्ट का हुआ था.

रितेश कहते हैं, "इतिहास ख़ुद को दोहराता है. कभी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा था कि हम 230 हैं और वह तीस. क्या किसी ने कभी बंगाल से वाममोर्चा के ख़त्म करने की कल्पना की थी? अब ममता के साथ भी वही होने जा रहा है."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव नतीजों के बाद राज्य का राजनीतिक परिदृश्य जिस तेज़ी से बदला है उससे तृणमूल कांग्रेस में टूट की आशंका को नकारा नहीं जा सकता. उनका कहना था कि कुछ नेता हमेशा सत्ता के साथ रहते हैं. इसके अलावा ज़्यादातर नेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं. उससे बचने के लिए वे पाला बदल सकते हैं.

'भगदड़ स्वाभाविक है'

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मुझे लगता है कि पार्टी से निकाले गए दोनों विधायक यानी ऋतब्रत और संदीपन शायद लंबे समय से टूट की कोशिश में लगे हैं. हो सकता है उन्होंने चुनाव से पहले इसकी योजना बनाई हो या फिर चुनाव के नतीजों के बाद. दोनों पहले ही तृणमूल नेतृत्व के हाईजैक होने के आरोप लगा चुके हैं."

उनका कहना था कि पार्टी में विभाजन के लिए जितनी संख्या चाहिए शायद अब तक उतनी नहीं जुट सकी है, लेकिन इस दिशा में कोशिशें जारी हैं.

शिखा कहती हैं, "बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य समेत कई नेता बार-बार दावा करते रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस टूट जाएगी. वैसे, महाराष्ट्र के मुकाबले यहां तस्वीर अलग है. वहां ऑपरेशन कमल चला था. लेकिन यहां विधायकों को चार्टर्ड उड़ानों से न तो कहीं ले जाया जा रहा और न ही उनको किसी रिज़ॉर्ट में रखा जा रहा है. यहां तृणमूल के लोग ही विभाजन की कोशिश कर रहे हैं."

उनके मुताबिक़, तृणमूल कांग्रेस की संभावित टूट में अब तक बीजेपी की स्पष्ट भूमिका नहीं नज़र आ रही है.

वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "लंबे समय तक सरकार में रहने वाली पार्टी से सत्ता छिनने के बाद उसमें भगदड़ स्वाभाविक है. कुछ नेता सत्ता के बिना नहीं रह सकते. सत्ता उनको भ्रष्टाचार से बचाने के लिए रक्षा कवच का काम करती है."

उनका कहना था कि ममता बनर्जी एक लड़ाकू नेता रही हैं. वह भी राजनीति के दाव-पेंच समझती हैं.

लेकिन सवाल यह है कि ज़मीन पर उनको पार्टी के कितने कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल है और आम लोगों में पार्टी की पकड़ कितनी मज़बूत है? तृणमूल कांग्रेस का भविष्य इन दोनों बातों से ही तय होगा.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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