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رجوعपश्चिम बंगाल टीएमसी में मुस्लिम विधायक समूह में फूट: जावेद अहमद खान ने ममता बनर्जी से दूरी बनाई
पश्चिम बंगाल टीएमसी में मुस्लिम विधायक समूह में फूट: जावेद अहमद खान ने ममता बनर्जी से दूरी बनाई
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BBC हिंदी6‏/6‏/2026سياسة4 د قراءةIndia

पश्चिम बंगाल टीएमसी में मुस्लिम विधायक समूह में फूट: जावेद अहमद खान ने ममता बनर्जी से दूरी बनाई

58 विधायकों से युक्त समूह ने Ritabrat Banerjee के समर्थन में स्पीकर को पत्र लिखा; मुस्लिम विधायक 13-14 तक घटने की रिपोर्ट

نظرة سريعة

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनावों में टीएमसी के टिकट पर कम से कम 31 मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जो पार्टी के 80 विधायक के लगभग 40% हैं। हालांकि, पार्टी के भीतर मुस्लिम विधायक समूह में विभाजन साफ जाहिर हुआ है; Ritabrat Banerjee के समर्थकों ने स्पीकर को 58 विधायक का पत्र दिया जिसमें कम से कम 17 प्रमुख मुस्लिम विधायक शामिल थे। परिणामस्वरूप ममता बनर्जी के साथ रहने वाले मुस्लिम विधायक संख्या घटकर 13-14 तक सीमित हो गई है।

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पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर कम से कम 31 मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जो पार्टी के 80 विधायकों का लगभग 40 प्रतिशत हैं. सालों तक ममता बनर्जी को मुस्लिम समुदाय का मज़बूत समर्थन मिलता रहा है और इस बात से बहुत कम लोग असहमत होंगे कि उनकी पिछली चुनावी सफलताओं में मुस्लिम वोटों की बड़ी भूमिका रही है. हालांकि, तृणमूल विधायक दल में उभरे बड़े विभाजन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब इन मुस्लिम विधायकों में से कई ममता बनर्जी के साथ खड़े नहीं हैं. विधायक दल के नेता के रूप में Ritabrat Banerjee के समर्थन में स्पीकर को पत्र लिखने वाले 58 विधायक के बीच कम से कम 17 प्रमुख मुस्लिम विधायक शामिल हैं. इसे ऐसे कह सकते हैं कि पार्टी के आधे से अधिक मुस्लिम विधायक अब ममता बनर्जी से अलग खेमे में दिखाई दे रहे हैं. इनमें सबसे प्रमुख नाम कसबा के विधायक और प्रभावशाली तृणमूल नेता जावेद अहमद खान का है, जिन्हें लंबे समय तक ममता बनर्जी के सबसे क़रीबी सहयोगियों में गिना जाता था. आंतरिक लोकतंत्र में कमी का आरोप. तृणमूल कांग्रेस का कोलकाता स्थित मुख्यालय 'तृणमूल भवन' जावेद अहमद खान की ओर से उपलब्ध कराई गई ज़मीन पर ही बना था. भवानीपुर में भी ममता काफ़ी हद तक उनके समर्थन पर निर्भर रहीं थीं. छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें. सबसे अधिक पढ़ी गईं. समाप्त. छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें. दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar) वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. एपिसोड. समाप्त. लेकिन अब जावेद अहमद खान ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी से दूरी बना ली है और पार्टी में 'आंतरिक लोकतंत्र की कमी' का आरोप लगाया है. ऋतब्रत बनर्जी के साथ खड़े होकर उन्होंने यहाँ तक कहा, "देखते हैं आने वाले दिनों में ममता बनर्जी के साथ कितने लोग रहते हैं." बुधवार को विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में पत्र देने वाले अन्य मुस्लिम विधायकों में रघुनाथगंज के अख़रुज्जमान ख़ान शामिल हैं, जिन्हें मुख्य सचेतक (चीफ़ व्हिप) नियुक्त किया गया है. उनके अलावा सूती के इमानी बिस्वास, हरिहरपाड़ा के नियामत शेख़, चोपड़ा के हामिदुल रहमान और पूर्व मंत्री ग़ुलाम रब्बानी शामिल हैं. ममता बनर्जी के साथ बने रहने वाले मुस्लिम विधायकों की संख्या अब केवल 13 या 14 बताई जा रही है. इनमें मालतीपुर के अब्दुर रहीम बॉक्सी, इटाहार के मुशर्रफ़ हुसैन और हरिश्चंद्रपुर के मतिउर रहमान शामिल हैं. हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर ममता बनर्जी का पार्टी संगठन पर नियंत्रण कमज़ोर पड़ता है तो इनमें से भी कितने विधायक ममता के प्रति वफ़ादार बने रहेंगे. बताया जाता है कि ऋतब्रत गुट इन नेताओं के साथ भी लगातार संपर्क बनाए हुए हैं. मुस्लिम नेता ममता का साथ क्यों छोड़ रहे हैं? इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण दिखाई देते हैं- 1. मुस्लिम वोट बैंक में सेंध हालिया चुनावी नतीजे संकेत देते हैं कि ममता बनर्जी के पारंपरिक मुस्लिम समर्थन आधार में दरारें उभरने लगी हैं. साथ ही, कई मुस्लिम बहुल ज़िलों में बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों के एकजुट होने के संकेत भी मिले हैं. बदलावते राजनीतिक परिदृश्य में कई मुस्लिम नेता अपने प्रभाव और निर्वाचन क्षेत्रों को बचाने के लिए धार्मिक वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. 2. विजेता के साथ रहने की राजनीति पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से "विजेता ही सब कुछ" वाली संस्कृति से प्रभावित रही है. कई विधायकों के लिए ममता के साथ बने रहने का मतलब अगले पाँच सालों तक सीमित राजनीतिक प्रभाव हो सकता है. इसके उलट, ऋतब्रत बनर्जी गुट के साथ जाने से (जो बीजेपी का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त माना जा रहा है), अधिक राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुँच मिल सकती है. पश्चिम बंगाल में विपक्षी विधायक के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के सहयोग के बिना अपने क्षेत्र के किसी एक व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराना भी मुश्किल हो सकता है. 3. जाँच एजेंसियों का डर जावेद ख़ान सहित कुछ नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति और कोलकाता में बड़ी संख्या में अवैध निर्माण से जुड़े आरोप लग चुके हैं. ऐसी अटकलें हैं कि बीजेपी समर्थित राजनीतिक माहौल में ईडी या सीबीआई जैसी एजेंसियों की संभावित जाँच की आशंका भी कुछ नेताओं को ममता बनर्जी से दूरी बनाने का कारण बन रही है. ममता के लिए मुश्किल समय लगातार 15 सालों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रहने के बाद हालिया विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की टीएमसी की हार हुई. उसके बाद से ही ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही हैं.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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