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वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल: वो सुपरस्टार जिसने पेले की चमक तक को फीका कर दिया था
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BBC हिंदी4‏/6‏/2026رياضة10 د قراءةIndia

वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल: वो सुपरस्टार जिसने पेले की चमक तक को फीका कर दिया था

نظرة سريعة

गरिंचा, ब्राज़ील के एक महान फ़ुटबॉलर थे जिन्हें 'ड्रिब्लिंग का बेताज बादशाह' कहा जाता था। अपने छोटे और टेढ़े पैर के बावजूद, उन्होंने अपनी ड्रिब्लिंग से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया और पेले के साथ मिलकर ब्राज़ील को 1958 और 1962 में विश्व कप जिताया।

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वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल: वो सुपरस्टार जिसने पेले की चमक तक को फीका कर दिया था

Author, प्रदीप कुमार

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित 12 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 12 मिनट

फ़ुटबॉल की दुनिया को जानने वाले कहते हैं कि ख़ूबसूरत फ़ुटबॉल की पहचान ड्रिब्लिंग है. ड्रिब्लिंग यानी खिलाड़ी और गेंद के बीच ऐसा तालमेल कि सामने वाला खिलाड़ी देखते रह जाए और पलक झपकते ही गेंद गोलपोस्ट की ओर बढ़ जाए. इसे फ़ुटबॉल की सबसे कठिन कलाओं में से एक माना जाता है.

आधुनिक फ़ुटबॉल में यही वजह है कि लियोनेल मेसी का जादू सालों से कायम है. मेसी के अलावा ब्राज़ील के सुपरस्टार रोनाल्डिन्हो और फ्रांस के दिग्गज जिनेदिन ज़िदान भी अपनी ड्रिब्लिंग के लिए याद किए जाते हैं. दुनिया आज भी उनके खेल की दीवानी है.

कुछ उम्रदराज़ फ़ुटबॉल प्रशंसकों से बात कीजिए, तो वे कहेंगे कि डिएगो माराडोना जैसा ड्रिब्लर सदियों में एक बार पैदा होता है. वहीं, उनसे पहले की पीढ़ी इंग्लैंड के जॉर्ज बेस्ट और नीदरलैंड्स के जोहान क्रूफ़ की ड्रिब्लिंग का ज़िक्र करती नज़र आएगी.

लेकिन अब बात उस फ़ुटबॉलर की, जिसे ड्रिब्लिंग का बेताज बादशाह कहा जाता है. एक ऐसा खिलाड़ी, जिसकी चमक फ़ुटबॉल के जादूगर माने जाने वाले पेले के दौर में भी अलग दिखाई देती थी.

ब्राज़ीलियाई फ़ुटबॉल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले इस खिलाड़ी का नाम था गरिंचा. उनका जलवा ऐसा था कि पेले की मौजूदगी वाली टीम के बारे में भी अख़बारों में सुर्खियां छपती थीं— 'अगले गुरुवार को फिर दिखेगा गरिंचा का जलवा.'

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फ़ुटबॉल की दुनिया में लंबे समय तक उन्हें पेले से भी महान खिलाड़ी माना जाता रहा. इस फुटबॉलर का नाम था गरिंचा.

इस नाम को रखे जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. गरिंचा हमउम्र बच्चों की तुलना में बहुत छोटे और कमज़ोर थे और उनकी बहनों ने उनका नाम स्थानीय छोटे पक्षी गरिंचा के नाम पर रख दिया था.

गरिंचा और पेले की तुलना तो तब भी होती थी और आज भी होती है. लेकिन उस पर बात करने से पहले कहानी गरिंचा की जिसके बारे में डॉक्टरों की राय ये थी कि वह ठीक ठाक एथलीट भी नहीं हो सकते.

'सबसे बेहतरीन ड्रिब्लर'

28 अक्तूबर, 1933 को ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो की झुग्गी झोपड़ी वाली बस्ती में जन्मे गरिंचा के पैरों में समस्या थी. उनका दायां पैर बाएं पैर की तुलना में छह सेंटीमीटर छोटा था और उनका बायां पैर अंदर की ओर मुड़ा हुआ भी था.

एक तरह से वे सीधे खड़े नहीं हो सकते थे, लेकिन गरिंचा ने ड्रिब्लिंग में अपनी इस खामी को ही ख़ासियत में तब्दील कर लिया. वे जब बेढंग से अंदाज़ में विपक्षी टीम के डिफेंडरों को छकाते थे तो स्टेडियम की जनता का हंसते-हंसते बुरा हाल हो जाता था.

इसी वजह से गरिंचा को फुटबॉल की दुनिया में पीपल्स जॉय के नाम से जाना जाता था. उन्हें फुटबॉल का चार्ली चैप्लिन जैसा दर्जा हासिल था.

शराबी पिता से गरिंचा को केवल शराब की लत ही मिली थी और 14 साल की उम्र से पेट पालने के लिए वे एक टेक्स्टाइल मिल में मजदूरी करने लगे थे. उन्हें एक आलसी कर्मचारी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन वे मिल की फुटबॉल टीम के स्टार थे. इसी वजह से नौकरी नहीं छिनी थी.

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गरिंचा के संघर्ष की यह कहानी शायद दुनिया तक नहीं पहुंचती, अगर ब्राज़ीलियाई पत्रकार रॉय कास्त्रो ने उन पर 'गरिंचा: द ट्रायम्फ एंड ट्रेजेडी ऑफ़ ब्राज़ील्स फॉरगॉटन फ़ुटबॉलिंग हीरो' नाम की किताब न लिखी होती.

यह किताब गरिंचा की मौत के 12 साल बाद प्रकाशित हुई थी. इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करीब 10 साल बाद आया. अनुवाद प्रकाशित होते ही खेल जगत में इसे काफी सराहना मिली.

किताब में गरिंचा के ग़रीबी से निकलकर सुपरस्टार बनने और फिर शराब व महिलाओं की लत के कारण उनके जीवन में आए उतार-चढ़ाव की कहानी विस्तार से बताई गई है.

गरिंचा को किसी बड़े फ़ुटबॉल क्लब में निखरने का मौका नहीं मिला था. ब्राज़ील के महान फ़ुटबॉलर निल्टन सैंटोस की नज़र जब 19 वर्षीय गरिंचा पर पड़ी, तो वे उन्हें बोटोफोगो क्लब में ले आए.

जिस उम्र में पेले को राष्ट्रीय टीम में जगह मिल चुकी थी, उससे भी ज़्यादा उम्र में पहली बार किसी बड़े फ़ुटबॉल विशेषज्ञ की नज़र गरिंचा पर पड़ी थी.

साल 1953 में गरिंचा को बोटोफोगो की ओर से खेलने का मौका मिला. उन्होंने अपने पहले ही मैच में हैट्रिक लगाकर सबको प्रभावित कर दिया. इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने निल्टन सैंटोस के भरोसे को सही साबित किया.

हालांकि, उन्हें 1954 विश्व कप के लिए ब्राज़ील की राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिली. इसके बावजूद गरिंचा क्लब स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन करते रहे.

साल 1957 में उन्होंने बोटोफोगो के लिए 20 गोल किए. इसके बाद राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं का ध्यान उनकी ओर गया और उन्हें राइट विंगर के तौर पर टीम में शामिल कर लिया गया.

पेले ने भी अपनी आत्मकथा 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में गरिंचा के बारे में कई दिलचस्प बातें लिखी हैं. दरअसल, दुनिया ने पहली बार पेले और गरिंचा का जादू 1958 विश्व कप में एक साथ देखा था.

गरिंचा की शारीरिक क्षमता को लेकर टीम प्रबंधन को पहले से संदेह था. इसके अलावा वे मानसिक परीक्षण में भी सफल नहीं हो पाए थे.

पेले ने अपनी किताब में लिखा है, "गरिंचा ने अपने पेशे की स्पेलिंग भी गलत लिखी थी. अगर सही स्पेलिंग लिखना चयन का पैमाना होता, तो शायद हमारी टीम का कोई खिलाड़ी विश्व कप में हिस्सा नहीं ले पाता."

जब ब्राज़ील बना पहली बार चैम्पियन

दिलचस्प बात यह है कि गरिंचा के अलावा टीम का एक और खिलाड़ी भी मानसिक परीक्षण में सफल नहीं हो पाया था. वह खिलाड़ी पेले थे. डॉक्टरों का मानना था कि कम उम्र के कारण वे विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट का दबाव नहीं झेल पाएंगे.

हालांकि, टीम के कोच ने डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों की राय के विपरीत फैसला लिया. उन्होंने पेले और गरिंचा, दोनों को टीम में शामिल किया. बाद में यही दोनों खिलाड़ी ब्राज़ील को पहली बार विश्व चैंपियन बनाने में अहम साबित हुए.

पेले ने 1958 विश्व कप फ़ाइनल को याद करते हुए अपनी किताब में लिखा है, "स्वीडन के खिलाफ आख़िरी पलों में मैंने हेडर से पांचवां गोल किया था. गोल करने के बाद मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं गोलपोस्ट के सामने बिना हिले-डुले लेट गया था."

पेले लिखते हैं, "सबसे पहले गरिंचा मेरे पास दौड़कर आए. वे बेहद नेकदिल इंसान थे. मेरी मदद करने के लिए वे तुरंत पहुंचे. उन्होंने मेरे पैर उठाए. वे किसी तरह मेरे सिर तक रक्त का प्रवाह फिर से सामान्य करना चाहते थे. कुछ देर बाद जब मुझे होश आया, तब मैंने देखा कि बाकी खिलाड़ी जश्न मना रहे थे."

1958 विश्व कप में वेल्स के डिफेंडर मेल हॉपकिंस भी गरिंचा के खेल से प्रभावित थे. मैच के बाद उन्होंने कहा था, "पेले की तुलना में गरिंचा कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थे. उन्हें खेलते देखना किसी जादू को देखने जैसा था."

पेले और गरिंचा के बीच मैदान पर गज़ब का तालमेल था. कहा जाता है कि जब भी दोनों एक साथ खेले, ब्राज़ील कोई मैच नहीं हारा.

दोनों ने साथ मिलकर 40 मैच खेले. इनमें ब्राज़ील ने 36 मैच जीते, जबकि चार मुकाबले ड्रॉ रहे. टीम को एक भी हार का सामना नहीं करना पड़ा.

कहा जाता है कि एक जीनियस ही दूसरे जीनियस की महानता को सही मायने में पहचान सकता है. इस कसौटी पर पेले के शब्द बहुत मायने रखते हैं.

एक अगस्त 2018 को पेले ने अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर लिखा था, "मैंने अपने जीवन में गरिंचा से बेहतर खिलाड़ी के साथ या उसके खिलाफ कभी नहीं खेला. मैदान पर हम टीममेट थे, लेकिन मैदान के बाहर हम भाई थे."

बहरहाल, 1958 विश्व कप के बाद ब्राज़ील में पेले और गरिंचा का जलवा किसी सुपरस्टार से कम नहीं था. उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा बीबीसी चैनल फोर की 2002 में आई डॉक्यूमेंट्री 'गॉड्स ऑफ़ ब्राज़ील: पेले एंड गरिंचा' से लगाया जा सकता है. दो भागों में बनी इस डॉक्यूमेंट्री में दिखता है कि आम लोगों के बीच इन दोनों खिलाड़ियों को लेकर कितनी दीवानगी थी.

पेले और गरिंचा की कहानी यह भी बताती है कि एक अच्छा माहौल और सही मार्गदर्शन किसी खिलाड़ी को क्या दे सकता है, और उसकी कमी उससे क्या छीन सकती है.

रॉय कास्त्रो ने अपनी किताब में लिखा है कि 1958 के बाद पेले ने एक अनुभवी मैनेजर रख लिया था. उस मैनेजर ने पेले के क्लब सैंटोस के साथ 500 डॉलर प्रति माह का अनुबंध कराया. इस समझौते में हर साल वेतन बढ़ने की भी व्यवस्था थी.

वहीं, दूसरी ओर बोटोफोगो क्लब के प्रबंधकों ने गरिंचा के सामने ऐसा अनुबंध रखा, जिसमें रकम वाली जगह खाली छोड़ दी गई थी. गरिंचा के पास कोई ऐसा मैनेजर नहीं था, जो उनके हितों का ध्यान रखता. इसलिए उन्होंने खाली जगह वाले कागज़ पर ही हस्ताक्षर कर दिए. नतीजा यह हुआ कि अगले तीन वर्षों तक क्लब उन्हें केवल 300 डॉलर प्रति माह देता रहा.

यह उदाहरण बताता है कि जब कोई खिलाड़ी स्टारडम की ओर बढ़ता है, तो उसके आसपास मौजूद लोगों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है.

पेले जहां अपने करियर और पेशेवर भविष्य को लेकर लगातार गंभीर होते गए, वहीं गरिंचा धीरे-धीरे अपने आसपास की दुनिया में खोते चले गए.

बीबीसी चैनल फोर की उसी डॉक्यूमेंट्री में गरिंचा कहते हैं, "1958 के बाद मैं बहुत लोकप्रिय हो गया था. जहां भी जाता था, लोग मुझे पहचान लेते थे. मुझसे मिलने के लिए इंतज़ार करते थे."

अपने दम पर दिलाया 1962 का वर्ल्ड कप

ग़रीबी और अभाव में पले-बढ़े गरिंचा के कदम यहीं से लड़खड़ाने लगे. उन्होंने खुद को शराब की लत में डुबो दिया. उनका वज़न बढ़ने लगा. साथ ही, महिलाओं के साथ उनके संबंधों को लेकर लगातार चर्चाएं होने लगीं.

हालांकि, फ़ुटबॉल की दुनिया को अभी गरिंचा का वह दौर देखना था, जो इतिहास में दर्ज होने वाला था. देखते ही देखते चार साल बीत गए और 1962 विश्व कप आ गया. चिली में होने वाले इस टूर्नामेंट के लिए गरिंचा किसी तरह ब्राज़ील की टीम में जगह बनाने में सफल रहे.

टूर्नामेंट के दूसरे मैच में पेले चोटिल होकर बाहर हो गए. इसके बाद टीम की ज़िम्मेदारी काफी हद तक गरिंचा के कंधों पर आ गई.

उस समय चिली फ़ुटबॉल कोच एसोसिएशन के अध्यक्ष अल्बर्टो कासोरला ने कहा था, "ब्राज़ील की दो टीमें हैं. एक टीम पेले के साथ और दूसरी पेले के बिना. पेले के बिना वाली टीम विश्व कप नहीं जीत सकती."

शायद कासोरला को अंदाज़ा नहीं था कि जल्द ही उनके इस बयान को गलत साबित कर दिया जाएगा. यह काम गरिंचा ने किया.

गरिंचा ने इंग्लैंड और चिली के खिलाफ दो अहम मुकाबलों में चार गोल किए. चिली के खिलाफ सेमीफ़ाइनल में ब्राज़ील ने 4-2 से जीत दर्ज की थी.

इस मैच में गरिंचा ने दो गोल किए और एक अन्य गोल में अहम भूमिका निभाई. उनके दोनों गोल आज भी याद किए जाते हैं.

पहला गोल उन्होंने करीब 20 गज की दूरी से बाएं पैर के ज़ोरदार शॉट पर किया था. दूसरा गोल एक शानदार हेडर था.

चिली के खिलाड़ियों ने पूरे मैच में उन्हें रोकने की कोशिश की. लगातार फाउल और मार्किंग के बीच गरिंचा का व्यवहार भी आक्रामक हो गया.

मैच के 83वें मिनट में रेफ़री ने उन्हें लाल कार्ड दिखा दिया. इसके बाद वे फ़ाइनल मुकाबले से बाहर हो गए.

बेमिसाल प्रतिभा के खिलाड़ी

रेफ़री के इस फ़ैसले के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया था. ब्राज़ील ने भी फीफ़ा की अनुशासन समिति के सामने इस फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई. रॉय कास्त्रो की किताब के मुताबिक, ब्राज़ील के प्रधानमंत्री ने भी इस मामले को रणनीतिक तौर पर उठाया था.

बाद में रेफ़री ने कहा कि उन्होंने गरिंचा का कथित फाउल अपनी आंखों से नहीं देखा था. उन्होंने लाइंसमैन की जानकारी के आधार पर लाल कार्ड दिखाया था.

किताब में यह भी उल्लेख है कि कई लैटिन अमेरिकी देशों के नेताओं ने फीफ़ा अधिकारियों से बात की. इसके बाद लाइंसमैन को हटा दिया गया और गरिंचा को फ़ाइनल खेलने की अनुमति मिल गई.

बहुत कम लोगों को पता है कि चेकोस्लोवाकिया के खिलाफ फ़ाइनल में गरिंचा तेज़ बुखार के बावजूद मैदान पर उतरे थे. बताया जाता है कि उन्हें 102 डिग्री बुखार था.

इसके बावजूद उनकी मौजूदगी का असर साफ दिखाई दिया. ब्राज़ील लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने में सफल रहा.

कई फ़ुटबॉल इतिहासकार मानते हैं कि 1962 विश्व कप में ब्राज़ील की सफलता के सबसे बड़े नायक गरिंचा थे. उन्होंने लगभग अकेले दम पर टीम को खिताब तक पहुंचाया था.

फ़ुटबॉल प्रशंसकों को ऐसा ही प्रदर्शन बाद में 1986 विश्व कप में देखने को मिला, जब डिएगो माराडोना ने अर्जेंटीना को चैंपियन बनाया.

उरुग्वे के प्रसिद्ध लेखक और खेल पत्रकार इदुआर्दो गालेआनो ने गरिंचा के खेल के बारे में लिखा है, "जब गरिंचा अपने चरम पर होते थे, तो फ़ुटबॉल का मैदान सर्कस में बदल जाता था. गेंद उनके इशारों पर चलती थी और दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रह जाते थे."

लेकिन गरिंचा की कहानी का एक दूसरा पहलू भी था. मैदान पर जादू बिखेरने वाला यह खिलाड़ी निजी जीवन में शराब की लत से जूझ रहा था.

रॉय कास्त्रो के अनुसार, कई बार उनका नशा खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता था. एक बार नशे की हालत में उन्होंने अपने पिता को कार से टक्कर मार दी थी. उनके पिता घायल हो गए थे. जब लोगों ने गरिंचा को रोका, तब वे इतने नशे में थे कि उन्हें ठीक से समझ भी नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है.

किताब में यह भी दावा किया गया है कि एक अन्य घटना में उन्होंने नशे की हालत में अपनी सास को कार से टक्कर मार दी थी, जिसमें उनकी मौत हो गई थी.

जीवन के उतार-चढ़ाव

शराब की लत के अलावा महिलाओं के साथ उनके संबंधों ने भी गरिंचा के करियर और निजी जीवन को गहराई से प्रभावित किया. गरिंचा के पांच महिलाओं से 14 बच्चे थे. ये वे रिश्ते थे, जिन्हें उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था.

गरिंचा ने दो शादियां की थीं. पहली शादी उन्होंने फैक्ट्री में काम करने वाली अपनी एक सहकर्मी से की थी. दूसरी शादी ब्राज़ील की मशहूर सांबा गायिका एलेज़ा सोआरेस से हुई थी. दोनों ही रिश्ते अंततः टूट गए और तलाक़ तक पहुंच गए.

शराब की लत और वैवाहिक जीवन में तनाव का असर उनके खेल पर भी पड़ा. 1966 विश्व कप तक आते-आते गरिंचा अपने पुराने स्तर से काफी दूर दिखाई देने लगे थे.

उनके फीके प्रदर्शन को उन कारणों में गिना जाता है, जिनकी वजह से ब्राज़ील लगातार तीसरी बार विश्व कप जीतने का सपना पूरा नहीं कर सका.

गरिंचा पूरी ज़िंदगी ब्राज़ीलियाई जनजीवन के प्रतीक बने रहे. फ़ुटबॉल, सांबा संगीत, शराब और महिलाएं—उनकी दुनिया काफी हद तक इन्हीं चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमती रही. उन्होंने इससे कहीं ज़्यादा पाने या बनने की कोशिश नहीं की.

लेकिन उनकी कहानी किसी सामान्य सुपरस्टार जैसी नहीं थी. जीवन के आख़िरी वर्षों में उन्हें आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ा.

जनवरी 1983 में, महज़ 49 साल की उम्र में, लिवर सिरोसिस के कारण उनका निधन हो गया.

गरिंचा की मौत रियो डी जनेरियो के एक अस्पताल में हुई थी. हालांकि, उनकी आख़िरी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक इलाके में किया जाए.

जब उनका पार्थिव शरीर रियो के मराकाना स्टेडियम से उनके गांव पाउ ग्रांडे के लिए रवाना हुआ, तो बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए.

रॉय कास्त्रो लिखते हैं कि करीब 65 किलोमीटर के उस सफ़र के दौरान हज़ारों लोगों ने अपने प्रिय खिलाड़ी को अंतिम विदाई दी.

जब शव उनके गांव पहुंचा, तब चर्च में लगभग 500 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी. लेकिन वहां करीब 3,000 लोग मौजूद थे.

भीड़ को देखते हुए पादरी ने अंतिम प्रार्थना जल्द पूरी की. इसके बाद जब गरिंचा के पार्थिव शरीर को दफ़नाने के लिए कब्रिस्तान ले जाया गया, तो वहां पहले से ही करीब 8,000 लोगों की भीड़ जमा थी.

हालात ऐसे थे कि गरिंचा के कई रिश्तेदार भी उनकी अंतिम झलक नहीं देख पाए.

गरिंचा ने जैसे मैदान पर फ़ुटबॉल खेली थी, उनकी विदाई भी कुछ वैसी ही रही. रंगों, भावनाओं, अव्यवस्था और नाटकीयता से भरी हुई. ऐसी विदाई, जो उनके जीवन की तरह ही लोगों की यादों में बस गई.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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