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उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत, लेकिन आम लोगों की ज़िंदगी अब भी मुश्किल
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उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत, लेकिन आम लोगों की ज़िंदगी अब भी मुश्किल

किम जोंग-उन के शासन में दशकों बाद आर्थिक सुधार के दावे, लेकिन मानवाधिकारों का उल्लंघन और आम लोगों की मुश्किलें बरकरार।

نظرة سريعة

उत्तर कोरिया दशकों से 'जीविका संकट' और मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना कर रहा है, लेकिन हाल ही में उसकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिले हैं। कोविड महामारी के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील और रूस के साथ बढ़ते संबंधों ने किम जोंग-उन के शासन को मज़बूत किया है, हालांकि आम लोगों की ज़िंदगी अब भी कठिनाइयों से भरी है।

ملخص مُنشأ بالذكاء الاصطناعي

لماذا يهم

उत्तर कोरिया कई दशकों से 'जीविका संकट' का सामना कर रहा है, जिसमें आबादी का लगभग 45% हिस्सा कुपोषण का शिकार है, और मानवाधिकारों के बड़े पैमाने पर उल्लंघन की ख़बरें लगातार सामने आती रही हैं। अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण, दुनिया से अलग-थलग रहने की नीति और सुरक्षा तंत्र को मज़बूत करने पर ज़ोर ने हालात को और ख़राब किया है।

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उत्तर कोरिया कई दशकों से उस स्थिति का सामना कर रहा है जिसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ "जीविका संकट" कहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, वहां क़रीब 1.1 करोड़ लोग, यानी आबादी का लगभग 45 फ़ीसदी हिस्सा, कुपोषण का शिकार है। यह ऐसे देश में हो रहा है जहां मानवाधिकारों के बड़े पैमाने पर उल्लंघन की ख़बरें लगातार सामने आती रही हैं।

अर्थव्यवस्था पर वर्षों से सरकारी नियंत्रण, दुनिया से अलग-थलग रहने की नीति और सार्वजनिक सेवाओं की अनदेखी कर सुरक्षा तंत्र को मज़बूत करने पर ज़ोर ने हालात को और ख़राब किया है।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने इसे "मानवाधिकारों का संकट" बताया है।

किम परिवार के तीसरी पीढ़ी के नेता किम जोंग-उन ने अपने शासन को और मज़बूत किया है। उनका परिवार दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस कम्युनिस्ट देश की स्थापना से ही सत्ता में बना हुआ है।

आज उत्तर कोरिया दुनिया के सबसे बंद और अलग-थलग देशों में गिना जाता है।

साल 2020 में जब कोविड महामारी आई, तो वहां के हालात और भी मुश्किल हो गए।

कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया को आर्थिक झटका लगा था, लेकिन इसका असर उत्तर कोरिया जैसी पिछड़ी और दुनिया की अलग-थलग अर्थव्यवस्था पर कहीं ज़्यादा पड़ा।

खाद्य संकट की ख़बरों और उसके शासन पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव के बीच किम जोंग उन टीवी पर भावुक नज़र आए और अपने देशवासियों से माफी मांगी। जबकि वहां की सरकारी प्रचार मशीनरी इन्हें कभी ग़लती न करने वाला बताती है।

उन्होंने कहा था, "मुझे वास्तव में खेद है। हमारे लोगों को मुश्किलों से निकालने के लिए मेरे प्रयास और मेरी ईमानदार कोशिशें पर्याप्त साबित नहीं हुई हैं।"

हालात अब कुछ हद तक बदलते हुए दिखाई देते हैं।

कोविड महामारी ख़त्म हो गई। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का दबाव कुछ कम हुआ।

उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ाना जारी रखा और उसने व्लादिमीर पुतिन के रूस के साथ अपने रिश्ते और मज़बूत किए।

इसी दौरान, कई दशकों में पहली बार उसकी अर्थव्यवस्था में सुधार के कुछ संकेत भी दिखाई दिए।

ऐसे में, बीते मार्च में संसद जैसे विधायी मंच से देश को संबोधित करते हुए किम जोंग-उन का संदेश पहले से काफी अलग था।

किम ने दावा किया कि उत्तर कोरिया ने "अनोखा बदलाव" का अनुभव किया है।

उन्होंने कहा, "अब हमारा देश ऐसा नहीं रहा जिसे दूसरे देशों की धमकियों से डराया जा सके।"

लेकिन सवाल यह है कि उत्तर कोरिया की आर्थिक स्थिति में वास्तव में कितना सुधार हुआ है?

उत्तर कोरिया में कैसे हैं हालात

उत्तर कोरिया में वास्तव में क्या हो रहा है, यह जानना काफी मुश्किल है।

वहां की सरकार बाहरी दुनिया तक जानकारी जाने से रोकने के लिए सख़्ती अपनाती है।

इसलिए मीडिया और विशेषज्ञों को देश की स्थिति समझने के लिए उन उत्तर कोरियाई लोगों की गवाही पर निर्भर रहना पड़ता है जो वहां से भाग निकलने में सफल हुए हैं।

इसके अलावा, विदेशी ख़ुफिया एजेंसियों, खासकर दक्षिण कोरिया की रिपोर्टों और उन गिने-चुने पश्चिमी लोगों के अनुभवों का भी सहारा लिया जाता है जिन्हें कड़ी निगरानी के बीच उत्तर कोरिया जाने की अनुमति मिली है।

फिर भी, इन स्रोतों से संकेत मिलता है कि कई दशकों से ठहरी हुई उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में कुछ सुधार हुआ है।

दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक के अनुमान के मुताबिक, 2024 में उत्तर कोरिया की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 3.7 फ़ीसदी रही। यह पिछले आठ वर्षों में उसकी सबसे तेज़ आर्थिक वृद्धि मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किम जोंग-उन के सत्ता संभालने के बाद से उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था फिलहाल अपने सबसे बेहतर दौर में है।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया सैन डिएगो के शोधकर्ता और उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ स्टीफन हैगार्ड ने बीबीसी मुंडो से कहा, "उत्तर कोरियाई शासन पहले के मुकाबले कहीं अधिक समृद्ध है।"

यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को हथियारों का निर्यात, चीन के साथ व्यापार, अनौपचारिक बाज़ारों पर बढ़ा सरकारी नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को लागू करने में आई ढील ने किम शासन की तिजोरियां भरने में अहम भूमिका निभाई है।

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि राजधानी प्योंगयांग और शासक वर्ग से दूर रहने वाले आम लोगों की ज़िंदगी अब भी कठिनाइयों से भरी हुई है।

लेकिन राजधानी प्योंगयांग में सुधार के कुछ संकेत साफ़ दिखाई देते हैं।

हाल के वर्षों में वहां जाने वाले लोगों का कहना है कि अब शहर की ज़्यादा सड़कें रोशन रहती हैं। पहले जिन ऊंची इमारतों में बिजली की कमी के कारण लिफ्टें नहीं चलती थीं, वहां अब कम से कम कुछ घंटों के लिए लिफ्टें चलने लगी हैं।

अमेरिका के कोलोराडो स्कूल ऑफ माइंस के अर्थ ऑब्ज़र्वेशन ग्रुप द्वारा किए गए सैटेलाइट विश्लेषण में भी यह देखा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में प्योंगयांग की बिजली आधारित रोशनी में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

उत्तर कोरिया जाने की अनुमति पाने वाले कुछ पश्चिमी लोगों ने भी ऐसे बदलावों की पुष्टि की है जो बढ़ती खपत और समृद्धि की ओर इशारा करते हैं।

इनमें मोबाइल फोन का बढ़ता इस्तेमाल, आयातित इलेक्ट्रिक कारें और खाना या टैक्सी बुक करने वाली ऐप्स शामिल हैं।

ऑस्ट्रेलियाई ट्रैवल एजेंट रोवन बियर्ड ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को बताया कि कई साल बाद प्योंगयांग की अपनी हालिया यात्रा के दौरान वह तब हैरान रह गए जब उनके ट्रांसलेटर ने मोबाइल ऐप के ज़रिए टैक्सी बुलाई और वह कुछ ही मिनटों में पहुंच गई।

बियर्ड ने कहा, "यह सब बिल्कुल नया था। मैं इसे देखकर हैरान रह गया।"

अर्थव्यवस्था में सीमित ही सही, लेकिन सुधार का एक और संकेत यह है कि सरकार किम जोंग-उन की प्राथमिकता वाले कुछ बड़े प्रोजेक्ट पूरे करने में सफल रही है। इनमें कांगवोन प्रांत के समुद्री तट पर स्थित वोंसान-काल्मा जैसे बड़े पर्यटन परिसर का निर्माण शामिल है।

किम ने कुछ महत्वाकांक्षी योजनाओं का भी ऐलान किया है। इनमें "20×10" नाम की योजना शामिल है, जिसके तहत दस वर्षों में देशभर में 20 नए कारखाने बनाने का वादा किया गया है, ताकि विकास केवल प्योंगयांग तक सीमित न रहे।

उत्तर कोरिया की सरकार ने खुद को एक परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में भी काफी हद तक स्थापित कर लिया है।

न तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और न ही डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान बातचीत के ज़रिए अपनाई गई नीति, किम जोंग-उन को परमाणु हथियारों के विकास से रोक पाई है।

किम का मानना है कि अमेरिका जैसे बाहरी "ख़तरों" के सामने अपने शासन को सुरक्षित रखने के लिए परमाणु हथियार बेहद ज़रूरी हैं।

इसी वजह से प्योंगयांग ने नई पीढ़ी की मिसाइलें विकसित की हैं। पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरिया परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों और ऐसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) के विकास पर भी काम कर रहा है, जो अमेरिका की मुख्य भूमि तक पहुंचने में सक्षम हो सकती हैं।

उत्तर कोरियाई लोगों की मुश्किल ज़िंदगी

उत्तर कोरिया के लोग मुश्किल हालात में जीने के आदी हैं।

साल 1994 से 1998 के बीच देश ने एक बड़े मानवीय संकट का सामना किया था। अकादमिक जगत में इसे "ग्रेट फे़मीन" कहा जाता है, जबकि सरकारी प्रचार तंत्र इसे "कठिन मार्च" के नाम से याद करता है।

हालांकि उत्तर कोरियाई सरकार ने कभी इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया, लेकिन माना जाता है कि उस दौर में भूख और उससे जुड़ी बीमारियों के कारण लाखों लोगों की मौत हुई थी।

इस त्रासदी के पीछे सोवियत संघ के समर्थन का खत्म होना, आर्थिक कुप्रबंधन और प्राकृतिक आपदाओं जैसे कई कारण थे।

तब भी और आज भी, उत्तर कोरिया में लोग ऐसे शासन के तहत रहते हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता एक पुलिस राज्य बताते हैं, जहां मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन होता है।

दक्षिण कोरिया भागने में सफल रहे लोगों के मुताबिक, देश छोड़ने की कोशिश करने वालों पर सुरक्षाबल गोली चला सकते हैं।

इसके अलावा, के-पॉप सुनने या दक्षिण कोरियाई टीवी सीरियल देखने जैसी बातों पर भी बेहद कड़ी सज़ा दी जा सकती है, जो कुछ मामलों में मौत तक पहुंच सकती है।

सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की असहमति या आदेशों की अवहेलना को गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसी गतिविधियों के लिए फायरिंग स्क्वॉड के ज़रिए मौत की सज़ा तक दी जा सकती है।

इसका एक चर्चित उदाहरण किम जोंग-उन के चाचा जांग सोंग-थाएक थे, जिन्हें किम के आदेश पर 2013 में फांसी दे दी गई थी।

कोविड महामारी के दौरान सरकारी नियंत्रण और सख्त हो गया। इसका असर चीन से सामान लाने वाले अनौपचारिक बाज़ारों पर भी पड़ा, जिससे कई उत्तर कोरियाई लोगों के सामने आजीविका का आखिरी सहारा भी खत्म हो गया।

दक्षिण कोरिया भागकर पहुंचीं उत्तर कोरियाई नागरिक किम यू-मी ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, "किम जोंग-उन की सरकार में सबसे मुश्किल बात यह थी कि हमें पैसा कमाने की भी अनुमति नहीं थी।"

सियोल स्थित कोरिया डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के उत्तर कोरिया विशेषज्ञ जोंगक्यू ली ने बीबीसी मुंडो से कहा कि अनौपचारिक बाज़ारों पर नियंत्रण बढ़ाकर "ऐसा लगता है कि सरकार सभी कारोबारी गतिविधियों को राज्य की कड़ी निगरानी में लाना चाहती है और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह राज्य केंद्रित बनाना चाहती है।"

उन्होंने कहा, "समस्या यह है कि राज्य का बढ़ता नियंत्रण लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार नहीं ला पाया है।"

रूस और चीन की भूमिका

रूस के साथ बढ़ती नज़दीकी उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था में हाल के सुधार की एक अहम वजह मानी जा रही है।

फरवरी 2022 में जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर रूसी आक्रमण शुरू किया, तब किम जोंग-उन ने इस युद्ध में एक अवसर देखा।

अमेरिका का ध्यान इस समय किसी और दिशा में केंद्रित था। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में किम जोंग-उन के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिशों को दोबारा आगे नहीं बढ़ाया।

ऐसे में उत्तर कोरियाई नेता ने पुतिन का साथ देने का फैसला किया, इस उम्मीद के साथ कि ज़रूरत पड़ने पर रूस भी उसका समर्थन करेगा।

दोनों देशों के बढ़ते रिश्तों की मिसाल जून 2024 में देखने को मिली, जब रूस और उत्तर कोरिया ने एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में आपसी रक्षा का प्रावधान भी शामिल है।

हाल के वर्षों में रूस से मिले धन, हथियारों और तकनीक ने किम जोंग-उन को अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने और लंबे समय से उपेक्षित पड़े कुछ औद्योगिक क्षेत्रों को फिर से सक्रिय करने में मदद की है।

जोंगक्यू ली के मुताबिक, "मॉस्को के साथ सैन्य सहयोग बढ़ने से खनन, भारी उद्योग, मशीन निर्माण और रासायनिक उद्योग जैसे क्षेत्रों को स्पष्ट बढ़ावा मिला है। गोला-बारूद और युद्ध सामग्री की बढ़ी मांग ने राज्य नियंत्रित उद्योगों में उत्पादन को बढ़ाया है, जिससे औपचारिक अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।"

हालांकि, दक्षिण कोरियाई विश्लेषक का मानना है कि पुतिन की मदद की भी अपनी सीमाएं हैं।

उन्होंने कहा, "रूस उत्तर कोरिया की कुछ तत्काल आर्थिक परेशानियों को कम कर सकता है, लेकिन व्यापक आर्थिक विकास को लंबे समय तक सहारा देने की उसकी क्षमता चीन की तुलना में काफी कम है।"

ما الذي يجب مراقبته

توقعات الذكاء الاصطناعي — احتمالات وليست حقائق

  • उत्तर कोरिया '20×10' योजना के तहत दस वर्षों में देशभर में 20 नए कारखाने बनाएगा।

    محتمل · خلال سنوات

أسئلة مفتوحة

  • उत्तर कोरिया की आर्थिक स्थिति में वास्तव में कितना सुधार हुआ है?
  • राज्य का बढ़ता नियंत्रण लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार क्यों नहीं ला पाया है?
  • रूस की मदद उत्तर कोरिया के व्यापक आर्थिक विकास को कब तक सहारा दे पाएगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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