सोनम वांगचुक ने अनशन ख़त्म करने के लिए रखीं तीन शर्तें, इरादों पर उठे सवाल
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब अस्पताल में भर्ती हैं और उन्होंने अपना अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं, जिस पर कई सवाल उठ रहे हैं।
نظرة سريعة
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था की 'नाकामियों' और नीट परीक्षा अनियमितताओं के विरोध में अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उन्होंने अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं, जिनमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग शामिल नहीं है, जिससे उनके इरादों पर सवाल उठ रहे हैं।
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सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था की 'नाकामियों' के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे थे। उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश पर सफ़दरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब अस्पताल में भर्ती हैं।
पुलिस दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश का हवाला देते हुए 18 जुलाई को उन्हें जबरन सफ़दरजंग अस्पताल ले गई थी।
अस्पताल में उन्होंने ड्रिप या मुंह से कोई भी तरल पदार्थ लेने से इनकार कर दिया है और कहा है कि उनका अनशन जारी रहेगा।
लेकिन सोमवार को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अपना अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखीं।
इन शर्तों के सामने आते ही उनके इरादों पर सवाल उठाए जाने लगे।
सोशल मीडिया पर कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और एक्टिविस्ट अब उनके इरादों पर सवाल उठा रहे हैं।
सोनम वांगचुक ने जो शर्तें रखी हैं उनमें कहा गया है कि सरकार प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाओं समेत शिक्षा व्यवस्था की 'हाल की नाकामियों' का जिम्मा लेती है या फिर राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का भरोसा देते हैं या फिर अलग-अलग दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उनसे मिलकर आश्वासन देते हैं तो वो अपना अनशन ख़त्म कर देंगे।
इन शर्तों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग का कोई ज़िक्र नहीं है। जबकि ये कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक की प्रमुख मांग रही है।
सोनम वांगचुक नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर ही अनशन पर बैठे थे।
क्या सोनम वांगचुक इस आंदोलन को ख़त्म कर रहे हैं?
वांगचुक की शर्तों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की शर्त का न होना लोगों को चौंका रहा है। कई वरिष्ठ पत्रकारों और एकेडेमिक का कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे सोनम वांगचुक ने अचानक शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने की जिम्मेदारी विपक्ष पर क्यों डाल दी?
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने सोनम वांगचुक की इन मांंगों पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, '' क्या सोनम वांगचुक ने ख़ुद को कॉकरोच पार्टी के आंदोलन से अलग कर लिया है?
''उन्होंने अपना अनशन तोड़ने की आसान शर्तें रखने से पहले क्या आंदोलन के दूसरे साथियों से बात की?
अगर की थी तो क्या सब उन शर्तों पर राज़ी थे?''
''क्या उन्होंने ये मान लिया कि सरकार को बख़्श दिया जाए और सारा भार अब विपक्ष के कंधों पर डाल दिया जाए?''
उन्होंने लिखा, ''क्या इसका मतलब ये होगा कि आंदोलन ख़त्म हो गया? यानी सोनम वांगचुक ने आंदोलन को ख़त्म करने की भूमिका निभाई? इन प्रश्नों के जवाब का इंतज़ार है।''
उन्होंने इससे पहले एक और पोस्ट में लिखा, ''सोनम वांगचुक का ये कथन संदेह को बढ़ाने वाला है। वे कह रहे हैं कि राज्यपाल ने उन्हें विवश किया कि वे अभिजीत दीपके से मिलें।''
''राज्यपाल ने उन्हें क्यों विवश किया? उनके क्या स्वार्थ थे? क्या उन्हें ऊपर से निर्देश दिए गए थे कि वे सोनम वांगचुक का इस्तेमाल करें।''
उन्होंने लिखा, ''सोनम वांगचुक क्यों विवश हुए, उनकी किस मजबूरी का फ़ायदा सरकार ने उठाया? अभिजीत दीपके से पूछा जाना चाहिए कि सोनम ने उनसे क्या बातचीत की थी? क्या सोनम ने राज्यपाल वाली बात बताई थी?''
एकेडेमिक और लेखक अपूर्वानंद ने भी कुछ ऐसे ही सवाल उठाए।
उन्होंने एक्स पर लिखा, '' कैसी निराशाजनक बात है। अब गेंद सरकार के पाले से निकलकर विपक्ष के पाले में पहुंच गई है। वे (सोनम वांगचुक) विपक्षी नेताओं से अपील कर रहे हैं कि वे उनके पास आकर आश्वासन दें कि संसद के मौजूदा सत्र में शिक्षा का मुद्दा मजबूती से उठाया जाएगा।"
सोनम वांगचुक का आंदोलन मील का पत्थर - योगेंद्र यादव
पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, ''वांगचुक का (धर्मेंद्र) प्रधान के इस्तीफ़े की मांग और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से पीछे हटना मोदी सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक जीत है। अब लगता है कि केवल मंत्रियों के साथ बैठक ही काफ़ी होगी। ऐसे नतीजों का अंदाज़ा पहले ही था। इस पूरे घटनाक्रम में उनके समर्थकों ने अपनी ही विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया।''
हालांकि जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव सोनम वांगचुक और सीजेपी के आंदोलन को मील का पत्थर मानते हैं।
उन्होंने पत्रकार स्मिता शर्मा से एक बातचीत में कहा, ''लगभग 50 साल बाद इस देश के युवा शिक्षा के सवाल पर इकट्ठा हुए हैं। नतीजा जो हो लेकिन ये आंदोलन एक मील का पत्थर साबित होगा और शिक्षा और रोज़गार इस देश की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा होगा।''
योगेंद्र यादव ने कहा, ''सोनम वांगचुक ने अपने लिखित बयान में कहा है कि सरकार या तो जिम्मेदारी ले यानी धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा ले। या फिर सांसद यानी विपक्ष के सांसद उन्हें आश्वस्त करेंगे कि वो ये मुद्दा संसद में उठाएंगे।''
सवाल ये है कि क्या सोनम वांगचुक अपना आंदोलन ख़त्म करने के लिए तैयार हैं?
इस सवाल पर योगेंद्र यादव ने कहा कि सोनम वांगचुक के इस बयान का आंदोलन ख़त्म करने से कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने कहा, ''सोनम वांगचुक ने ये कतई नहीं कहा कि इन शर्तों को पूरा करने पर वो आंदोलन ख़त्म कर देंगे। उन्होंने कहा है कि वो भूख हड़ताल ख़त्म करेंगे। उनके साथ बैठे स्टूडेंट्स भी आज भूख हड़ताल ख़त्म कर देंगे।''
इस बीच, सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) के स्टूडेंट्स यूनियन आइसा के तीन अनशनकारियों ने 23 दिनों से चल रही अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है।
इन आंदोलनकारियों से मिलने पहुंचीं शबाना आज़मी ने कहा, "हमारी पीढ़ी भले ही नई पीढ़ी के लिए बेहतर रास्ता बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रही, लेकिन छात्रों के संघर्ष ने आगे की दिशा दिखाई है।"
'सम्मानजनक रास्ता तलाश रहे हैं सोनम वांगचुक'
सोनम वांगचुक की शर्तों के बारे में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता ने कहा कि लद्दाख के इस सोशल एक्टिविस्ट के पास सीमित विकल्प हैं।
उन्होंने कहा, ''सोनम वांगचुक के सामने दो ही रास्ते हैं। एक तो वो अपना आमरण अनशन जारी रखें और डॉक्टर जीडी अग्रवाल की तरह शहीद होकर बाद में भुला दिए जाएं। दूसरा रास्ता ये है कि वो अपनी भूख हड़ताल तोड़ें। इसके लिए उन्हें एक सम्मानजनक रास्ता चाहिए।''
शरद गुप्ता कहते हैं कि सोनम वांगचुक के लिए सम्मानजनक रास्ता क्या हो सकता है?
''सरकार जब बात करने के लिए तैयार नहीं है तो सोनम वांगचुक के सामने सम्मानजनक रास्ता यही हो सकता था कि कम से कम विपक्ष इस मुद्दे को संसद में उठा दे। उनके लिए यहीं संतोषजनक बात होगी।''
शरद गुप्ता ने कहा कि सोनम वांगचुक को ये आशंका है कि जिस तरह पिछली बार लद्दाख को राज्य बनाने की मांग करने पर सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया था, ठीक उसी तरह इस बार भी उन्हें जेल भेजा जा सकता है। इसलिए वो इस पूरे आंदोलन से निकलने का एक सम्मानजनक रास्ता खोज रहे हैं।
शरद गुप्ता का मानना है कि सोनम वांगचुक के लिए यही व्यावहारिक रास्ता भी होगा।
''सोनम वांगचुक और उनके साथ के लोगों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही है परीक्षा में गड़बड़ियों शिक्षा व्यवस्था की दिक्कतों का मुद्दा सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन गया है। जंतर-मंतर पर इस सवाल पर जिस तरह से लोगों की भीड़ जुटी है उसे देखते हुए उनका ये अभियान सफल कहा जाएगा।''
उन्होंने कहा, ''हर जान क़ीमती है। सोनम वांगचुक अपने अभियान को सफल मानें और जीडी अग्रवाल की राह पकड़ने की कोशिश न करें।''
आईआईटी के प्रोफ़ेसर और पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल ने 2018 में गंगा सफाई के मुद्दे पर 111 दिनों का अनशन करने के बाद प्राण त्याग दिए थे। उस समय उनकी उम्र 86 साल थी।
أسئلة مفتوحة
- राज्यपाल ने सोनम वांगचुक को अभिजीत दीपके से मिलने के लिए क्यों विवश किया?
- अभिजीत दीपके से सोनम वांगचुक की क्या बातचीत हुई थी?
- क्या विपक्ष संसद में शिक्षा के मुद्दे को मजबूती से उठाएगा?

