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Zurückमोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' की नग्नता पर बहस, एनसीईआरटी ने तस्वीर को मूल रूप में रखने का एलान किया
मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' की नग्नता पर बहस, एनसीईआरटी ने तस्वीर को मूल रूप में रखने का एलान किया
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BBC हिंदी23.6.2026Education3 Min. LesezeitIndia

मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' की नग्नता पर बहस, एनसीईआरटी ने तस्वीर को मूल रूप में रखने का एलान किया

Auf einen Blick

एनसीईआरटी की कला की किताब में मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' की नग्न प्रतिमा को धुंधला करने पर तीखी बहस छिड़ गई थी. विशेषज्ञों की आलोचना के बाद एनसीईआरटी ने तस्वीर को उसके मूल रूप में रखने का एलान किया है.

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Author, शकील अख़्तर

पदनाम, बीबीसी उर्दू, दिल्ली

प्रकाशित 49 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 5 मिनट

मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' इन दिनों सुर्खियों में है.

कांसे से बनी नर्तकी की यह नग्न मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख पुरावशेषों में गिनी जाती है.

हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कला की किताब 'मधुरिमा' जारी की थी.

इसमें साढ़े चार हज़ार साल पुरानी इस कांस्य प्रतिमा के नग्न शरीर के धड़ और ऊपरी हिस्से को डिजिटल शेडिंग और रंगों का इस्तेमाल कर धुंधला कर दिया गया था.

इसके बाद इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई थी.

कला और इतिहास के विशेषज्ञों की आलोचना के बाद एनसीईआरटी ने इस तस्वीर को उसके मूल रूप में रखने का एलान किया.

नर्तकी है भी या नहीं?

मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' की यह छोटी सी मूर्ति लगभग 10 सेंटीमीटर की है.

कांसे से बनी यह मूर्ति एक ऐसी किशोरी की है, जिसके बाएं हाथ में कंगन हैं और दायां हाथ कूल्हे पर रखा है. उसके दोनों पैर घुटनों से कुछ मुड़े हुए और आगे की तरफ़ निकले हुए हैं.

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शायद मूर्ति के इसी अंदाज़ की वजह से पुरातत्वविद जॉन मार्शल ने इसे 'डांसिंग गर्ल' का नाम दिया था. साढ़े चार हज़ार साल बाद भी इस मूर्ति की पहचान आज तक एक रहस्य है.

इस बारे में लाहौर म्यूज़ियम के क्यूरेटर एहतशाम अज़ीज़ कहते हैं, "इस लड़की की मूर्ति को देखा जाए तो लगता है कि वह नृत्य कर रही है. नृत्य धार्मिक गतिविधियों का हिस्सा रहा है, विशेष रूप से हिंदू धर्म में. आप जितने भी देवी-देवता देखें, उन्हें अक्सर नृत्य करते हुए या इसी तरह के अंदाज़ में पाएंगे. नृत्य धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा रहा है."

इतिहासकार ग्रेगरी एल पॉसेल ने अपनी किताब 'द इंडस सिविलाइज़ेशन' में लिखा है कि यह मूर्ति किसी नर्तकी का प्रतिनिधित्व नहीं करती. कई दूसरे इतिहासकारों ने भी इसे नर्तकी मानने से इनकार किया है.

'ए न्यू हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' के लेखक आर मुखर्जी, शोभिता पुंजा और टोबी सिंक्लेयर लिखते हैं, "इस लड़की की मूर्ति को 'डांसिंग गर्ल' शायद उसके खड़े होने के अंदाज़ के आधार पर कहा गया, लेकिन सच्चाई यह है कि इसकी सही पहचान आज भी इतिहासकारों के लिए एक पहेली है."

मशहूर इतिहासकार एएल बाशम ने अपनी किताब 'द वंडर दैट वाज़ इंडिया' में लिखा है, ''कुछ इतिहासकारों ने यह बताने की कोशिश की है कि यह डांसिंग गर्ल मंदिरों की नर्तकी या वेश्या वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इस बात को ऐतिहासिक रूप से साबित नहीं किया जा सकता. यह साफ़ नहीं है कि यह लड़की सच में नर्तकी है और मंदिर की नर्तकी होने का दावा तो और भी अविश्वसनीय है."

भारत कैसे पहुंची ये मूर्ति?

डांसिंग गर्ल की यह मूर्ति इस समय नई दिल्ली स्थित नेशनल म्यूज़ियम में रखी हुई है. मर्टिमर व्हीलर 1944 से 1948 तक भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख रहे.

वह आज़ादी से पहले मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से लगभग 12 हज़ार पुरावशेष और नमूने प्रदर्शनी के लिए लाहौर म्यूज़ियम से दिल्ली लेकर आए थे.

भारत के विभाजन के बाद मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे प्राचीन स्थल पाकिस्तान में चले गए, जबकि गुजरात का लोथल, राजस्थान का कालीबंगन और धोलावीरा जैसे कुछ स्थल भारत का हिस्सा बने जो हड़प्पा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते थे.

पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहासकार आशीष कुमार ने अपने एक शोध पत्र में लिखा है, "'विभाजन के समय सिंधु घाटी के ज़्यादातर पुरावशेष दिल्ली में रखे हुए थे. चूंकि यह सब पाकिस्तान के इलाक़े से खोजे गए थे, इसलिए पाकिस्तान ने इनकी वापसी की मांग की. 1950 के दशक में मर्टिमर व्हीलर की मदद से इन पुरावशेषों का आधा हिस्सा पाकिस्तान को देने का समझौता हुआ."

उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान 'प्रीस्ट किंग' (पुरोहित राजा) और 'डांसिंग गर्ल' की मूर्तियां वापस लेना चाहता था, लेकिन भारत उनमें से केवल एक पाकिस्तान को देने को तैयार हुआ.

कुछ इतिहासकारों के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारियों ने यह सोचते हुए 'प्रीस्ट किंग' लेने का फ़ैसला किया कि डांसिंग गर्ल की नग्न मूर्ति विवाद का कारण बन सकती है.

लेकिन यह मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ.

लाहौर हाई कोर्ट में 2016 में एक याचिका दायर की गई जिसमें, अदालत से गुहार लगाई गई कि वह पाकिस्तान सरकार को डांसिंग गर्ल की मूर्ति भारत से वापस लाने के निर्देश जारी करे.

याचिका में कहा गया था कि चूंकि यह मूर्ति 1926 में मोहनजोदड़ो से मिली थी, इसलिए इस प्राचीन धरोहर का असली वारिस पाकिस्तान है.

उस वक़्त भारत के कुछ इतिहासकारों ने यह तर्क दिया कि पाकिस्तान अकेला हड़प्पा सभ्यता का वारिस नहीं है बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की साझी विरासत है.

ऑड्रे ट्रशके अपनी किताब 'इंडिया: फ़ाइव थाउज़ेन्ड ईयर्स ऑफ़ हिस्ट्री' में लिखती हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता मिस्र, मेसोपोटामिया और चीन के साथ प्राचीन काल की चार बड़ी सभ्यताओं में से एक थी. भौगोलिक दृष्टि से सिंधु घाटी का क्षेत्र मिस्र और मेसोपोटामिया के संयुक्त क्षेत्र से बड़ा था और शायद इसकी आबादी भी अधिक थी.

वह लिखती हैं कि सिंधु घाटी की खुदाई में मिली हज़ारों चीज़ों पर अज्ञात लिपि में लिखी हुई बातें मौजूद हैं. उस काल की मिली मुहरों पर लिखी हुई बातें आज तक पढ़ी नहीं जा सकी हैं.

इन सभी बहसों के साथ सिंधु घाटी की सभ्यता की तरह डांसिंग गर्ल भी एक पहेली बनी हुई है.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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