Eilmeldung
RUДвое российских военнопленных сбежали из колонии в Харьковской областиTRKolombiya'da 7,4 Büyüklüğündeki Deprem Sonucu: 312 Ölü, 4.380 Yaralı, 290 KayıpARكوريا الشمالية تحذّر اليابان من "ضربة مدمرة فورية" في حالة اتخاذ "الخيار الخاطئ"ESFeijóo exige el regreso o expulsión de todos los inmigrantes irregulares en Ceuta y censura la 'inacción' del GobiernoGLOBALChidimma Adetshina reiterates South African birth amid deportation proceedingsUKGreat Britain household energy bills set to hit three-year high this winterUSMeta and Apple Slammed Over Ads and Apps Promoting AI Deepfake PornARالناتو يستعد لتهديدات إيرانية واستطلاع رأي جديد في إسرائيلCN烏克蘭戰時選舉面臨重重挑戰TRMilletvekili Melih Meriç'i Bıçaklayan Zanlı Seydi Ahmet Keleş'in İfadesi ÇıktıRUДвое российских военнопленных сбежали из колонии в Харьковской областиTRKolombiya'da 7,4 Büyüklüğündeki Deprem Sonucu: 312 Ölü, 4.380 Yaralı, 290 KayıpARكوريا الشمالية تحذّر اليابان من "ضربة مدمرة فورية" في حالة اتخاذ "الخيار الخاطئ"ESFeijóo exige el regreso o expulsión de todos los inmigrantes irregulares en Ceuta y censura la 'inacción' del GobiernoGLOBALChidimma Adetshina reiterates South African birth amid deportation proceedingsUKGreat Britain household energy bills set to hit three-year high this winterUSMeta and Apple Slammed Over Ads and Apps Promoting AI Deepfake PornARالناتو يستعد لتهديدات إيرانية واستطلاع رأي جديد في إسرائيلCN烏克蘭戰時選舉面臨重重挑戰TRMilletvekili Melih Meriç'i Bıçaklayan Zanlı Seydi Ahmet Keleş'in İfadesi Çıktı
Newsgather
Zurückमोदी और ट्रंप की मुलाक़ात: क्या बदली हुई बॉडी लैंग्वेज भारत-अमेरिका रिश्तों में आई दूरी की झलक है?
मोदी और ट्रंप की मुलाक़ात: क्या बदली हुई बॉडी लैंग्वेज भारत-अमेरिका रिश्तों में आई दूरी की झलक है?
In Entwicklung
BBC हिंदी19.6.2026Welt5 Min. LesezeitIndien

मोदी और ट्रंप की मुलाक़ात: क्या बदली हुई बॉडी लैंग्वेज भारत-अमेरिका रिश्तों में आई दूरी की झलक है?

Auf einen Blick

फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात में गर्मजोशी की कमी दिखी. यह बदलाव भारत-अमेरिका रिश्तों में टैरिफ़, व्यापार, रूस से तेल ख़रीद और पाकिस्तान जैसे मुद्दों पर आए तनाव को दर्शाता है.

KI-generierte Zusammenfassung

Schriftgröße

मोदी और ट्रंप जिस तरह से एक-दूसरे से पेश आए, उससे क्या मतलब निकलता है?

Author, सुमेधा पाल

पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रकाशित एक मिनट पहले

पढ़ने का समय: 8 मिनट

फ्रांस के एवियन-ले-बैं में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाक़ात की चर्चा खूब है.

लेकिन सबसे ज़्यादा ध्यान उस बातचीत पर नहीं बल्कि कैमरों में कैद हुई तस्वीर की रही.

दोनों नेता करीब 16 महीने बाद आमने-सामने थे. लेकिन इस बार वह पुरानी तस्वीर नहीं दिखी जिसके लिए मोदी और ट्रंप की मुलाक़ातें जानी जाती रही हैं.

न कोई बड़ा सार्वजनिक गर्मजोशी भरा इशारा, न लंबे समय तक दिखने वाली दोस्ताना बॉडी लैंग्वेज. एक औपचारिक हाथ मिलाना हुआ और बातचीत आगे बढ़ी.

कूटनीति में कई बार तस्वीरें शब्दों से ज़्यादा संदेश देती हैं. इसलिए सवाल उठा कि क्या यह सिर्फ़ दो नेताओं की बदली हुई शैली थी या फिर भारत-अमेरिका रिश्तों में आई दूरी की झलक?

दोनों नेताओं के बीच यह मुलाक़ात ऐसे समय हुई, जब कई मुद्दों पर रिश्तों में एक कड़वाहट सी है.

इसके केंद्र में है- टैरिफ़ विवाद, ट्रेड डील की बातचीत, रूस से भारत की तेल ख़रीद, पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का रुख़ और भारतीय नाविकों की सुरक्षा. इन मुद्दों ने रिश्तों में असहजता बढ़ाई है.

भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, लेकिन उसे एक अहम साझेदार के तौर पर लगातार बुलाया जाता रहा है.

छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें

सबसे अधिक पढ़ी गईं

समाप्त

ऐसे में यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक बैठक नहीं थी. यह देखने का भी मौका है कि तनाव के बीच दोनों देश अपने रिश्ते को किस तरह संभालते हैं.

दोस्ती की पुरानी तस्वीर से आगे बढ़ता रिश्ता

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें

दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

मोदी और ट्रंप के बीच रिश्ते लंबे समय तक व्यक्तिगत गर्मजोशी और बड़े सार्वजनिक आयोजनों के लिए पहचाने जाते रहे.

अमेरिका में 'हाउडी मोदी' और भारत में 'नमस्ते ट्रंप' जैसे कार्यक्रमों ने दोनों नेताओं की नज़दीकी को सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश में बदल दिया था. लेकिन जी-7 की तस्वीर अलग थी.

इस बार दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई, लेकिन माहौल ज़्यादा औपचारिक था. यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते अब सिर्फ नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर नहीं टिके हैं.

पूर्व राजदूत प्रभु दयाल मानते हैं कि इसे भारत की कमज़ोरी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. वह कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात भारत की कमज़ोर स्थिति नहीं दिखाती. भारत ने अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को मज़बूती से सामने रखा."

प्रभु दयाल के अनुसार, पहले जैसी सार्वजनिक गर्मजोशी की जगह इस बार ज़्यादा कामकाज़ी अंदाज़ दिखा.

वह कहते हैं, "पहले जैसी बड़ी सार्वजनिक गर्मजोशी और गले मिलने वाली तस्वीरों की जगह इस बार एक ज़्यादा औपचारिक और व्यावसायिक शैली दिखी. इससे दोनों नेता व्यापार, सुरक्षा और सैन्य साझेदारी जैसे ठोस मुद्दों पर ध्यान दे सके."

यानी तस्वीर बदली थी, लेकिन सवाल यह था कि क्या रिश्ते भी उतने ही बदल गए हैं?

16 महीने की खटास के बाद मुलाक़ात

इस मुलाक़ात को समझने के लिए पिछले 16 महीनों के रिश्तों को देखना ज़रूरी है.

ट्रंप की दूसरी पारी में भारत-अमेरिका रिश्तों में कई नए तनाव सामने आए. सार्वजनिक बयान, व्यापार दबाव और रूस से तेल ख़रीद जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद दिखे.

अंतररराष्ट्रीय मामलों के जानकार और एमिटी यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर आशुतोष सिंह कहते हैं कि यह बैठक ऐसे दौर के बाद हुई जब रिश्तों में कई असहज स्थितियां बन चुकी थीं.

वह कहते हैं, "यह मुलाक़ात करीब 16 महीने के तनावपूर्ण दौर के बाद हुई है. इस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ़ से भारत और भारतीयों को लेकर कई ऐसे बयान आए जो रिश्तों के लिए सहज नहीं थे."

हालांकि भारत ने इस दौरान सार्वजनिक टकराव का रास्ता नहीं चुना. आशुतोष सिंह के मुताबिक़ यह भी कूटनीति का हिस्सा था.

वह कहते हैं, "कूटनीति में संकेतों की अहमियत होती है. पिछले 16 महीनों में ट्रंप अपनी स्थिति मज़बूत करते रहे और भारत ने उनके दबाव का जवाब उसी भाषा में नहीं दिया."

उनका कहना है कि इससे ट्रंप के पास रिश्ते में सख़्ती और नरमी दोनों दिखाने की गुंज़ाइश बनी रही.

व्यापार समझौता: पर्दे के पीछे की असली बातचीत

मोदी-ट्रंप मुलाक़ात के पीछे सबसे बड़ा व्यावहारिक मुद्दा व्यापार था. ट्रंप प्रशासन की टैरिफ़ नीति ने कई देशों के साथ तनाव बढ़ाया है और भारत भी इसका हिस्सा रहा है.

लेकिन व्यापार सिर्फ़ आर्थिक मामला नहीं है. यह दोनों देशों के राजनीतिक हितों से भी जुड़ा हुआ है.

आशुतोष सिंह कहते हैं, "यह बैठक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भी जुड़ी है. ट्रंप चाहते हैं कि भारत के साथ कोई छोटा समझौता भी अमेरिका में उपलब्धि के तौर पर दिखाया जा सके, ख़ासकर अपने समर्थकों और किसानों के बीच."

भारत के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अमेरिकी बाज़ार में बेहतर पहुंच चाहता है.

आशुतोष सिंह के मुताबिक़, "भारत के लिए ज़रूरी है कि वह खुद को अमेरिका के क़रीबी रणनीतिक साझेदार के रूप में पेश करे और समझौते में कुछ रियायतें हासिल करे, ख़ासकर उस बाज़ार में जहां भारत को बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों से प्रतिस्पर्द्धा करनी है."

क्या बॉडी लैंग्वेज ही पूरी कहानी है?

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हर्ष वी पंत कहते हैं कि कूटनीति को सिर्फ़ तस्वीरों से नहीं समझा जा सकता. उनके मुताबिक़, "ऐसी मुलाक़ातें किसी रिश्ते की स्थिति समझने का सबसे अच्छा पैमाना नहीं होतीं, ख़ासकर जब बात डोनाल्ड ट्रंप की हो. असली बात यह है कि बातचीत से क्या नतीजे निकलते हैं."

उनका कहना है कि इससे पहले भी मोदी और ट्रंप की मुलाक़ात गर्मजोशी भरी दिखी थी, लेकिन उससे रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.

इस बार मोदी का अंदाज़ भी अलग था.

पंत कहते हैं, "इस बार मोदी ने ट्रंप की तरह व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं की. उनका रुख़ ज़्यादा संतुलित था. यह भारत की तरफ़ से भी एक संदेश था."

यानी भारत ने यह संकेत दिया कि रिश्ता सिर्फ व्यक्तिगत समीकरणों से नहीं चलेगा.

भरोसे का संकट

भारत-अमेरिका रिश्तों में अब सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की है.

रणनीतिक साझेदारी केवल रक्षा और व्यापार से नहीं बनती. इसके लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की चिंताओं को महत्व देना होता है.

हर्ष वी पंत कहते हैं, "रणनीतिक साझेदारी सिर्फ़ रक्षा और व्यापार से नहीं चलती. इसके लिए यह भरोसा ज़रूरी है कि दोनों देश एक-दूसरे की चिंताओं को महत्व देते हैं."

टैरिफ़ विवाद, पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का रुख़ और भारत से जुड़े कुछ बयानों ने इस भरोसे को कमज़ोर किया है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यूएस स्टडीज़ के विशेषज्ञ डॉक्टर विनीत प्रकाश कहते हैं कि तनाव के पीछे सिर्फ़ एक मुद्दा नहीं है.

वह कहते हैं, "व्यापार एक बड़ा कारण है. दूसरा कारण यह है कि अमेरिका कई बार भारत की प्राथमिकताओं और सुरक्षा चिंताओं को लेकर पर्याप्त संवेदनशील नहीं दिखा."

उनके मुताबिक़ ट्रंप की राजनीति में अक्सर यह सवाल केंद्र में रहता है कि अमेरिका को क्या फ़ायदा मिलेगा.

वह कहते हैं, "ट्रंप की राजनीति में सवाल यह होता है कि अमेरिका को क्या फ़ायदा मिलेगा. इसमें कई बार भारत और भारतीय हित प्रभावित होते हैं."

नाविकों की सुरक्षा का संदेश

जी-7 के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने समुद्री सुरक्षा और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया.

यह सिर्फ़ एक मानवीय मुद्दा नहीं था. भारत के लिए यह वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल है.

हर्ष वी पंत का कहना है कि भारत ने यह दिखाने की कोशिश की कि वह सिर्फ़ रिश्तों की गर्मजोशी नहीं बल्कि अपने हितों पर भी बात करेगा.

वह कहते हैं, "भारत-अमेरिका संबंध जी-7 या केवल टैरिफ़ विवाद से कहीं बड़े हैं. रक्षा, शिक्षा, तकनीक और लोगों के बीच संबंध बहुत गहरे हैं."

आख़िरकार इस मुलाक़ात की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि भारत-अमेरिका रिश्ता अब सिर्फ़ नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती से नहीं चलेगा.

अब इसकी दिशा व्यापार, सुरक्षा और सबसे बढ़कर भरोसे से तय होगी."

Verwandte Themen

This article was originally published by BBC हिंदी.

Ähnliche Meldungen

असम में बाढ़ के दौरान दिखी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मदद के लिए उठे कई हाथ - ग्राउंड रिपोर्ट
Welt·vor 19 Stunden

असम में बाढ़ के दौरान दिखी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मदद के लिए उठे कई हाथ - ग्राउंड रिपोर्ट

असम के शिवसागर में आई भीषण बाढ़ के दौरान हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने आपसी मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे की जान बचाई और गुरुद्वारों व मस्जिदों में शरण ली। सांप्रदायिक राजनीति के बावजूद, संकट के समय मानवीय एकता की एक नई मिसाल देखने को मिली है।

BBC हिंदी
6 Min. Lesezeit