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रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर को पार कर सकता है, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक
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BBC हिंदी5/21/2026Business6 min readIndia

रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर को पार कर सकता है, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक

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भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 97 के स्तर के करीब पहुंच गया है और 2026 में 7.5% गिर चुका है। विश्लेषकों का अनुमान है कि यह 100 के स्तर को पार कर सकता है, जिससे आयात महंगा होगा और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।

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प्रकाशित 21 मई 2026, 13:01 IST

पढ़ने का समय: 6 मिनट

किसी भी देश की मुद्रा की मज़बूती या कमज़ोरी वहाँ की अर्थव्यवस्था की सेहत की स्थिति बताती है.

आमतौर पर जिस देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही हो, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है.

भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मौजूदा समय में भी बढ़िया है, इसके बावजूद 2018 से हर साल रुपया कमज़ोर हुआ है.

2013 में जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तब उन्होंने कमज़ोर होते रुपये को लेकर तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ एक कारगर राजनीतिक अभियान चलाया था.

उस समय बड़े बॉलीवुड सितारों, लोकप्रिय धर्मगुरुओं और कई मशहूर हस्तियों को यह कहते हुए देखा गया था कि भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 60 के स्तर तक पहुँच गया है.

अब अक्सर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते पाए गए हैं कि जब बीजेपी के शासनकाल में रुपया लगातार गिरते हुए 97 के क़रीब आ गया, तब उनमें से किसी के पास कोई टिप्पणी क्यों नहीं है.

अगर रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर जाता है तो सरकार की असहजता और बढ़ सकती है.

भारत में कमज़ोर रुपए का मतलब है कि आयात महंगे हो जाते हैं. इससे तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती हैं. इनमें से अधिकांश भारत विदेशों से ख़रीदता है.

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कमज़ोर रुपया उन परिवारों के लिए फ़ायदा भी लेकर आता है जो विदेशों में काम कर रहे भारतीयों के पैसों पर निर्भर हैं क्योंकि हर डॉलर के ज़्यादा रुपये मिलते हैं.

भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस हासिल करने वाले देशों में से एक है.

मार्च 2025 तक के वर्ष में प्रवासी भारतीयों ने देश में 135 अरब डॉलर से अधिक भेजे थे.

हालांकि ईरान युद्ध के कारण पर्सियन गल्फ़ के देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों से आने वाला पैसा प्रभावित हो सकता है.

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भारतीय मुद्रा रुपए की जैसी हालत है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है.

एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 97 के क़रीब पहुँच चुका है. अभी 2026 में पाँच महीने भी नहीं पूरे हुए हैं और रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7.5% गिर चुका है.

रुपए को थामने की भारत की हर कोशिश बहुत कारगर साबित नहीं हो रही है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पर दबाव बढ़ रहा है कि वह कुछ ठोस क़दम उठाए.

सरकार रुपए की कमज़ोरी को काबू में करने के लिए कई क़दम उठा रही है लेकिन इसका असर अभी दिख नहीं रहा है. सरकार ने सोना और चांदी पर आयात शुल्क दोगुने से ज़्यादा बढ़ा दिए हैं.

पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की है और खाद्य तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रही है. वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर घरेलू मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.

ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले बाद तेल की क़ीमतों में आई तेज़ बढ़ोतरी भारत के व्यापार घाटे को बढ़ा रही है. रुपए कमज़ोर होने का असर भारत के शेयर बाज़ार पर भी सीधा पड़ रहा है.

विदेशी निवेशक इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.

रुपए कमज़ोर होने से विदेशी निवेशकों को डॉलर में रिटर्न कम मिलता है. ऐसे में ये उन देशों की ओर रुख़ कर रहे हैं, जिनकी मुद्राएं डॉलर के सामने डटकर खड़ी हैं.

वैश्विक निवेशकों को लग रहा है कि रुपया आगे और कमज़ोर हो सकता है.

ऐसा अनुमान भी है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुँच सकता है. यह एक ऐसा स्तर है, जिसे कभी अकल्पनीय माना जाता था.

सिटी ग्रुप का मानना है कि भारतीय कंपनियों के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने और निर्यातकों को अपनी विदेशी मुद्रा आय जल्दी भारत वापस लाने के लिए सख़्त नियम लागू किए जाने की संभावना है.

तेल की बढ़ती क़ीमतें

भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का मतलब है कि समान मात्रा में तेल ख़रीदने के लिए भारत को पहले से ज्यादा डॉलर ख़र्च करने पड़ रहे हैं.

इसके साथ ही पूंजी निकासी भी दबाव बढ़ा रही है. 2026 में वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.

पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ़ की घोषणा की तो रुपए में गिरावट और तेज़ हो गई.

इसके बाद अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया और तेल की क़ीमतें बढ़ गईं. रुपया एक बार फिर से दबाव में आया और यह बढ़ता ही जा रहा है.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये की कमज़ोरी की असली वजह बाहरी नहीं बल्कि घरेलू संरचनात्मक कमज़ोरियां भी हैं, जिन्हें तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद दूर नहीं किया जा सका.

2025 में रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा था और 2026 में भी यही स्थिति बनी रही.

2025 में रुपये की कमज़ोरी के पीछे ट्रंप के दोहरे अंकों वाले टैरिफ़, भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों का बाहर जाना और धीमी आर्थिक वृद्धि को माना गया.

मौजूदा कमज़ोरी इस डर को दर्शाती है कि ईरान युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा क़ीमतें महंगाई बढ़ाएंगी, आर्थिक वृद्धि को कमज़ोर करेंगी और भारत के चालू खाते के घाटे को और बढ़ा देंगी.

ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के अनुमान के अनुसार, अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल और गैस क़ीमतें युद्ध से पहले के स्तर से 50 प्रतिशत ऊपर रहती हैं तो भारत का आयात बिल हर महीने पाँच अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.

आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव क्या कारण मानते हैं?

20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने लिखा था, "रुपए में कमज़ोरी हालिया संकट की कहानी नहीं है. असल में रुपया पिछले कई वर्षों से लगातार दबाव में रहा है क्योंकि भारत से बाहर पूंजी बाहरी और घरेलू दोनों कारणों से जा रही है. विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर अवसरों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर अन्य बाज़ारों की ओर बढ़ गए.

वैश्विक स्तर पर पूंजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपए पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आसपास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है."

विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव

भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 690 अरब डॉलर पर आ गया है. यह फ़रवरी 2026 के रिकॉर्ड 728 अरब डॉलर के स्तर से नीचे है.

भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है. लेकिन आयात बिल बढ़ने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर खर्च किए थे.

इसी अवधि में सोने का आयात 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया था. वहीं चांदी का आयात क़रीब 150 प्रतिशत बढ़कर 12 अरब डॉलर हो गया था. उर्वरक आयात भी पिछले वित्त वर्ष में 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर पहुँच गया था.

इन चार वस्तुओं तेल, सोना, चांदी और उर्वरक पर भारत का आयात बिल केवल चार वर्षों में दोगुने से भी अधिक हो गया है. ज़ाहिर है कि आयात बिल बढ़ता है तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च होता है. डॉलर कम होगा तो रुपया कमज़ोर होगा. यही वजह है कि सरकार अब इस बढ़ते आयात दबाव पर ब्रेक लगाने की कोशिश कर रही है.

निर्यात से ज़्यादा आयात

भारत अब भी जितना निर्यात करता है, उससे ज़्यादा आयात करता है. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ अब भी अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर दबाव बनाए हुए हैं. हालांकि भारत कई देशों से मुक्त व्यापार समझौता कर रहा है.

अप्रैल में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत पहुंच गई. क़रीब चार सालों की यह सबसे तेज वृद्धि है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.

जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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