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चेन्नई: 19 महीने का बच्चा बना तमिलनाडु का सबसे कम उम्र का आर्गन डोनर
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BBC हिंदी7 hours agoHealth3 min readIndia

चेन्नई: 19 महीने का बच्चा बना तमिलनाडु का सबसे कम उम्र का आर्गन डोनर

माता-पिता के अंगदान के फ़ैसले से तीन अन्य लोगों को नया जीवन मिला

Quick Look

चेन्नई के राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल में 19 महीने के एक ब्रेन डेड बच्चे के माता-पिता ने अंगदान का फ़ैसला किया, जिससे वह तमिलनाडु के सबसे कम उम्र के आर्गन डोनर बन गए और उनके अंगों से तीन लोगों की जान बचाई गई।

AI-generated summary

Why It Matters

चेन्नई के राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल में 19 महीने के बच्चे को हाइड्रोसिफ़लस बीमारी के बाद ब्रेन डेड घोषित किया गया था।

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अंगदान के लिए सहमति देने के बाद मां ने आखिरी बार 19 महीने के अपने बच्चे को देखा. इसके बाद डॉक्टर उसे ऑपरेशन थिएटर ले गए.

ऑपरेशन थिएटर के दरवाज़े बंद होने के बाद मां ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बेटे को ले जाते हुए देखना उनके लिए बहुत मुश्किल था, इसलिए वह अपने पति के साथ अस्पताल से चली गईं.

दंपत्ति का बच्चा चेन्नई के राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल में ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था. मां- बाप की सहमति से बच्चे के अंगों को तीन अलग-अलग लोगों में ट्रांसप्लांट किए गए.

तमिलनाडु में यह बच्चा अबतक का सबसे कम उम्र का ऑर्गन डोनर है.

शुरुआत में माता-पिता को लगा कि उनका बच्चा सिर्फ़ थका हुआ है और उसने खाना कम कर दिया है. लेकिन बच्चा सिर्फ़ 19 महीने का था, इसलिए वह अपनी तकलीफ़ और लक्षणों के बारे में साफ़ साफ़ बता नहीं पा रहा था.

बच्चे के माता-पिता आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार से आते हैं.

उन्होंने सबसे पहले उसे स्थानीय अस्पताल में दिखाया जहां से बेहतर इलाज़ के लिए उसे चेन्नई के राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल भेज दिया गया.

डॉक्टरों ने बच्चे में एक ऐसी बीमारी की पहचान जो बहुत 'रेयर' होती है लेकिन बहुत गंभीर बीमारी मानी जाती है. बच्चे में हाइड्रोसिफ़लस बीमारी की पहचान की गई.

हाइड्रोसिफ़लस बीमारी क्या होती है?

हाइड्रोसिफ़लस बीमारी ऐसी स्थिति है, जिसमें आमतौर पर दिमाग और रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखने वाला सेरेब्रोस्पाइनल फ़्लूइड दिमाग के वेंट्रिकल्स में ज़रूरत से ज़्यादा जमा हो जाता है.

इससे दिमाग पर काफ़ी दबाव पड़ सकता है और उसका सामान्य काम प्रभावित हो सकता है.

उस समय माता-पिता को इस बीमारी की गंभीरता का पता नहीं था.

राजीव गांधी जनरल अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख डॉक्टर आर राघवेंद्रन ने बताया, "बच्चे के दिमाग में बहुत कम समय में काफ़ी तेज़ी से फ़्लूइड जमा हो गया."

"इस वजह से जब बच्चा अस्पताल पहुंचा, तब उसकी हालत बेहद गंभीर थी. सर्जरी के बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ. हाइड्रोसिफ़लस जन्मजात असामान्य चीजों के कारण हो सकता है. कुछ मामलों में जन्म के तुरंत बाद इसके लक्षण दिखाई नहीं देते और बाद में सामने आ सकते हैं."

ब्रेन डेड घोषित होने के बाद भी इलाज जारी रहा

बच्चा छह दिनों तक आईसीयू में अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में रहा. उसकी सर्जरी की गई, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद हालत लगातार बिगड़ती गई.

आखिरकार डॉक्टरों ने बच्चे को ब्रेन डेड घोषित कर दिया. इसका मतलब है कि मेडिकल सपोर्ट की मदद से शरीर को कुछ समय तक काम करता हुआ रखा जा सकता है, लेकिन दिमाग की सभी गतिविधियां स्थायी रूप से बंद हो चुकी होती हैं.

कुछ दिन पहले तक बच्चा दूसरे छोटे बच्चों की तरह दौड़ रहा था और खेल रहा था. अब उसके माता-पिता के सामने यह दुखद सच्चाई थी कि वह आईसीयू के बिस्तर से कभी ठीक होकर वापस नहीं आएगा.

इसके बाद मेडिकल टीम ने परिवार से अंगदान के बारे में बात की और इसके महत्व के बारे में समझाया. गहरे दुख के बीच भी माता-पिता ने अपने बच्चे के अंग दान करने का मुश्किल फ़ैसला लिया.

इस तरह 19 महीने का यह बच्चा तमिलनाडु के इतिहास में सबसे कम उम्र का आर्गन डोनर बन गया.

अंगदान का फ़ैसला होने के बाद बच्चे को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया. लेकिन मां-पिता इसके बाद वहां नहीं रुके.

अस्पताल परिसर में मौजूद बच्चे के पिता ने बस इतना कहा, "मेरा बच्चा बच नहीं सका. हमने यह (अंगदान) दूसरे बच्चों के लिए किया."

डॉक्टर राघवेंद्रन ने फ़ोन पर बीबीसी तमिल को इस घटना के बारे में बताते हुए कुछ देर के लिए बात रोक दी. दूसरी तरफ कुछ पल तक खामोशी रही.

इसके बाद उन्होंने कहा, "सर्जरी के बाद एक सामाजिक संस्था की मदद से बच्चे के शव को दफ़ना दिया गया."

दो साल पहले इसी अस्पताल में 20 महीने के एक बच्चे के आर्गन डोनेट किए गए थे.

राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल के डीन डॉक्टर शांतारामन ने कहा, "मैं अंगदान को सबसे बड़ा दान मानता हूं. माता-पिता ने अपनी ज़िंदगी के सबसे दर्दनाक पलों में एक नेक फ़ैसला लिया. एक डॉक्टर के तौर पर मुझे इससे बहुत संतोष मिला."

उन्होंने आगे कहा, "कई मामलों में आख़िरकार अंगदान का फ़ैसला मां ही करती है. बच्चा चाहे कितनी भी उम्र का हो, मां के लिए वह हमेशा बहुत ख़ास होता है."

"यह जानना कि उसके बच्चे के अंग किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर में काम कर रहे हैं, उसे कुछ राहत दे सकता है. ऐसा फ़ैसला लेना कभी आसान नहीं होता. इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए."

क्या बच्चों के अंग बड़ों के लिए उपयुक्त होते हैं?

ब्रेन डेड घोषित किए गए बच्चे की दोनों किडनियां चेन्नई की 20 साल की उम्र वाली एक महिला में ट्रांसप्लांट की गईं. उसका लिवर चेन्नई के एक बच्चे को दान किया गया, जबकि उसका दिल कोयंबटूर के एक बच्चे में ट्रांसप्लांट किया गया.

डॉ. शांतारामन के मुताबिक़, छोटे बच्चों के अंगों को कई मामलों में बड़ों में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किया जा सकता है.

उन्होंने बताया, "कई अंग जन्म से ही उसी तरह काम करते हैं, जैसे वे बड़ों में काम करते हैं. डेढ़ साल की उम्र तक कई अंग लगभग वयस्कों के आकार के हो जाते हैं."

डॉ. राघवेंद्रन ने बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट में सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक ग्लोमेरुलर फ़िल्ट्रेशन रेट यानी जीएफ़आर है. यह बताता है कि किडनियां खून को कितनी अच्छी तरह फ़िल्टर कर रही हैं.

उन्होंने कहा, "जीएफ़आर डोनर और रिसीवर, दोनों के लिए उपयुक्त होना चाहिए. जब किसी वयस्क की किडनी दान की जाती है, तो ट्रांसप्लांट के लिए अक्सर एक किडनी ही काफ़ी होती है. लेकिन जब डोनर बहुत छोटा बच्चा हो, तो आमतौर पर दोनों किडनियां एक साथ ट्रांसप्लांट की जाती हैं."

उन्होंने आगे बताया कि दिल और फेफड़ों जैसे अंगों को ट्रांसप्लांट करते समय शरीर का वज़न और अन्य कारक महत्वपूर्ण होते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि कई बच्चे अब भी आर्गन ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग लिस्ट में हैं, इसलिए इस तरह का अंगदान ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है.

Open Questions

  • अंग प्राप्त करने वाले मरीजों की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति क्या है?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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