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जंतर-मंतर 2.0 :  कौन कर रहा है आंदोलन का एजेंडा तय, क्या रही है सीजेपी की चूक - द लेंस
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जंतर-मंतर 2.0 : कौन कर रहा है आंदोलन का एजेंडा तय, क्या रही है सीजेपी की चूक - द लेंस

दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), विपक्ष और वामपंथी संगठनों की भूमिका, पुलिस की कार्रवाई और मीडिया की स्वतंत्रता पर चर्चा।

Quick Look

दिल्ली में जंतर-मंतर 2.0 प्रदर्शनों के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), विपक्ष और वामपंथी संगठनों की भूमिका, पुलिस की सख्त कार्रवाई और मीडिया की स्वतंत्रता पर पत्रकारों की चर्चा।

AI-generated summary

Why It Matters

दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में प्रदर्शन किए गए।

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बीता एक हफ्ता दिल्ली के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा और दिल्ली की यह उथल-पुथल देश के कई अन्य हिस्सों में भी महसूस की गई. विरोध प्रदर्शनों के बीच देश की राजधानी में सुरक्षा के ऐसे इंतजाम किए गए जिन्हें अभूतपूर्व बताया गया.

सुरक्षा की कई परतों के बीच लगभग तीस हज़ार पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान तैनात किए गए.

तस्वीरों और वीडियो में पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों को जबरन घसीटते और बसों में धकेलते हुए दिखाई दिए.

इन प्रदर्शनों के केंद्र में थी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी. उसके साथ विपक्षी दल भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े़ की मांग कर रहे थे. इन दलों का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया का फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को मिल रहा है.

इस आंदोलन को आकार देने वाली तीन प्रमुख ताकतें दिखाई देती हैं - कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन और वामपंथी संगठन. इन प्रदर्शनों ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी की है और यह पूरा घटनाक्रम कई सवालों को जन्म दे रहा है.

सीजेपी का यह आंदोलन इससे पहले हुए प्रदर्शनों से किस तरह अलग है? इस बार मुद्दा सिर्फ़ किसी एक फ़ैसले या व्यक्ति के विरोध का नहीं बल्कि चुनावी व्यवस्था से जुड़ा है.

मगर क्या यह आम लोगों को जोड़ पा रहा है? इस पूरी कहानी में सीजेपी, कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और वामपंथी छात्र संगठनों की क्या भूमिका है?

लेकिन सबसे अहम सवाल शायद यह है कि इस विरोध का आगे क्या होगा? क्या इससे एसआईआर की प्रक्रिया पर कोई संस्थागत पुनर्विचार होगा? या फिर प्रदर्शनों, हिरासत और राजनीतिक टकराव के बावजूद ये मांगें कोई असर नहीं डाल पाएंगी?

इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश कुमार ने बात की बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन और 'द हिंदू' की राजनीतिक संपादक निस्तुला हेब्बार से.

इस बार के प्रदर्शनों में पुलिस की तैयारी और उसकी कार्रवाई पिछली बारी के जंतर-मंतर के प्रदर्शन की तुलना में कहीं ज़्यादा व्यापक और त्वरित थी.

इन प्रदर्शनों को कवर कर रहे बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित कहते हैं कि उनका सबसे बड़ा उद्देश्य यह था कि कुछ होने ही न दें.

वह बताते हैं, "10 तारीख की दोपहर को मंडी हाउस पर सब शांत था. अचानक कहीं से दो महिलाएं आईं जिनके हाथों में एक छोटा सा प्लेकार्ड था, जिसे हम पढ़ भी नहीं पाए. वह मुश्किल से पांच या 10 कदम ही चली होंगी कि आरएएफ़ के लगभग दर्जनों जवान वहां आ धमके. फटाफट बस भी आ गई और उन्हें गायब कर दिया गया. यह सारा घटनाक्रम तीन-चार मिनट या अधिकतम पांच मिनट में खत्म हो गया."

मौजूदा सरकार पर करीबी से नज़र रखने वाली 'द हिंदू' की राजनीतिक संपादक निस्तुला हेब्बार को भी लगता है कि इस बार पुलिस की तैयारी ज़्यादा थी.

वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि वे पूरी तरह तैयार थे कि इन्हें कहीं भी बैठकर जमने नहीं देना है. वे पिछली बार की तरह आंदोलन को फैलने से रोकना चाहते थे. आपने देखा होगा कि इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन में किसी की ज़्यादा पिटाई नहीं हुई. वहां चीजों को आसान बनाया गया था कि आप यहां जाइए, वहां से निकलिए. सड़क पर पुलिस बहुत थी, लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं हुआ."

वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन कहते हैं, "सरकार के ऊपर जो आरोप लग रहा है कि वह एक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रही है. यह अपने आप में एक मुद्दा बन गया है और उसके इर्द-गिर्द, बेरोज़गारी, महंगाई, महिला सुरक्षा जैसी आवाज़ें भी सुनाई दे रही हैं. और यह असामान्य नहीं है. कई प्रदर्शनों में ऐसा हो जाता है कि एक मुख्य मुद्दा रहता है और उसके इर्द-गिर्द और लोग भी जुड़ जाते हैं."

जुगल पुरोहित कहते हैं कि एक संस्था के रूप में दिल्ली पुलिस पर कई सवाल उठे हैं. पिछले प्रदर्शन में कई लोग सादे कपड़ों में काम कर रहे थे, अपना चेहरा ढककर काम कर रहे थे और उनके बैज भी नहीं थे. यह इस बार के प्रदर्शन में भी दिखा. पैलेट गन का सवाल अब भी बना हुआ है.

वह कहते हैं, "10 तारीख़ के पहले पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. उसकी एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए भी काफ़ी मशक्कत की लेकिन वह अभी तक दर्ज नहीं हुई, अभी उसकी जांच ही चल रही है. दूसरी तरफ़ उन लोगों (यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वालों पर) पर अब एक एफ़आईआर ज़रूर दर्ज हो गई है."

दिल्ली में तीन प्रमुख समूहों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था -सीजेपी, आइसा के नेतृत्व में वामपंथी संगठन और कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन. इनमें एजेंडा सेट करता हुआ कौन दिखाई पड़ रहा है?

निस्तुला हेब्बार कहती हैं कि विपक्ष का एजेंडा-कम से कम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कटघरे में खड़ा करने का एजेंडा तो सेट हो गया है. उनके अनुसार प्रोटेस्ट के साथ एक समस्या यह होती है कि उसे गरिमापूर्ण, अच्छे और संतोषजनक तरीके से कैसे समाप्त किया जाए, ख़ासकर तब जब आपकी मांगें तुरंत पूरी न की जा सकें.

वह कहती हैं, "इंडिया ब्लॉक के प्रोटेस्ट की संरचना मुझे अच्छी लगी. वह सुप्रीम कोर्ट पर जाकर समाप्त हुआ और एक अदालत में याचिका दायर करके सब रजिस्ट्रार के पास गए और कोर्ट केस फाइल करके वे वहां से निकल गए. तो वीकेंड के लिहाज से कहूंगी कि विपक्ष को और नेहा बोरा को ठीक अंक मिलने चाहिए, सीजेपी को थोड़ा कम मिलने चाहिए."

जुगल पुरोहित को इस बार के प्रदर्शन में तीनों पक्षों में एकरूपता नज़र आई. सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े, एसआईआर और जिस कानून से चुनाव आयोग में बुनियादी बदलाव आया, उसे लेकर तीनों पक्ष एक ही बात कह रहे हैं. लेकिन उन्हें कार्यप्रणाली में एकरूपता नहीं नज़र आती.

श्रीनिवासन जैन कहते हैं कि जब आप सरकार को चुनौती देते हैं, तो आपको उसका फॉलो-अप करना चाहिए. यदि आपने प्रदर्शन का ऐलान किया या चुनौती दी और फिर आप फील्ड में नजर नहीं आए, तो निश्चित रूप से लोग इसके बारे में थोड़ा सोचेंगे.

वह कहते हैं, "नेहा बोरा पर इतना ध्यान इसलिए जा रहा है क्योंकि वह लगातार सक्रिय हैं और नज़र आ रही हैं. सीजेपी कभी फील्ड में नहीं थी, जबकि नेहा 10 तारीख को भी कोशिश करती रहीं, 11 तारीख को भी कोशिश करती रहीं, निरंतर करती आ रही हैं. इसी वजह से कांग्रेस ने इसे स्वीकार करते हुए उन्हें यह भूमिका दी है."

सीजेपी को लेकर अब थोड़ी आलोचना भी होने लगी है . उनके रवैये से, उनके काम करने के तरीके से और अब एक तरह से उनकी अनुपस्थिति से. क्या इस दौर में वह थोड़ा पीछे छूटते हुए दिखाई पड़ रहे हैं?

इसके जवाब में श्रीनिवासन जैन कहते हैं इसे आप एक विरोधाभास की तरह देख सकते हैं. पहली बार जब ये इकट्ठा हुए, तो सरकार ने सोचा था कि यह कोई सोशल मीडिया की घटना है, इससे ज़मीन पर कुछ नहीं होगा लेकिन बात इतनी बढ़ गई थी कि सरकार को एक मंत्री का इस्तीफा लेना पड़ा.

वह कहते हैं, "सीजेपी के पास स्पष्ट रूप से कुछ ताकत है. लोगों को जुटाने की ताकत, प्रभाव, समुदाय, दर्शक वर्ग, जिसका अंदाज़ा शायद खुद सीजेपी को भी नहीं रहा होगा. अब सीजेपी को इतना गंभीरता से ले लिया है कि उन्होंने भारत की पूरी राजधानी को बंद ही कर दिया, जो किसी और प्रदर्शनकारी समूह के लिए अभी तक नहीं किया गया था."

"लेकिन इस बीच सीजेपी की संगठनात्मक क्षमता नहीं दिखी. आपके तीनों नेता हिरासत में चले गए, और उनका कोई बैकअप प्लान नहीं है, कोई स्पष्ट ब्लूप्रिंट नहीं है. बाकी समूहों, जैसे वामपंथी समूहों वगैरह की योजना और संगठन बेहतर था. संगठनात्मक रूप से सीजेपी की कुछ कमजोरियां हैं, अनुभव की कमी है."

निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "20 जुलाई को भी अभिजीत दिपके की तबीयत ठीक नहीं थी और वह शायद किसी ट्रक में थे. उस समय सौरभ दास और रांका जेपी नड्डा के घर पर थे. तब इस प्रोटेस्ट में शामिल मेरे कई गैर-पत्रकार मित्रों ने कहा, कई ने सोशल मीडिया पर यह कहते हुए पोस्ट भी किया था, यह अचानक दिशाहीन हो गया है."

"दूसरी बार जब आपने लोगों को बुलाया तब दिल्ली छावनी बन चुकी थी. अब सब यह कह रहे हैं कि वीडियो डालकर यह बोलने की क्या जरूरत क्या थी कि हम इस विमान से, इस तरह आ रहे हैं? यानी शाब्दिक रूप से यह खुला निमंत्रण था कि आइए हमें गिरफ़्तार कर लीजिए."

निस्तुला हेब्बार आगे कहती हैं, "ये लोग गिरफ़्तार हो गए और जो लोग इनके बुलाने पर वे ढूंढने लगे कि कौन नेतृत्व कर रहा है? तब नेहा बोरा ने आईएनए मार्केट की तरफ कुछ किया. यहां दौड़ीं, वहां दौड़ीं. विरोध प्रदर्शन के नाम पर कुछ तो उन्हें करना ही था. ऐसा तो नहीं हो सकता था कि सब कहें कि अच्छा भाई, ये तीनों लोग गिरफ़्तार हो गए हैं, अब हम घर चलते हैं."

"जो लोग भी आए हैं, उनको रास्ता दिखाना आपका फ़र्ज़ है. आपने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है. इसलिए लोगों में थोड़ा संदेह पैदा हो रहा है."

इस बार पत्रकारों के साथ जिस तरह से बर्ताव किया गया, उन्हें खींचकर बसों में डाला गया, इसकी बहुत सारी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार आ रहे हैं.

अदालत में भी जो सुनवाई चल रही है, उसमें यह मुद्दा उठ रहा है.

इस बात पर जुगल पुरोहित बताते हैं कि इस बात के प्रयास रहे कि संघर्ष की वे तस्वीरें और वीडियो बाहर न आ सकें.

पुलिस और अन्य सुरक्षाबलों कोशिश कर रहे थे कि वे प्रदर्शनकारियों को पूरी तरह से घेर लें ताकि पत्रकार उनकी तस्वीरें न ले सकें. जहां-जहां पत्रकार जा रहे थे वे अपनी ढालें ऊपर कर ले रहे थे ताकि तस्वीरें न ली जा सकें.

वह कहते हैं, "ऐसा पहली बार देखा. इसके अलावा हम जब माइक पर कुछ बोल रहे थे तो हमें घेरकर हमारे माइक के सामने सीटियां बजाई जा रही थीं. सभी लोग ऐसा कर रहे थे. आप सोचिए कि आप बात कर रहे हैं और 20 लोग आपके सामने सीटियां बजाने लगें, आपके माइक में, ऑडियो में बाधा आ सकती है. इसके अलावा आपकी विचारों की श्रृंखला बाधित होगी."

श्रीनिवासन जैन कहते हैं, "2014 से हम देख रहे हैं कि एक के बाद एक प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोटा जा रहा है. मीडिया मालिकों पर दबाव बनाया जा रहा है ताकि चैनल और अखबार अपनी पूरी लाइन बदल दें. अब इन्होंने जाकर पत्रकारों को फील्ड में हिरासत में लेना शुरू कर दिया है."

वह कहते हैं, "कश्मीर, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर जैसे संघर्ष क्षेत्रों को छोड़कर, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा कि पुलिस को एक तरह से पूरी छूट दे दी गई है कि वे प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के बीच कोई अंतर न समझें. पत्रकार अपने बैज दिखा रहे हैं, अपने माइक दिखा रहे हैं, लेकिन मेरी आंखों के सामने करीब सात या आठ पत्रकारों को काफ़ी बुरी तरीके से पकड़कर, गाली-गलौज करते हुए वैन में डाला गया."

"यह एक नया चिंताजनक बदलाव है. जंतर-मंतर 1.0 के बाद सरकार एक घायल बाघ की तरह हो गई है, जिसे हार माननी पड़ी थी, पीछे हटना पड़ा था. इस बार वे ज्यादा आक्रामकता के साथ हमला कर रहे हैं. और यह हमारी मीडिया बिरादरी के लिए बहुत चिंताजनक है."

श्रीनिवासन जैन यह भी कहते हैं कि यह एक जटिल परिदृश्य है कि कोई भी मीडिया का बैज बना ले, अपना एक लोगो बनाकर अपने फोन से वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दे. इसे रेगुलेट करना एक चुनौती है.

इसके साथ ही वह सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "लेकिन यह कानून-व्यवस्था का इतना बड़ा मुद्दा नहीं है, जितना सरकार इसे बनाना चाहती है. और वह ऐसा इसलिए करना चाहती है क्योंकि मुख्यधारा का मीडिया तो पालतू बन चुका है, लेकिन सोशल मीडिया पर ये जो छोटे-बड़े प्लेटफॉर्म्स चुनौती बन रहे हैं. इसलिए उन्हें रेगुलेट करने, नियंत्रित करने, बंद करने के लिए यह एक बहाना बन जाता है."

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • एसआईआर प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था के विरोध में राजनीतिक टकराव जारी रहेगा

    Likely · Within weeks

Open Questions

  • एसआईआर प्रक्रिया पर क्या कोई संस्थागत पुनर्विचार होगा?
  • पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों में आगे क्या कार्रवाई होगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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