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लोक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा से पारित: पेपर लीक पर कड़ी सज़ा और फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान
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BBC हिंदी4 hours agoLaw5 min readIndia

लोक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा से पारित: पेपर लीक पर कड़ी सज़ा और फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान

Quick Look

लोकसभा से पारित होने के एक दिन बाद, लोक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा में पारित हो गया, जिसमें पेपर लीक के मामलों में कड़ी सज़ा, 50 लाख तक का जुर्माना, 10 साल तक की क़ैद और फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर माफ़िया को बख़्शा नहीं जाएगा, जबकि विपक्ष ने पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री के बयान की मांग करते हुए वॉकआउट किया।

AI-generated summary

Why It Matters

साल 2024 में संसद ने लोक परीक्षा अधिनियम, 2024 पारित किया था, लेकिन जून 2024 से प्रभावी होने के बावजूद मई 2026 में नीट-यूजी परीक्षा का पेपर लीक हुआ, जिसके बाद छात्रों का देशव्यापी आंदोलन शुरू हुआ।

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लोकसभा से पारित होने के एक दिन बाद, लोक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026 को गुरुवार को राज्यसभा में चर्चा के बाद पारित कर दिया गया.

विधेयक में पेपर लीक के मामलों में कड़ी सज़ा और फास्ट ट्रायल कोर्ट का प्रावधान है.

बिल पारित होने के कुछ ही घंटों बाद गुरुवार देर रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर कहा, "पेपर माफ़िया, पेपर लीक गैंग या देश के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी गिरोह को बख़्शा नहीं जाएगा."

उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने सख़्त क़ानून लाने का अपना वादा पूरा किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "हम एक भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था बनाने की दिशा में लगातार क़दम उठा रहे हैं. चाहे टास्क फोर्स का गठन हो, फास्ट ट्रैक कोर्ट हों या राज्यों से सुझाव लेना. शिक्षा क्षेत्र में देशव्यापी सुधार अब अनिवार्य हो गया है और इस दिशा में काम जारी रहेगा"

इससे पहले, घंटों तक तक चली चर्चा के बाद जब केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह जवाब देने के लिए सदन में खड़े हुए तो उससे पहले ही इंडिया गठबंधन के सांसद सदन से वॉकआउट कर गए.

विपक्ष की मांग थी कि गृह मंत्री अमित शाह 20 जुलाई को प्रदर्शन कर रहे स्टूडेंट्स पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सदन में बयान दें.

इस पर जितेंद्र सिंह ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो सांसद बहस के दौरान सबसे मुखर थे, वही जवाब सुने बिना सदन से चले गए."

नए बिल के प्रावधान

साल 2024 में संसद ने लोक परीक्षा अधिनियम, 2024 पारित किया था.

इसका मक़सद प्रश्नपत्र लीक समेत परीक्षा में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के ख़िलाफ़ सज़ा का प्रावधान करना था.

यह क़ानून संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएसएसी), कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी), इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनल सिलेक्शन (आईबीपीएस) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की ओर से आयोजित परीक्षाओं, जिनमें नीट भी शामिल है पर लागू होता है.

यह क़ानून जून 2024 से प्रभावी है.

इस साल मई में नीट-यूजी परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देशभर में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ.

इसी बीच, 23 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात सोशल मीडिया पर घोषणा की कि उनकी सरकार पेपर लीक पर और अधिक कड़े प्रावधान वाला विधेयक लाएगी.

इसके अगले दिन 24 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2024 के कानून में संशोधन करने वाले विधेयक को मंज़ूरी दे दी.

इस नए बिल में में जो सबसे बड़ा बदलाव किया गया है वो है फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट को लेकर.

नए विधेयक में प्रावधान है कि हर राज्य में पेपर लीक के मामलों की सुनवाई के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे. इससे ऐसे मामलों में फ़ैसला जल्द से जल्द हो सके.

पेपर लीक के मामलों में जांच पूरी करने का समय दो महीने होगा. ताकि जल्दी चार्ज़शीट दायर करके सुनवाई शुरू हो.

आम तौर पर किसी भी केस की जांच के लिए पुलिस के पास 90 दिन का वक़्त होता है.

अगर किसी व्यक्ति को पेपर लीक करने का दोषी पाया जाता है तो उसे अब 50 लाख का जुर्माना और दस साल तक सज़ा होगी.

साल 2024 के क़ानून में जुर्माना 10 साल और क़ैद की सज़ा अधिकतम पांच साल थी. अगर पेपर लीक करने के लिए कोई सिंडिकेट नेटवर्क ज़िम्मेदार है तो उसे 10 करोड़ तक का जुर्माना भरना होगा.

सीजेपी ने इस बिल पर क्या कहा?

इस बिल के संसद से पारित होने के बाद सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि फिर वही पुराना रवैया अपनाया जा रहा है.

सरकार पेपर लीक होने के बाद की तैयारी कर रही है ना कि व्यवस्था में सुधार की बात कर रही है, जिससे पेपर को लीक होने से बचाया जा सके.

एक डेढ़ मिनट का वीडियो बयान जारी करके रांका ने कहा है, "आज जो बिल पास हुआ है, उसमें वही दिक्क़त है कि आप पेपर लीक होने के बाद की बात कर रहे हैं. चाहे वो फास्ट ट्रैक कोर्ट हो, चाहे वो कड़ी सज़ा हो या कड़ा जुर्माना. लेकिन पेपर लीक रोकने के लिए आप क्या कर रहे हैं इस पर बात नहीं हो रही."

"जब तक आप एनटीए में रिफॉर्म की बात नहीं करेंगे, एसएससी को वैधानिक निकाय बनाने की बात नहीं करेंगे, कैलेंडर में और सिलेबस में पारदर्शिता की बात नहीं करेंगे, जब तक कोचिंग सेंटर की बात नहीं करेंगे, जब तक वेंडर की बात नहीं करेंगे, ब्लैक लिस्टिंग वेंडर को कैसे रोका जाए इसकी बात नहीं करेंगे और कैसे एग्ज़ाम प्रक्रिया को एंड टू एंड मज़बूत बनाया जाए, उसकी बात नहीं करेंगे. जब तक एग्ज़ाम इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने की बात नहीं करेंगे तब तक पेपर लीक की समस्या हल नहीं होगी. ''

उन्होंने कहा, ''आप इस बिल में पेपर लीक के बाद की स्थिति पर बात कर रहे हैं लेकिन आपको इस पर भी बात करनी पड़ेगी की लीक रोका कैसे जाए. आप हमारा चार्टर देखिए. उस पर आप छात्रों से, शिक्षकों से, जानकारों से डिजिटल और साइबर जानकारों से बात कीजिए. जल्दबाज़ी में फ़ैसले ना लीजिए क्योंकि ये देश के बच्चों के भविष्य का सवाल है."

नीट परीक्षा में पेपर के चार अलग-अलग सेट होते हैं. इनमें भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के कुल 180 सवाल शामिल होते हैं. साल 2024 और 2026 में जो पेपर लीक हुआ वो दो अलग-अलग चरणों में हुआ.

2024 में, आरोप था कि पेपर छपने के बाद लीक हुआ. जांच एजेंसियों के अनुसार, एग्ज़ाम सेंटर तक ले जाते समय सीलबंद ट्रंकों को खोलकर पेपर लीक किया गया.

जांच में कहा गया इसमें लगभग 40 से 50 लोग शामिल थे. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस घटना से परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित नहीं हुई और दोबारा परीक्षा कराने की मांग ख़ारिज कर दी.

साल 2026 में, आरोप है कि पेपर एनटीए से बाहर जाने से पहले ही लीक हो गया. आरोप है कि कुछ शिक्षकों ने सिस्टम के भीतर से ही पेपर लीक किया.

अधिकारियों का कहना है कि इस बार छपाई, परिवहन और वितरण से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था में कोई चूक नहीं हुई. कमज़ोरी प्रक्रिया की शुरुआत में ही थी, यानी पेपर चेन ऑफ कस्टडी में आने से पहले ही कथित तौर पर लीक हो गया.

लेकिन इस नए अधिनियम को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं.

जैसे कि साल 2024 से ही ये क़ानून है, जिसमें जुर्माना और सज़ा का प्रावधान रहा है.

फिर भी साल 2026 में नीट का पेपर लीक हुआ, तो क्या सज़ा के साल और ज़ुर्माने की राशि बढ़ा देने से पेपर लीक पर कितना असर पड़ेगा?

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली कहते हैं, " सरकार पेपर लीक से निपटने के लिए कई स्तर पर नई रणनीति अपना रही है. मौजूदा क़ानून में बदलाव उसी कड़ी में एक हिस्सा है.''

''सज़ा बढ़ने और फास्ट ट्रायल से पेपर लीक करने वालों पर असर पड़ेगा. लेकिन ऐसी परीक्षाओं के संचालन में तीन बातें सबसे अहम होती हैं, विश्वसनीयता , वैधता और साख इस बार जो चूक हुई है, वह पूरे सिस्टम के भीतर हुई है. जिन लोगों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी, उन पर भरोसा टूट गया.''

उन्होंने कहा, ''हमें व्यवस्था को और मज़बूत करना होगा और इस तरह की खामियों को पूरी तरह रोकना होगा. इसके लिए भरोसेमंद लोग, भरोसेमंद तंत्र और ज़िम्मेदारी के प्रति भरोसेमंद रवैये की ज़रूरत है, ताकि पूरी परीक्षा प्रक्रिया की साख बनी रहे. इस बदलाव को लागू करने में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए."

अशोक गांगुली कहते हैं, ''परीक्षा के तरीके में भी बदलाव की जरूरत है. ऐसी परीक्षाओं का संचालन एक प्रोफेशनल काम है. इसके लिए जानकारों की ज़रूरत होगी न कि सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों की. ये धारणा बदलनी होगी कि ऐसी परीक्षाएं कोई भी आयोजित कर सकता है. मुझे उम्मीद है कि उच्चस्तरीय समिति जिसका गठन किया गया है, वो इस पहलू पर भी ध्यान देगी.''

"ऐसी परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की संख्या बहुत अधिक होती है, इसलिए इन्हें सिंगल टियर सिस्टम के तहत आयोजित नहीं किया जाना चाहिए हमें टू-टियर व्यवस्था अपनानी चाहिए."

''दूसरे चरण में केवल छंटनी करने के बजाय यह आकलन किया जाना चाहिए कि उम्मीदवार में ज़रूरी एटीट्यूड और एप्टीट्यूड है या नहीं."

ये नया संशोधन कितना असरदार होगा ये आने वाले सालों में पता चलेगा लेकिन इस वक़्त विपक्ष और एक तबका ये सवाल ज़रूर उठा रहा है कि सिस्टम लीक प्रूफ़ हो ये कैसे सुनिश्चित करें.

देश में मौजूदा फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का रिपोर्ट कार्ड

इस बिल को लेकर और भी कई सवाल हैं, जैसे फास्ट ट्रैक कोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई होगी और दो महीने में पुलिस को चार्जशीट फाइल करनी होगी जिसकी अवधि अन्य केसों में तीन महीने होती है.

तो क्या पुलिस व्यवस्था जल्दी केस की जांच करने के लिए तैयार है और क्या ये कम अवधि जांच की क्वॉलिटी को प्रभावित नहीं करेगी? क्या अभी जो फास्ट ट्रैक कोर्ट देश में काम कर रही हैं, वो सच में फास्ट ट्रैक जजमेंट दे पा रही हैं?

24 जुलाई 2026 को सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, देश में मौजूद फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट पर 2.45 लाख मामलों का बोझ है.

क़ानून मंत्रालय ने यह जानकारी उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी से बीजेपी सांसद राजकुमार चाहर और मध्य प्रदेश के रीवा से बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा के सवाल के जवाब में दी.

दोनों सांसदों ने देश में फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, जिनमें विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं, उनकी संख्या और पिछले तीन सालों में इन अदालतों में दायर, निपटाए गए और केस का ब्यौरा मांगा था.

इसके चलते लंबित मामलों की संख्या 2024 के अंत में 2,04,122 से बढ़कर 2025 के अंत तक 2,45,579 हो गई. 2023 के अंत में यह संख्या 2,02,175 थी.

ऐसे में नए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनने से पेपर लीक के केस कितने जल्दी निपटाए जा सकेंगे, ये देखने वाली बात होगी।

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • हर राज्य में पेपर लीक के मामलों की सुनवाई के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे।

    Very likely · Within months

  • पेपर लीक के मामलों में जांच पूरी करने का समय दो महीने होगा।

    Very likely · Within months

Open Questions

  • क्या पुलिस व्यवस्था दो महीने में जांच पूरी करने के लिए तैयार है?
  • क्या कम अवधि जांच की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करेगी?
  • नए फास्ट ट्रैक कोर्ट पेपर लीक के मामलों को कितनी जल्दी निपटा पाएंगे?

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This article was originally published by BBC हिंदी.