
उत्तर प्रदेश के हाथरस में 2020 की घटना के छह साल बीत जाने के बाद भी पीड़ित दलित परिवार सीआरपीएफ की सुरक्षा के साए में जीने को मजबूर है और गांव से बाहर बसाए जाने की मांग कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के हाथरस में 2020 की दलित युवती से जुड़े मामले के छह साल बाद भी पीड़ित परिवार सीआरपीएफ के कड़े सुरक्षा पहरे में रहने को मजबूर है। परिवार ने गांव छोड़ने और सरकारी वादों के पूरा होने की मांग की है, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को तीन महीने में दूसरी जगह बसाने का निर्देश दिया है।
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हाथरस में 14 सितंबर 2020 को 19 वर्षीय दलित युवती के साथ जघन्य घटना हुई थी, जिसकी बाद में दिल्ली के अस्पताल में मौत हो गई थी।
छह साल गुज़रने के बाद भी 14 सितंबर 2020 की तारीख़, उत्तर प्रदेश के हाथरस में रहने वाला एक दलित परिवार नहीं भुला पाया है. सितंबर 2020 का ये मामला देश और विदेश में चर्चा में रहा था.
इसमें 19 साल की सर्वाइवर के बयान के आधार पर पहले गैंगरेप का मामला दर्ज किया गया था. लड़की की मौत के बाद इसमें हत्या का मामला भी दर्ज किया गया था. इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी.
इस मामले में सबूतों के अभाव में चार अभियुक्तों में से तीन अभियुक्त बरी होकर घर आ चुके हैं, जबकि अदालत ने एक अभियुक्त संदीप सिसोदिया को ग़ैर-इरादतन हत्या और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं में दोषी पाते हुए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
लेकिन छह साल बाद भी उस घर के दरवाज़े पर लगा सीआरपीएफ का पहरा नहीं हटा है. सुरक्षा का यही घेरा अब परिवार के लोगों के लिए क़ैद बन चुका है.
सरकार ने नौकरी और घर देने का जो वादा अगले ही दिन कर दिया था, वह छह साल बाद भी अधूरा है. अदालतें बार-बार फटकार लगाती रहीं, आदेश पर आदेश आते रहे, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदला.
दरसअल, यह सिर्फ़ एक मुक़दमे की कहानी नहीं है, बल्कि एक परिवार की उस लड़ाई की कहानी है जो इंसाफ़ से पहले सांस लेने की आज़ादी मांग रहा है.
मृतक दलित युवती की भाभी बीबीसी हिन्दी से कहती हैं, "मुख्यमंत्री होने के नाते मैं योगी आदित्यनाथ जी से बोलना चाहती हूं, वो अलीगढ़ आये लेकिन कभी यहां आने की कोशिश नहीं की. क्या हम लोग इंसान नहीं थे? अलीगढ़ से हाथरस बहुत दूर नहीं है, वहां आए लेकिन हम लोगों के यहां नहीं आए. क्या यह जातीय भेदभाव है?"
पीड़िता के परिवार का एक-एक सदस्य सीआरपीएफ जवानों की निगरानी में सांसें ले रहा है.
इस परिवार की आजीविका का आख़िरी धन तीन भैंसें थीं, जिसमें से दो बिक चुकी हैं, तीसरी भैंस भी बिकने वाली है. सुरक्षा क़ैद से बाहर निकलने की परिवार की हर कोशिश नाकाम हो चुकी है.
मगर, छह साल बाद भी परिवार का एक ही सवाल है, अभी और कितने दिनों तक सीआरपीएफ जवानों के सुरक्षा घेरे में बिताना होगा?
हालांकि बीते 24 अगस्त, 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए तीन महीने के अंदर पीड़ित परिवार को गांव से बाहर बसाने का निर्देश दिया है.
हाथरस से लगभग दस किलोमीटर दूर बुलगढ़ी गांव छह साल पहले तब चर्चा में आया, जब 19 वर्षीय दलित युवती खेतों के बीच खून से लथपथ फटे-चिथड़े कपड़ों में मिली थी.
क़रीब 16 दिनों तक ज़िंदगी और मौत से जूझते हुए 29 सितंबर 2020 को युवती की दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत हो गई थी. आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने आनन-फानन में युवती की लाश को गांव लाकर आधी रात में परिजनों की ग़ैर-मौजूदगी में जला दिया था.
अभी यह मामला अदालत में विचाराधीन है.
जब हम मुख्य सड़क से बुलगढ़ी गांव की ओर मुड़े तो सुबह के दस बज रहे थे. बुलगढ़ी जाने वाली सड़क के दोनों ओर खेतों में किसान काम कर रहे थे. हर कोई बाहर से आने-जाने वालों को गौर से देखता है.
गांव के बाहर खेत में चारा काट रहे किसान विष्णु शर्मा से हमारी मुलाक़ात हुई. हमने उनसे रेप पीड़िता का घर पूछा तो उन्होंने बड़ी हिकारत से पीड़िता के घर की ओर इशारा करते हुए दिखाया और आने का कारण पूछा.
उनसे जब मैं छह साल पहले घटी घटना के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा, "देखिए, घटना को छह साल हो गए लेकिन हम बता रहे हैं कि उस मामले में कुछ लोगों को फ़र्ज़ी फंसाया गया था. तीन लोग तो बाहर आ गए लेकिन एक अभी भी जेल में है. वह भी बाहर आ जाएगा."
पीड़िता का घर गांव के दक्षिणी छोर पर सबसे बाहरी हिस्से में है. घर के बाहर लगे तंबुओं और मुस्तैद वर्दीधारी अर्धसैनिक बल के जवानों को देख कर साफ़ तौर पर परिवार के घर का पता चलता है.
गांव में घुसते ही ख़ास तरह का सन्नाटा और सूनापन देखने को मिलती है. घटना के लगभग छह साल बाद भी उस घटना का प्रभाव गांव में नज़र आता है.
गांव में लगभग हर कोई उस घटना के बारे में बात करने से बचता है. जो भी घटना के विषय में बात करता भी है वह मृत युवती के परिवार वालों को ही असली गुनहगार मानता है और इसे ऑनर किलिंग का मामला बताता है. हालांकि सीबीआई ने अपनी जांच में परिवार के किसी भी सदस्य को अभियुक्त नहीं बनाया है.
हालांकि इस गांव में दलितों के केवल चार परिवार ही हैं और गांव में ठाकुर और ब्राह्मण अधिक तादाद में हैं. ग्राम प्रधान नरेंद्र सिसोदिया अभियुक्तों को निर्दोष बताते हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से दावा किया, "वास्तविक बात यह है कि जो जेल गए थे वो लोग दोषी नहीं थे. ऐसे मामले बहुत जगह हो जाते हैं लेकिन पता ही नहीं चलता लेकिन यह मामला मीडिया ट्रायल की वजह से हाइलाइट हुआ."
युवती के परिवार में दस वर्ष से कम आयु की दो लड़कियां भी हैं जो सुरक्षा कारणों से लंबे समय तक स्कूल नहीं जा पाई थीं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस साल जुलाई से परिवार की दोनों बच्चियों को सीआरपीएफ़ की सुरक्षा में हाथरस के एक स्कूल में भेजा जा रहा है.
मृत युवती की भाभी और स्कूल जाने वाली बच्चियों की मां बीबीसी हिन्दी से कहती हैं, "मेरी तीन बेटियां हैं. सबसे बड़ी बेटी को घटना के बाद नानी के पास भेज दिया था, ताकि वह स्कूल जा सके. लेकिन दो बेटियां मेरे साथ इसी घर में रहती हैं."
"जब 2020 में घटना हुई उसके बाद से मेरी बेटियां डर के कारण घर से बाहर नहीं निकलतीं. बच्चों को लगता है कि बुआ की तरह उन्हें भी कोई मार देगा. आज भी मेरी बेटियों को लगता है गेट से बाहर नहीं निकलना है. गांव में उनके साथ कोई खेलने वाला नहीं, वो सीआरपीएफ वाले सर लोगों के साथ खेलती हैं."
29 सितंबर 2020 को युवती की मौत के अगले दिन ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने परिवार को 25 लाख रुपये, एक सदस्य को सी ग्रेड की सरकारी नौकरी और आवास देने का वादा किया था.
परिवार के अनुसार घोषित की गई राशि तो उन्हें मिल गई लेकिन सरकारी नौकरी और आवास अभी तक परिवार के किसी सदस्य को नहीं मिला है.
हाथरस के जिलाधिकारी अतुल वत्स से जब बीबीसी ने पीड़िता के परिवार के किसी एक सदस्य को मुख्यमंत्री के वादे के बावजूद नौकरी न दिए जाने के बारे में सवाल किया, तो उन्होंने यह कहते हुए इस मामले पर बात करने से इनकार कर दिया कि मामला अदालत में विचाराधीन है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने साल 2022 में परिवार को बुलगढ़ी गांव से बाहर कहीं और बसाने का निर्देश सरकार को दिया था लेकिन अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है.
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था जिसमें दलित परिवार को उत्तर प्रदेश से बाहर बसाने की मांग की गई है. हालांकि सरकार ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट के इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया है.
24 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए तीन महीने के अंदर परिवार को गांव से बाहर बसाने का आदेश दिया है और कोर्ट के आदेशों में रुकावट डालने की बात कही है.
हाई कोर्ट ने कहा, "ऐसा लगता है कि राज्य सरकार हमारे 26.09.2024, 14.11.2024 और 08.01.2025 के आदेशों के अनुसार विचार करने में बेवजह रुकावट डाल रही है."
"हम 22.02.2025 के फ़ैसले को रद्द करते हैं और राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह पीड़ित परिवार को गाज़ियाबाद या नोएडा (जैसा भी मामला हो) में बसाए और उन्हें नई जगह पर रहने की सुविधा दे. यह काम हर हाल में तीन महीने के अंदर पूरा होना चाहिए."
मृतका के छोटे भाई बीबीसी हिन्दी से कहते हैं, "जितना पैसा सरकार ने दिया था यदि हमारी कहीं नौकरी लग जाती तो पांच सालों में ही उतना पैसा कमा लेते. अगर हमें नौकरी में चालीस हज़ार भी मिलता तो पांच सालों में बीस लाख रुपये कमा लेता. बल्कि इससे ज़्यादा ही कमा लेता क्योंकि घर में तीन सदस्य हैं. हम अपना कीमती समय पिछले छह सालों में गंवा चुके हैं. हम इन छह सालों में कई साल पीछे चले गये."
ग्राम प्रधान नरेंद्र सिसोदिया कहते हैं, "युवती का परिवार एक नज़र क़ैद में है. उनके पास ज़्यादा ज़मीन नहीं है. मेहनत मज़दूरी पर निर्भर थे. सरकार को उनकी सारी बातें मान कर उन्हें सरकारी नौकरी और आवास दे देना चाहिए."
युवती और उसका परिवार दलितों में वाल्मीकि समुदाय से है. यह समुदाय भारतीय जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर माना जाता है. इस समुदाय से आने वाली महिलाओं और पुरुषों के साथ आज भी देश के कई हिस्सों में 'अछूत' जैसा व्यवहार होता रहा है.
ठाकुर, ब्राह्मण बहुल बुलगढ़ी गांव में वाल्मीकि परिवार के केवल चार घर हैं. गांव पहुंचने पर हमने युवती के परिवार को गांव से पूरी तरह अलग-थलग पाया. गांव में खुले तौर पर यह बात सुनने को मिलती है कि उस परिवार के साथ हमारा कोई संबंध नहीं हो सकता क्योंकि वे 'वाल्मीकि' हैं.
युवती की भाभी अपने साथ हो रहे जातिगत भेदभाव पर बीबीसी हिन्दी से कहती हैं, "पहले सास-ससुर को यहां प्रताड़ित किया गया और अब हम लोगों के साथ वही किया जा रहा है. उन चीज़ों को आदमी भुला कर जीने लगता है. हम लोग तो भूल सकते हैं मगर ये लोग नहीं भूल सकते हैं."
युवती के बड़े भाई अपने साथ हो रहे जातीय भेदभाव पर कहते हैं, "हम वाल्मीकि जाति से हैं. अभियुक्त ठाकुर जाति से हैं. यहां छुआछूत बहुत है. एक-दूसरे के यहां खाते-पीते नहीं हैं. हम लोगों को दूर से खाना खिलाते हैं. घटना के बाद से कोई बुलाता ही नहीं."
हमारी मुलाक़ात युवती के पड़ोसी राधेश्याम पचौरी से हुई. उन्होंने युवती के परिवार की सामाजिक स्थिति के बारे में बताते हुए कहा, "हम उनके यहां (युवती के परिवार) किसी कार्यक्रम में नहीं जाते हैं लेकिन हम अपने यहां उन्हें बुलाते हैं और अलग बैठा कर खिलाते हैं."
युवती के छोटे भाई ने अपने साथ होने वाले भेदभाव के बारे में बताते हुए बीबीसी हिन्दी से कहा, "हमारे रिश्ते किसी के साथ लड़ाई-झगड़े वाले नहीं थे. पहले भाईचारे के साथ रहते थे. लेकिन घटना के बाद जाति का समझ लीजिए या कुछ और समझ लीजिए तबसे गांव का कोई सदस्य हमसे बात नहीं करता है."
वे शिकायती अंदाज़ में कहते हैं, "इतनी बड़ी घटना घट गई लेकिन गांव का कोई सदस्य पूछने नहीं आया कि आपके साथ क्या हुआ, कैसे हुआ? जब अपराधी छूट कर आये तो पूरा क्षेत्र समाज उनके यहां आया जैसे वो कोई रण जीत कर आये हैं. उन्हें देखने जा रहे थे. होली में ढोल नगाड़ों के साथ घुमाया गया, मिठाइयां बांटी गईं."
छह साल पहले घटी जघन्य घटना से पहले युवती का परिवार खेत के छोटे हिस्से पर खेती और दिहाड़ी मज़दूरी कर जीवन यापन करता था. पिता एक दुकान में सफाईकर्मी का काम करते थे.
घटना के बाद उच्च जातियों के संभावित ख़तरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया था. तब से परिवार सीआरपीएफ की सुरक्षा के बीच जी रहा है. अर्धसैनिक बल की चाक चौबंद सुरक्षा और ज़रूरी जगहों पर सीसीटीवी कैमरों की निगरानी अब परिवार के लिए क़ैद बन गई है.
सुरक्षा से परिवार पर पड़ने वाला असर साफ़ तौर पर दिखाई पड़ता है. परिवार की सामाजिक संरचना, रिश्ते और स्वतंत्रता छिन्न-भिन्न हो चुकी है. परिवार का हर सदस्य लगभग छह सालों से घर की चहारदीवारी के भीतर जीवन जी कर रहा है.
युवती के बड़े भाई घटना से पहले दिल्ली में एक निजी कंपनी में काम करते थे लेकिन घटना के बाद से घर में हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा, "हम खुली ज़िंदगी नहीं जी पा रहे हैं. रत्तीभर स्वतंत्रता नहीं है. बिना सीआरपीएफ की मर्जी के गेट के बाहर कदम नहीं रख सकते. पांच साल मुआवजे के पैसे से ज़िंदगी कट गई लेकिन आगे का कुछ पता नहीं."
"घटना से पहले हम लोग दूसरों के खेतों में काम कर लेते थे, घर पर सात भैंसें थीं बीस लीटर दूध हो जाता था, पिता सफाईकर्मी का काम करते थे परिवार का ख़र्च निकल जाता था. लेकिन घटना के बाद से हमें कोई मज़दूरी के लिए भी नहीं बुलाता है क्योंकि हमारे साथ सीआरपीएफ के जवान भी जायेंगे. हमें नहीं पता था सिक्योरिटी हमारे लिए बोझ बन जाएगी."
युवती के परिवार में आठ लोग मां, पिता, दादी, बड़े भाई, भाभी, उनके दो बच्चे और छोटा भाई अर्धसैनिक बल की सुरक्षा में मौजूद हैं. जब घटना हुई तब छोटे भाई की उम्र बीस वर्ष थी.
युवती की मां से घटना या बेटी के बारे में पूछना उनके पुराने ज़ख़्मों को कुरेदने जैसा है. पिछले दिनों उन्हें कई बार हार्ट अटैक आ चुका है.
उन्होंने छोटे बेटे की शादी को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा, "पांच साल से किसी से कोई रिश्ता नहीं है. किसी शादी में नहीं गई. घर में रह कर टेंशन से बीमारी बन गई है. मुझे अटैक आ चुका है. फ़ोर्स के कारण बच्चे कहीं कुछ करने नहीं जा पाते हैं."
वे कहती हैं, "छोटा बेटा पच्चीस साल का हो गया है. दिक्कत तो यह है शादी के लिए कोई आ नहीं रहा है. ऐसे माहौल में कौन आयेगा? लोग सोचते हैं सिक्योरिटी रहती है पता नहीं कैसा गांव हो? कैसे घर-परिवार के लोग हों. हम सोचते हैं सिक्योरिटी हट जाये हमारे बच्चे की शादी हो जाये."
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण न्याय में देरी को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा, "सुरक्षा देते-देते पीड़ित परिवार कहने लगा है कि हमारी ज़िंदगी जेल बन चुकी है. शायद पहले आदेश आ चुका है कि परिवार को दूसरी जगह स्थापित किया जाए और एक नौकरी दी जाए."
न्याय में देरी के सवाल पर प्रशांत भूषण कहते हैं, "यह हिंदुस्तान का दुर्भाग्य है कि यहां पर न्यायपालिका का जो तरीका है या जो सिस्टम है इतनी देरी करता है तारीख़ पर तारीख़ लगती रहती है. परिवार सुप्रीम कोर्ट भी गया है, दो साल पहले नोटिस जारी हुआ है लेकिन दो साल बाद तक कुछ हुआ नहीं. सुप्रीम कोर्ट को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए."
AI outlook — possibilities, not facts
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