जियो की स्टॉक मार्केट में धमाकेदार एंट्री, लेकिन क्या ख़त्म हो जाएगा सस्ते मोबाइल इंटरनेट का दौर?
रिलायंस समूह के दो दशक बाद आ रहे इस सबसे बड़े आईपीओ को निवेशकों से ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है, लेकिन क्या अब सस्ते डेटा का दौर ख़त्म होने वाला है?
Quick Look
भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी जियो प्लेटफ़ॉर्म्स 30,213 करोड़ रुपये का आईपीओ लेकर आ रही है, जो देश के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ है। इसे निवेशकों से भारी प्रतिक्रिया मिली है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसके बाद बेहद सस्ते डेटा का दौर ख़त्म हो सकता है।
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Why It Matters
भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी जियो प्लेटफ़ॉर्म्स 30,213 करोड़ रुपये का आईपीओ लेकर आ रही है। इसमें मेटा और गूगल का भी निवेश है।
भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी जियो प्लेटफ़ॉर्म्स बुधवार को शेयर बाज़ार में उतरने जा रही है. इस कंपनी में मेटा और गूगल ने भी निवेश किया हुआ है.
जियो का 30,213 करोड़ रुपये का आईपीओ भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ है.
भारतीय शेयर बाज़ार पिछले कुछ समय से मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं. इसके बावजूद जियो के आईपीओ को दुनिया के बड़े फ़ंड मैनेजरों, भारतीय संस्थानों और छोटे खुदरा निवेशकों से ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली है.
21 अक्तूबर को आईपीओ के लिए आवेदन शुरू होने के कुछ ही घंटों के भीतर उपलब्ध शेयरों से कहीं ज़्यादा बोलियां लग गईं.
जियो के मालिक एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी हैं.
भारत में लगभग 50 करोड़ लोग जियो की सस्ती मोबाइल डेटा सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इस वजह से जियो को भारत की सबसे महत्वपूर्ण कंपनियों में गिना जाता है.
हालांकि, कंपनी जितनी तेज़ी से आगे बढ़ी, उसके साथ कई विवाद भी जुड़े रहे.
जियो ने 2016 में भारत के पहले से भीड़ भरे टेलीकॉम बाज़ार में क़दम रखा था.
कंपनी ने बेहद कम दरों पर मोबाइल सेवाएं शुरू कीं और लाखों भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ दिया.
लेकिन जियो की शुरुआत ने टेलीकॉम क्षेत्र में बहुत बड़ी उथल-पुथल भी पैदा की.
कभी भारत के टेलीकॉम बाज़ार में 17 कंपनियां थीं. बाद में यह बाज़ार सिमटकर केवल तीन बड़ी कंपनियों तक रह गया.
आलोचकों ने आरोप लगाया कि भारी पैसा लगाने की क्षमता रखने वाली जियो ने क़ीमतों की ऐसी लड़ाई शुरू की, जिसमें दूसरी कंपनियों को अपना कारोबार बंद करना पड़ा.
हाल में एलन मस्क ने भी मुकेश अंबानी की आलोचना करते हुए उन्हें "भारत का असली बॉस" कहा था.
मस्क ने संकेत दिया था कि जियो भारत में उनकी कंपनी स्टारलिंक को आने से रोकने की कोशिश कर रही है.
रिलायंस ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा था कि वह मस्क से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है.
पिछले एक दशक में जियो को भले ही कई सवालों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा हो, लेकिन उसकी सस्ती डेटा योजनाएं भारत की डिजिटल क्रांति की बुनियाद रही हैं.
इन योजनाओं ने भारत में एक बहुत बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्था तैयार करने में मदद की.
एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में ऑनलाइन भुगतान, खाना पहुंचाने वाली सेवाओं और ई-कॉमर्स को आम लोगों तक पहुंचाने में भी इनकी अहम भूमिका रही.
जियो की शुरुआत के तीन साल के भीतर ग्राहकों का डेटा इस्तेमाल 50 गुना बढ़ गया और डेटा की क़ीमतें तेज़ी से गिर गईं.
इसी आक्रामक तरीक़े से दरें कम रखने के कारण जियो ने 2026 तक क़रीब 55.3 करोड़ मोबाइल ग्राहक बना लिए.
दूसरे क्षेत्रों में भी जियो की पकड़ मज़बूत हुई है.
भारत के वायरलेस ब्रॉडबैंड बाज़ार में कंपनी की हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी और फ़िक्स्ड ब्रॉडबैंड में 40 फ़ीसदी से अधिक है.
ब्रोकरेज कंपनी एमके ग्लोबल के मुताबिक़, भारत के कुल वायरलेस डेटा ट्रैफ़िक का 60 फ़ीसदी हिस्सा जियो के नेटवर्क से गुज़रता है.
कंपनी का यह भी कहना है कि चीन के बाहर उसके पास 5जी ग्राहकों की सबसे बड़ी संख्या है.
एमके ग्लोबल ने जियो को "भारत का डिजिटल इंजन" बताया है.
विश्लेषकों का कहना है कि जियो का शेयर बाज़ार में उतरना उसकी क़ीमत तय करने की रणनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है.
इस आईपीओ के ज़रिए कंपनी के प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी लगभग तीन फ़ीसदी कम करेंगे.
इसके साथ ही कई वर्षों से बेहद कम दरों पर मिल रही सेवाओं का ख़त्म होना तय माना जा रहा है.
कामायक्या वेल्थ Management की सह-संस्थापक नित्या शाह कहती हैं, "बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए हथियार के रूप में सस्ती दरों का इस्तेमाल करने का जियो का दौर अब ख़त्म होने की ओर है."
वह कहती हैं, "शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने के बाद जियो को छोटे शेयरधारकों को भी जवाब देना होगा. इससे क़ीमतों को जान-बूझकर कम रखने की उसकी वजह का वज़न घट जाएगा."
जियो की भविष्य की वृद्धि अब मुख्य रूप से सस्ती योजनाओं के ज़रिए नए ग्राहक जोड़ने पर निर्भर नहीं रहेगी.
ब्रोकरेज कंपनी मोतीलाल ओसवाल ने एक नोट में कहा है कि कंपनी की आगे की ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि वह हर ग्राहक से कितनी अधिक कमाई करती है.
इसके लिए ग्राहकों को 5जी पर ले जाना, समय-समय पर दरें बढ़ाना और उन घरों तक फ़िक्स्ड वायरलेस ब्रॉडबैंड पहुंचाना अहम होगा, जहां फ़ाइबर अब तक नहीं पहुंचा है.
जियो के शेयर बाज़ार में उतरने के बाद उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियों के लिए भी अपनी दरें बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है.
अभी इन कंपनियों को डर रहता है कि अगर उन्होंने दरें बढ़ाईं, तो जियो उनसे सस्ती सेवाएं देकर उनके ग्राहकों को अपनी ओर खींच सकती है.
अगर यह डर कम होता है, तो दूसरी कंपनियां भी अपनी सेवाओं की क़ीमत बढ़ा सकती हैं.
नित्या शाह कहती हैं, "इस बदलाव का सबसे बड़ा फ़ायदा वोडाफ़ोन आइडिया को हो सकता है."
"यह ऐसा मौक़ा है, जब इस क्षेत्र की सबसे कमज़ोर वित्तीय स्थिति वाली कंपनी को सबसे मज़बूत सहारा मिल सकता है."
विश्लेषकों का कहना है कि अगर क़ीमतें फिर बढ़ती हैं, तो बाज़ार में ग्राहकों के कंपनियां बदलने का एक नया दौर शुरू हो सकता है.
क़ीमतों को लेकर संवेदनशील ग्राहक उस कंपनी की ओर जा सकते हैं, जिसकी योजना सबसे सस्ती होगी.
इसका मतलब है कि ग्राहकों को मोबाइल बिल बढ़ने के लिए तैयार रहना पड़ सकता है.
जहां ग्राहकों को अधिक बिल चुकाना पड़ सकता है, वहीं जियो का आईपीओ निवेशकों को भारत में डेटा की लगातार बढ़ती मांग पर दांव लगाने का मौक़ा दे रहा है.
इसके साथ निवेशकों को जियो की डिजिटल सेवाओं के बढ़ते कारोबार से भी जुड़ने का अवसर मिलेगा.
कंपनी मनोरंजन, क्लाउड कंप्यूटिंग, गेमिंग और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में भी काम करती है.
कम दरों और स्मार्टफ़ोन के बढ़ते इस्तेमाल के कारण भारत दुनिया में मोबाइल डेटा का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है.
जियो के हर ग्राहक का औसत मासिक डेटा इस्तेमाल 2024 में 28.7 जीबी था.
साल 2026 में यह बढ़कर 42.3 जीबी हो गया. यानी दो वर्षों में इसमें 52 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.
कुछ अनुमानों के मुताबिक़, लोगों की ख़र्च करने की क्षमता बढ़ने के साथ इस दशक के आख़िर तक डेटा का इस्तेमाल बढ़कर 65 जीबी तक पहुंच सकता है.
इससे जियो को लंबे समय में हर ग्राहक से होने वाली औसत कमाई बढ़ाने में मदद मिलेगी.
एमके ग्लोबल के मुताबिक़, "अधिकतर डिजिटल सेवाओं की पहुंच अब भी चीन और अमेरिका के मुक़ाबले बहुत कम है. इसलिए इसमें बढ़ोतरी की काफ़ी गुंजाइश है."
रेटिंग एजेंसी मूडीज़ के मुताबिक़, शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने से जियो के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ सकती है.
इससे निवेशकों को कंपनी का "ज़्यादा स्पष्ट बाज़ार मूल्यांकन" भी मिल सकेगा.
अभी जियो, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का हिस्सा है. रिलायंस का कारोबार शोधन से लेकर खुदरा व्यापार तक फैला हुआ है.
भारत की अर्थव्यवस्था में जियो की बढ़ती और अहम भूमिका ने निवेशकों का उत्साह बढ़ाया है.
लेकिन इस आईपीओ को लेकर चर्चा की एक और बड़ी वजह है.
यह दो दशक से अधिक समय में रिलायंस समूह की ओर से लाया गया पहला आईपीओ है.
रिलायंस ने 1958 में मसालों और पॉलिएस्टर धागे के छोटे व्यापार से शुरुआत की थी.
इसके बाद कंपनी ने कपड़ा, पेट्रोकेमिकल्स, तेल शोधन और फिर खुदरा व्यापार, टेलीकॉम और डिजिटल सेवाओं में अपना कारोबार फैलाया.
लंबे समय में निवेशकों की संपत्ति बढ़ाने के अपने रिकॉर्ड के कारण रिलायंस को छोटे निवेशकों के बीच एक ख़ास दर्जा हासिल है.
रिलायंस साम्राज्य के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में शेयरों में निवेश को लोकप्रिय बनाने में बुनियादी भूमिका निभाई थी.
समय के साथ इससे निवेशकों का एक ऐसा समूह तैयार हुआ, जो कंपनी के प्रति बेहद वफ़ादार था.
इनमें से कई निवेशकों का कंपनी के साथ गहरा भावनात्मक रिश्ता भी बन गया.
पिछले एक साल में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के शेयर की क़ीमत लगभग 20 फ़ीसदी गिरी है.
इसके बावजूद लंबी अवधि का उसका रिकॉर्ड निवेशकों में भरोसा बनाए हुए है.
मुंबई की वेल्थमिल्स सिक्योरिटीज़ के क्रांति बाथिनी ने बीबीसी से कहा, "कंपनी ने 30 वर्षों तक लगातार औसतन क़रीब 30 फ़ीसदी का सालाना रिटर्न दिया है."
"इसीलिए लोगों को उम्मीद है कि जियो के आईपीओ में भी वही जादू दोहराया जा सकता है."
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जियो के शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने के बाद मोबाइल दरों में बढ़ोतरी हो सकती है।
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Open Questions
- आईपीओ के बाद जियो की शेयर बाज़ार में लिस्टिंग पर शेयर मूल्य क्या होगा?
- क्या प्रतिस्पर्धी कंपनियां वाकई अपनी दरें बढ़ाएंगी?

