देहरादून-ऋषिकेश सिक्सलेन प्रोजेक्ट: सीएम धामी ने पेड़ कटान रोका, फिर भी क्यों जारी है 'सात मोड़' आंदोलन?
Quick Look
उत्तराखंड में देहरादून-ऋषिकेश सिक्सलेन परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई पर सीएम धामी की अस्थायी रोक के बावजूद 'सात मोड़' आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी परियोजना के भविष्य पर स्थायी निर्णय और वैकल्पिक डिजाइन की मांग कर रहे हैं, जबकि मामला 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा।
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Why It Matters
देहरादून-ऋषिकेश सिक्सलेन परियोजना के लिए 4,369 पेड़ों को हटाने का प्रस्ताव है, जिससे पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों में चिंता है। मुख्यमंत्री धामी ने पेड़ों की कटाई पर अस्थायी रोक लगाई है, लेकिन आंदोलनकारी स्थायी समाधान चाहते हैं।
उत्तराखंड के देहरादून-ऋषिकेश राजमार्ग पर सीएम पुष्कर सिंह धामी के बयान के बाद पेड़ों की कटाई रुक गई है लेकिन फिर भी प्रदर्शनकारी वहां से हटने को तैयार नहीं हैं।
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें केवल पेड़ कटने पर अस्थायी रोक नहीं बल्कि इस परियोजना के भविष्य पर स्पष्ट फैसला चाहिए।
देहरादून और ऋषिकेश के बीच सड़क चौड़ीकरण के लिए 4,369 पेड़ों को हटाने का प्रस्ताव है, इनमें से 3,605 पेड़ों की कटाई और 754 पेड़ों को यहां से हटाकर कहीं और लगाने की योजना है।
प्रदर्शन के बाद सात मोड क्षेत्र में पेड़ों की कटाई रुका हुई है, लेकिन अब भी कुछ लोग यहां दिन में कुछ समय के लिए जमा होते हैं। 'सात मोड़' स्टेट हाईवे पर स्थित एक प्रमुख और घना वन क्षेत्र है।
इस आंदोलन में शामिल जतिन सिंह चौहान का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी उनका आंदोलन खत्म नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा, "सरकार ने पेड़ कटान पर स्थायी रोक नहीं लगाई है, बल्कि सभी पक्षों से बातचीत होने तक इसे स्थगित किया है। इसलिए हम रोज़ सात मोड़ पहुंच रहे हैं।"
अंतिम समाधान तक विरोध जारी रखने की मांग
सीएम धामी ने एक्स पर लिखा था, "देहरादून–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना को लेकर पिछले कुछ दिनों से अनेक नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों की ओर से व्यक्ति चिंताओं और सुझावों का मैंने गंभीरता से संज्ञान लिया है।"
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर यह भी लिखा कि जब तक सभी पक्षों के साथ संतोषजनक सहमति और विश्वास का वातावरण नहीं बन जाता, तब तक इस परियोजना के लिए पेड़ों का कटान स्थगित रखा जाएगा। लेकिन पेड़ों के काटे जाने के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे लोग इसे अंतिम समाधान के रूप में नहीं देखते हैं।
आंदोलन में शामिल अपर्णा भी मुख्यमंत्री की घोषणा से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि लोग आज भी सात मोड़ पर इसलिए जुट रहे हैं क्योंकि सरकार ने केवल पेड़ों का कटना रोका है, परियोजना के स्वरूप पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया है।
वहीं, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर काम करने वाले आशुतोष कोठारी ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "मुख्यमंत्री ने परियोजना रोकने की नहीं, बल्कि वार्ता करने को लेकर कहा है। हमारा सवाल वही है कि अगर सड़क बनाने के ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिनसे हजारों पेड़ बच सकते हैं, तो उन पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जा रहा?"
वहीं, राज्य में विपक्षी दल कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिम दसौनी का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की अपील पर राहुल गांधी ने इस मुद्दे को संसद में उठाने का आश्वासन दिया था, जिसके बाद सरकार ने पेड़ कटान रोकने का फैसला लिया।
वहीं, उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रमिला रावत का कहना है कि केवल सोशल मीडिया पर की गई घोषणा पर्याप्त नहीं है। उन्होंने बीबीसी से कहा कि सरकार को पेड़ कटान रोकने का औपचारिक लिखित आदेश जारी करना चाहिए।
उनका कहना है कि जब तक स्पष्ट तौर पर ऐसा नहीं होता, सात मोड़ पर धरना जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि अब इस मामले की सुनवाई 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होनी है।
क्यों है विवाद
देहरादून और ऋषिकेश के बीच प्रस्तावित भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना करीब 20 किलोमीटर लंबी है। यह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) का प्रोजेक्ट है।
10 जुलाई को एनएचएआई की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया कि मौजूदा सड़क पर तीखे मोड़, बढ़ता ट्रैफ़िक और चारधाम यात्रा के दौरान वाहनों का दबाव दुर्घटनाओं का कारण बनता है।
प्राधिकरण के मुताबिक, सड़क चौड़ी होने से यातायात सुगम होगा और जॉलीग्रांट एयरपोर्ट तक संपर्क बेहतर होगा।
हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल सड़क चौड़ीकरण का मामला नहीं है। उनका तर्क है कि सात मोड़ शिवालिक एलीफेंट रिजर्व का हिस्सा है और यहां हजारों पेड़ों की कटाई से हाथियों के पारंपरिक रास्तों के साथ पूरे वन्यजीव तंत्र पर असर पड़ सकता है।
इन्हीं चिंताओं को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता रीनू पॉल ने नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
जनवरी 2026 में हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले के कई पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय पहले से सुनवाई कर रहा है। बाद में अदालत ने स्पष्ट किया कि पेड़ों की कटाई पर पहले लगाया गया अंतरिम स्थगन आदेश प्रभावी नहीं था, जिसके बाद कटान शुरू हुआ। अब इस मामले में 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
'हम सड़क के नहीं, उसके डिजाइन के विरोध में हैं'
पर्यावरण कार्यकर्ता और सिविल इंजीनियर आशीष गर्ग का कहना है कि उनका विरोध सड़क निर्माण से नहीं, बल्कि उसके मौजूदा डिजाइन से है।
उन्होंने बीबीसी से कहा, "अगर कुछ हिस्सों में सड़क को एलिवेटेड बनाया जाए या डिजाइन में बदलाव किया जाए तो बड़ी संख्या में साल के पेड़ बचाए जा सकते हैं। विकास और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।"
वो दावा करते हैं कि अब तक करीब 450 पेड़ काटे जा चुके हैं और अब भी परियोजना में बदलाव की संभावना पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है।
एनएचएआई का क्या है पक्ष
बीती दस जुलाई को एनएचएआई ने कहा कि इस परियोजना की रूपरेखा को उत्तराखंड वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और भारतीय वन्यजीव संस्थान के तकनीकी परामर्श से तैयार किया गया था।
इसमें हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट और अन्य संरचनाओं का प्रावधान है। प्राधिकरण का यह भी कहना है कि 754 पेड़ों का प्रत्यारोपण वैज्ञानिक आकलन के आधार पर किया जाएगा।
बीबीसी ने भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना के संबंध में एनएचएआई के परियोजना निदेशक सौरभ सिंह से कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
उधर, पेड़ों को एक जगह से हटाकर दूसरे जगह लगाने के सवाल पर पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप नौटियाल कहते हैं कि उत्तराखंड में पेड़ों के प्रत्यारोपण का पिछला अनुभव उत्साहजनक नहीं रहा है।
वह कहते हैं, " आरटीआई के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, नवंबर 2000 से जून 2026 तक राज्य में 46,203 हेक्टेयर वन भूमि को कई विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित किया जा चुका है। यानी औसतन हर दिन करीब पांच हेक्टेयर जंगल किसी न किसी परियोजना के लिए दिया गया।"
क्षेत्रफल की दृष्टि से देहरादून राज्य के कुल भू-भाग का लगभग छह प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन कुल ट्रांसफ़र हुई वन भूमि में से करीब 47 प्रतिशत हिस्सा अकेले देहरादून में हुआ है। सात मोड़ का इलाका भी इसी जिले में आता है।
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहा कि परियोजना को भारत सरकार से वन स्वीकृति के दोनों चरण (स्टेज-1 और स्टेज-2) मिल चुके हैं और वाइल्ड लाइफ़ मैनेजमेंट प्लान भी तैयार है।
अधिकारी ने कहा, "हाईकोर्ट ने परियोजना पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगाई थी। उनका कहना है कि मामला अभी अदालतों में विचाराधीन है इसलिए इस पर सार्वजनिक रूप से अधिक टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।"
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
सुप्रीम कोर्ट 29 जुलाई को इस मामले की सुनवाई करेगा।
Very likely · Within days
Open Questions
- क्या सरकार परियोजना के डिजाइन में बदलाव पर विचार करेगी?
- सुप्रीम कोर्ट का 29 जुलाई का फैसला क्या होगा?
- क्या सरकार पेड़ों की कटाई रोकने का औपचारिक लिखित आदेश जारी करेगी?


