
पूर्व इसराइली सेना प्रमुख गादी आइज़नकोट प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं।
इसराइली राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइज़नकोट को नई गठबंधन सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है। वह लंबे समय से सत्ता में रहे पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
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इसराइली राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने विपक्षी नेता गादी आइज़नकोट को गठबंधन सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है।
इसराइली राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने कहा है कि उन्होंने नई गठबंधन सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइज़नकोट को सौंपी है.
इसराइली सेना के पूर्व प्रमुख रहे आइज़नकोट उस नेतन्याहू को अप्रत्याशित चुनौती दे रहे हैं, जिन्होंने पिछले लगभग तीन दशकों के अधिकतर समय इसराइल का नेतृत्व किया है.
आइज़नकोट राजनीति में नए हैं. उन्होंने औपचारिक रूप से 2022 में राजनीति में क़दम रखा था.
वह नेशनल यूनिटी पार्टी से इसराइली संसद के सदस्य बने. बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी. उनका कहना था कि पार्टी के साथ उनके वैचारिक मतभेद थे.
पिछले साल विपक्ष के प्रमुख नेताओं से अलग होकर उन्होंने अपनी मध्यमार्गी पार्टी 'याशर' बनाई. 'याशर' का अर्थ 'सीधा' या 'ईमानदार' होता है.
इसके बाद आइज़नकोट चुनावी मुक़ाबले में नेतन्याहू के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन गए.
इस चुनाव में इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी और उसके धुर दक्षिणपंथी और धुर-रूढ़िवादी यहूदी सहयोगियों ने 120 सीटों वाली संसद में 53 सीटें जीतीं, जबकि आइजनकोट की मध्यमार्गी याशर पार्टी और उनके गठबंधन की तीन अन्य याहूदी विपक्षी पार्टियों ने 48 सीटें जीतीं.
हाल के वर्षों में नेतन्याहू भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे हैं. वह इन आरोपों से इनकार करते हैं.
सात अक्तूबर 2023 के हमलों से निपटने के उनके तरीक़े की भी आलोचना हुई है. इसके अलावा न्यायपालिका में बड़े बदलाव की उनकी विवादित योजना के कारण देश में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे.
लेकिन नेतन्याहू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के आइज़नकोट के फ़ैसले के पीछे एक निजी त्रासदी भी है.
गादी आइज़नकोट के पांच बच्चों में सबसे छोटे बेटे मास्टर सार्जेंट गाल आइज़नकोट की दिसंबर 2023 में उत्तरी ग़ज़ा में एक विस्फोट में मौत हो गई थी.
वह सात अक्तूबर को हमास की ओर से बंधक बनाए गए दो इसराइलियों के अवशेष तलाशने के अभियान पर गए थे.
गादी आइज़नकोट कहते हैं कि उन्होंने अब तक अपने बेटे की उन चीज़ों को नहीं देखा है, जो दो बक्सों में रखकर उन्हें सौंपी गई थीं.
ये बक्से तेल अवीव के उत्तर में समुद्र किनारे बसे समृद्ध शहर हर्ज़लिया में उनके घर पर रखे हैं.
66 साल के आइज़नकोट ने अप्रैल में इसराइल के सरकारी रेडियो 'कान रेशेत बेट' से कहा था, "मैंने अब तक उन्हें नहीं खोला है. मैं इसे लगातार टालता रहता हूं."
ग़ज़ा अभियान में उनके बेटे के साथ-साथ दो भतीजों की भी मौत हुई.
इस निजी नुक़सान और इस सोच ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को और मज़बूत किया कि नेतन्याहू सरकार हमास के अभूतपूर्व हमलों को रोकने में विफल रही.
आइज़नकोट ने 'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' से कहा था, "मैं समय को पीछे नहीं ले जा सकता. गाल ने जो भारी क़ीमत चुकाई है, उसके योग्य बनने के लिए मैं वह सब करूंगा जो कर सकता हूं."
नेतन्याहू और उनके मंत्रिमंडल को जवाबदेह ठहराना आइज़नकोट की प्राथमिकताओं में शामिल है.
सात अक्तूबर के हमलों के बाद राष्ट्रीय एकता दिखाने के लिए आइज़नकोट विपक्ष के कुछ दूसरे नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट में शामिल हुए थे.
लेकिन जून 2024 में उन्होंने युद्ध कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया.
उन्होंने नेतन्याहू पर आरोप लगाया कि हमास की ओर से बंधक बनाए गए लोगों को छुड़ाने के लिए उन्होंने ज़्यादा तेज़ी से क़दम नहीं उठाए.
आइज़नकोट ने 'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' से कहा, "उनके शासन में महिलाओं और बच्चों को अगवा किया गया और उन्हें बाहर निकालने के लिए जो करना ज़रूरी था, उन्होंने जानबूझकर वह नहीं किया."
नेतन्याहू इस दावे को कई बार ख़ारिज कर चुके हैं.
नेतन्याहू का कहना है कि युद्ध कैबिनेट में रहते हुए आइज़नकोट ने ग़ज़ा में कुछ अहम सैन्य कार्रवाइयों का विरोध किया था.
उनके मुताबिक़, आइज़नकोट की रणनीति अपनाने से हमास कमज़ोर नहीं होता.
जून में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान नेतन्याहू ने कहा, "मुझे याद है कि जब हम ग़ज़ा में थे, तब गादी आइज़नकोट और दूसरे लोगों ने क्या कहा था."
"उनका कहना था कि हमें बस एक समझौता करना चाहिए, बंधकों को बाहर निकालना चाहिए और ग़ज़ा से निकल जाना चाहिए, पूरे ग़ज़ा से."
'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' के मुताबिक़, नेतन्याहू ने कहा कि अगर यह रणनीति अपनाई जाती तो "पूरा हमास" और युद्ध के दौरान इसराइल की ओर से मारे गए उसके शीर्ष अधिकारी "आज भी वहां होते, ज़िंदा होते और नियंत्रण में होते."
हाल में समाचार वेबसाइट 'वाईनेट न्यूज़' को दिए इंटरव्यू में आइज़नकोट ने नेतन्याहू के दावे को ख़ारिज कर दिया.
उन्होंने प्रधानमंत्री से युद्ध कैबिनेट की बैठकों और उनमें हुए मतदान के रिकॉर्ड जनता के सामने रखने को कहा.
चुनाव से कुछ दिन पहले आइज़नकोट ने वादा किया कि अगर वह चुने जाते हैं, तो 18 महीने के भीतर हमास का शासन ख़त्म कर देंगे.
नदाव इयाल इसराइल के प्रमुख पत्रकारों में शामिल हैं. वह एक शिक्षाविद भी हैं और आइज़नकोट के राजनीतिक सफ़र पर नज़र रखते रहे हैं.
उनका कहना है कि निजी नुक़सान ने आइज़नकोट को "एक उद्देश्य और मिशन का एहसास" दिया है.
इयाल के मुताबिक़, यह मिशन केवल इतना नहीं है कि आइज़नकोट की याशर पार्टी इसराइली संसद में इतनी सीटें हासिल कर ले कि वह मौजूदा प्रधानमंत्री को हटाने वाला गठबंधन बना सके.
नेतन्याहू की तरह आइज़नकोट भी मानते हैं कि ग़ज़ा के भविष्य की किसी भी योजना में हमास को जगह नहीं मिलनी चाहिए.
इयाल ने बीबीसी से कहा, "यह समझना बहुत ज़रूरी है कि उनके बेटे को हमास ने उस युद्ध में मारा, जिसे हमास ने शुरू किया था."
आइज़नकोट ने दो राष्ट्रों के समाधान का भी समर्थन नहीं किया है. इस समाधान में इसराइल के साथ एक फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देने की बात कही जाती है.
इसराइली मीडिया के मुताबिक़, अगस्त के आख़िर में आइज़नकोट ने कहा था कि जो लोग अब भी इस संभावना में विश्वास करते हैं, वे "भ्रम में जी रहे हैं."
हालांकि, उन्होंने कहा है कि वह फ़लस्तीनी प्राधिकरण के साथ इसराइल के संबंधों को "नए सिरे से तय" करना चाहते हैं.
आइज़नकोट ने अक्तूबर में 'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' से कहा, "फ़लस्तीनी प्राधिकरण को क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में रहने वाले 28 लाख फ़लस्तीनियों पर शासन करने की अनुमति दी जानी चाहिए. मैं उन पर शासन नहीं करना चाहता."
आइज़नकोट बड़ी इसराइली बस्तियों के समूहों के विस्तार का समर्थन करते हैं. हालांकि, उनकी शर्त है कि यह विस्तार इसराइली क़ानून और देश के हितों के मुताबिक़ होना चाहिए.
इसके साथ ही उन्होंने वेस्ट बैंक के कुछ इलाक़ों में यहूदी बाशिंदों की मौजूदगी बढ़ाने की विवादित योजनाओं का विरोध किया है.
उन्होंने ख़ास तौर पर यरुशलम के पूर्व में ई1 के नाम से जाने जाने वाले इलाक़े में एक बस्ती के विस्तार की योजना का विरोध किया.
ऐसा लगता है कि उनकी आपत्तियों के पीछे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नकारात्मक प्रतिक्रिया भी एक वजह है.
हाल में उन्होंने वादा किया कि वह "जूडिया और समारिया से यहूदी आतंकवादियों को बाहर निकालेंगे."
इसराइल क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के लिए 'जूडिया और समारिया' नाम का इस्तेमाल करता है.
आइज़नकोट ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया है कि वह सात अक्तूबर के हमलों की जांच कराएंगे. इस जांच में यह पता लगाया जाएगा कि इसराइली सरकार से कहां-कहां ग़लतियां हुईं.
इसराइल के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने ऐसे आरोप प्रकाशित किए हैं कि संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के अधिकारियों ने नेतन्याहू को ग़ज़ा की ओर से संभावित हमले के बारे में चेतावनी दी थी.
नेतन्याहू इन आरोपों से इनकार करते हैं.
उन्होंने उस इसराइली अख़बार पर मुक़दमा किया, जिसने सबसे पहले यह दावा प्रकाशित किया था.
नेतन्याहू इसराइल के सुप्रीम कोर्ट की अगुवाई में किसी सरकारी जांच का भी लगातार विरोध करते रहे हैं. उनका तर्क है कि न्यायपालिका उनके ख़िलाफ़ पक्षपात करेगी.
आइज़नकोट कहते हैं, "यह चुनाव ज़िम्मेदारी स्वीकार करने और ज़िम्मेदारी से भागने के बीच चुनाव है."
आइज़नकोट ने अपने 10 सूत्रीय कार्यक्रम में एक आपात योजना शुरू करने का वादा किया है.
इसके ज़रिए वह बड़ी संख्या में देश छोड़कर जा रहे बेहद हुनरमंद इसराइलियों की समस्या से निपटना और नए प्रवासियों के इसराइल आने को बढ़ावा देना चाहते हैं.
आइज़नकोट अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदायों और अरब इसराइलियों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट भी ख़त्म करना चाहते हैं.
उन्होंने 'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' से कहा, "हम एक और काम करेंगे. सभी इसराइली नागरिकों के लिए एक समान सेवा क़ानून पारित किया जाएगा."
"इसके तहत सैन्य, राष्ट्रीय या नागरिक सेवा करनी होगी. इसमें अरब नागरिकों के लिए राष्ट्रीय सेवा भी शामिल होगी."
इससे पहले भी अनिवार्य सैन्य सेवा का दायरा बढ़ाने की कोशिशें हुई हैं. नेतन्याहू सरकार ने भी ऐसी कोशिश की थी.
लेकिन इन कोशिशों के ख़िलाफ़ अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदायों ने प्रदर्शन किए थे.
गादी आइज़नकोट का जन्म तिबेरियस में हुआ और उनकी परवरिश ईलात में हुई.
ये दोनों शहर इसराइल की राजनीतिक सत्ता के प्रमुख केंद्रों यरुशलम और तेल अवीव से काफ़ी दूर हैं.
आइज़नकोट के माता-पिता मोरक्को से आए प्रवासी थे. वे साधारण आर्थिक हालात वाले परिवार से थे और 1950 के दशक में इसराइल आकर बस गए थे.
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीकी देशों से आए यहूदी समुदायों को 'मिज़राही' कहा जाता है.
अब तक मिज़राही समुदाय का कोई व्यक्ति इसराइल का प्रधानमंत्री नहीं बना है. हालांकि, इस समुदाय के नेता पहले भी प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर चुके हैं.
'द न्यू यॉर्कर' के संपादक डेविड रेमनिक ने चुनाव प्रचार के दौरान आइज़नकोट के साथ समय बिताया है.
उनका कहना है कि आइज़नकोट इसराइली समाज में अधिकारों से वंचित समझे जाने वाले समुदायों, जैसे मिज़राही, के समर्थक के रूप में नेतन्याहू की पहचान को चुनौती देते हैं.
नेतन्याहू पूर्वी यूरोप से इसराइल आए यहूदी प्रवासियों के वंशज हैं और यरुशलम के एक समृद्ध इलाक़े में पले-बढ़े हैं. इसलिए अधिकारों से वंचित लोगों के नेता के रूप में उनकी छवि इस पृष्ठभूमि से मेल खाती नहीं दिखती.
इसराइली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, ऐतिहासिक रूप से लिकुड पार्टी का समर्थन करता आया मिज़राही समुदाय आइज़नकोट के लिए अक्सर मोरक्को की अरबी भाषा के शब्द 'दियालिना' का इस्तेमाल करता है.
'दियालिना' का अर्थ है, "हममें से एक."
आइज़नकोट ने इस साल की शुरुआत में टीवी नेटवर्क चैनल 13 से कहा था, "मेरे माता-पिता मोरक्को से आए थे. मुझे उन पर और अपनी जड़ों पर गर्व है."
"लेकिन सबसे पहले मुझे इस बात की ख़ुशी होगी कि हम अपनी इसराइली पहचान पर गर्व करें."
आइज़नकोट 18 साल की उम्र में इसराइली सेना में शामिल हुए थे.
उन्होंने 40 साल तक सेना में काम किया और अलग-अलग पदों से आगे बढ़ते हुए सेना प्रमुख बने. वह 2015 से 2019 तक इस पद पर रहे.
साल 2000 के दशक में दूसरे इंतिफ़ादा के दौरान वह वेस्ट बैंक में इसराइली सेनाओं के प्रभारी थे.
दूसरा इंतिफ़ादा चार साल से अधिक समय तक चला फ़लस्तीनी विद्रोह था.
इस दौरान क़रीब एक हज़ार इसराइली और तीन हज़ार से ज़्यादा फ़लस्तीनी मारे गए थे.
बाद में आइज़नकोट का नाम 'दाहिया सिद्धांत' के साथ जोड़ा गया.
यह सिद्धांत उन इलाक़ों के नागरिक ढांचे के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा सैन्य ताक़त इस्तेमाल करने की वकालत करता है, जहां से इसराइल को लगता है कि उस पर हमला किया जा रहा है.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नेतन्याहू की इतनी आलोचना करने के बावजूद आइज़नकोट ने सात अक्तूबर के हमलों के जवाब में इसराइल की सैन्य कार्रवाई का कभी विरोध नहीं किया.
हमास के नेतृत्व में हुए हमले में क़रीब 1,200 लोग मारे गए थे और 251 लोगों को बंधक बनाया गया था.
इसके जवाब में इसराइल ने ग़ज़ा में सैन्य अभियान शुरू किया.
ग़ज़ा के हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, इस अभियान में 74,200 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. संयुक्त राष्ट्र इन आंकड़ों को भरोसेमंद मानता है.
आइज़नकोट ने 'द टाइम्स ऑफ़ इसराइल' से कहा, "हमें अपनी रक्षा करने के लिए मजबूर किया गया. ईमानदारी से देखना होगा कि इसकी शुरुआत कहां से हुई."
'द इकनॉमिस्ट' पत्रिका के इसराइल संवाददाता और नेतन्याहू की जीवनी के लेखक अंशेल फ़ेफ़र कहते हैं कि आइज़नकोट "शांतिवादी नहीं हैं."
फ़ेफ़र ने बीबीसी से कहा, "लेकिन उनकी छवि एक गंभीर व्यक्ति की भी है."
"अब तक चुनाव प्रचार में वह बड़े-बड़े या बेतुके वादे नहीं कर रहे हैं. इसके अलावा वह किसी प्रभावशाली या विशिष्ट परिवार से नहीं आते. इसलिए उनकी छवि ख़राब करना बहुत मुश्किल है."
फ़ेफ़र के मुताबिक़, नेतन्याहू को सीधे चुनौती देने वाले नेता के रूप में आइज़नकोट का सामने आना थोड़ा अप्रत्याशित था.
वह कहते हैं, "छह महीने पहले तक पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट को नेतन्याहू का सबसे संभावित प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा था."
"लेकिन ऐसा लगता है कि आइज़नकोट ने बिल्कुल सही समय पर मतदाताओं की भावनाओं को छू लिया."
आइज़नकोट को अक्सर 'नेतन्याहू का उलट' कहा जाता है.
वह चर्चा में बने रहने की कोशिश नहीं करते और उन्हें बहुत अच्छा राजनीतिक वक्ता भी नहीं माना जाता.
नदाव इयाल का मानना है कि आइज़नकोट को शायद राजनेता होना भी पसंद नहीं है.
क्या आइज़नकोट के प्रधानमंत्री बनने से इसराइल और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच ख़राब हुए रिश्ते सुधर सकते हैं?
ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इसराइली विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर योसी मेकेलबर्ग ने बीबीसी से कहा कि ऐसा होने की संभावना है.
लेकिन ऐसा कोई बदलाव रातों रात आ जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि केवल नेतन्याहू की जगह किसी दूसरे नेता के आने से यह गारंटी नहीं मिल जाती कि इसराइल की ओर से सद्भावना दिखाई जाएगी.
प्रोफ़ेसर मेकेलबर्ग कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि आइज़नकोट की पार्टी समेत कोई भी विपक्षी दल नेतन्याहू के मुक़ाबले कोई साफ़ विकल्प पेश करता है."

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