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Backभारत के ख़िलाफ़ बयान देने वाले स्टीफ़न मिलर को ट्रंप ने क्यों सौंपी अहम ज़िम्मेदारी?
भारत के ख़िलाफ़ बयान देने वाले स्टीफ़न मिलर को ट्रंप ने क्यों सौंपी अहम ज़िम्मेदारी?
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BBC हिंदी15 minutes agoPolitics4 min readIndia

भारत के ख़िलाफ़ बयान देने वाले स्टीफ़न मिलर को ट्रंप ने क्यों सौंपी अहम ज़िम्मेदारी?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने क़रीबी सहयोगी स्टीफ़न मिलर को नया चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नियुक्त किया है।

Quick Look

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्टीफ़न मिलर को अपना नया चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नियुक्त किया है। मिलर की सख़्त इमिग्रेशन नीतियों और भारत की व्यापारिक नीतियों पर पहले की आलोचनात्मक टिप्पणियों के कारण इस नियुक्ति को भारत-अमेरिका संबंधों के नज़रिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

AI-generated summary

Why It Matters

स्टीफ़न मिलर ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी प्रभावशाली थे और इमिग्रेशन नीतियों के मुख्य सूत्रधार माने जाते हैं। मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद प्रशासन में यह बड़ा बदलाव किया गया है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए अपने क़रीबी सहयोगी स्टीफ़न मिलर को नया चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नियुक्त किया है। मिलर सोमवार से यह ज़िम्मेदारी संभालेंगे।

ट्रंप ने शुक्रवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर उनकी नियुक्ति का एलान किया। यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है, जब मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। चुनावी नतीजों के बाद मौजूदा चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ सूसी वाइल्स ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।

मिलर को ट्रंप का भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है। उनकी पहचान अमेरिका की सख़्त इमिग्रेशन नीति को आकार देने वाले 'मास्टरमाइंड' के तौर पर रही है। ट्रंप के पहले कार्यकाल से लेकर दूसरे कार्यकाल तक वह प्रशासन के अहम फ़ैसलों में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं।

मिलर की नियुक्ति भारत के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसकी वजह भारत की व्यापार और इमिग्रेशन नीतियों को लेकर उनके पहले दिए गए आलोचनात्मक बयान हैं।

41 वर्षीय मिलर ट्रंप प्रशासन में डिप्टी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ के तौर पर काम कर चुके हैं। वह ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले दिन जिन कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए गए थे, उनमें जन्मसिद्ध नागरिकता ख़त्म करने और अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने से जुड़े आदेश शामिल थे। इन आदेशों पर मिलर के हस्ताक्षर भी मौजूद थे। इससे प्रशासन में उनके प्रभाव और कद का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. शैलेंद्र देवलांकर के मुताबिक़, मिडटर्म इलेक्शन में हुई वोटिंग में 18-19 फ़ीसदी आबादी के लिए इमिग्रेशन एक बड़ा मुद्दा था। उनके मुताबिक़, इस मुद्दे पर ट्रंप आसानी से प्ले कर सकते हैं, मिलर की नियुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका प्रतीकात्मक संदेश है।

उनका कहना है कि ट्रंप इस फ़ैसले के ज़रिए अमेरिकी जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बताना चाहते हैं कि चुनावी हार के बावजूद उनकी नीतियों में नरमी नहीं आएगी। डॉ. देवलांकर कहते हैं, "मिलर की नियुक्ति सिंबॉलिक नेचर की है। जब आप किसी कंजर्वेटिव को इस पद पर नियुक्त करते हैं, तो आप एक संदेश दे रहे होते हैं। ट्रंप यह बताना चाहते हैं कि आने वाले दो वर्षों में विदेश नीति और रक्षा के मोर्चे पर बेहद मज़बूत और आक्रामक रुख़ अपनाएंगे।"

स्टीफ़न मिलर कई मौक़ों पर भारत की व्यापार और इमिग्रेशन नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। अगस्त 2025 में उन्होंने रूस से कच्चा तेल ख़रीदने को लेकर भारत पर सवाल उठाए थे। मिलर ने कहा था, "भारत रूसी तेल ख़रीदने के मामले में चीन के बराबर जुड़ा हुआ है, जिससे रूस-यूक्रेन युद्ध को आर्थिक रूप से मदद मिल रही है।" उन्होंने भारत के इस क़दम को अस्वीकार्य बताया था।

इसके अलावा फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में मिलर ने भारत की इमिग्रेशन नीति पर भी सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर भारी शुल्क लगाता है, जबकि ख़ुद को अमेरिका का क़रीबी सहयोगी बताता है। मिलर ने कहा था, "भारत ख़ुद को दुनिया में हमारे सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक बताता है। लेकिन वह हमारे उत्पादों को स्वीकार नहीं करता और हम पर भारी शुल्क लगाता है। हम यह भी जानते हैं कि वह इमिग्रेशन नीति में काफ़ी धोखाधड़ी करता है।"

मिलर के पुराने बयानों को देखते हुए उनकी नई ज़िम्मेदारी को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस नियुक्ति से भारत के ख़िलाफ़ तत्काल किसी बड़े अमेरिकी क़दम की संभावना नहीं है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर राजन कुमार के मुताबिक़, भारत और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है। प्रोफ़ेसर राजन कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "अमेरिका और भारत दोनों की एक-दूसरे को ज़रूरत है। ख़ासकर ऊर्जा क्षेत्र में दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं।" उनका मानना है कि रूस से तेल ख़रीदने के मुद्दे पर भारत को लेकर अमेरिकी रुख़ सख़्त रह सकता है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में तत्काल प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना नहीं दिखती।

हालांकि, राजन कुमार का कहना है कि मिलर की नियुक्ति के बाद अमेरिकी इमिग्रेशन नीति में नरमी की संभावना कम हो सकती है। उनके मुताबिक़, रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेता भी सीमा सुरक्षा और बॉर्डर वॉल जैसी व्यवस्थाओं का समर्थन करते हैं। ऐसे में ट्रंप प्रशासन मौजूदा इमिग्रेशन नीति को और सख़्त बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।

स्टीफ़न मिलर की नियुक्ति का असर अमेरिका की इमिग्रेशन नीति पर भी पड़ सकता है। ख़ासकर एच-1बी वीज़ा को लेकर भारतीय पेशेवरों की चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, डॉ. शैलेंद्र देवलांकर का कहना है कि एच-1बी वीज़ा व्यवस्था में बड़े नीतिगत बदलाव के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंज़ूरी ज़रूरी होगी। राष्ट्रपति केवल कार्यकारी आदेश के ज़रिए इस व्यवस्था में अपनी मर्ज़ी से बड़े बदलाव नहीं कर सकते।

उनके मुताबिक़, मिलर की मौजूदगी से अमेरिका की इमिग्रेशन नीति का सख़्त रुख़ जारी रह सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह एच-1बी वीज़ा व्यवस्था में मनचाहे बदलाव कर पाएंगे।

डॉ. शैलेंद्र देवलांकर इसके जवाब कहते हैं, ट्रेड डील अब लगभग अंतिम चरण में है। ऐसे में इस समझौते को प्रभावित करने की मिलर की क्षमता सीमित हो सकती है। उन्होंने कहा, "मिलर की नियुक्ति को भारत के ख़िलाफ़ किसी संभावित अमेरिकी कार्रवाई के तौर पर नहीं देखना चाहिए। ट्रंप आने वाले समय में दक्षिण एशिया पर अपना ध्यान कुछ कम कर सकते हैं। उनका फ़ोकस रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान जैसे मुद्दों पर अधिक रह सकता है।"

प्रोफ़ेसर राजन कुमार भी मानते हैं कि अब खुद अमेरिका ही रूस से डीजल ले रहा है, तो वो भारत पर अधिक पाबंदियां लगाने की स्थिति में नहीं है। गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील पर आधिकारिक हस्ताक्षर अभी तक नहीं हुए हैं, हालांकि फ़रवरी 2026 में दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते के फ़्रेमवर्क पर सहमति जताई थी।

स्टीफ़न मिलर ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी वह प्रशासन के सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल थे। पोलिटिको के मुताबिक़, मिलर निजी बैठकों में भी राष्ट्रपति ट्रंप के फ़ैसलों का विरोध करने से बचते हैं और उनके निर्णयों के अनुरूप तेज़ी से ख़ुद को ढाल लेते हैं। यही वजह रही कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में कैबिनेट में कई बदलावों और रिपब्लिकन पार्टी के भीतर विवादों के बावजूद वह अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे।

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • अमेरिकी इमिग्रेशन नीति में सख़्ती जारी रहने की संभावना।

    Likely · Within months

Open Questions

  • क्या मिलर एच-1बी वीज़ा नियमों में बदलाव करेंगे?
  • भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर कब होंगे?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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