
इसराइल में मतदान रिकॉर्ड स्तर पर, सरकार बनाने के लिए राजनीतिक खींचतान की संभावना
इसराइल में प्रधानमंत्री पद के लिए बिन्यामिन नेतन्याहू और गादी आइज़नकोट के बीच कड़ा मुक़ाबला है। रिकॉर्ड मतदान के बावजूद, किसी भी गठबंधन को बहुमत मिलने की संभावना कम है, जिससे चुनाव के बाद लंबे राजनीतिक गतिरोध का अंदेशा है।
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इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण गठबंधन सरकारें अनिवार्य हैं। 7 अक्टूबर के हमास हमलों के बाद सुरक्षा और नेतन्याहू के शासन पर जनता की राय विभाजित है।
इसराइल में मतदान का प्रतिशत अब तक रिकॉर्ड स्तर पर है. देश में हो रहे इन चुनावों को कई लोग इसराइल के इतिहास के सबसे अहम चुनावों में से एक मान रहे हैं.
शुक्रवार को जारी हुए सर्वे के मुताबिक़, प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में मौजूदा प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़नकोट के बीच लगभग बराबरी का मुक़ाबला है.
लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि दोनों में से किसी के भी राजनीतिक गठबंधन को बहुमत की सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 61 सीटें नहीं मिलेंगी. इसका मतलब है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर कई हफ़्तों या महीनों तक राजनीतिक खींचतान चल सकती है.
चुनाव प्रचार में लोकतंत्र और सुरक्षा के मुद्दे छाए रहे हैं और इस चुनाव को बड़े पैमाने पर नेतन्याहू के शासन पर जनता की राय के तौर पर देखा जा रहा है.
मंगलवार सुबह कई प्रमुख पार्टियों ने देश भर के मतदान केंद्रों पर कथित गड़बड़ियों की शिकायत की. लेकिन इसराइल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी (सीईसी) का कहना है कि मतपत्रों के साथ व्यवस्थित तरीके से छेड़छाड़ किए जाने का कोई सबूत नहीं है.
इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की चुनाव प्रणाली है. इस वजह से वहां सरकारें हमेशा गठबंधन की रही हैं और सत्ता की दौड़ में कई बार ऐसे गठबंधन भी बने हैं, जिनकी उम्मीद नहीं की गई थी. लेकिन इस बार मुक़ाबला ख़ास तौर पर कड़ा नज़र आ रहा है और पार्टियों ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि वे किसके साथ जा सकती हैं और किसके साथ नहीं.
हाल ही में बनी याशार पार्टी के नेता आइज़नकोट तथाकथित 'चेंज ब्लॉक' का प्रमुख चेहरा हैं. इस गठबंधन में ऐसी पार्टियां शामिल हैं जिनके बीच वैचारिक मतभेद हैं, लेकिन उनका साझा मक़सद नेतन्याहू को सत्ता से हटाना है.
इस गठबंधन के अन्य नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन शामिल हैं. दोनों दक्षिणपंथी नेता हैं और सुरक्षा के मुद्दे पर सख़्त रुख़ रखते हैं. इनके अलावा वामपंथी रुझान वाले पूर्व जनरल याइर गोलान भी इस गठबंधन में हैं.
इसराइली राजनीति के दिग्गज नेतन्याहू पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने थे. उनकी सत्ता में वापसी इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वह एक बार फिर धुर-दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियों के साथ गठबंधन कर पाते हैं. यही पार्टियां उनकी मौजूदा सरकार में भी शामिल हैं, जिसे इसराइल के इतिहास की सबसे दक्षिणपंथी सरकार माना जाता है.
इस चुनाव में दो अरब पार्टियों के गठबंधन भी मैदान में हैं. इसराइल की करीब 20 फ़ीसदी आबादी अरब है और इनमें से कई लोग खुद को इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिक बताते हैं. सैद्धांतिक तौर पर ये पार्टियां सत्ता बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं. लेकिन प्रमुख यहूदी पार्टियों में से एक को छोड़कर बाकी सभी ने उनके साथ काम करने से इनकार कर दिया है.
चुनाव प्रचार में सुरक्षा का मुद्दा छाया रहा है. विपक्षी गठबंधन ने 7 अक्तूबर को हमास के नेतृत्व में इसराइल पर हुए हमलों से पहले हुई अभूतपूर्व सुरक्षा चूक के लिए नेतन्याहू पर निशाना साधा है. इन हमलों में क़रीब 1,200 लोग मारे गए थे और 251 लोगों को बंधक बनाकर ग़ज़ा ले जाया गया था.
विपक्षी दलों ने इन हमलों की स्वतंत्र जांच के लिए एक आयोग बनाने की मांग की है. नेतन्याहू लंबे समय से इसका विरोध करते रहे हैं और उनका कहना है कि यह आयोग उनके ख़िलाफ़ पक्षपाती होगा.
विपक्षी दल नेतन्याहू के शासन में लोकतंत्र के लिए ख़तरों की ओर भी इशारा करते हैं. नेतन्याहू भ्रष्टाचार के आरोपों में चल रहे मुक़दमे का सामना कर रहे हैं, जिनसे वह इनकार करते हैं. वह न्याय व्यवस्था में सुधार की विवादित योजनाओं को भी आगे बढ़ा रहे हैं. इन योजनाओं के ख़िलाफ़ 7 अक्तूबर के हमलों से पहले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.
विपक्ष के हमलों के बावजूद नेतन्याहू ने एक बार फिर खुद को 'मिस्टर सिक्योरिटी' के तौर पर पेश किया है. वह मध्य-पूर्व में इसराइल की जंगों में अपनी सरकार की बताई गई रणनीतिक कामयाबियों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने करीबी रिश्ते को इसका आधार बताते हैं.
रविवार को इसराइल के चैनल 12 ने रिपोर्ट दी कि नेतन्याहू ने चुनाव से पहले ऐसी सैन्य कार्रवाई की वकालत की थी, जिससे ईरान के साथ टकराव हो सकता था. लेकिन इसराइल के सैन्य प्रमुख अयाल ज़मीर ने इसका विरोध किया. इसके अगले दिन सीएनएन ने रिपोर्ट दी कि नेतन्याहू ने ट्रंप को ईरान पर नए हमले करने के लिए मनाने की भी कोशिश की थी, लेकिन ट्रंप ने इसकी मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया. नेतन्याहू ने दोनों रिपोर्टों को ख़ारिज किया है.
चुनाव प्रचार के आख़िरी दिनों में एक और मामले को लेकर भी नेतन्याहू सुर्खियों में रहे. उन्होंने एआई से बनाई गई एक तस्वीर पोस्ट की, जिसमें तेल अवीव पर परमाणु बम गिरता हुआ दिखाया गया था. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो वह ही इसराइल की रक्षा कर सकते हैं. आइज़नकोट ने उन्हें 'हिस्टीरिकल' यानी 'बदहवास' बताया.
एक और बड़ा मुद्दा सैन्य भर्ती का रहा है. नेतन्याहू की सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले को लागू करने में नाकाम रही है, जिसमें कहा गया था कि पूरे समय धार्मिक अध्ययन करने वाले अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को सेना में भर्ती किया जाना चाहिए. यह बेहद विवादित मुद्दा है, क्योंकि हाल की जंगों में लड़ने के लिए हज़ारों दूसरे लोगों को सेना में भर्ती किया गया है.
ग़ज़ा के मुद्दे पर आइज़नकोट का रुख़ मोटे तौर पर नेतन्याहू जैसा ही है. उन्होंने 18 महीनों के भीतर ग़ज़ा में हमास के शासन को ख़त्म करने का वादा किया है. इसके लिए या तो अमेरिका की अगुवाई वाली शांति योजना के ज़रिए ऐसा किया जाएगा या ज़रूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी.
पिछले साल युद्धविराम होने के बाद से इसराइल ग़ज़ा पर लगभग हर दिन हमले करता रहा है. उसका कहना है कि इन हमलों में हमास के लड़ाकों को निशाना बनाया जाता है. ग़ज़ा के हमास द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, युद्ध शुरू होने के बाद से इसराइली सेना के हमलों में 74,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. संयुक्त राष्ट्र इन आंकड़ों को भरोसेमंद मानता है.
युद्ध में इसराइल के तौर-तरीक़ों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी आलोचना बढ़ी है और दुनिया भर में उसके सहयोगी देशों के साथ उसके रिश्ते ख़राब हुए हैं.
आइज़नकोट क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इसराइली बस्तियों का बड़े पैमाने पर समर्थन करते हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत ये बस्तियां अवैध हैं. हालांकि, वह चरमपंथी यहूदी बाशिंदों पर कार्रवाई करना चाहते हैं, जिनके हमले संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़ अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं.
उन्होंने फ़लस्तीनियों के लिए ऐसी परिस्थितियां बनाने की भी बात कही है, जिनमें उन्हें "स्वायत्तता या एक राज्य से कम दर्जे" का दर्जा मिल सके, लेकिन अंतिम सुरक्षा नियंत्रण इसराइल के पास रहे.
दो-राष्ट्र समाधान यानी इसराइल के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र बनाने का विचार मुख्यधारा की इसराइली राजनीति से लगभग गायब हो चुका है.
कुछ लोगों ने अनुमान लगाया है कि अरब पार्टियां आइज़नकोट के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार को अनौपचारिक तौर पर समर्थन दे सकती हैं. लेकिन संभावित सहयोगियों में शामिल लिबरमैन ने ऐसी किसी व्यवस्था का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है.
इन्हीं पेचीदगियों की वजह से चुनाव के बाद सीटों का हिसाब-किताब बेहद जटिल हो गया है. अब देखना होगा कि नतीजे आने के बाद कौन-कौन सी रियायतें, समझौते और रुख़ में बदलाव संभव होते हैं.
बताया जा रहा है कि विदेश से रिकॉर्ड 70,000 लोग मतदान करने के लिए इसराइल लौटे हैं, जबकि हज़ारों लोग पहली बार वोट डालने वाले हैं.
मंगलवार को इसराइली समयानुसार रात 10 बजे इसराइली ब्रॉडकास्टर्स एग्ज़िट पोल जारी करेंगे. इससे मतदान के रुझान का कुछ अंदाज़ा मिलेगा, लेकिन इनके नतीजों में काफ़ी अंतर हो सकता है.
देश भर में इसराइली लोग नतीजों को आते हुए देखने के लिए जुटेंगे. नेतन्याहू की लिकुड पार्टी यरूशलम में जुटेगी, जबकि पिछले साल ही बनी आइज़नकोट की याशार पार्टी तेल अवीव में इकट्ठा होगी.
सैकड़ों हज़ार इसराइली सैनिक और रिज़र्व सैनिक भी मतदान करेंगे, लेकिन इनमें से कई वोटों की गिनती बुधवार से पहले शुरू नहीं होगी. इसका मतलब है कि नतीजों में देर से दक्षिणपंथी पार्टियों को बढ़त मिल सकती है, जिनके बारे में माना जाता है कि इस वर्ग में उन्हें मज़बूत समर्थन हासिल है.
हालांकि चुनाव को अक्सर आइज़नकोट और नेतन्याहू के बीच सीधा मुक़ाबला बताया जा रहा है, लेकिन कोई दूसरा नेता भी सत्ता में आ सकता है. ऐसा तब हो सकता है, जब वह नेता अपनी पार्टी का गठबंधन को समर्थन देने से इनकार कर दे और इसके बदले प्रधानमंत्री पद की मांग करे.
कई लोगों को जिस नतीजे का डर है, वह है राजनीतिक गतिरोध. यानी ऐसी स्थिति जिसमें कोई भी गठबंधन बहुमत हासिल न कर पाए और अल्पमत की सरकार भी न बन सके. ऐसी स्थिति में नए चुनाव कराए जाएंगे और नेतन्याहू अंतरिम प्रधानमंत्री बने रहेंगे.
AI outlook — possibilities, not facts
चुनाव के बाद सरकार गठन के लिए हफ़्तों या महीनों तक राजनीतिक खींचतान होगी।
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