
विवादों के बीच एनएलएसआईयू के दीक्षांत समारोह में शामिल हुए सीजेआई सूर्यकांत, असहमति और गरिमा पर दिया जोर
बेंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल (एनएलएसआईयू) के दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत ने छात्रों को संबोधित किया। यह कार्यक्रम पहले हुए विवादों के कारण स्थगित हुआ था। सीजेआई ने बौद्धिक स्वतंत्रता और असहमति जताते समय दूसरों की गरिमा का सम्मान करने की आवश्यकता पर बल दिया।
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नालसार और एनएलएसआईयू के छात्रों ने सीजेआई की एक पूर्व टिप्पणी के विरोध में दीक्षांत समारोह में उनके निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसके जवाब में छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।
भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को बेंगलुरु के एक कार्यक्रम में कहा कि 'असहमति जताने में दूसरों की गरिमा का सम्मान ज़रूरी है.'
वो बेंगलुरू में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) के दीक्षांत समारोह में शामिल होने पहुंचे थे.
इससे पहले एक विवाद के बीच एनएलएसआईयू ने अपना 34वां दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया था, जो 12 सितंबर को होना था. विश्वविद्यालय ने इसके लिए 'अपरिहार्य परिस्थितियों' का हवाला दिया था.
दरअसल, बीते अगस्त में हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (नालसार) लॉ यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने अपने यहां दीक्षांत समारोह में सीजेआई के अतिथि बनाने के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने को कहा था.
विवाद तब और बढ़ गया जब बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनन मिश्रा ने एक लेटर लिख कर 2026 बैच के ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट पर पहले रोक लगाने का निर्देश दिया था.
इसके विरोध में एनएलएसआईयू के स्टूडेंट्स और पूर्व छात्रों ने एक खुला ख़त लिख कर नालसार स्टूडेंट्स के प्रति एकजुटता जताई थी. हालांकि बाद में सीजेआई के हस्तक्षेप के बाद मनन मिश्रा ने अपनी चिट्ठी वापस ले ली.
उस समय सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई की आलोचना करते हुए इसे 'अपने और छात्रों के बीच का मामला' बताया था और बीसीआई को 'बेवजह दख़ल' देने के लिए लताड़ लगाई थी.
नालसार देश की अग्रणी लॉ यूनिवर्सिटी मानी जाती है जबकि बेंगलुरू का एनएलएसआईयू देश का दूसरी सबसे बड़ी लॉ यूनिवर्सिटी मानी जाती है.
विवाद के बाद एनएलएसआईयू ने समारोह की तारीख बदलकर 17 अक्तूबर कर दी. संशोधित तारीख को विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद और सामान्य परिषद ने मंजूरी दी. इन बैठकों की अध्यक्षता सीजेआई सूर्यकांत ने कुलाधिपति के रूप में की.
इस विवाद के बाद पहली बार सीजेआई सूर्यकांत इस दीक्षांत समारोह में पहुंचे थे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, एनएलएसआईयू में आयोजित कार्यक्रम में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, मशहूर कलाकार अरुंधति नाग, कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विभु बखरू, एनएलएसआईयू के कुलपति प्रोफ़ेसर सुधीर कृष्णास्वामी और अन्य लोग भी मौजूद थे.
दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत ने परोक्ष रूप से बीते दिनों हुए विवाद की ओर इशारा किया.
उन्होंने स्टूडेंट्स से बौद्धिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अलग-अलग विचारों के प्रति सम्मान विकसित करने का आग्रह किया.
उन्होंने कहा, "मैं अक्सर इस बात पर विचार करता हूं कि क़ानूनी पेशा कमज़ोर दिल वालों के लिए नहीं है. इसमें क़ानून और अदालती फ़ैसलों की गहरी समझ के साथ-साथ न्यायसंगत बातों का बचाव करने का साहस और उन आवाज़ों को सुनने की विनम्रता भी ज़रूरी है, जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है."
उन्होंने कहा, "इस बौद्धिक आज़ादी के लिए निष्पक्षता भी ज़रूरी है. फ़ैसला सुनाने से पहले सुनना, किसी व्यक्ति को उसके विचार से अलग समझना और दूसरे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाए बिना असहमति जताना चाहिए."
बार एंड बेंच के मुताबिक़ सीजेआई ने कहा, "क़ानून आपके धैर्य को चुनौती देगा, आपकी नैतिकता की परीक्षा लेगा और आपसे अपने साहस का पूरा इस्तेमाल करने की मांग करेगा. लेकिन यह आपको सेवा करने की एक ख़ास खुशी भी देगा. ग़लत को सही करने का सुकून, स्वतंत्रता की रक्षा करने का गर्व और संविधान को बनाए रखने का सम्मान देगा."
क्यों हुआ था विवाद
इसी साल हैदराबाद के नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने के प्रस्ताव को लेकर विवाद खड़ा हो गया था.
दरअसल कुछ स्टूडेंट्स ने विश्वविद्यालय प्रशासन को ईमेल के माध्यम से एक याचिका सौंपी जिसमें सीजेआई को आमंत्रित करने के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया था.
विरोध करने वाले विद्यार्थी जस्टिस सूर्यकांत की उस कथित टिप्पणी का विरोध कर रहे थे जिसमें उन्होंने बेरोज़गार युवाओं को 'कॉकरोच' कहा था. हालांकि बाद में ख़ुद सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि उनकी टिप्पणी को 'ग़लत तरीक़े से पेश' किया गया.
इसी साल 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर युवाओं और विद्यार्थियों ने दिल्ली में संसद की ओर मार्च किया था.
एक वकील ने विद्यार्थियों और युवाओं पर पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की.
वकील ने कहा, "पुलिस की बर्बरता के वीडियो सबूत मौजूद हैं. विद्यार्थी जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. पुलिस बहुत सख़्ती से पेश आ रही है."
इस याचिका का जवाब देते हुए सीजेआई ने टिप्पणी की, "अपना समय बर्बाद न करें, हमारा समय भी बर्बाद न करें."
नालसार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने ईमेल के माध्यम से एक याचिका भेजकर अपनी आपत्तियां व्यक्त कीं, जिसमें उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों का हवाला दिया गया था.
इसके बाद बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनन मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि नालसार के 2026 बैच के किसी भी ग्रेजुएट का नामांकन न किया जाए.
इसी विवाद के बीच बाद नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरू के छात्रों और पूर्व छात्रों ने नालसार के छात्रों के समर्थन में एक खुला पत्र जारी किया था.
उन्होंने मांग की थी कि सीजेआई सूर्यकांत और बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को बेंगलुरू के दीक्षांत समारोह में भी आमंत्रित करने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए.
सीजेआई सूर्यकांत ने जताई थी नाराज़गी
इसके बाद से ही मनन मिश्रा और बीसीआई सोशल मीडिया पर चर्चाओं के केंद्र में आ गए.
लाइव लॉ के मुताबिक़, उस समय सीजेआई ने कहा था, "बीसीआई बेवजह कार्रवाई कर रहा है. अगर छात्रों के पास विरोध करने का कोई मुद्दा है तो उन्हें विरोध करने का अधिकार है."
"हो सकता है छात्रों ने मुझे कोई पत्र लिखा हो. यह छात्रों और मेरे बीच का संवाद है. बीसीआई कौन होता है जो बेवजह इस मुद्दे को उठाए? यह पूरी तरह अनावश्यक है. बीसीआई का इससे कोई लेना-देना नहीं है."
उन्होंने अपने छात्र जीवन का जिक्र करते हुए कहा था कि वह खुद भी छात्र गतिविधियों में शामिल रहे हैं.
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